बिना मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है!

एक ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजरा बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया किन्तु किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अऩ्न नहीं दिया आखिर दोपहर हो गयी ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा थाः “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक न मिला? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक न मिला?

इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस पर पड़ी उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली वे बड़े पहुँचे हुए संत थे उन्होंने कहाः
“ब्राह्मणदेव, तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना?”

ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है!”

संत बोले, नहीं ब्राह्मणदेव, मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं! अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब ही जी रहे हैं; कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है! कोई हिरण की से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है! उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता!
‘दूसरे लोगों में भी मेरा ही दिलबर ही है’- यह ज्ञान नहीं होता!
अतः तुमने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है!”

ब्राह्मणदेव के चेहरे के हावभाव देख दूरदृष्टि के धनी सिद्धपुरुष ने कहाः “देखो ब्राह्मणदेव, मैं तुम्हें यह चश्मा देता हूँ। इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँगना फिर देखना, क्या होता है?”

ब्राह्मणदेव जहाँ पहले गए थे; वहीं पुनः गये और योगसिद्ध कला वाले संत का चश्मा पहनकर गौर से देखाः ‘ओहोऽऽऽऽ…. वाकई कोई कुत्ता है! कोई बिल्ली है तो कोई बघेरा है! आकृति तो मनुष्य की है लेकिन संस्कार पशुओं के हैं! मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं!
घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गये तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है! ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो *उस में मनुष्यत्व का निखार पाया!

ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ मुझे बड़ी भूख लगी है लेकिन तेरे हाथ का नहीं खाऊँगा फिर भी मैं तुझसे माँगता हूँ क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है!”

उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु, आप भूखे हैं? हे मेरे रब आप भूखे हैं? इतनी देर आप कहाँ थे?”

यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर ( रेज़गारी ) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हलवाई भाई, मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ!”

यह कहकर मोची भागा घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया!

उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था! उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया! दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः “अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा!”

दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिसमें मानवता खिली थी! जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे! चित्त में दया-करूणा थी! उसमें ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था!

मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी!

राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ किस मोची ने बनाई है यह जूती?”

मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है!”

मोची को बुलाया गया उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली; राजा ने कहाः “जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है! जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो!”

मोची बोलाः “राजा साहिब तनिक ठहरिये यह जूती मेरी नहीं है! जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ!”

मोची जाकर विनयपूर्वक ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा साहब यह जूती इन्हीं की है!”

राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इसकी जूती कैसे?”

राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा, मैं तो ब्राह्मण हूँ यात्रा करने निकला हूँ!”

राजा ने कहा, “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे! इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची?”

मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मणदेव की होगी!

जब रकम इनकी है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ।

न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो?

इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए ना। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं!
हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और इसके असली अधिकारी को ले आया!”

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ?”

ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष संत के चश्मे वाली बात बतलाते हुए कहा कि “आप के राज्य में पशुओं के दीदार तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का विकास इस मोची में ही नज़र आया!”

राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें!”

राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारी वगैरह में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ!

राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ?
उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर!

उस के आश्चर्य की सीमा न रही! ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ !’

राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है वे योगी महाराज कहाँ होंगे?”

ब्राह्मण बोले – “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं!

श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं! बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते!

ब्राह्मण ने आगे कहाः ‘राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है! व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है!
एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है!”

अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हम में मनुष्यता खिली है? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है!

तुलसीदाज जी ने कहा हैः
बिगड़ी जनम अनेक की,
सुधरे अब और आजु!
तुलसी होई राम को,
रामभजि तजि कुसमाजु!!

कुसंस्कारों को छोड़ दे! बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे!अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा! यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे।

मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा!

अतः पशुत्व के संस्कारों को आप निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये – फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है!

सत्संग से, मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है!

बिना मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏

सकारात्मक रवैया !!

सकारात्मक रवैया !!

एक आदमी एक सेठ की दुकान पर नौकरी करता था। वह बेहद ईमानदारी और लगन से अपना काम करता था। उसके काम से सेठ बहुत प्रसन्न था और सेठ द्वारा मिलने वाली तनख्वाह से उस आदमी का गुज़ारा आराम से हो जाता था।

ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे। एक दिन वह आदमी बिना बताए काम पर नहीं आया। उसके न आने से सेठ का काम रूक गया।

तब सेठ ने सोचा कि यह आदमी इतने दिनों से ईमानदारी से काम कर रहा है। मैंने कब से इसकी तन्ख्वाह नहीं बढ़ाई। इतने पैसों में इसका गुज़ारा कैसे होता होगा?

सेठ ने सोचा कि अगर इस आदमी की तन्ख्वाह बढ़ा दी जाए, तो यह और मेहनत और लगन से काम करेगा। उसने उसी महीने से ही उस आदमी की तनख्वाह बढ़ा दी।

उस आदमी को जब एक तारीख को बढ़े हुए पैसे मिले, तो वह हैरान रह गया। लेकिन वह कुछ नहीं बोला और चुपचाप पैसे रख लिये! धीरे-धीरे बात आई गई हो गयी। कुछ महीनों बाद वह आदमी फिर कुछ दिन ग़ैर हाज़िर हो गया।

यह देखकर सेठ को बहुत गुस्सा आया। वह सोचने लगा- कैसा कृतघ्न आदमी है। मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई, पर न तो इसने धन्यवाद दिया और न ही अपने काम की जिम्मेदारी समझी।

इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ? यह नहीं सुधरेगा! और उसी दिन सेठ ने बढ़ी हुई तनख्वाह वापस लेने का फैसला कर लिया।

अगली 1 तारीख को उस आदमी को फिर से वही पुरानी तनख्वाह दी गयी। लेकिन हैरानी यह कि इस बार भी वह आदमी चुप रहा।

उसने सेठ से ज़रा भी शिकायत नहीं की। यह देख कर सेठ से रहा न गया और वह पूछ बैठा- बड़े अजीब आदमी हो भाई। जब मैंने तुम्हारे ग़ैर-हाज़िर होने के बाद पहले तुम्हारी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तब भी तुम कुछ नहीं बोले। और आज जब मैंने तुम्हारी ग़ैर-हाज़री पर तन्ख्वाह फिर से कम करके दी, तुम फिर भी खामोश रहे। इसकी क्या वजह है?

उस आदमी ने जवाब दिया- जब मैं पहली बार ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। उस वक्त आपने जब मेरी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तो मैंने सोचा कि ईश्वर ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेजा है। इसलिए मैं ज्यादा खुश नहीं हुआ!

जिस दिन मैं दोबारा ग़ैर-हाजिर हुआ, उस दिन मेरी माता जी का निधन हो गया था। आपने उसके बाद मेरी तन्ख्वाह कम कर दी, तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का अपने साथ ले गयीं! फिर मैं इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ?

यह सुनकर सेठ गदगद हो गया। उसने उस आदमी को गले से लगा लिया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।

उसके बाद उसने न सिर्फ उस आदमी की तनख्वाह पहले जैसे कर दी, बल्कि उसका और ज्यादा सम्मान करने लगा।

हमारे जीवन में अक्सर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की घटनाएं होती रहती हैं।

जो आदमी एक अच्छी घटना से खुश होकर अनावश्यक उछलता नहीं और नकारात्मक घटनाओं पर अनावश्यक दु:ख नहीं मनाता और हर दशा में अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखते हुए सच्ची लगन और ईमानदारी से कार्य करता रहता है, वही आदमी जीवन में स्थाई सफलता प्राप्त करता है!

🙏🙏🏻 सुप्रभात🙏🏽🙏🏾

गिलहरी

गिलहरी

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी!

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी।

क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था !

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ!
वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा!

गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा! एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया!

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये अखरोट मेरे किस काम के?

पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये – इन्हें खाऊँगी कैसे!

यह कहानी आज हम सभी के जीवन की हकीकत बन चुकी है!

क्योंकि हर इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !

60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है या बैंक बैलेंस होता है तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है!

तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है!

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा कि आपने इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये अपनी कितनी इच्छायें मारी होंगी? आपको कितनी तकलीफें मिली होंगी? आपके कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके!

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके !

इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो,
मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो
भजन करो मस्त जवानी में बुढ़ापा किसने देख्या है।
🌹🌹🌹🌹🌹
*🙏🙏🙏🙏🙏
आपका दिन मंगलमय हो!

समय की कीमत

!! समय की कीमत !!

कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है| आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते| इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते है और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता | यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| हो सकता है कि कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद| लेकिन इतना तो निश्चित है कि यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा|

ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे ? जाहिर है आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे क्योंकि यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| क्या आप जानते है कि ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)” और इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते है जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है| हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते है और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे| यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है इसलिए देर मत कीजिए आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इसलिए समय का सदुपयोग कीजिए|

अगर किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा | क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है| हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते है| खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता| उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है| बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ|

बीते हुए कल को भूल जाइए, उसका आज कोई वजूद नहीं| आज आपका है, आज एक नयी शुरुआत कीजिए| “जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है..!!’

निमित्तमात्र

निमित्तमात्र

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुचा , पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था

मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।

छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये।

जीवन को देख मेरा मन भर आया l

सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।

मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे ?

बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए।

उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डाट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।
होटल वाले ने आश्चर्य🤔🤔 से मेरी ओर देखा..

उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी😊😊 कुछ निराली ही थी।

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना।

और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे।

मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।

रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान ! आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख, आप कैसे चुप बैठ सकते है।

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया, पुत्र अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया।
मैं स्तब्ध हो गया, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो।
मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है उसके कार्य कलाप के वो महान है।

शिक्षा:-भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के लायक समझता है, किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना।

जय श्रीराम

शुभरात्रि

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी वो एकांत जगह की तलाश में घूम रही थी कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।

उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने बायें देखा तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था।
घबराकर वह दाहिने मुड़ी तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था।
सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुड़ी तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी करती तो क्या ही करती?

वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी।
अब क्या होगा?
क्या हिरनी जीवित बचेगी?
क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी?
क्या शावक जीवित रहेगा?
क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी?
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी?
क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है।
क्या करेगी वो?

हिरनी ने अपने आप को शून्य में छोड़ अपने प्राथमिक उत्तरदायित्व अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी।

कुदरत का करिश्मा देखिये –
बिजली चमकी
और तीर छोडते हुए
शिकारी की आँखे चौंधिया गयी
उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते
शेर की आँख में जा लगा!
शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा
और
शिकारी
शेर को घायल ज़ानकर
भाग गया!
घनघोर बारिश शुरू हो गयी
और
जंगल की आग
बुझ गयी!
इस प्रकार
हिरनी ने शावक को जन्म दिया।
किसी ने सही कहा है कि –
जाको राखे साइयां, मार सके न कोय!
बाल न बांका करि सके जो जग बैरी होय!!

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते हैं-
जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं!
और
कोई निर्णय नहीं ले पाते!
तो
तब समर्पण भाव से
सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर
अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
अन्तत:
यश- अपयश, लाभ-हानी, हार-जीत, जीवन-मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।

हमें उस परम शक्ति पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

सर्व निंदक महाराज

सर्व निंदक महाराज

एक थे सर्वनिंदक महाराज। काम-धाम कुछ आता नहीं था पर निंदा गजब की किया करते थे। हमेशा औरों के काम में टाँग फँसाते थे।

अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके सुस्ताने भी बैठता तो कहते, ‘मूर्ख एक नम्बर का कामचोर है। अगर कोई काम करते हुए मिलता तो कहते, ‘मूर्ख जिंदगी भर काम करते हुए मर जायेगा।’

कोई पूजा-पाठ में रुचि दिखाता तो कहते, ‘पूजा के नाम पर देह चुरा रहा है। ये पूजा के नाम पर मस्ती करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।’ अगर कोई व्यक्ति पूजा-पाठ नहीं करता तो कहते, ‘मूर्ख नास्तिक है! भगवान से कोई मतलब ही नहीं है। मरने के बाद पक्का नर्क में जायेगा।’

माने निंदा के इतने पक्के खिलाड़ी बन गये कि आखिरकार नारदजी ने अपने स्वभाव अनुसार.. विष्णु जी के पास इसकी खबर पहुँचा ही दिया। विष्णु जी ने कहा ‘उन्हें विष्णु लोक में भोजन पर आमंत्रित कीजिए।’

नारद तुरंत भगवान का न्योता लेकर सर्वनिंदक महाराज के पास पहुँचे और बिना कोई जोखिम लिए हुए उन्हें अपने साथ ही विष्णु लोक लेकर पहुँच गये कि पता नहीं कब महाराज पलटी मार दे।

उधर, लक्ष्मी जी ने नाना प्रकार के व्यंजन अपने हाथों से तैयार कर सर्वनिंदक महाराज को परोसा। सर्वनिंदक जी ने जमकर हाथ साफ किया। वे बड़े प्रसन्न दिख रहे थे। विष्णु जी को पूरा विश्वास हो गया कि सर्वनिंदक जी लक्ष्मी जी के बनाये भोजन की निंदा कर ही नहीं सकते। फिर भी नारद जी को संतुष्ट करने के लिए पूछ लिया, और महाराज भोजन कैसा लगा?

सर्वनिंदक जी बोले, महाराज भोजन का तो पूछिए मत, आत्मा तृप्त हो गयी। लेकिन… भोजन इतना भी अच्छा नहीं बनना चाहिए कि आदमी खाते-खाते प्राण ही त्याग दे।

विष्णु जी ने माथा पीट लिया और बोले, ‘हे वत्स, निंदा के प्रति आपका समर्पण देखकर मैं प्रसन्न हुआ। आपने तो लक्ष्मी जी को भी नहीं छोडा़, वर माँगो।

सर्वनिंदक जी ने शर्माते हुए कहा — हे प्रभु मेरे वंश में वृद्धि होनी चाहिए।

तभी से ऐसे निरर्थक सर्वनिंदक हमारे आसपास ही नहीं वरन सभी जगहों में पाए जाने लगे..।

सार : हम चाहे कुछ भी कर लें.. इन सर्वनिंदकों की प्रजाति को संतुष्ट नहीं कर सकते!अतः ऐसे लोगों की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य पथ पर हमें अग्रसर रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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माया का बन्धन

माया का बन्धन

एक बहुत ही प्रसिद्ध महात्मा थे। उनके पास रोज ही बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने आते थे। एक बार एक बहुत ही अमीर व्यापारी उनसे मिलने पहुंचा। व्यापारी ने सुन रखा था कि महात्मा बड़ी ही सरलता से रहते है। जब वह व्यापारी महात्मा के दरबार में पहुंचा तो उसने देखा कि कहने को तो वह महात्मा है, लेकिन वे जिस आसन पर बैठे है, वह तो सोने का बना है, चारों ओर सुगंध है, जरीदार पर्दे टंगे है, सेवक है जो महात्माजी की सेवा में लगे है और आश्रम में समस्त सुख सुविधाओं का अंबार लगा है
व्यापारी यह देखकर भौंचक्का रह गया कि हर तरफ विलास और वैभव का साम्राराज्य है। ये कैसे महात्मा है? महात्मा उसके बारे में कुछ कहते, इसके पहले ही व्यापारी ने कहा, “महात्माजी आपकी ख्याति सुनकर आपके दर्शन करने आया था, लेकिन यहाँ देखता हूँ, आप तो भौतिक सपंदा के बीच मजे से रह रहे हैं लेकिन आप में साधु के कोई गुण 1नजर नही आ रहे है।“
महात्मा ने व्यापारी से कहा, “व्यापारी… तुम्हें ऐतराज है तो मैं इसी पल यह सब वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चल देता हूँ।“
व्यापारी ने कहा, “हे महात्मा, क्या आप सच मे इस विलास पूर्ण जीवन को छोड़ पाएंगे?“ महात्माजी कुछ न बोले और उस व्यापारी के साथ चल दिए और जाते-जाते अपने सेवको से कहा कि यह जो कुछ भी है सभी सुख सुविधा की वस्तुओं को गरीबो में बाँट दें।

दोनो कुछ ही दूर चले होंगे कि अचानक व्यापारी रूका और पीछे मुड़ा, कुछ सोचने लगा। महात्मा ने पूछा, “क्या हुआ रूक क्यों गए?“ व्यापारी ने कहा, “महात्मा जी, मैं आपके दरबार में अपना कांसे का लोटा भूल आया हूँ। मैं जाकर उसे ले आता हूँ, उसे लेना जरूरी है।”
महात्माजी हंसते हुए बोले, “बस यही फर्क है तुममें और मुझमें। मैं सभी भौतिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी उनमें बंधता नहीं,मेरे लिए संसार के समस्त पदार्थ शून्य है वे मेरे बन्धन का कारण कदापि नही बन सकते।यही मेरे महात्मा होने का प्रमाण है, इसीलिए जब चाहूँ तब उन्हें छोड़ सकता हूँ और तुम जैसे साधारण मनुष्य इतने अमीर होकर भी एक छोटे से लोटे के बंधन से भी मुक्त नहीं हो।“वास्तव में लोटा तो मात्र एक छोटा सा भौतिक पदार्थ हैं, और तुम इसी तुच्छ पदार्थ के बन्धन से मुक्त नही हो पा रहे तो फिर इस संसार सागर के रिश्ते,नाते,धन संपदा से कैसे मुक्त हो पाओगे।आओ मेरे साथ सांसारिक विरह का अभ्यास करों।। इतना कहते हुए महात्माजी फिर से अपने दरबार की ओर जानें लगे और वह व्यापारी उन्हें जाता हुआ देखता रहा क्योंकि महात्मा उसे जीवन का सबसे अमूल्य रहस्य बता चुके थे।

इस छोटी सी कहानी का सारांश ये है कि चीजों का उपयोग करना, लेकिन उनके मोह में न पड़ना, यही जीवन का अन्तिम उद्देश्य होना चाहिए क्योंकि मोह ही दु:खों का कारण है और जिसे चीजों का मोह नहीं, वह उनके बंधन में भी नहीं पड़ता और जो बंधन में नही पड़ता, वो हमेंशा मुक्त ही रहता है ।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

सुख कैसे मिले?

सुख कैसे मिले?

एक व्यक्ति के पास बहुत धन था। इतना कि अब और धन पाने से कुछ सार नहीं था। जितना था, उसका भी उपयोग नहीं हो पा रहा था। मृत्यु समीप आने लगी थी। न बेटे थे, न बेटियां थीं, कोई पीछे न था और जीवन धन बटोरने में बीत गया था।

वह तथाकथित महात्माओं के पास गया कि मुझे कुछ आनंद का सूत्र दो।
महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब के द्वार खटखटाए। खाली हाथ लौटा।

फिर किसी ने कहा कि एक साधू को हम जानते हैं, शायद वही कुछ कर सके। उनके ढंग जरूर अनूठे हैं; इसलिए चौंकना मत।

उनके रास्ते उनके निजी हैं; उनकी समझाने की विधियां भी थोड़ी बेढब होती हैं। मगर अगर कोई न समझा सके, तो *जिनका कहीं कोई इलाज नहीं है, उस तरह के लोगों को हम वहां भेज देते हैं और उनके लिए वहाँ सुनिश्चित उपाय है।

उस धनी व्यक्ति ने एक बड़ी पोटली भरी हीरे-जवाहरातों से और पहुंच गया साधू के पास।

साधू बैठे थे एक झाड़ के नीचे। धनी व्यक्ति ने पोटली रख दी उनके सामने और कहा कि इतने हीरे-जवाहरात मेरे पास हैं, मगर सुख का कण भी मेरे पास नहीं। मैं कैसे सुखी होऊं?

साधू ने आव देखा न ताव, उठाई पोटली और भागे!
वह व्यक्ति तो एक क्षण समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हो रहा है!

महात्मागण तो ऐसा नहीं करते! एक क्षण तो ठिठका रहा, अवाक! फिर उसे होश आया कि इस साधू ने तो लूट लिया, मारे गए, सारी जिंदगी भर की कमाई साधु ले भागा!

हम सुख की तलाश में आए थे और ज्यादा दुःखी हो गए। व्यक्ति भागा, चिल्लाया कि लुट गया, बचाओ ! साधु चोर है, बेईमान है, भागा जा रहा है!

साधु ने पूरे गांव में उस व्यक्ति को चक्कर कटवाया। साधू का गांव तो जाना-पहचाना था, सारे गली-कूंचे की पहचान थी, इधर से निकले, उधर से निकल जाए।

भीड़ भी पीछे हो ली- भीड़ तो साधू को जानती थी कि जरूर कोई विधि होगी! क्योंकि पूरा गांव तो साधू से परिचित था, उसके ढंगों से परिचित था। धीरे-धीरे आश्वस्त हो गया था कि वह जो भी करे, वह चाहे कितना बेबूझ मालूम पड़े लेकिन भीतर कुछ राज होता है।

लेकिन उस धनी व्यक्ति को तो कुछ पता नहीं था। वह पसीना-पसीना हो चला था क्योंकि जीवन मे कभी इतना भागा भी नहीं था! इतना, थका-मांदा; साधू उसे भगाता हुआ, दौड़ाता हुआ, पसीने से लथपथ कराता हुआ वापिस अपने झाड़ के पास लौटा लाया। जहां उसका घोड़ा खड़ा था। साधु ने पोटली वहीं घोड़े के पास लाकर पटक दी और स्वयं झाड़ के पीछे छिप कर खडे हो गए।

वह व्यक्ति लौटा, पोटली नीचे पड़ी थी, घोड़ा खड़ा था उसने पोटली उठा कर छाती से लगा ली और कहा कि हे! परमात्मा ! तेरा बहुत बहुत धन्यवाद! आज मुझ जैसा सुखी व्यक्ति इस दुनिया में और कोई भी नहीं क्योंकि मुझे मेरा धन वापिस मिल गया!

साधू वृक्ष के पीछे से झांकर कहा : कुछ सुख मिला?
यही राज है।

यही पोटली पहले तुम्हारे पास थी! इसी को लिए तुम यहां वहाँ लिय घूम रहे थे और सुख का कोई पता नहीं था और अब भी यही पोटली वापिस तुम्हारे हाथ में है; लेकिन बीच में फासला हो गया! थोड़ी देर को पोटली तुम्हारे हाथ में नही थी! थोड़ी देर को पोटली से तुम वंचित हो गए थे! और अब तुम कह रहे हो- हे प्रभु, धन्यवाद तेरा कि आज मैं आह्लादित हूं! आज पहली बार आनंद की थोड़ी झलक मिली।

मुझे चोर और बेईमान कहते तुमको शर्म नहीं आयी! बैठो घोड़े पर और भाग जाओ! नहीं तो मैं पोटली फिर छीन लूंगा। रास्ते पर लगो ! रास्ता तुम्हें मैंने बता दिया।

हम सबके हालत भी यही हैं कि अनमोल जीवन की कभी भी जीते जी कदर नहीं करते! इसका मूल्य का पता तबतक नहीं चलता जब तक कि इसको गंवाते नहीं!

जो हमें स्वांसें मिली हैं; उसकी हमारे लिय कोई कदर नहीं है। जो खो गया, उसके लिए हम रोते हैं! जो खो गया, हमको उसका अभाव खलता है और उस धनी व्यक्ति की तरह हम महपुरुषों के इशारे को नजरंदाज कर देते हैं!
कहा भी है कि –
मानुष जनम अनमोल रे, मिट्टी मे ना रोल रे!
अब जो मिला है, फ़िर ना मिलेगा, कभी नहीं, कभी नहीं रे!!

कर्म का फल

कर्म का फल

एक राजा के दरबार मे कर्म के ऊपर बहस छिड़ी हुई थी!

कोई कहता कर्म का फल ऊपर वाले पर छोड़ दीजिए!
तो कोई कहता मरने के बाद जीव का क्या होता है- आजतक किसी को कुछ पता नहीं!
तो कोई कहता कर्म का फल सबको इसी जन्म में मिलता है!

राजा ने निर्णय लिया कि इसे प्रत्यक्ष व्यवहार में लाकर परिणाम देखा जाए !

राजा ने अपने तीन मन्त्रियो को दरबार में बुलाया और तीनो को आदेश दिया कि एक-एक थैला ले कर बगीचे में जाएं और वहां से अच्छे से अच्छे और बढ़िया से बढ़िया फल तोड़कर लाएं!

वो तीनों अलग-अलग बाग़ में प्रविष्ट हो गए!

पहले मन्त्री ने कोशिश की कि राजा के लिए उसकी पसंद के अच्छेअच्छे और मज़ेदार फल जमा किए जाएं तो उस ने काफी मेहनत के बाद बढ़िया और ताज़ा फलों से अपना थैला भर लिया!

दूसरे मन्त्री ने सोचा कि राजा हर फल का परीक्षण तो करेगा नहीं इस लिए उसने जल्दी -जल्दी थैला भरने में ताज़ा , कच्चे , गले सड़े फल भी थैले में भर लिए!

तीसरे मन्त्री ने सोचा कि राजा की नज़र तो सिर्फ भरे हुए थैले की तरफ होगी वो खोल कर देखेगा भी नहीं कि इसमें क्या है? उसने समय बचाने के लिए जल्दी-जल्दी इसमें घास और पत्ते भर लिए और वक़्त बचाया!

दूसरे दिन राजा ने तीनों मन्त्रियो को उनके थैलों समेत दरबार में बुलाया और उनके थैले खोल कर भी नही देखे और आदेश दिया कि इन तीनों को उनके थैलों समेत दूर स्थान के एक जेल में 15 दिन के लिए एकांतवास में रखा जाए!

अब जेल में उनके पास खाने-पीने को कुछ भी नहीं था सिवाए उन फल से भरे थैलों के! तो जिस मन्त्री ने अच्छे-अच्छे फल जमा किये थे – वो तो मज़े से उनको खाता रहा और उसके 15 दिन अच्छे से गुज़र भी गए!

फिर दूसरा मन्त्री जिसने ताज़ा, कच्चे गले सड़े फल जमा किये थे – वह कुछ दिन तो ताज़ा फल खाता रहा फिर उसे ख़राब फल खाने पड़े! जिस से वो बीमार होगया और बहुत तकलीफ उठानी पड़ी!

और तीसरा मन्त्री जिसने अपने थैले में सिर्फ घास और पत्ते जमा किये थे वो कुछ ही दिनों में भूख से व्याकुल हो गया!

राजा ने सबकी निगरानी के लिए गुप्तरुप से एक संतरी रखा हुआ था! बचा तो सबको लिया गया मगर उन्हें अपने कर्म का फल समझ में आ गया!

हमको भी विचार करना है कि हम अपने जीवन की झोली में क्या जमा कर रहे हैं?

हम भी इस समय उस बनाने वाले के बगीचे में एक निश्चित समय के लिय आये हैं और हर पल काल रूपी गुप्तचर के पहरे में हैं! और दाता की दुनिया में हमारे कर्मों का खाता खुला हुआ है – इसलिय अपने हमें ही खुद तय करना है कि चाहें तो अच्छे कर्म की पूजी जमा करें और चाहें तो बुरे कर्मों से अपनी पोटली को भरें!

लेकिन याद रहे जो आप जमा करेंगे, वही आपके जन्मों-जन्मों तक काम आएगा !

जीवन के इस रहस्य को समझें कि –
जैसे रास्ते पर
गति की सीमा है!
बैंक में
पैसों की सीमा है!
परीक्षा में
समय की सीमा है!
परंतु
हमारी सोच (विचार शक्ति) की
कोई सीमा नहीं है!
इसलिए
सदा श्रेष्ठ सोचें, श्रेष्ठ करें एवं श्रेष्ठ बोलें तब श्रेष्ठ पाएं!
क्योकि
कर्म
प्रबलता के साथ
अपने कर्ता
का पीछा करते हैं!
किसी ने सही फ़रमाया कि –

नियत तेरी अच्छी है तो, किस्मत तेरी दासी है!
कर्म तेरे यदि अच्छे हैं तो, घर ही में मथुरा-काशी है!

मिटाने से मिटता नहीं, कभी कर्म का ये लेख!
कर्म तू अच्छा कर, फिर ईश्वर की रहमत देख!!
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