टोकरी में पानी

संत सदानंद का शिक्षा देने का अलग ही ढंग था। वह सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान का सहारा नहीं लेते थे। शिष्य अच्छी तरह से उनकी बात समझ सकें, इसके लिए व्यावहारिक उपायों से विषयों को समझाते थे। एक दिन उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और सबके हाथ में बांस की एक-एक टोकरी थमा दी। संत ने शिष्यों से कहा, ‘आज तुम सभी को इन टोकरियों में जल भरकर लाना है। उसी जल से आश्रम की सफाई करनी है। याद रखना जल केवल वही होना चाहिए जो इस टोकरी में भरकर लाया गया हो।’
गुरु की आज्ञा मानकर सभी शिष्य नदी की ओर चल पड़े। एक शिष्य बोला, ‘बांस की टोकरी में पानी कैसे भर पाएंगे?’ पानी तो बांस की टोकरी से बाहर निकल जाएगा। दूसरे शिष्य ने कहा, ‘पता नहीं इसके माध्यम से गुरुजी हमें कौन सा व्यावहारिक ज्ञान सिखाना चाहते हैं!’ सभी शिष्य टोकरी में जल भरने लगे। लेकिन जैसे वे जल भरते, वैसे ही पानी टोकरियों के छिद्र से बाहर निकल जाता। शिष्यों ने तीन-चार बार कोशिश की। फिर वे अपनी टोकरियां वहीं फेंक कर वापस चले गए। उनमें एक शिष्य था
सदाव्रत। उसने हिम्मत नहीं हारी।कुछ घंटों बाद वह शिष्य यह देखकर हैरान रह गया कि अब टोकरी से पानी का रिसना बंद हो गया है। हुआ यह कि थोड़े समय पानी में रहने के बाद बांस की कमचियां फूल गईं और बीच की खाली जगह भर गई। वह जो पानी उठाता, टोकरी में ठहर जाती। शिष्य सदाव्रत ने टोकरी में पानी लाकर उससे आश्रम की सफाई कर दी। संत सदानंद ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘आज मैं तुम सबके धैर्य की परीक्षा लेना चाहता था। लेकिन केवल शिष्य सदाव्रत ही उसमें उत्तीर्ण हो सका। जीवन में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी होता है कि लगातार प्रयत्न किए जाएं, तुरंत हार न मानी जाए।’

जीवन का आनंद!

एक सम्राट राजा अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था।

वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि अब वह अमर होना चाहता था।
उसने पता लगाया कि कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है।

देश – दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार राजा ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था।

वह एक पुरानी गुफा थी, जहां पर कोई आता जाता नहीं था।

देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी, लेकिन राजा ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया।

वहां पर उसने देखा कि गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है।

उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि एक कौवे की आवाज आई।

कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था। कौवा जोर से बोला, ठहरो, रुक जाओ, यह भूल मत करो।

सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। वह बड़ी ही दयनीय अवस्था में था, पंख झड़ गए थे। पंजे गिर गए थे। वह अपंग भी हो गया था। बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था।

राजा ने कहा, तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? यह अमृत पीने से मुझे तू कैसे रो सकता है?

तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि मैं भी अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था और मैंने जल्दबाजी में बिना सोच विचार के अमृत पी लिया। अब मैं कभी मर नहीं सकता, लेकिन अब मैं मरना चाहता हूं पर मर नहीं सकता। देखो मेरी हालत!
कौवे की बात सुनकर राजा देर तक सोचता रहा। सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीये ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया।

राजा समझ चुका था कि जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है; जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं।

इसलिए, जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए। हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए!

क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते हैं।

जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

इसलिए जीवन को बिंदास रहकर जियो। दुनिया भर का टेंशन मत लो। मृत्यु के कुछ समय बाद तुम्हे सब भूल जाएंगे!
साथ रहेंगे तो केवल अविनाशी और अविनाशी तक पहुंचने का रास्ता बताने वाले सद्गुरु !

सद्गुरु यही कहते हैं कि –
जिन्दगी जबरदस्त है-
इसे जबरदस्ती ना जिएं;
बल्कि
जबरदस्त तरीके से जिएं!
तभी –
इस जीवन में जीवन के असली आनन्द का अनुभव हो पायेगा!
🙏🙏🙏🙏🙏

श्रद्धा भाव के पुष्प

एक बार किसी गांव में महात्मा बुद्घ का सत्संग हुआ। सब इस होड़ में लग गए कि क्या भेंट करें?

सुदास नाम का एक मोची था। उसने देखा कि मेरे घर के बाहर के तालाब में एक कमल🪷 खिला है। उसकी इच्छा हुई कि आज नगर में महात्मा बुद्घ आए हैं। सब लोग तो उधर ही गए हैं, तो आज यह फूल बेचकर गुजारा कर लेंगे। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया।  कमल के फूल को लेकर आया, केले के पत्ते का दोना बनाया और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया। पानी की कुछ बूंदे कमल पर पड़ी हुई थी इसलिए वह बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा था।

एक सेठ आया और बोला – इस फूल के हम आपको दो चांदी के रुपये दे सकते हैं। अब उसने सोचा एक दो आने का फूल। इसके दो रुपये दिये जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।

इतनी देर में नगर सेठ आया। उसने कहा – भाई! फूल बहुत अच्छा है, यह फूल हमें दे दो। हम इसके दस चांदी के सिक्के दे सकते हैं।

मोची ने सोचा इतना कीमती है यह फूल!

नगर सेठ ने कहा- मेरी इच्छा है कि मैं महात्मा बुद्घ के चरणों में यह फूल रखूं। इसलिए इसकी इतनी कीमत दे रहा हूं।

इतनी देर में उस राज्य का मंत्री अपने वाहन पर बैठा हुआ आ गया और कहने लगा- क्या बात है? कैसी भीड़ लगी हुई है।
अब लोग कुछ बताते उससे पहले उसका ध्यान उस फूल की तरफ गया।  उसने पूछा- यह फूल बेचोगे? हम इसके सौ सिक्के दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा बुद्घ आए हुए हैं। जब हम यह फूल लेकर जाएंगे तो सारे गांव में तो चर्चा होगी कि महात्मा बुद्घ ने केवल मंत्री का ही फूल स्वीकार किया। इसलिए हमारी इच्छा है कि यह फूल हम भेंट करें।

थोड़ी देर के बाद राजा ने भीड़ को देखा, देखने के बाद मंत्री से पूछा कि क्या बात है? उसने बताया कि फूल का सौदा चल रहा है।

राजा ने देखते ही कहा इसको हमारी तरफ से एक हजार चांदी के सिक्के भेंट करना। ‘यह फूल हम लेना चाहते हैं।

सुदास ने कहा – क्षमा करें महाराज, यह फूल मैं बेचना ही नहीं चाहता।
जब महात्मा बुद्घ के चरणों में सब लोग कुछ भेंट करने के लिए पहुंच रहें हैं तो ये फूल इस गरीब की तरफ से आज उनके चरणों में भेंट होगा।

राजा बोला – देख लो! एक हजार चांदी के सिक्कों से तुम्हारी पीढि़यां तर सकती हैं।

सुदास ने कहा, मैंने तो आज तक राजाओं की संपत्ति से किसी को तरते नहीं देखा, लेकिन महान पुरुषों के आशीर्वाद से लोगों को जरुर तरते हुए देखा है।

राजा मुस्कुराया और बोला, तेरी मर्जी तू ही भेंट कर ले।

बहुत जल्दी चर्चा महात्मा बुद्घ के कानों तक भी पहुंच गई कि आज कोई व्यक्ति फूल लेकर आ रहा है जिसकी कीमत बहुत लगी है।

सुदास फूल लेकर जैसे ही पहुंचा तो उसकी आंखों में आंसू बरसने लगे। कुछ बूंदे उसके आंसुओं के रूप में उस कमल पर ठिठक गईं। सुदास घुटनों के बल बैठ गया।

रोते हुए उसने कहा – सबने बहुत-कीमती चीजें आपके चरणों में भेंट की होंगी। लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप जो मैंने किए हैं, उनके आंसू आंखों मे भरे पड़े हैं; आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूं। कृपया कर मुझे मुक्ति का मार्ग बताएं।

महात्मा बुद्घ ने अपने शिष्य आनन्द को बुलाया और कहा- देख रहे हो आनन्द! हजारों साल में भी कोई राजा इतना नहीं कमा पाया, जितना इस गरीब सुदास ने आज एक पल में ही कमा लिया। इसका पुण्य श्रेष्ठ हो गया। आज राजाओं के मुकुट हार गए और एक गरीब का फूल जीत गया। इसे केवल एक फूल न समझना, इसमें श्रद्घा का खजाना छिपा पड़ा है।

महात्मा बुद्ध ने उसे ज्ञान दिया और उसके बाद वह भिक्षु बन गया।

सचमुच, यह संदेश कितना साफ है कि –
भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही इक सार है!
भाव से मुझको भजे तो भाव से बेडा पार है!

भाव बिन सर्वस्व भी दे तो मैं कभी लेता नहीं!
भाव से एक फूल भी दे, तो भव से बेडा पार है!

भाव जिस जन में नहीं, उसकी मुझे चिन्ता नहीं !
भाव वाले भक्त का भरपूर मुझ पर भार है!

टेर भक्तिभाव की करती मुझे लाचार है!
इसी लिय इस भूमि पर होता मेरा अवतार है!

सच ही कहा कहते हैं कि गुरु बिना गति नहीं।

सर यही है कि समय के सद्गुरु की ऊँगली पकड़ लो, तो यह जीवन निश्चित रूप से सफल हो जायेगा।
🙏🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

कम्युनिटीज बढ़ाने पर काम कर रहा है

व्हाट्सएप मेटा के स्वामित्व वाला मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप कथित तौर पर IOS के लिए अपने व्हाट्सएप बिजनेस एप्लीकेशन में कम्युनिटीज को लाने के लिए काम कर रहा है। बेबी टाइम फॉर की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल पेश बिजनेस टूल्स टैब को हटाने के बजाय प्लेटफॉर्म ऐप सेटिंग के भीतर नए फीचर के लिए नया प्रवेश बिंदु जोड़ने की संभावना है। नए फीचर के साथ व्यवसाय अपने उप समूहों और सामुदायिक घोषणा समूह सहित उन समुदायों की पूरी सूची तक पहुंचने में सक्षम होंगे जिनमें वे पहले शामिल हुए थे इसके अनुसार यूजर इस फीचर के अंदर एक नई कम्युनिटी बनाने में सक्षम होंगे नया फीचर व्यवस्थाओं के लिए मददगार होगा क्योंकि वह समर्पित कम्युनिटी और सब ग्रुप से बना कर आसानी से अपने ग्राहकों से प्रतिक्रिया ले सकेंगे। व्हाट्सएप बिजनेस पर कम्युनिटीज को बढ़ाने और प्रबंधित करने की क्षमता वर्तमान में विकास के अधीन है और भविष्य में ऐप के अपडेट में जारी होने की उम्मीद है।

मन का दर्पण

एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए। विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक दर्पण दिया।

वह साधारण दर्पण नहीं था । उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी।

शिष्य, गुरू के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था। उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों न दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए।

परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया!

शिष्य को तो सदमा लग गया । दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे है।

मेरे आदर्श, मेरे गुरूजी इतने अवगुणों से भरे है !”

यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ. दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना हो गया तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही कि जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया।

उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था। इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता !

उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया।

जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए है। सब दोहरी मानसिकता वाले लोग है।

लोग बाहर से जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं।

इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुंच गया!

उसे अपने माता-पिता का ध्यान आया। उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है। उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते है। इनकी परीक्षा की जाए।

उसने उस दर्पण से माता-पिता की भी परीक्षा कर ली। उनके हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा। ये भी दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। संसार सारा मिथ्या पर चल रहा है।

अब उस शिष्य के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी।

उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर शीघ्रता से पहुंचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया।

गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे ।

चेले ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा- गुरुदेव, मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह-तरह के दोष है।

कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा?

क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आप में और अपने माता-पिता में मैंने दोषों का भंडार देखा । इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है।

तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य दंग रह गया। उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे। ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो।

गुरुजी बोले- बेटा यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था न कि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए।

जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका।

कहा भी है कि –
बुरा जो देखन में चला,
बुरा ना मिलिया कोई!
जो दिल खोजों आपना,
मुझसे बुरा ना कोई!!

लक्ष्मण जी की आनंद यात्रा……

भगवान श्रीराम ने एक बार पूछा कि लक्ष्मण तुमने अयोध्या से लेकर लंका तक की यात्रा की है परन्तु उस यात्रा में सबसे अधिक आनंद तुम्हें कब आया?

लक्ष्मणजी ने कहा कि भैया, मेरी सबसे बढ़िया यात्रा तो लंका में हुई और वह भी तब हुई जब मेघनाद ने मुझे बाण मार दिया!

प्रभु ने हंसकर कहा कि लक्ष्मण तब तो तुम मूर्छित हो गये थे, उस समय तुम्हारी यात्रा कहां हुई थी?

तब लक्ष्मणजी ने कहा कि प्रभु उसी समय तो सर्वाधिक सुखद यात्रा हुई!

लक्ष्मणजी का तात्पर्य था कि अन्य जितनी यात्राएं हुईं उन्हें तो मैंने चलकर पूरा किया!

लेकिन इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि मूर्छित होने के बाद भी हनुमानजी ने मुझे गोद में उठा लिया और आपकी गोद में पहुंचा दिया।

प्रभु, सन्त की गोद से लेकर ईश्वर की गोद तक की जो यात्रा थी जिसमें रंचमात्र कोई पुरुषार्थ नहीं था!
उस यात्रा में जितनी धन्यता की अनुभूति हमें हुई वह तो सर्वथा वाणी से परे है!

लक्ष्मणजी ने कहा _प्रभु, शेष के रूप में आपको गोदी में सुलाने का सुख तो मैंने देखा था पर आपकी गोदी में सोने का सुख तो सन्त की प्रेरणा से ही मुझे प्राप्त हुआ!

इसलिए मेरे हिसाब से तो सबसे महान वही यात्रा थी जो हनुमान जी की गोद से आपकी गोदी तक हुई थी!

लक्षमन की बात सुनकर भगवान श्रीराघवेन्द्र ने लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया !!_

सचमुच, आन्तरिक यात्रा की अनुभूति का आनंद ही विलक्षण होता है!

Weight Machine RYLAN Digital Kitchen Weighing Scale & Food Weight Machine for Diet, Nutrition, Health, Fitness, Baking & Cooking

  • Kitchen Scale is Compact portable and easy to use. It has tare (zero) function.
  • Capacity: 500g, 1000g, 3000g, 5000g.
  • Automatic Zero resetting and automatic switch off in 3 seconds.
  • Low power, low battery and overload indicator.
  • Equipped With a High Precision Strain Gauge Sensor System

हीरा मोती

एक साधु था! वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”

बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे।

एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।”

और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया। उसने साधु से पूछा – “महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मैं जो चाहता हूँ?”

साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मैं उसे जरुर दूंगा, बस तुम्हें मेरी बात माननी होगी।

लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हें आखिर चाहिये क्या?”

युवक बोला- मेरी एक ही ख्वाहिश है कि मैं हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ। “

साधु बोला, ”कोई बात नहीं मैं तुम्हें एक हीरा और एक मोती देता हूँ! उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!”

और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ”पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं! इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो।

युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ”पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं! जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा।

और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है।

वास्तव में, ‘समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

अतः हम सभी के लिए ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें।
सुप्रभात

एक बाल्टी दूध…

जो कोई करै सो स्वार्थी, अरस परस गुण देत
बिन किये करै सो सूरमा, परमारथ के हेत!

अर्थ: जो अपने हेतु किये गये के बदले में कुछ करता है वह स्वार्थी है। जो किसी के किये गये उपकार के बिना किसी का उपकार करता है। वह वस्तुत: परमार्थ के लिये कार्य है।

एक बाल्टी दूध…

〰️〰️🌼〰️〰️
एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के बीचो बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में डाला जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और लोगों का मरना बन्द हो जायेगा। राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है ।

अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक चालाक एवं कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक बाल्टी पानी डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे। कुछ भी नहीं बदला था क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुयी थी। राजा ने जब कुंए के पास जाकर इसका कारण जानना चाहा तो उसने देखा कि सारा कुंआ पानी से भरा हुआ है। दूध की एक बूंद भी वहां नहीं थी। राजा समझ गया कि इसी कारण से महामारी दूर नहीं हुई और लोग अभी भी मर रहे हैं।

दरअसल ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि जो विचार उस बुढ़िया के मन में आया था वही विचार पूरे राज्य के लोगों के मन में आ गया और किसी ने भी कुंए में दूध नहीं डाला।

मित्रों , जैसा इस कहानी में हुआ वैसा ही हमारे जीवन में भी होता है। जब भी कोई ऐसा काम आता है जिसे बहुत सारे लोगों को मिल कर करना होता है तो अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह सोच कर पीछे हट जाते हैं कि कोई न कोई तो कर ही देगा और हमारी इसी सोच की वजह से स्थितियां वैसी की वैसी बनी रहती हैं। अगर हम दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लग जायें तो पूरे देश की जनता ऐसा बदलाव ला सकती हैं जिसकी आज हमें ज़रूरत है ।

एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना साथी हाथ बढ़ाना।

अज्ञानता

एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए।
एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- ‘बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। उनसे कहना किइसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।

बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया। चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना! अच्छे दाम मिलेंगे।

साथ ही उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से हमारी दुकान पर आकर बैठना।

अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों रत्नो की परख का काम सीखने लगा।
दूकान में काम करते करते एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे।

एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना! और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।

उसने घर जाकर मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है।

वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।

चाचा ने पूछा, बेटा, हार नहीं लाए क्या?
उसने कहा, चाचा वह हार तो नकली था।
तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे!
तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा हमारी चीज को भी नकली बताने लगे।
आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।

सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है और ऐसे ही अज्ञानता में हम सही-गलत का भेद नहीं कर पाते! साथ ही गलतफहमी का शिकार होकर हमारे रिश्ते बिगडते हैं।