जीवन में संतुलन

जीवन में संतुलन

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था – रवि। वह हमेशा बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था!

इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक महोदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा।

क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक महोदय के कमरे में पहुंचा।

रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो। इसलिए इसका सीधा असर तुम्हारी पढ़ाई में भी साफ नजर आ रहा है! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक महोदय ने पूछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ, और किसी चीज में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता हूँ।

अध्यापक महोदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और मन ही मन उसे फिर से सही रास्ते पर लाने का विचार करके *रविवार को घर पर बुलाया।

रवि निश्चित समय पर अध्यापक महोदय के घर पहुँच गया।

रवि क्या तुम नीबू शरबत पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पूछा।

जी। रवि ने झिझकते हुए कहा।

अध्यापक महोदय ने नीम्बू शरबत बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा कम ही रखी।

शरबत का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया।

अध्यापक महोदय ने पूछा, क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था कि अध्यापक महोदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम का नहीं रहा!

ऐसा कह कर अध्यापक महोदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

बिलकुल ठीक, रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था…. अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो! शरबत में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है!

और अब इस बात को समझो, शरबत का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते!
इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शरबत का स्वाद ठीक कर सकते हैं – उसी तरह पुरानी कड़वाहट और दुखों को मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने अतीत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्ज्वल हो पाएगा। अध्यापक महोदय ने अपनी बात पूरी की।

रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था! उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

अक्सर बंद होते हुए दरवाजे की तरफ इतनी देर तक देखते रहते हैं कि हमें खुलते हुए अच्छे दरवाजों की भनक तक नहीं लगती और हमारा जीवन दुखों के सागर में ही डूबा रह जाता है!
जरुरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों या फिर तकलीफ़ों को भूलना सीखें और जिंदगी को फिर से नयी दिशा की और मोड़ें।
इसलिए –
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

नदी का घमंड

नदी का घमंड

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही गर्वीले शब्दों में कहा बताओ पानी के प्रचंड वेग से मैं तुम्हारे लिए  क्या बहा कर लाऊं ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूं ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है । उसने कहा, यदि मेरे लिए कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना । समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूं । नदी ने अपने पानी का प्रचंड प्रवाह घास उखाड़ने के लिए लगाया परंतु घास नहीं उखड़ी । नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी के वेग के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती । नदी को सफलता नहीं मिली ।

थकी हारी निराश नदी समुंद्र के पास पहुंची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान, वृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बहाकर ला सकती हूं परंतु घास उखाड़ कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचंड वेग से खास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आई ।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचंड वेग भी नहीं अखाड़ सकता । समुद्र की बात सुनकर नदी का घमंड भी चूर चूर हो गया ।

विनम्रता अर्थात् जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं । नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है । नम्रता में सर्व का सम्मान संचित है । नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है । नम्रता ही बड़प्पन है । दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहिए । संसार को विनम्रता से जीत सकते हैं । ऊंची से ऊंची मंजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिए ।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमंड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता । स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है । जहां विरोध हो जहां प्रतिरोध और बल से काम नहीं चल सकता । विनम्रता से ही समस्याओं का हल संभव है । विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता । जो व्यक्ति अहं कार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वप्रिय बन जाता है ।

परिवार से जुड़े रहे – जोड़ते रहे 🙏💐

अहँकार और विनम्रता

अहँकार और विनम्रता

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही अहंकारी शब्दों में कहा, बताओ पानी की प्रचंँड वेग से मैं तुम्हारे लिए क्या बहा कर लाऊंँ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूंँ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है। उसने कहा, यदि मेरे लिये कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना।

समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूंँ।

नदी ने अपने पानी का प्रचन्ड प्रवाह घास उखाड़ने के लिये लगाया परन्तु घास नहीं उखड़ी। नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी बहाव के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती। नदी को सफलता नहीं मिली। थकी हारी निराश नदी समुद्र के पास पहुंँची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान बृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बाहर कर ला सकती हूंँ परन्तु घास उखाड़कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचन्ड वेग से घास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आयीं।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचन्ड पानी का वेग भी नहीं उखाड़ सकता।

समुद्र की बात सुनकर नदी का घमन्ड भी चूर-चूर हो गया।

इसलिए ज्ञान मार्ग में विनम्रता अर्थात जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं। जिसमें नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है – वही आनन्द प्राप्त करता है!
क्योंकि नम्रता में सबका सम्मान संँचित है। नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है।नम्रता ही बड़प्पन है।

अगर दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहियें। संँसार को विनम्रता से ही जीत सकते हैं। उँची से ऊँची मंँजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिये।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमन्ड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता। स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है।

जहांँ विरोध हो, जहांँ प्रतिरोध और बल से काम नहीं कर सकता। विनम्रता से ही समस्याओं का हल सम्भव है। विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता है। जो व्यक्ति अहंँकार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वोपरि बन जाता है।
गुरु दरबार में भी विनम्रता से ही ज्ञान समझ में आता है।

क्रोध और नियंत्रण

क्रोध और नियंत्रण

एक समय की बात है। एक राजा घने जंगल में भटक गया। कई घंटों के बाद वह प्यास से व्याकुल होने लगा। तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहां एक डाली से टप-टप करती पानी की छोटी-छोटी बूंदें गिर रही थीं… राजा ने पत्तों का दोना बनाकर पानी इकट्ठा किया, राजा जैसे ही पानी पीने लगा।

एक तोता आया और झपट्टा मार दोने को गिरा दिया। राजा ने सोचा पंछी को प्यास लगी होगी इसलिए वह भी पानी पीना चाहता था लेकिन गलती से उसने झपट्टा मारकर पानी को गिरा दिया…

यह सोचकर राजा फिर से खाली दोने को भरने लगा, काफी देर के बाद वह दोना फिर भर गया। राजा ने हर्षचित्त होकर जैसे ही दोने को उठाया तो तोते ने वापस उसे गिरा दिया।

राजा को बहुत तेज गुस्सा आया और उसने चाबुक उठाकर तोते पर वार किया और उसके प्राण निकल गए…

राजा ने सोचा अब मैं शांति से पानी इकट्ठा कर अपनी प्यास बुझा पाऊंगा। यह सोचकर वह डाली के पास वापस पानी इकट्ठा होने वाली जगह पहुंचा तो उसके पांव के नीचे की जमीन खिसक गई…

उस डाली पर एक जहरीला सांप सोया हुआ था और उस सांप के मुंह से लार टपक रही थी। राजा जिसको पानी समझ रहा था वह सांप की जहरीली लार थी… राजा का मन ग्लानि से भर गया। उसने कहा काश मैंने संतों के बताए उत्तम क्षमा मार्ग को धारण कर क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो… मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नहीं जाती..!!

शिक्षा:-

जल्दबाजी और बिना सोचे-विचारे किया काम हमेशा परेशानी और पश्चाताप का कारण बनता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

सम्बन्ध- स्वार्थ के!

सम्बन्ध- स्वार्थ के!
एक बूढ़ा मर रहा था। मरा नहीं था, बस मर ही रहा था।

उसके चार बेटे उसके पास ही खड़े थे।
उनके नाम थे- सोम, मंगल, बुध, वीर। वह चाहता तो सात बेटे था, पर मंहगाई के चलते चार पर ही संतोष कर लिया था।

ये चारों बेटे आपस में अपने पिता की अंतिम यात्रा की तयारी कर रहे थे –

पहला बेटा सोम सलाह देता है कि, भाई! जब पिताजी मर जाएँगे तो उनकी शवयात्रा हम गुप्ता जी की मर्सिडीज़ में निकालेंगे। लोग भी तो देखें कि किसका बाप मरा है।

दूसरे बेटे मंगल ने कहा – भैया! गुप्ता जी कार दे तो देंगे पर सारी उम्र सुनाएँगे कि तुम्हारा बाप मरा था, तो मैंने कार दी थी। मैं अपने दोस्त बंटी की होंडा माँग लाऊँगा। होंडा भी कोई छोटी कार नहीं।

तीसरा बेटा बुध कहने लगा – अरे मंगल भाई! मालूम भी है कि होंडा धुलवाना कितना मंहगा है?
मैंने कल ही अपनी आल्टो ठीक करा ली है, उसी में ले चलेंगे। कार तो कार है, छोटी हो या बड़ी? और सारी जिंदगी पिताजी ने कंजूसी में बिताई है, क्या यह बात लोग नहीं जानते?

इतने में चौथे बेटे वीर ने भी अपनी राय दी कि – देखो भैया! बुरा न मानना। आल्टो में पिताजी की लाश ले तो जाएँगे पर फिर हमेशा उसमें बैठते वहम आया करेगा। श्मशान वालों ने इस काम के लिए एक ठेला बनाया हुआ है। अब कार हो या ठेला, मरने वाला तो मर ही गया, तब क्या फर्क पड़ता है?

जैसा कि शुरुआत में बताया कि अभी बूढ़ा मर रहा था, मरा नहीं था और वह तो अपने बेटों की बातों सब सुन रहा था।
वह बूढा व्यक्ति उठ कर बैठ गया और बोला- मेरी साइकिल कहाँ है? मेरी साइकिल लाओ! वह उठा और साइकिल चलाकर श्मशान घाट पहुँच गया! साइकिल से उतरा! साइकिल खड़ी की, भूमि पर लेटा और मर गया।

यही जगत के संबंधों की सच्चाई है। प्राण छूट जाने पर इस शरीर को कोई नाम ले कर भी नहीं बुलाता, सभी “लाश-लाश” कहते हैं। अभी भी समय है, जीते जी अपने अन्दर बैठे असली भगवान् से अपना संबंध बना लो। यही श्रेयष्कर होगा!
🌸🙏🌸🙏🌸🙏🌸🙏
सुप्रभात और सादर जय सच्चिदानंद
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

नज़र का ऑपरेशन संभव है लेकिन नजरिए का नहीं!

एक गांव के एक किनारे के समीप कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। इत्तेफाक से उसी समय उधर से एक साधु गुजरे। पत्थरों से बनते खंभे देखकर उन्होंने उन्होंने एक मजदूर से प्रश्न किया – “यहां क्या बन रहा है?”

झुंझलाकर उस मजदूर ने कहा – “देखते नहीं, पत्थर काट रहा हूं?”

साधु ने कहा- ‘हां, देख तो रहा हूं। लेकिन यहां बनेगा क्या?”

मजदूर झुंझला कर बोला- “मालूम नहीं। यहां पत्थर तोड़ते- तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा।”

मजदूर की बात सुनकर साधु महाराज आगे बढ़ गए। आगे एक दूसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी पूछा- “यहां क्या बनेगा?”

मजदूर ने साधु को ऊपर से नीचे निहारते हुए कहा- “देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या! मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में १०० ₹ मिलते हैं। बस शाम को ₹ मिलें और मेरा काम बने।मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है!”

साधु महाराज आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी वही प्रश्न किया तो मजदूर ने कहा- “मंदिर। इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं है! इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक- एक छैनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छैनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है। मुझे आनंद की अनुभूति होती है। कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा मंदिर बनाने की मस्ती में रहता हूं। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं। बीच- बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया।”

साधु ने उसकी बातों को गंभीरता से सुनकर कहा- “यही जीवन का रहस्य है मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है।
कोई काम को बोझ समझ रहा है और पूरा जीवन झुंझलाते और हाय- हाय करते बिता रहा है लेकिन कोई काम को आनंद समझ कर जीवन का लुत्फ ले रहा है।जीवन से सम्बद्ध हर पल के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक होना चाहिए। सकारात्मकता सफलता की जननी है।

अपनी ज़िंदगी में बोई सकारात्मकता की फ़सल हमारे जीवन को तनावमुक्त कर हरा-भरा रखती। बस, अपने नज़रिए को बदलिए जीवन अपने आप बदल जायेगा!*
🙏🙏 सुप्रभात 🙏🏻🙏

रेत का घर

रेत का घर

एक गाँव में नदी के किनारे कुछ बच्चे खेलते हुए रेत के घर बना रहे थे। किसी का पैर किसी के घर को लग जाता और वो बिखर जाता! इस बात पर झगड़ा हो जाता। थोड़ी बहुत बचकानी उम्र वाली मारपीट भी हो जाती। फिर वह बदले की भावना से सामने वाले के घर के ऊपर बैठ जाता और उसे मिटा देता और फिर से अपना घर बनाने में तल्लीन हो जाया करता। यही बच्चो का काम था!

महात्मा बुद्ध चुपचाप एक ओर खड़े ये सारा तमाशा अपने शिष्यों के साथ देख रहे थे।

बच्चे अपने आप में ही मशगूल थे तो किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

इतने में एक स्त्री आकर बच्चो को कहती है – साँझ हो गयी है तुम सब की माताएं तुम्हारा रास्ता देख रही है।
बच्चो ने चौंकते हुए देखा दिन बीत गया है! साँझ हो गयी है और अँधेरा होने को है!

इसके बाद वो अपने ही बनाये घरों पर उछले कूदे सब मटियामेट कर दिया और किसी ने नहीं देखा कि कौन किसका घर तोड़ रहा है। सब बच्चे भागते हुए अपने घरों की और चल दिए!

महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा – तुम मानव जीवन की कल्पना इन बच्चों की इस क्रीडा से कर सकते हो!
क्योंकि
तुम्हारे बनाये शहर, राजधानियां सब ऐसे ही रह जाती है और तुम्हें एक दिन यह सब छोड़कर जाना ही होती है!तुम यहां जिन्दगी की भागदौड में सब भूल जाते हो और खुद से कभी मिल ही नहीं पाते!
जबकि
जाना तो सबका तय ही है!

इसलिए
कभी भी अधिक लम्बा सोचकर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए।
🌸🌸🙏🙏🙏🌸🌸

कर्म और ज्ञान

कर्म और ज्ञान

एक बार एक जंगल में आग लग गई! उसमें दो व्यक्ति फँस गए थे!
उनमें से एक अँधा तथा दूसरा लंगड़ा था! दोनों बहुत डर गए थे। अंधे ने आव देखा न ताव बस दौड़ना शुरू कर दिया!
अंधे को यह भी ख्याल नहीं रहा कि वो आग की तरफ दौड़ रहा था! लंगड़ा उसे आवाज़ देता रहा पर अंधे ने पलटकर जवाब नहीं दिया।
लंगड़ा आग को अपनी तरफ आती तो देख रहा था पर वह भाग नहीं सकता था।
अंत में दोनों आग में जलकर मर गए।

अंधे ने भागने का कर्म किया था पर उसे ज्ञान नहीं था की किस तरफ भागना है।
लंगड़े को ज्ञान था कि किस तरफ भागना है पर वो भागने का कर्म नहीं कर सकता था।

अगर दोनों एक साथ रहते और अँधा, लंगड़े को अपने कंधे पर बिठा कर भागता तो दोनों की जान बच सकती थी।

इस प्रसंग से यही अर्थ निकलता है कि कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है और ज्ञान के बिना कर्म व्यर्थ है!

यदि कोई अपने को ज्ञानी समझता हो तो उसे सतत्त ज्ञान का अभ्यास करना होगा अन्यथा ज्ञान होने के बाद भी खतरा निश्चित है!

पिता की प्रार्थना

पिता की प्रार्थना

एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा करते समय रास्ता भटक कर एक टापू पर पहुंच गये। उनकी नौका उन्हें ऐसी जगह ले आई थी जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।
         
परिस्थितियों से चिंतित होकर पिता ने पुत्र से कहा- “लगता है, हम दोनों का अंतिम समय निकट आ गया है। यहां तो दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है तो क्यों न हम ईश्वर से प्रार्थना करें।”
         
उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा- “हे भगवन! इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।” ईश्वर ने उसकी प्रार्थना अविलंब सुनी। तत्काल वहां पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। यह देखकर उसके मुख से बरबस ही निकल गया- “ये तो चमत्कार हो गया।”
         
अपनी पहली प्रार्थना पूर्ण होते देखकर उसने पुनः प्रार्थना की-” एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।” तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ?

उसने ऐसा ही किया और उसने प्रार्थना की-” एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।”

तत्काल वहां नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा। तभी एक आकाशवाणी ने उसे चोंका दिया- “बेटा! तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?”

आकाशवाणी सुनकर पुत्र ने कहा- “उनको छोड़ो! प्रार्थना तो उन्होंने भी की होगी लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ?’

पूत्र की बात का आशय समझ कर पुनः आकाशवाणी में कहा गया- “क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?क्या तुम यह नहीं जानना चाहोगे कि उनकी कौन सी प्रार्थना स्वीकार हुई और कौन सी अस्वीकार?”
         
पुत्र बोला-“हां, मैं अवश्य जानना चाहूंगा।”
         
आकाशवाणी में कहा गया-” तो सुनो!तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की- हे भगवन! मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना और इस प्रकार आज तुम्हें जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।”

         
💐💐शिक्षा💐💐

स्वार्थ की राह पर निकल कर हम अपने सगे-संबंधियों और शुभचिंतकों से दूर हो जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं। और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर पछताना पड़ता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

चूहा और हम।

चूहा और हम।

एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके डेरे पर बहुत दिनों से एक चूहा भी रहता आ रहा था। यह चूहा ऋषि से बहुत प्यार करता था। जब वे तपस्या में मग्न होते तो वह बड़े आनंद से उनके पास बैठा भजन सुनता रहता। यहाँ तक कि वह स्वयं भी ईश्वर की उपासना करने लगा था!

लेकिन कुत्ते-बिल्ली और चील-कौवे आदि से वह सदा डरा-डरा और सहमा हुआ सा रहता।
एक बार ऋषि के मन में उस चूहे के प्रति बहुत दया आ गयी। वे सोचने लगे कि यह बेचारा चूहा हर समय डरा-सा रहता है,क्यों न इसे शेर बना दिया जाए!

ताकि इस बेचारे का डर समाप्त हो जाए और यह बेधड़क होकर हर स्थान पर घूम सके। ऋषि बहुत बड़ी दैवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर उस चूहे को शेर बना दिया और सोचने लगे कि अब यह चूहा किसी भी जानवर से नहीं डरेगा और निर्भय होकर पूरे जंगल में घूम सकेगा!

लेकिन चूहे से शेर बनते ही चूहे की सारी सोच बदल गई! वह सारे वन में बेधड़क घूमता। उससे अब सारे जानवर डरने लगे और प्रणाम करने लगे।

उसकी जय-जयकार होने लगी।
किन्तु ऋषि यह बात जानते थे कि यह मात्र एक चूहा है वास्तव में शेर नहीं है।

अतः ऋषि उससे चूहा समझकर ही व्यवहार करते यह बात चूहे को पसंद नहीं आई कि कोई भी उसे चूहा समझ कर ही व्यवहार करे!

वह सोचने लगा कि ऐसे में तो दूसरे जानवरों पर भी बुरा असर पड़ेगा! लोग उसका जितना मान करते हैं, उससे अधिक घृणा और अनादर करना आरम्भ कर देंगे।

अतः चूहे ने सोचा कि क्यों न मैं इस ऋषि को ही मार डालूं!

फिर न रहेगा बाँस, न बजेगी बांसुरी; यही सोचकर वह ऋषि को मारने के लिए चल पड़ा!

ऋषि ने जैसे ही क्रोध से भरे शेर को अपनी ओर आते देखा तो वे उसके मन की बात समझ गये।उनको शेर पर बड़ा क्रोध आ गया।

अतः उसका घमंड तोड़ने के लिए  ऋषि ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे एक बार फिर चूहा बना दिया!

इस प्रसंग हमें सचेत करता है कि हमको भी कभी भी अपने हितैषी का अहित नहीं करना चाहिए, चाहे हम कितने ही बलशाली क्यों न हो जाए!
हमें उन लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए जिन्होंने हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दिया होता है! इसके अलावा हमें अपने बीते वक्त को भी नहीं भूलना चाहिए!
चूहा यदि अपनी असलियत याद रखता तो उसे फिर से चूहा नहीं बनना पड़ता! बीता हुआ समय हमें घमंड से बाहर निकालता है!
ज्ञान मार्ग में यह अक्सर देखने को मिलता है कि जब व्यक्ति अपने गुरु महाराजी के शरण में जाता है तो उस समय उसकी हालात भी उस चूहे के समान होती है!
जब महाराज जी अपनाते हैं, दया और करुणावश ज्ञान देते हैं, उसका हर प्रकार से डर दूर करके ज्ञान का उपहार देकर उसे सबल करते हैं, सेवा का अवसर भी देते हैं तो कुछ भक्त*ज्ञान अभ्यास से विमुख होकर वह अपनी पूर्व स्थिति को भूलकर उस चूहे की तरह अहंकारी बन जाते हैं और उनके मन में सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता भाव को भी खो देते हैं!
कहावत है कि –
धोबी का कुत्ता, घर का ना घाट का।
वही हाल अहंकारी और संवेदनहीन भक्त का होता है।
इसलिए,
एक अच्छे और सच्चे भक्त को बिना मन बुद्धि लगाए महाराजी की सेवा करना ही उसके लिए अभीष्ट है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏