*आनन्द की चाबी**
*जैसे एक ही चाबी ताले को खोलती भी है और बंद भी करती है!*
*उसी प्रकार एक ही मन बंधन का भी हेतु है और यही मुक्ति का हेतु भी हो सकता है।*
जैसे एक दिशा में घुमाने से ताला बंद हुआ है, विपरीत दिशा में घुमाने से खुलता है!
*वैसे ही संसार में लगा मन बंधनकारी है!*
*यदि इसे ईश्वर में लगा दें तो मुक्तिकारी हो जाए।*
चाबी की निंदा से कुछ नहीं होगा!ताला उसने नहीं उसे घुमानेवाले ने लगाया है!
इसी तरह मन की निंदा से भी क्या होगा?
क्योंकि मन स्वयं संसार में नहीं लगा! उसे तो आप ने लगाया है।
ये अलग बात है कि *आज से नहीं लगाया, कभी लगाया था। बस जीवन रूपी गेंद सीढ़ी से लुड़की तो लुड़कती चली गई। पानी में, मिट्टी मिल गई!*
अब पानी साफ कैसे हो? कचरा फैला तो एक पल में दिया लेकिन समेटने में बहुत प्रयास लगता है।
मन तो ऐसा है कि *इस पर हर भाव अंकित हो जाता है! इसी को संस्कार कहते हैं।*
*न मालूम कब संसार के संस्कार का बीज पड़ा!अंकुर फूटा, वृक्ष फला! उन फलों से पुनः अनन्त बीज बनकर इसी मन की भूमि में पड़ते रहे और अब यह घोर घना जंगल कैसे कटे?*
*इसलिए जल्दबाजी न करें, घबराएँ नहीं! समझकर चलें!मुश्किल भले लगे लेकिन मंजिल का मिलना असंभव नहीं है।*
*याद रखें-*
*इससे पहले कि मृत्यु आए!यदि नया संस्कार न पड़े और पिछले मिट जाएँ! तो बात बन जाए।*
इसलिए समय के सदगुरु के पास जाकर *स्व-रूप* का बोध प्राप्त करें और उसके सतत अभ्यास में लगे रहें!
*तभी मन की यह चाबी सही दिशा में धूमेगी जहां आनन्द ही आनन्द होगा!*
*आपका जीवन आनंदमय बना रहे! 🌹🙏*

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