कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।
जोग न मख जप तप उपवासा।।
सरल सुभाऊ न मन कुटिलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई।।
~(उत्तरकांड ४५/१)
राज्याभिषेक उपरांत एक बार रामजी ने सभी नगरवासियों को बुलाया है। सभी को इसलोक व परलोक दोनों जगह सुखी होने का उपाय अपनी भक्ति बताया है। वे आगे कहते हैं कि भक्ति में कौन का परिश्रम लगता है। इसमें योग, यज्ञ, जप, तप, उपवास की कोई आवश्यकता नहीं है। बस सरल स्वभाव हो, मन में कुटिलता न हो तथा जो कुछ मिले उसी में संतोष रखें।
सुखी होने का यह सरलतम मार्ग रामजी हमें आपको बताया है। हम आप योग, यज्ञ, उपवास आदि तो खूब कर लेते हैं, पर सरलता है कि आती नहीं और कुटिलता है कि जाती नहीं है। वस्तुतः ये दोनों तो सतत आत्मचिंतन करने पर ही आती व छूटती हैं!
इसलिय सहज और सरल बनकर ही हमको संतुष्टि का बोध हो सकता है!
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