Love – Prem

प्रेम

एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए |
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एक दिन वह बीमार पड़ गया | अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे | उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।
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जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए |

उसने पिता से पूछा “ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?” पिता ने उत्तर दिया “अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |”
ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।i
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हमें भी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।
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जो प्राप्त है-पर्याप्त है
जिसका मन मस्त है
उसके पास समस्त है!!

The fear of death changes life

मृत्यु का भय जीवन को बदल देता है

एक बार की बात है सन्त तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था! उनके समक्षआया और बोला, *”गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं? ना आप किसी पर क्रोध करते हैंऔर ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं?”
कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए।

सन्त बोले, ”मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ!”
मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” ,शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।”
तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!”, सन्त तुकाराम दुखी होते हुए बोले।

कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं सन्त तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?

शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहांँ से चला गया। उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पर क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान-सुमिरणऔर पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया हो और उनसे माफ़ी मांँगता।

देखते-देखते सन्त की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।
शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं।
वह उनके समक्ष पहुंँचा और बोला, ”गुरु जी, मेरा समय पूरा होने वाला है,कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”

“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र! गुरु जी ने प्यार से उसे कहते हुए उससे पूछा, अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”,

शिष्य तत्परता से बोला कि नहीं-नहीं, महाराज, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे,मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी’!

सन्त तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरेअच्छे व्यवहार का रहस्य है।”
मैं जानता हूँ कि एक न एक दिन मुझे इस संसार से जाना है इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।

शिष्य समझ गया कि सन्त तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था।

अगर हम नियमित सेवा, सत्संग और साधना अभ्यास करते हैं तो हमको निन्दा, चुगली और तेरी-मेरी व्यर्थ की बातों में पढने की जरुरत ही नहीं है!
भजन-सुमिरण के सतत अभ्यास अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहिए। यही मनुष्य जीवन का सार है।

बाकी एक ना एक दिन जाना सबने है –
आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर!
कोई सिंहासन चढ चला, कोई बंधे जंजीर!!

glory of satsang

सतसंग की महिमा

अशान्ति, परेशानियाँ तब शुरू हो जाती हैं । जब मनुष्य के जीवन में सतसंग नहीं होता।

मनुष्य का जीवन आगे बढ़ता चला जा रहा है। लेकिन मनुष्य इस बारे में नहीं सोचता कि जीवन को कैसे जीना चाहिए!
मनुष्य ने धन कमा लिया, मकान बना लिया, शादी घर परिवार बच्चे सब हो गये, गाड़ी खरीद ली, – यह सब कर लेने के बाद भी मनुष्य का जीवन सफल नहीं हो पायेगा।

क्योंकि जिसके लिए यह जीवन मिला उसको तो मनुष्य ने समय दिया ही नहीं और संसार की वस्तुयें जुटाने में समय नष्ट कर दिया।
जीवन मिला था भगवान के भजन सुमिरण के लिए।
लेकिन मनुष्य माया का दास बनकर माया की प्राप्ति के लिए इधर – उधर भटकने लगता है और इस तरह मनुष्य का यह कीमती जीवन नष्ट हो जाता है।

जिस अनमोल रतन मानव जीवन को पाने के लिए देवता लोग भी तरसते रहते हैं। उस मानव जीवन को मनुष्य ब्यर्थ गवाँ देता है।

देवता लोगों के पास भोगों की कमी नहीं है! लेकिन फिर भी देवता लोग मनुष्य जीवन जीना चाहते हैं।

क्योंकि मनुष्य देह पाकर ही भक्ति का पूर्ण आनन्द और श्री गुरू महाराज जी की सेवा और सन्तों की कृपा से सतसंग का सानिध्य मिलता है।

सन्तो के संग से मिलने वाला आनन्द तो बैकुण्ठ में भी दुर्लभ है।

कबीर जी कहते हैं कि –
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय!
जो सुख साधु संग में, सो बैकुण्ठ न होय!

रामचरित्रमानस मेंं भी लिखा है कि–
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिए तुला एक अंग!
तुल न ताहि सकल मिली, जो सुख लव सतसंग!
हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जायें।
तब भी वह सब सुख मिलकर भी दूसरे पलड़े पर रखे हुए सत्संग बराबर नहीं हो सकते। जो क्षण मात्र की सतसंग से मिलता है ।

सतसंग से मनुष्य को जीवन जीने का तरीका पता चलता है।

सतसंग से ही मनुष्य को अपने वास्तविक कर्तव्य का पता चलता है।
मानस में लिखा है कि –
सत संगत मुद मंगल मूला!
सोईं फल सिद्धि सब साधन फूला!
अर्थात सतसंग सब मंँगलों का मूल है।

जैसे फूल से फल और फल से बीज और बीज से बृक्ष होता है । उसी प्रकार सतसंग से विवेक जागृत होता है और विवेक जागृत होने पर भगवान से प्रेम होता है और प्रेम से प्रभु की प्राप्ति होती है। सतसंग से मनुष्य के करोड़ों – करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं – सतसंग से मनुष्य का मन बुद्धि शुद्ध होती है। सतसंग से ही भक्ति मजबूत होती है ।भगवान की जब कृपा होती है । तब मनुष्य को सतसंग और सन्तों का संग प्राप्त होता है।

कहा है –
एक घडी आधी घडी आधी ते पुनि आध!
तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध!

आज मनुष्य हर पल चिन्तित रहने लगता है और हमेशा परेशान रहता है।

इन सब का कारण अज्ञानता है!
जब हम कोई मशीन घर में लेकर आते हैं तो उसके साथ एक बुकलेट भी मिलती है । जिसमें मशीन को कैसे चलाना है, इस बारे में लिखा होता है।

उसी प्रकार भगवान ने जब यह मानव शरीर दिया और इस मानव जीवन को सफल कैसे करना है – यह भी वेद-शास्त्र रुपी बुकलेट के सतसंग और सन्तों से पता चलता है।

इसलिए जीवन से सतसंग को अलग नहीं करना चाहिए!

जब सतसंग जीवन में नहीं रहेगा तो संसार के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और संसार के प्रति मोह, मनुष्य के जीवन को विनाश की तरफ ले जाता है।

सतसंग की अग्नि में मनुष्य के सारे विकार नष्ट हो जाते हैं –

आनन्द कहीं बाहर नहीं है वो भीतर ही है लेकिन मनुष्य के मन के चारों तरफ संसार के मोह की चादर लपेट रखीं है।

इसलिए वो आनन्द ढक जाता है और महसूस नहीं होता – और जब सतसंग से और गुरु दरबार की सेवा से, महाराज जी के दर्शन करने से मोह रुपी चादर हट जाती है।

तब आनन्द ही आनन्द मिलने लगता है। जीवन में जो भी अशान्ति, परेशानी, विकार आदि रहते हैं उनको सतसंग हटा देता है और मनुष्य को एक निर्मल चरित्र बना देता है । इसलिए कहा है कि –
जाने बिनु न होय परतीति,
बिनु परतिती होई न प्रीति!!

जब तक श्री गुरु महाराज जी के चरणों में पूर्ण समर्पण नहीं होगा।तब तक विवेक जागृत नहीं होगा –
बिनु सतसंग विवेक न होई –

इसलिए जीवन में सतसंग को हमेशा बनाये रखना चाहिए और जब भी जहांँ भी सतसंग सुनने या सतसंग में जाने का मौका मिले तो दुनिया वालों की परवाह कियें बिना ही पहुंँच जाना चाहिये!

  जय सच्चिदानन्द

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Find the way in yourself!

खुद में रा़स्ता ढूढ़े!

एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुःखी लग रहा था। वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुःखी हूँ! मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ – काफी लगन से भी काम करता हूँ; लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया।
भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ।
स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए। उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था!
उन्होंने उस व्यक्ति से कहा– तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा।

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा। काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था।

स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो?

तो उस व्यक्ति ने कहा कि मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पर चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था। हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है।

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा- यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पर जाने की बजाय; दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो!

जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो मतभेदों की धारणा से उत्पन्न होने वाले सभी भय दूर होने लगते हैं और व्यक्ति इस संसार के दुखों को पार करने में सक्षम हो जाता है। 
यही एक ब्रह्मज्ञानी के अनुभव की स्थिति और सच्ची भक्ति का आधार है!
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We don’t want money, we want peace!

धन नही चैन चाहिए!

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने भगवान से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।

एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।

उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां!
मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।

बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि – तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।

कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।

ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।

फिर व्यक्ति भरे मन से बोला, हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया?

प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था? जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहां क्या करने आए हो?

उसकी आंखों में आंसू भर आ गये; ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए।

ठाकुर जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे और मन की शांति के लिए ही आओगे!

ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता! इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है।
वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला- मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने का मौका दीजिए।

सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है जिसे समय के सद्गुरु की सेवा से महसोस किया जाता सकता है!
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How far do the sinful deeds go?

पाप कर्म कहांँ-कहांँ तक जाते हैं ?

एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते हैं,तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी।

अब यह जानने के लिए ऋषि ने तपस्या की और समझाना चाहा कि ये पाप कहाँ जाते हैं?

तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए।

ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है?

भगवन ने कहा कि चलो गंगा से ही पूछते हैं!

दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि, हे गंगे ! सब लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते हैं, तो इसका मतलब आप भी पापी हुई।

गंगा ने कहा, मैं क्यों पापी हुई , मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ!

अब वे लोग समुद्र के पास गए और बोले, हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए?

समुद्र ने कहा, मैं क्यों पापी हुआ, मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ।

अब वे लोग बादल के पास गए और पूछने लगे, हे बादल! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देता हैतो इसका मतलब आप पापी हुए।

बादलों ने कहा मैं क्यों पापी हुआ!मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ। पापियों का नुकसान होता है और धर्मी ज्ञानीयों के लिए अन्न उपजता है, जिसको मानव खाता है; उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है। जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है।

शायद इसीलिये कहते हैं – “जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मनl”

अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता हैऔर जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है। वैसे ही विचार मानव के बन जाते हैं!

इसीलिये सदैव भोजन से पहले श्री सदगुरुदेव महाराज जी के लिए दसवाँ हिस्सा निकाल कर खाना चाहिए। और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।श्रद्धा-प्रेम की सेवा ही गुरु दरबार में काम आती है।

positive attitude

सकरात्मक दृष्टिकोण

एक गरीब आदमी बड़ी मेहनत से एक-एक रूपया जोड़ कर मकान बनवाता है। उस मकान को बनवाने के लिए वह पिछले 20 वर्षों से एक-एक पैसा बचत करता है, ताकि उसका परिवार छोटे से झोपड़े से निकलकर पक्के मकान में सुखी से रह सके।

आखिरकार एक दिन मकान बन कर तैयार हो जाता है। तत्पश्चात पंडित से पूछ कर गृह प्रवेश के लिए शुभ तिथि निश्चित की जाती है।

लेकिन गृहप्रवेश के 2 दिन पहले ही भूकंप आता है, और उसका मकान पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है।

यह खबर जब उस आदमी को पता चलती है तो वह दौड़ा दौड़ा बाजार जाता है और मिठाई खरीद कर ले आता है।

मिठाई लेकर वह घटनास्थल पर पहुंचता है, जहां पर काफी लोग इकट्ठे होकर उसके मकान गिरने पर अफसोस जाहिर कर रहे थे।

ओह बेचारे के साथ बहुत बुरा हुआ, कितनी मुश्किल से एक – एक पैसा जोड़कर मकान बनवाया था।

इसी प्रकार लोग आपस में तरह तरह की बातें कर रहे थे।

वह आदमी वहाँ पहुंचता है और झोले से मिठाई निकाल कर सबको बाँटने लगता है।

यह देखकर सभी लोग हैरान हो जाते हैं।

तभी उसका एक मित्र उससे कहता है कि कहीं तुम पागल तो नहीं हो गए हो, घर गिर गया, तुम्हारी जीवन भर की कमाई बर्बाद हो गई और तुम खुश होकर मिठाई बांट रहे हो।

वह आदमी मुस्कुराते हुए कहता है कि –
तुम इस घटना का सिर्फ नकारात्मक पक्ष देख रहे हो इसलिए इसका सकारात्मक पक्ष तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा है।

ये तो बहुत अच्छा हुआ कि मकान आज ही गिर गया वरना तुम्हीं सोचो अगर यह मकान 2 दिनों के बाद गिरता तो मैं मेरी पत्नी और बच्चे सभी मारे जा सकते थे, तब कितना बड़ा नुकसान होता।

नकारात्मक दृष्टिकोण को त्याग दीजिये,अपने घर मे बच्चों तथा बुजुर्गो को कहिये-
“आप स्वस्थ रहिये, खुश हम आपको रख लेंगे!”

हर व्यक्ति सुबह उठकर प्लान करता है कि आज 2 बजे वहाँ जाऊंगा।

आज 4 बजे उससे मिलूंगा जबकि अगले पल का भरोसा नहीं।

सुबह उठकर मन मे सोचिए कि “श्री हरि इच्छा, देखे आज ईश्वर, क्या करवाता है, कैसा दिन गुजरवाता है!”

जो है वो सबसे बढ़िया है! क्योंकि वो जो नहीं है वो अगर सबसे बढ़िया होता तो वही होता, ये न होता!

अर्थात जो है वो सबसे बढ़िया है। जो नहीं है वो मेरे लिए बढ़िया नहीं रहा होगा इसलिए ईश्वर ने नही होने दिया!

आप सभी का दिन शुभ हो।
🙏🙏🙏🙏🙏🏻😊

समय के सद्गुरु में पूर्ण समर्पण से भटकाव खत्म होता है!

समय के सद्गुरु में पूर्ण समर्पण से भटकाव खत्म होता है!

एक बगीचा था। नाना प्रकार के पुष्प उसमें खिले हुए थे और एक भौंरा एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर बैठता था।

परंतु एक चंपा का जो विशाल वृक्ष था- उस चंपा के बड़े फूल में बड़ी सुंदरता और खूशबू होती है, लेकिन वह भौंरा उस बड़े चंपा के फूल पर नहीं जाता था।

तो एक महात्मा जी उस बागवानी में, उपवन में आए और यह सब कुछ देखकर के चंपा से पूछने लगे!

महात्मा जी ने अपना प्रश्न किया कि ये चंपा के फूल! तेरे में रूप भी है, सुंदरता भी है, खूशबू भी है और आकार भी तेरा बहुत बड़ा है, अन्य पुष्पों की तुलना में, परंतु क्या कारण है कि यह भौंरा तेरे पास नहीं आ रहा है!

तो चंपा ने महात्मा जी को जवाब दिया कि –
मुझमें तीन गुण रूप रंग और सुबास!
जगह जगह के मीत को कौन बिठावे पास!

आपने ठीक फरमाया कि मेरे में तीनों गुण विद्यमान हैं परंतु यह दर-दर का भटकने वाला भौंरा कभी किसी पुष्प पर जाता है, कभी किसी पुष्प पर जाता इसका समर्पण नहीं है किसी चीज के प्रति!

इसीलिए कहा है कि A man can become jack of all trades but Master of Non कि आदमी जो है बहुत कुछ सीख सकता है पर किसी एक चीज के ऊपर पूर्णतः अधिकार प्राप्त नहीं किया तो उसे असली चीज से वंचित होना पड़ता है!

अतः इसीलिए भक्ति के अंदर तद्रुपता और पूर्णतः समर्पण ही भक्ति की सफलता है।

इसलिए हर मानव परमपिता परमात्मा का एक जीता-जागता मंदिर है।

यह हमारा जो पंच भौतिक शरीर है यह परमात्मा की जीती-जागती मस्जिद है। उसका जीता-जागता गुरुद्वारा है। उसका जीता-जागता मंदिर है और इसके अंदर प्राण रूप में वह परमात्मा हमारे अंदर प्रतिष्ठित है।

पर हम बेखबर हो गए हैं और इधर-उधर भटकते हैं!

संत महापुरुष कहते हैं कि दुनियां के शोर से अपना ध्यान हटाकर अपने अंदर की शक्ति को पहचानो!

वह कैसे पहचानी जाएगी?

जब हमें समय के सच्चे सद्गुरु मिल जाते हैं, उनका मार्गदर्शन मिलता है तो हमारी भटकन समाप्त हो जाती है!

When we keep saying, we don’t have time for devotion then what is the result.

जब हम कहते रहते हैं, हमारे पास भक्ति के लिए समय नहीं है तो परिणाम क्या होता है।

एक बहुत बड़ा सौदागर नौका लेकर दूर-दूर देशों में करोड़ों रुपये कमाने जाता था।
उसके मित्रों ने उससे कहा कि तुम नौका में घूमते हो। पुराने जमाने की नौका है। समुद्र में तूफ़ान आते हैं, खतरे बहुत होते हैं और नावें डूब जाती हैं। तुम तैरना तो सीख लो।

सौदागर ने कहा कि तैराकी सीखने के लिए मेरे पास समय कहां है?

लोगों ने कहा, ‘ज्यादा समय की जरूरत नहीं है। गाँव में एक कुशल तैराक है, जो कहता है कि वह तीन दिन में ही तैरना सिखा देगा।’

सौदागर बोला – ‘हाँ! वह जो कहता है तो ठीक ही कहता होगा; लेकिन मेरे पास तीन दिन कहाँ? तीन दिन में तो मैं हज़ारों का कारोबार कर लेता हूँ। तीन दिन में तो लाखों रूपए यहां से वहाँ हो जाते हैं। कभी फुरसत मिलेगी तो जरूर सीख लूंगा।’

फिर भी लोगों ने कहा कि ख़तरा बहुत बड़ा है! तुम्हारा जीवन निरन्तर नाव पर है और दाँव पर है। किसी भी दिन जान को ख़तरा हो सकता है और तुम तो तैरना भी नहीं जानते।

उसने कहा कि और कोई सस्ती तरकीब हो तो बताओ! इतना समय तो मेरे पास नहीं है।
तो लोगों ने कहा कि कम से कम दो ख़ाली पीपे अपने पास रख लो। कभी ज़रूरत पड़ जाए तो उन्हें पीठ पर बाँध लेना ताकि उन्हें पकड़कर तुम तैर तो सकोगे।

उसने दो खाली पीपे मुंह बन्द करवाकर अपने पास रख लिए। उनको हमेशा अपनी नाव में जहां वो सोता वहीं रख लेता।
किसी को पता भी न था कि एक दिन वह घड़ी आ ही गई। तूफ़ान उठा और नाव डूबने लगी।

वह चिल्लाया, ‘मेरे पीपे कहां हैं?’

उसके नाविकों ने बताया कि वे तो उसके बिस्तर के पास ही रखे हुए हैं।

बाकी नाविक तो कूद गये, कयोंकि वे तैरना जानते थे।

वह अपने पीपों के पास गया। दो खाली पीपे भी वहां थे जो उसने तैरने के लिए रखे थे और दो स्वर्ण मुद्राओं से भरे पीपे भी थे! जिन्हें वह लेकर आ रहा था।

उसका मन डांवाडोल होने लगा कि कौन से पीपे लेकर कूदे! सोने से भरे हुए या खाली पीपे?

फिर उसने देखा कि नाव डूबने वाली है। खाली पीपे लेकर कूदने से क्या होगा? मेरा सोना तो डूब ही जाएगा! उसने अपने सोने से भरे पीपे लिए और कूद गया।

इस प्रकार जो अंत उस सौदागर का हुआ होगा, वह आप समझ सकते हैं – कयोंकि वह तैरने के लिए समय नहीं निकाल सका था। उसे तो बचने का मौका भी मिल गया था। वह खाली पीपे लेकर कूद सकता था, लेकिन समय पर उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और वह भरे पीपे लेकर कूद गया और अपने जीवन से हाथ धो बैठा।

यही हाल हमारा भी है। क्या हम अभ्यास के लिय समय निकाल रहे हैं? या यही बहाना है कि अभी थोड़ा व्यापार संभाल लें! थोड़ा मकान देख लें! परिवार में मेरे बिना सब चौपट हो जाएगा! थोड़ा उसको भी देख लें! बस ऐसे ही जीवन निकाल रहे हैं।

हम तैरना कब सीखेंगे? जबकि हम संसार-सागर में टूटी हुई नाव में बैठे हैं।

सभी सन्त महात्मा पुकार-पुकार कर सावधान कर रहे हैं, लेकिन हमारे पास समय नहीं है।

यहां तक कि सत्संग और सेवा के 2 खाली पीपे भी हमने साथ नहीं रखे हैं।
उनको भी हमने अहंकार और दौलत के दिखावे से भर रखा है!

क्योंकि जिनको जीवन भर दिखावे, अहंकार और दौलत से भरे-भरे, फूले-फूले होने की आदत होती है – वे एक क्षण भी खाली होने को राजी नहीं हो सकते।

इसलिय कुछ वख्त अपने लिय भी निकालें – अपने अन्दर बैठे उस अविनाशी का सानिध्य पाने के लिय, स्वयं की आवाज सुनने के लिय – इसी में जीवन की सफलता और समझदारी निहित है!

cost of man

मनुष्य की कीमत

एक बालक अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में काम करता था। एक दिन बालक ने अचानक ही अपने पिता से पूछा – “पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की क्या कीमत होती है?”

पिताजी एक छोटे से बच्चे से ऐसा गम्भीर सवाल सुन कर हैरान रह गये। फिर वे बोले “बेटे एक मनुष्य की कीमत आँकना बहुत मुश्किल है, वो तो अनमोल है।”
बालक ने फिर पूछा – क्या सभी उतना ही कीमती और महत्त्वपूर्ण हैं?
पिताजी – हाँ बेटे।
बालक कुछ समझा नहीं उसने फिर सवाल किया – तो फिर इस दुनिया में कोई गरीब तो कोई अमीर क्यो है? किसी की कम रिस्पेक्ट तो किसी की ज्यादा क्यो होती है?
सवाल सुनकर पिताजी कुछ देर तक शान्त रहे और फिर बालक से स्टोर रूम में पड़ा एक लोहे का रॉड लाने को कहा!
लोहे की रॉड लाते ही पिताजी ने पूछा – इसकी क्या कीमत होगी?
बालक बोला – करीब 200 रूपये!
पिताजी बोले – *अगर मैं इसके बहुत से छोटे-छटे कील बना दूँ तो इसकी क्या कीमत हो जायेगी?
बालक कुछ देर सोच कर बोला – *तब तो ये और महंँगा बिकेगा लगभग 1000 रूपये का!?
फिर पिताजी कहा कि – अगर मैं इस लोहे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो?

बालक कुछ देर गणना करता रहा और फिर एकदम से उत्साहित होकर बोला – ”तब तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा हो जायेगी।”

फिर पिताजी उसे समझाते हुए बोले – “ठीक इसी तरह मनुष्य की कीमत इसमें नहीं है कि अभी वो क्या है, बल्कि इसमें है कि वो अपने आप को क्या बन सकता है!”
अब बालक अपने पिता की बात समझ चुका था।

यह बात सत्य हैं कि यह मानव चोला जो हमें मिला है यह देव दुर्लभ है!
इसमें अथाह शक्ति और संभावनाएं निहित हैं! हमारा यह जीवन हमेशा सम्भावनाओ से भरा होता है। हमारे जीवन में कई बार परिस्थितियाँ अच्छी नही होती है,पर इससे हमारी कीमत कम नहीं होती है।

मनुष्य के रूप में हमारा जन्म इस दुनिया मे भगवान का भजन-सुमिरण करने के लिए हुआ है ।हमें अपने सदगुरु जी की सेवा करके, उनसे आत्मज्ञान जानकर मनुष्य जीवन को सफल बनाना चाहिए। यही जीवन का सच्चा उद्देश्य है!
संतों ने भी कहा है कि –
नर तन पाय यतन कर ऐसा, जिससे वह करतार मिले!
एसी उत्तम योनी पदारथ, फिर नहीं बारम्बार मिले!
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