अपनी ही गठरी टटोलें!

अपनी ही गठरी टटोलें! 🌹
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एक राह पर चलते-चलते
दो व्यक्तियों की मुलाकात हुई।
दोनों का गंतव्य स्थान एक था,
तो दोनों यात्रा में साथ हो चले।

सात दिन बाद दोनों के अलग
थलक होने का समय आया तो
एक ने कहा- “भाई साहब!
एक सप्ताह तक दोनों साथ रहे,
क्या आपने मुझे पहचाना?”
दूसरे ने कहा:- “नहीं,
मैंने तो नहीं पहचाना।”
*पहला यात्री बोला😘
“महोदय, मैं एक नामी ठग हूँ,
परन्तु आप तो महाठग हैं।
आप मेरे भी गुरू निकले।”
दूसरा यात्री बोला:- “कैसे ?”
पहला यात्री- “कुछ पाने की
आशा में मैंने निरंतर सात दिन
तक आपकी तलाशी ली,
मुझे कुछ भी नहीं मिला।
इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं
तो क्या आपके पास कुछ नहीं है?
आप बिल्कुल खाली हाथ हैं?”

दूसरा यात्री:- “मेरे पास
एक बहुमूल्य हीरा है और
थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी हैं।”
*पहला यात्री बोला😘
“तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद
वह मुझे मिले क्यों नहीं?”
दूसरा यात्री- “मैं जब भी बाहर
जाता, हीरा और मुद्राएं तुम्हारी
पोटली में रख देता था और तुम
सात दिन मेरी झोली टटोलते रहे।
अपनी पोटली सँभालने की
जरूरत ही नहीं समझी, तो
फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से?”

यही समस्या हर इंसान की है।
इंसान अपने सुख से सुखी नहीं है
पर दूसरे के सुख से दुखी है,
क्योंकि निगाह सदैव दूसरे
की गठरी पर ही होती है !!

ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी
झोल़ी में डालता है, परन्तु
हमें अपनी गठरी पर निगाह
डालने की फुर्सत ही नहीं है।
यही सबकी मूलभूत समस्या है।
जिस दिन से इंसान दूसरे की
ताकझांक बंद कर देगा, उस क्षण
समस्या का समाधान हो जाऐगा!

“अपनी गठरी ही टटोलें।”
जीवन में सबसे बड़ा गूढ़ मंत्र है।
स्वयं को टटोले और आगे बढ़े
सफलतायें आप की प्रतीक्षा में हैं।

🙏🙏🙏🙏🙏

आधुनिक युग का
*सबसे बड़ा आश्चर्य है कि-
इंसान इंटरनेट द्वारा
समग्र ब्रह्मांड में स्थित
वस्तुओ का रहस्य
जानना चाहता है!
किन्तु…
मैं कौन हूँ ?
मैं कहाँ से आया हूँ ?
मुझे कहाँ जाना है ?
यह जानने का
प्रयास ही नहीं करता।

आज का दिन आपका शुभ हो l
🌹🙏🌹