between birth and death

जन्म और मृत्यु के बीच

मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। जन्म और मृत्यु के बीच का उसका समय ऐसा होता है जिसमें वह और और पाने के लिए भटकता रहता है। आयु पर्यन्त वह कोल्हू के बैल की तरह ही खटता रहता है। यह दिन-रात का भटकाव उसका सुख-चैन सब छीन लेता है। वह बिना समय व्यर्थ गंवाए संसार में सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है।

वह इस दुनिया के सारे भौतिक सुख अपनी झोली में डाल लेने के लिए आतुर रहता है। पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसे सब मिलता है। मनुष्य इस सत्य को भूल जाना चाहता है या नजरअंदाज करना चाहता है कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता।

फिर भी हाथ पसारे माँगता रहता है। उसकी एक कामना पूर्ण होती है कि दूसरी के लिए याचना आरंभ हो जाती है। दूसरी के बाद तीसरी, फिर चौथी, पाँचवीं यानी कि यह क्रम चलता रहता है। यदि उसके भाग्य के अनुसार उसकी इच्छा पूरी न हो पाए तो वह उस दाता से नाराज हो जाता है उसे गाली तक दे बैठता है। उस न्यायकारी पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से नहीं चूकता।स्वयं को उससे दूर कर लेने की धमकी देता है। हद तो तब होती है जब अपने अहंकार के वशीभूत वह सृष्टि के रचयिता उस स्वामी को रिश्वत देने का प्रयास करता है।

उसे हर उस व्यक्ति से होड़ करनी होती है जिसका भाग्य बलवान है और सब सुविधाओं से संपन्न है। ईश्वर की दया से जिसके पास भौतिक सुख-साधनों की कोई कमी नहीं है।

इस कारण वह कुमार्गगामी हो जाने से परहेज नहीं करता। नीति-अनीति,छल-फरेब, झूठ-सच करने की महारत हासिल कर लेता है।भ्रष्टाचार करना,दूसरों का गला काटना, छीना-झपटी करना,बेईमानी करना,चोरबाजारी करना आदि उसके प्रिय शगल बन जाते हैं। इन समाज विरोधी कार्यों को करते समय वह भूल जाता है कि वह मालिक उसके इन कृत्यों से प्रसन्न नहीं हो रहा।
उसे अच्छा नहीं लगता कि उसके बच्चे ऐसे व्यवहार करने वाले बनें।

इस भौतिक संसार में हम अपने बच्चों से सरलता,ईमानदारी व सच्चाई की अपेक्षा करते हैं वैसा व्यवहार वह ईश्वर हमसे भी चाहता है। बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए हम उन्हें कई प्रकार के दण्ड देते हैं,उनकी पिटाई करते हैं या जेब खर्च बंद कर देते हैं आदि। इसी प्रकार वह परम न्यायकारी भी हमें दण्ड देता है। वह हमें मानसिक व शारीरिक कष्ट देता है, प्रियजनों से वियोग करवा देता है,हमें धन,बल व यश से वंचित कर देता है आदि।

अधर्म से कमाए हुए पैसे के कारण अहंकारी हुए मनुष्य का घमण्ड दूर करने के लिए उसे या उसके परिवारी जनों या बच्चों को बुराइयों में उलझा देता है। गलत रास्ते से कमाई गई धन-संपत्ति को बरबाद कर देता है।

वह प्रभु मनुष्य को सोचने पर विवश कर देता है कि वह इस संसार में खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही उसे यहाँ से जाना है। इस संसार से अपने साथ केवल अपने अच्छे व बुरे कर्मों का लेखा-जोखा लेकर जाता है जो जन्म-जन्मान्तर तक उसके साथी बनते हैं। आने वाले जन्मों की सुख-समृद्धि या बदहाली का कारण बनते हैं।

समय रहते यदि मनुष्य जाग जाए तो अपने लिए मुसीबतों के पहाड़ खड़े करने के स्थान पर वह अपने लिए सुख-शांति का पुरस्कार प्राप्त कर सकता है..!!

विश्वसम फल दायकम

किसी गांँव में राम जी भाई नाम का एक नवयुवक रहता था। वह बहुत मेहनती था,पर हमेशा अपने मन में एक शंका लिए रहता था कि वो अपने कार्य क्षेत्र में सफल होगा या नहीं! कभी-कभी वो इसी चिन्ता के कारण आवेश में आ जाता और दूसरों पर क्रोधित भी हो उठता।_

एक दिन उसके गांँव में एक प्रसिद्ध महात्मा जी का आगमन हुआ। खबर मिलते ही राम जी भाई,महात्मा जी से मिलने पहुंँचा और बोला, “महात्मा जी मैं कड़ी मेहनत करता हूंँ, सफलता पाने के लिए हर-एक प्रयत्न करता हूंँ पर फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती।कृपया आप ही कुछ उपाय बतायें!

महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, रामजी भाई, तुम्हारी समस्या का समाधान इस चमत्कारी ताबीज में है! मैंने इसके अन्दर कुछ मन्त्र लिख कर डाले हैं जो तुम्हारी हर बाधा दूर कर देंगे। लेकिन इसे सिद्ध करने के लिए तुम्हें एक रात श्मशान घाट में अकेले गुजारनी होगी!”

श्मशान घाट का नाम सुनते ही रामजी भाई का चेहरा पीला पड़ गया।
“लल्ल..ल..लेकिन मैं रात भर अकेले कैसे रहूँगा”…, राम जी भाई काँपते हुए बोला।”
घबराओ मत यह कोई मामूली ताबीज नहीं है! यह हर संकट से तुम्हें बचाएगा! महात्मा जी ने समझाया।_*

रामजी भाई ने पूरी रात श्मशान घाट में बिताई और सुबह होते ही महात्मा जी के पास जा पहुंँचा, “हे महात्मन्!आप महान हैं! सचमुच ये ताबीज दिव्य है! वर्ना मेरा जैसा डरपोक व्यक्ति रात बिताना तो दूर, श्मशान घाट के करीब भी नहीं जा सकता था। निश्चय ही अब मैं सफलता प्राप्त कर सकता हूं!

इस घटना के बाद राम जी भाई बिल्कुल बदल गया! अब वह जो भी करता उसे विश्वास होता कि ताबीज की शक्ति के कारण वह उसमें सफल होगा और धीरे-धीरे यही हुआ भी! वह गांँव के सबसे सफल लोगों में गिना जाने लगा।

इस घटना के करीब एक साल बाद फिर वही महात्मा गांँव में पधारे। रामजी भाई तुरन्त उनके दर्शन करने को गया और उनके दिया गया चमत्कारी ताबीज का गुणगान करने लगा। तब महात्मा जी बोले, रामजी भाई! जरा अपनी ताबीज निकाल कर देना। उन्होंने ताबीज हाथ में दे लिया,और उसे खोला। उसे खोलते ही रामजी भाई का होश उड़ गया। जब उसने देखा कि ताबीज के अन्दर कोई मन्त्र तन्त्र नहीं लिखा हुआ था! वह तो धातु का एक टुकड़ा मात्र था!

रामजी भाई बोला, “ये क्या महात्मा जी! ये तो एक मामूली ताबीज है, फिर इसने मुझे सफलता कैसे दिलाई?”
महात्मा जी ने समझाते हुए कहा- सही कहा तुमने, तुम्हें सफलता इस ताबीज से नहीं बल्कि तुम्हारे विश्वास की शक्ति ने दिलाई है।रामजी भाई!

हम इन्सानों को भगवान ने एक विशेष शक्ति (चेतन शक्ति) देकर भेजा है। वो है- आत्मा के विश्वास की शक्ति।

तुम अपने कार्य क्षेत्र में इसलिए सफल नहीं हो पा रहे थे क्योंकि तुम्हें खुद पर विश्वास नहीं था!

लेकिन जब इस ताबीज की वजह से तुम्हारे अन्दर वो विश्वास पैदा हो गया तो तुम सफल होते चले गये।
इसलिए जाओ किसी ताबीज पर यकीन करने के बजाए अपने कर्म पर, अपनी सोच पर, अपने निर्णय पर विश्वास करना सीखो!

इस बात को समझो कि जो हो रहा है वह अच्छे के लिए हो रहा है और निश्चय ही तुम सफलता के शीर्ष पर पहुंँच जाओगे!”

इसलिए आत्मविश्वास को जगाने के लिए श्री गुरु महाराज जी आत्मज्ञान की दीक्षा देते हैं। तभी जीव के अन्दर आत्मविश्वास पैदा होता है और वह अन्दर का आनन्द बना रहे उसके लिय, उस सतत विश्वास के लिए सेवा, सतसंग, समय के सद्गुरु द्वारा दिए आत्मज्ञान का अभ्यास करना भी भी परमावश्यक है।
गुरु सर्मथ सर पर खड़े, कहाँ कमी तोही दास!
रिद्धि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छोड़े साथ!!
इसलिय भक्त को सदा जरूरत है – अपने सद्गुरु पर, अपने ज्ञानदाता पर अटूट विस्वास करने की है!

अमीर आदमी का अनुभव।

अमीर आदमी का अनुभव।

जॉन डी रॉकफेलर दुनिया के सबसे अमीर आदमी और पहले अरबपति थे।

25 साल की उम्र में, वे अमेरिका में सबसे बड़ी तेल रिफाइनरियों में से एक के मालिक बने और 31 साल की उम्र में, वे दुनिया के सबसे बड़े तेल रिफाइनर बन गए।

38 साल उम्र तक, उन्होंने यू.एस. में 90% रिफाइंड तेल की कमान संभा ली और 50 की उम्र तक, वह देश के सबसे अमीर व्यक्ति हो गए थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तो वह दुनिया के सबसे अमीर आदमी थे।

एक युवा के रूप में वे अपने प्रत्येक निर्णय, दृष्टिकोण और रिश्ते को अपनी व्यक्तिगत शक्ति और धन को बढ़ाने में लगाते थे।

लेकिन 53 साल की उम्र में वे बीमार हो गए। उनका पूरा शरीर दर्द से भर गया और उनके सारे बाल झड़ गए।

नियति को देखिए,
उस पीड़ादायक अवस्था में, दुनिया का एकमात्र अरबपति जो सब कुछ खरीद सकता था, अब केवल सूप और हल्के से हल्के स्नैक्स ही पचा सकता था।

उनके एक सहयोगी ने लिखा, “वह न तो सो सकते थे, न मुस्कुरा सकते थे और उस समय जीवन में उसके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता था।”

उनके व्यक्तिगत और अत्यधिक कुशल चिकित्सकों ने भविष्यवाणी की कि वह एक वर्ष ही जी पाएंगे। उनका वह साल बहुत धीरे-धीरे, बहुत पीड़ा से गुजर रहा था।

जब वह मृत्यु के करीब पहुंच रहे थे, एक सुबह उन्हें अहसास हुआ कि वह अपनी संपत्ति में से कुछ भी, अपने साथ अगली दुनिया में नहीं ले जा सकते।

जो व्यक्ति पूरी व्यापार की दुनिया को नियंत्रित कर सकता था, उसे अचानक एहसास हुआ कि उसका अपना जीवन ही उसके नियंत्रण में नहीं हैं।

उनके पास एक ही विकल्प बचा था। उन्होंने अपने वकीलों, एकाउंटेंट और प्रबंधकों को बुलाया और घोषणा की कि वह अपनी संपत्ति को अस्पतालों में, अनुसंधान के कार्यो में और धर्म-दान के कार्यों के लिए उपयोग में लाना चाहते हैं।

जॉन डी. रॉकफेलर ने अपने फाउंडेशन की स्थापना की।

इस नई दिशा में उनके फाउंडेशन के अंतर्गत, अंततः पेनिसिलिन की खोज हुई, मलेरिया, तपेदिक और डिप्थीरिया का इलाज ईजाद हुआ।

लेकिन शायद रॉकफेलर की कहानी का सबसे आश्चर्यजनक हिस्सा यह है कि जिस क्षण उन्होंने अपनी कमाई का हिस्सा धर्मार्थ देना शुरू किया, उसके शरीर की हालात आश्चर्यजनक रूप से बेहतर होती गई।

एक समय ऐसा लग रहा था कि वह 53 साल की उम्र तक ही जी पाएंगे, लेकिन वे 98 साल तक जीवित रहे।

रॉकफेलर ने कृतज्ञता सीखी और अपनी अधिकांश संपत्ति समाज को वापस कर दी और ऐसा करने से वह ना केवल ठीक हो गए बल्कि एक परिपूर्णता के अहसास में भर गए। उन्होंने बेहतर होने और परिपूर्ण होने का तरीका खोज लिया।

ऐसा कहा जाता हैं कि रॉकफेलर ने जन कल्याण के लिए अपना पहला दान स्वामी विवेकानंद के साथ बैठक के बाद दिया और उत्तरोत्तर वे एक उल्लेखनीय परोपकारी व्यक्ति बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने रॉकफेलर को संक्षेप में समझाया कि उनका यह परोपकार, गरीबों और संकटग्रस्त लोगों की मदद करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

अपनी मृत्यु से पहले, उन्होंने अपनी डायरी में लिखा – मुझे जीवन ने काम करना सिखाया, मेरा जीवन एक लंबी, सुखद यात्रा है! काम और आनंद से भरपूर, मैंने राह की चिंता छोड़ दी और ईश्वर ने मुझे हर रोज एक अच्छाई से नवाजा!

देने का सुख ही जीवन जी ने का सुख है – “दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा जरूरी हैं मन की शांति की।”

इसलिए हमेशा संतों ने कहा है कि – आप वो प्रयास तो करें ही जिससे भगवान मिले पर वो भी काम जरूर करें जिससे दुआ मिले।

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा हमेशा व्यक्ति को ऊँचा उठाती है। व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में वो खुद बहुत नीचे उतर जाता है।

जो व्यक्ति अहंँकार बस सतसंग नहीं सुनते, तर्क-कुतर्कों में पड़कर, महाराज की सेवा नहीं करते, ऐसे व्यक्तियों का जीवन गुस्से से व्यर्थ चला जाता है।

उनकी जीवात्मा हमेशा कष्ट पाती है। चौरासी योनियों का दुख पाती है। इस जन्म में भी और चौरासी लाख योनियों में भी कष्ट पाते हैं।

एक बार एक धोबी नदी किनारे की शिला पर रोज की तरह कपडे धोने आया। उसी शिला पर कोई महात्मा जी ध्यानस्थ थे।

धोबी ने आवाज़ लगायी, उसने नहीं सुनी। धोबी को जल्दी थी, दूसरी आवाज़ लगायी,वो भी नहीं सुनी, तो फिर धोबी ने महात्मा जी को धक्का मार दिया।

ध्यानस्थ महात्मा जी की आँखें खुली, क्रोध की जवाला उठी!दोनों के बीच में खूब मार -पीट और हाथा पायी हुई।

लुटपिट कर दोनों अलग अलग दिशा में बैठ गये।

एक व्यक्ति दूर से ये सब बैठकर देख रहा था।

महात्मा जी के नजदीक आकर पूछा, महात्मा जी आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी, उसने बहुत मारा आपको।

महात्मा जी ने कहा, उस समय आप छुडाने क्यों नहीं आये?

व्यक्ति ने कहा, आप दोनों के बीच में, जब युद्ध हो रहा था, उस समय में यह निर्णय नहीं कर पाया कि धोबी कौन है और महात्मा कौन है?

प्रतिशोध और बदले की भावना महात्मा को भी धोबी के स्तर पर उतार लाती है।

इसीलिए कहा जाता है कि, बुरे के साथ बुरे मत बनो, नहीं तो महात्मा और दुष्ट की क्या पहचान।

दूसरी तरफ, क्षमा करके व्यक्ति अपने स्तर से काफी ऊँचा उठ जाता है।

इस प्रतिक्रिया में वो सामने वाले को भी ऊँचा उठने और बदलने की गुप्त प्रेरणा या मार्गदर्शन देता है।

“प्रतिशोध और गुस्से से हम कभी कभार खुद को नुक्सान पहुँचा बैठते हैं। जिससे हमें बाद में खुद बहुत पछतावा होता है!

इसलिए समझना होगा कि गुस्सा अपना ही नुक़सान करता है!

गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर गलत ही साबित होता है, इसलिए हमें खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है।

हमेशा निरन्तर भगवान के अव्यक्त-नाम का सुमिरन करना चाहिए।

क्षमा करने से सामने वाले व्यक्ति के नजर में हमारी इज्जत, सम्मान और बढ़ जाती है।

यानी भजन-सुमिरण करने वाले के सिर पर हमेशा परमात्मा का हाथ रहता है।

गुस्से में हमेशा अक्सर वो काम हो जाता है जिससे हम दूसरों को और खुद को भी नुक्सान पहुँचाने के साथ साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं।

गुरु दरबार की सेवा, ध्यान-सुमिरण से मन के अन्दर दया प्रेम पैदा होता है। गुस्सा शान्त हो रहता है।

आपको जब भी गुस्सा आये या किसी के ऊपर गुस्सा हो तो हमें चाहिए कि उस समय हम अपने दिमाग और मन को शान्त रखें (नियन्त्रण करना सीखें) नाम-सुमिरण या फिर हम वहांँ से कहीं दूसरी जगह पर चले जाएँ।

यह मन बड़ा चंँचल और स्वार्थी है, इसलिए हमेशा समय के महापुरुष के सानिध्य में रहें! नियमित सतसंग सुनें! अभ्यास करें! सेवा करें और अपने मानव जीवन को सार्थक करें!
यही जीवन का सार है।

औरतों का त्रिया चरित्र???

एक प्यासा आदमी एक कुएं के पास गया,
जहां एक जवान_औरत पानी भर रही थी
उस आदमी ने औरत से थोड़ा पानी पिलाने के लिए कहा खुशी से उस औरत ने उसे पानी पिलाया।
पानी पीने के बाद उस आदमी ने औरत से पूछा कि आप मुझे औरतों की त्रिया चरित्र के बारे में कुछ बता सकती है???

इतना कहने पर वह औरत जोर जोर से चिल्लाने लगी बचाओ… बचाओ…

उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग कुए की तरह दौड़ने लगे तो उस आदमी ने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रही है, तो उस औरत ने कहा ताकि गांव वाले आए और आपको खूब पीटें और इतना पीटे की आपके होश ठिकाने लग जाए।

यह बात सुनकर उस आदमी ने कहा मुझे माफ करें, मैं तो आपको एक भली और इज्ज़तदार औरत समझ रहा था।

तभी उस औरत ने कुएं के पास रखा मटके का सारा पानी अपने शरीर पर डाल लिया और अपने शरीर को पूरी तरह भींगा डाला। इतने देर में गांव वाले भी कुएं के पास पहुंच गए।
गांव वालों ने उस औरत से पूछा कि क्या हुआ ?

औरत ने कहा मैं कुएं में गिर गई थी इस भले आदमी ने मुझको बचा लिया। यदि यह आदमी यहां नही रहता तो आज मेरी जान चली जाती।
गांव वालों ने उस आदमी की बहुत तारीफ की और उसको कंधों पर उठा लिया। उसका खूब आदर सत्कार किया और उसको इनाम भी दिया।

जब गांव वाले चले गए तो औरत ने उस आदमी से कहा कि अब समझ में आया औरतों का त्रिया चरित्र???

अगर आप औरत को दुःख देंगे और उसे परेशान करेंगे तो वह आपका सब सुख- चैन छीन लेगी और अगर आप उसे खुश रखेंगे तो वह आपको मौत के मुंह से भी निकाल लेगी,,,

चार आदमी और चार स्त्रियां

चार आदमी और चार स्त्रियां

एक बार एक आदमी जंगल से गुज़र रहा था। उसे चार स्त्रियां मिली।
उसने पहली से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ?

उसने कहा “बुद्धि “

तुम कहाँ रहती हो?
उत्तर मिला – मनुष्य के दिमाग में।

दूसरी स्त्री से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया ” लज्जा,।”

फिर पूछा कि तुम कहाँ रहती हो?

उत्तर मिला – आँखों में!

तीसरी से पूछा – तुम्हारा क्या नाम है?

उत्तर मिला “साहस”

कहाँ रहती हो ?
मुनष्य के ह्रदय में ।

चौथी से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जवाब आया – “स्वास्थ्य “

कहाँ रहती हो?
मनुष्य के पेट में।

वह आदमी अब थोड़ा आगे बढा तो फिर उसे चार पुरूष भी मिले।
उसने पहले पुरूष से पूछा –

तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया – ” क्रोध “

कहाँ रहते हो?
मनुष्य के दिमाग में!

दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं, तुम कैसे रहते हो?

जब मैं वहाँ रहता हूँ तो बुद्धि वहाँ से विदा हो जाती है!

दूसरे पुरूष से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं?

उसने कहा- मेरा नाम *”लोभ” है!

कहाँ रहते हो?
लोगों की आँखों में।

आँख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो?
जब मैं आता हूँ तो लज्जा वहाँ से प्रस्थान कर जाती है!

तीसरें से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जबाब मिला “भय”।

कहाँ रहते हो?
मनुष्य केहृदय में।

ह्रदय में तो आनन्द रहता है। तुम कैसे रहते हो?

जब मैं आता हूँ तो आनन्द वहाँ से नौ दो ग्यारह हो जाता है!

चौथे से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?

उसने कहा – “रोग”।

कहाँ रहते हो?
इन्सान के पेट में।

पेट में तो स्वास्थ्य रहता है
जब मैं आता हूँ तो *स्वास्थ्य वहाँ से रवाना हो जाता है।

सांसारिक जीवन की हर विपरीत परिस्थिति में यदि हम उपरोक्त वर्णित बातों को याद रखें तो कई दुखदायी चीजें टाली जा सकती हैं।

इसलिए,
अन्दर बाहर प्रभु के अस्तित्व को स्वीकार करो! समय के सदगुरु के मार्गदर्शन में रहकर अंदर के आनन्द के क़रीब रहो!

भगवान को पाने के लिए सरल बन जाओ! आपके अन्दर छल, कपट, अहंकार के साथ क्रोध और लोभ नहीं होना चाहिए! ताकि हर पल निर्भयता के साथ इस जीवन का भरपूर मात्रा में आनन्द लिया जा सके!

सुप्रभात

मृत्यु के लिये प्रवेश!

मेरे निकट मित्र का यह संस्मरण, जिसे आपके साथ शेयर किया जा रहा है। आशा है यह लेख आपको भी सोचने को मजबूर करेगा।

वाराणसी के एक गेस्ट हाउस का एकाउंट है, जहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं। इसे ‘काशी लाभ मुक्ति भवन’ कहा जाता है।

एक हिंदु मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है, प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने वाराणसी जाने का फैसला किया, यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा, जिन्होंने न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो।

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया। उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे।

इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा, “शुक्ला जी, आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे।”

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये। लेकिन इस श्रृंखला में एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया।

वह जीवन का असली पाठ है- ‘जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें।

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे। जिनका नाम राम सागर मिश्रा था। मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया। इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई, अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में, मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14वें दिन मिश्रा जी ने, 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा, “यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है। मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ।”

14वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया। जल्द ही, उनके सबसे छोटे भाई आ गए।

मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा। उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया। उनका चेहरा शांत हो गया और उसी क्षण वह चल बसे।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे केवल अपनी यात्रा के समय इसे छोड़ना चाहते हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए। किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए!

क्योंकि अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है।

जरा सोचें…क्या कुछ ऐसा है या कोई है जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।
तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

जब तुम कहते हो, भगवान! “अगर तू है तो अपने को दिखा दे!’’
तो वह अंदर से ही दरवाज़ा खटखटाता है- मैं यहाँ हूँ। तू मुझे बाहर ढूँढ़ता है और मैं तेरे अंदर बैठा हूँ।

लोग कहते हैं कि ‘‘भगवान को सबकुछ मालूम है!’’

जिसको सब कुछ मालूम है उसको यह भी तो मालूम होगा कि तुमको उसकी ज़रूरत पड़ेगी।

सबके घट में वह परमानंद विराजमान है, परंतु सब बाहर दौड़ लगा रहे हैं। उसी दौड़ को अंदर की तरफ लगाना है।

जैसे ही हम अंदर की तरफ दौड़ लगाना शुरू करेंगे, वह परमानंद हमें स्वयं अपने पास बुलाएगा। क्योंकि वहाँ है हृदय, और हृदय के अंदर उसकी प्यास लगी हुई है।

उस प्यास को बुझाने की क्या विधि है?

वह विधि मैं जगह-जगह जाकर लोगों को बताता हूँ और कहता हूँ कि परमानंद तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। उसको अपना बॉस बनाओ, उसकी चाकरी करो तो तुम्हारे जीवन के अंदर भी सुख और आनंद की बारिश हो जायेगी। जो व्यक्ति शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाना चाहता है, उनका मैं मार्गदर्शन कर सकता हूँ।

  • Prem Rawat

भक्ति दान मोहि दीजिये…..

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज अपने गुरु जी के आश्रम जाकर वहांँ पर साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था।
अक्सर वो अपने गुरु जी से कहता कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाये।

एक दिन गुरु जी ने पूछ ही लिया कि क्या तुम आश्रम में इसीलिए सेवा करने आते हो?
उसने पूरी ईमानदारी से कहा कि हांँ, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाये, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूंँ। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूंँ। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आयेंगे।
गुरु जी ने कहा कि – तुम चिन्ता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आयेगा तब तुम्हें कोई आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, काम-धन्धा खूब चलने लगा वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि आश्रम में जाना ही छूट गया। कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही आश्रम पहुंँचा और साफ-सफाई करने लगा।

गुरु जी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आये हो? सुना है बहुत बड़े सेठ बन गये हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियांँ की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में शान्ति नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूंँ! पर आ ना सका! गुरु जी आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिन्दगी में शान्ति नहीं दी?

गुरु जी ने कहा कि तुमने मेरे पास शान्ति (चैन) मांँगा ही कब था? जो तुमने मांँगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहांँ क्या करने आए हो।

उसकी आंँखों में आंँसू भर आए! गुरु जी के श्रीचरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांँगने के लिए सेवा नहीं करूंँगा। दिल को शान्ति मिल जाये, बस।

गुरू जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ माँगने के लिए आश्रम की सेवा नहीं करोगे! बस मन की शान्ति के लिए ही आओगे।

उन्होंने ने समझाया कि चाहे मांँगने से कुछ भी मिल जाये पर दिल का (चैन) शान्ति कभी नहीं मिलती इसलिए सेवा के बदले कुछ मांँगना नहीं है।
वो व्यक्ति अपने गुरुदेव को सुनता रहा और बोला- गुरू जी मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए।

यह सत्य है कि – सच्चे गुरू की शरणागत होने पर उनके दरवार में डिमाण्ड और कमांड वाली सोच को त्यागना होगा! तभी अलोकिक आनन्द मिल पायेगा जो सदा भक्त की कल्पना से परे की स्थिति होती है!

एक ही बार परखिये,परखिये ना बारम्बार।

एक ही बार परखिये,
परखिये ना बारम्बार।

बालू तो हूं किरकिरी,
जो छाने सौ बार।

★अर्थ: किसी व्यक्ति को परखना है तो बस एक बार में ही परख लेना चाहिए!
जिस प्रकार रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो उसकी किरकिरी दूर नहीं होती!

उसी प्रकार दुर्जन को भी बार बार भी परखो; तब भी वह अपनी दुष्टता से भरा हुआ वैसा ही मिलेगा! जबकि सज्जन की परख एक बार में ही हो जाती है।

कहानी सलाह यह या वह
🌸🌸🌸🌸🌸

एक धनी व्यक्ति का बटुआ बाजार में गिर गया। उसे घर पहुंच कर इस बात का पता चला। बटुए में जरूरी कागजों के अलावा कई हजार रुपये भी थे। फौरन ही वो मंदिर गया और प्रार्थना करने लगा कि बटुआ मिलने पर प्रसाद चढ़ाउंगा, गरीबों को भोजन कराउंगा आदि।

संयोग से वो बटुआ एक बेरोजगार युवक को मिला।

बटुए पर उसके मालिक का नाम लिखा था। इसलिए उस युवक ने सेठ के घर पहुंच कर बटुआ उन्हें दे दिया। सेठ ने तुरंत बटुआ खोल कर देखा। उसमें सभी कागजात और रुपये यथावत थे।

सेठ ने प्रसन्न हो कर युवक की ईमानदारी की प्रशंसा की और उसे बतौर इनाम कुछ रुपये देने चाहे, जिन्हें लेने से युवक ने मना कर दिया।

इस पर सेठ ने कहा, अच्छा कल फिर आना।

युवक दूसरे दिन आया तो सेठ ने उसकी खूब खातिर की। युवक चला गया।

युवक के जाने के बाद सेठ अपनी इस चतुराई पर बहुत प्रसन्न था कि वह तो उस युवक को सौ रुपये देना चाहता था। पर युवक बिना कुछ लिए सिर्फ खा -पी कर ही चला गया।

उधर युवक के मन में इन सब का कोई प्रभाव नहीं था,

क्योंकि उसके मन में न कोई लालसा थी और न ही बटुआ लौटाने के अलावा और कोई विकल्प ही था।

सेठ बटुआ पाकर यह भूल गया कि उसने मंदिर में कुछ वचन भी दिए थे।

सेठ ने अपनी इस चतुराई का अपने मुनीम और सेठानी से जिक्र करते हुए कहा कि देखो वह युवक कितना मूर्ख निकला। हजारों का माल बिना कुछ लिए ही दे गया।

सेठानी ने कहा, तुम उल्टा सोच रहे हो। वह युवक ईमानदार था। उसके पास तुम्हारा बटुआ लौटा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसने बिना खोले ही बटुआ लौटा दिया। वह चाहता तो सब कुछ अपने पास ही रख लेता। तुम क्या करते? ईश्वर ने दोनों की परीक्षा ली। वो पास हो गया, तुम फेल। अवसर स्वयं तुम्हारे पास चल कर आया था, तुमने लालच के वश उसे लौटा दिया। अब अपनी गलती को सुधारो और जाओ उसे खोजो। उसके पास ईमानदारी की पूंजी है, जो तुम्हारे पास नहीं है। उसे काम पर रख लो।

सेठ तुरत ही अपने कर्मचारियों के साथ उस युवक की तलाश में निकल पड़ा।

कुछ दिनों बाद वह युवक किसी और सेठ के यहां काम करता मिला।

सेठ ने युवक की बहुत प्रशंसा की और बटुए वाली घटना सुनाई, तो उस सेठ ने बताया,

उस दिन इसने मेरे सामने ही बटुआ उठाया था। मैं तभी अपने गार्ड को लेकर इसके पीछे गया।

देखा कि यह तुम्हारे घर जा रहा है। तुम्हारे दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सब कुछ देखा व सुना। और फिर इसकी ईमानदारी से प्रभावित होकर इसे अपने यहां मुनीम रख लिया। इसकी ईमानदारी से मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं।

बटुए वाला सेठ खाली हाथ लौट आया। पहले उसके पास कई विकल्प थे! उसने निर्णय लेने में देरी की। उस ने एक विश्वासी पात्र खो दिया।

युवक के पास अपने सिद्धांत पर अटल रहने का नैतिक बल था। उसने बटुआ खोलने के विकल्प का प्रयोग ही नहीं किया।

युवक को ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया। दूसरे सेठ के पास निर्णय लेने की क्षमता थी।

उसे एक उत्साही , सुयोग्य और ईमानदार मुनीम मिल गया।

एक बहुत बड़े विचारक सोरेन कीर्कगार्ड ने अपनी पुस्तक आइदर -और अर्थात यह या वह में लिखा है कि जिन वस्तुओं के विकल्प होते हैं उन्हीं में देरी होती है। विकल्पों पर विचार करना गलत नहीं है। लेकिन विकल्पों पर ही विचार करते रहना गलत है। हम यह या वह के चक्कर में फंसे रह जाते हैं।

किसी संत ने एक जगह लिखा है , विकल्पों में उलझ कर निर्णय पर पहुंचने में बहुत देर लगाने से लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है।
सुप्रभात
🙏🙏🙏🙏🙏