जीवन का आनंद

एक बार एक सम्राट एक साधु से बहुत प्रभावित हो गए। सम्राट रोज रात को अपने घोड़े पर सवार होकर राज्य का चक्कर लगाने निकलते थे, उस समय रोज उस साधु को देखते थे।
वह साधु एक वृक्ष के नीचे अपनी मस्ती में बैठे, कभी बाँसुरी बजाते, कभी नाचते, कभी गीत गुनगुनाते और कभी चुपचाप बैठ कर आकाश के तारों को देखते रहते थे।

सम्राट जब भी घोड़े पर सवार होकर उसके पास से निकलते तो वहाँ रुक जाते।

उसकी मस्ती को देखते और फिर वहाँ से चले जाते। धीरे-धीरे उनको उस साधु को देखने में इतना रस मिलने लगा कि उसे देखते-देखते समय कब बीत जाता, उन्हें पता ही नहीं चलता। वे एक झाड़ी के पीछे दूर चुपचाप खडे रहते और उस साधु की मस्ती देखते रहते। उसकी मस्ती में ऐसे खो जाते कि खुद भी मस्त होकर घर लौटते।
यह रोज का ही सिलसिला बन गया था।

एक दिन सम्राट इतना भाव विभोर होकर उस साधु के चरणों में गिर पड़े और कहा कि, “हे गुरुदेव, मैं आपको यहाँ और नहीं रहने दूँगा। वर्षा ऋतु करीब आ रही है। यह वृक्ष है, इसके नीचे आप बारिश में कैसे रहेंगे। आप मेरे महल में चलकर मुझ पर कृपा करें। मुझे सेवा का अवसर दे।

यह सुनते ही साधु खड़े हो गए और अपनी झोली उठाई और कहा कि, “चलो।”

यह देखकर सम्राट को बहुत सदमा लगा।
सम्राट ने तो सोचा था कि मेरी बात सुन साधु कहेंगे – कैसा महल, कहाँ का महल, हम जहाँ हैं, वहीं मस्त हैं। हम महलों में नहीं जाना चाहते। हमने महलों और सभी सुख सुविधाओं का त्याग कर दिया है। सम्राट के मन में तो साधु से यह सब सुनने की अपेक्षा थी। अगर साधु ने ऐसा कहा होता तो सम्राट उनके पैरों में गिर कर कुछ और विनती कर लेते, लेकिन साधू तुरंत चलने को तैयार हो गये, तो सम्राट थोड़ा सदमे में आ गये।

उन्होंने सोचा कि कहीं मैंने गलती तो नहीं कर दी। इस आदमी ने मेरे साथ कोई चालबाजी तो नहीं की है। यह इसकी महल में घुसने की कोई तरकीब तो नहीं है। यह कहीं मेरे ऊपर ही जाल तो नहीं फेंक रहा था। मैं फालतू ही इसके चक्कर में पड़ा।

सम्राट यह सब सोच ही रहा था कि तब तक वह साधु सम्राट के घोड़े पर चढ़कर बैठ गया और उसने सम्राट को चलने के लिए कहा।

सम्राट को जिंदगी में पहली बार पैदल चलना पड़ा जबकि वह साधु बड़े मजे से घोड़े पर बैठकर जा रहा था।

सम्राट का मन शक के घेरे मे फँस गया, लेकिन सम्राट अब अपनी बात से पलट भी नहीं सकते थे। वे अपने वचन के अधीन थे। सम्राट के मन में साधु के लिए सम्मान खत्म हो चुका था।

साधु महल में ऐसी ही मस्ती में रहने लगा जैसी मस्ती में वह वृक्ष के नीचे रहते थे।

साधु वृक्ष के नीचे भी बाँसुरी बजाते थे और महल में आकर भी वह बाँसुरी ही बजा रहें थे लेकिन अब वह मखमल के गद्दे पर बैठकर बाँसुरी बजा रहे थे। यह सब देख कर सम्राट का दिल जलने लगा।
वह सोचने लगा कि मैं किसे उठा लाया, यह कोई साधु नहीं है। सम्राट से भी ज्यादा शान से वह रहता है। सम्राट को तो चिंता और फिक्र भी थी क्योंकि उन्हें अपना साम्राज्य, अपना महल, अपनी धन दौलत, सभी को संभालना था। लेकिन साधु को तो कोई चिंता ही नहीं थी। वह तो अपनी ही मस्ती में बाँसुरी बजाए, नाचे-गाये और मस्ती में भोजन करें।

6 महीने तक किसी तरह सम्राट ने बर्दास्त किया लेकिन अब बात सम्राट के सहन के बाहर हो गई थी।

एक दिन सम्राट ने साधु से कहा कि, “हे गुरुदेव मेरे मन मे एक जिज्ञासा है। मुझे जानना है कि अब मुझ में और आप में क्या फर्क है?”

साधु ने कहा कि, “फर्क जानना चाहते हो।”

सम्राट ने कहा, “हाँ, महाराज।”

साधु ने कहा कि, “तुम 6 महीने क्यों परेशान रहे। यह बात तुम उसी वक्त पूछ लेते, जब मैं तुम्हारे घोड़े पर बैठा था क्योंकि मैंने तो देख ही लिया था कि यह बात तुम्हारे मन में उसी वक्त उठ गई थी। जब मैं अपना झोला उठाकर तुम्हारे साथ चलने को राजी हुआ था उसी वक्त मैंने तुम्हारा चेहरा पढ़ लिया था। यह प्रश्न तो उस वक्त भी तुम्हारे भीतर था। अरे बुद्धू; तुमने 6 महीने तक अपना दिल क्यों जलाया। वहीं पूछ लिया होता तो, मैं झोला डाल कर फिर वही बैठ जाता। क्यों नहीं पूछा तुमने, क्या संकोच था तुम्हारे मन में? मैं प्रतीक्षा ही कर रहा था कि कब तुम मुझसे पूछोगे। ठीक है, कल सुबह मैं तुम्हें फर्क बता ही देता हूँ। लेकिन हाँ, गाँव के बाहर बताऊँगा।”

सम्राट बहुत उत्सुक थे जानने के लिए कि क्या फर्क है।

सम्राट ने सोचा कि खाना जो मैं खाता हूँ, वह भी वही खाता है। मैं जिस कमरे में रहता हूँ, उससे भी ज्यादा सुंदर कमरे में ये साधू रहते हैं। मेरा दो तीन नौकरों से काम चल जाता है लेकिन वह पूरे दिन पंद्रह- बीस नौकरों से काम करवाता है। इसकी जरूरतों का कोई अंत नहीं। कपड़े शानदार पहनते है। यह खुद ही इस महल का सम्राट मालूम पड़ते है। कम से कम महल के बाकी लोग मुझसे डरते तो हैं। इसकी आँखों में तो डर नाम की कोई चीज ही नहीं है। बस पूरे दिन बिना किसी चिंता के मस्त बाँसुरी बजाते रहते हैं। अब देखते है कि आज क्या फर्क बतलाते है। उस पूरी रात सम्राट सो नहीं पाये सुबह जल्दी से तैयार होकर वह साधु के पास पहुंच गए। वहाँ जाकर देखा कि साधु ने वही पुराने कपड़े पहने हुए थे, जो कपड़े पहन कर वह वृक्ष के नीचे बैठते थे। एक हाथ में उसका झोला और दूसरे हाथ में उसकी बाँसुरी थी। वह तैयार खड़े थे।

सम्राट ने कहा, चलें महाराज।”

फिर दोनों महल के बाहर निकल आए। चलते-चलते गाँव की नदी पार हो गई। कुछ ही देर में वह दोंनो गाँव के बाहर आ गए।

सम्राट ने पूछा, “अभी और कितना चलना है।”

साधु ने कहा, “बस कुछ देर और।”

चलते चलते सुबह से दोपहर हो गई।

सम्राट ने कहा कि, “बस, अब मुझसे और आगे नहीं चला जाएगा। जो भी कहना है, यहीं कह दो।”

साधु ने कहा कि, “मैं तो और आगे जा रहा हूँ। तुम चल रहे हो या नहीं।”

सम्राट ने कहा, “मैं कैसे चल सकता हूँ। मेरा महल, मेरी बीवी, मेरे बच्चे, मेरा धन-दौलत सब कुछ पीछे रह गया है। मैं तुम्हारी तरह फ़कीर तो नहीं हूँ, जिसे किसी चीज की फिक्र नहीं है।”

साधु ने कहा, “बस यही फर्क है तुम्हारे और मेरे बीच में। मैं कहीं भी जा सकता हूँ, तुम नहीं जा सकते हो। मैं हर परिस्थिति में खुश रह सकता हूँ, लेकिन तुम नहीं रह सकते हो। जब मैं उस वृक्ष के नीचे रहता था तब भी मस्ती से रहता था और अपनी जिंदगी के एक-एक पल को जीता था। और मैं महल चला गया, तब भी मैंने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी मस्ती और खुशी के साथ जिया। अब मैं अगर कहीं और चला जाऊँ, तब भी मैं ऐसे ही जी लूँगा। हम जिस वक्त जहाँ रहते हैं, पूरी तरीके से वही रहते हैं। हम ना तो अपने बीते हुए कल के बारे में सोच कर पश्चाताप करते हैं और ना ही भविष्य की चिंता करके अपने वर्तमान को खराब करते हैं। हम बस आज में जीते हैं क्योंकि हम समझ चुके हैं कि जीवन तो आज में हैं। जीवन तो इसी पल को जीने में हैं। बस यही छोटा सा फर्क है, तुम में और मुझ में ।

तुम्हें परिस्थितियाँ चलाती है और हम परिस्थितियों को चलाते हैं।

तुम खुश रहोगे या दुखी, यह तुम्हारे आसपास होने वाली घटनाओं पर निर्भर करता है लेकिन हमारे लिए यह घटनाएँ जिंदगी के सफर का एक हिस्सा मात्र है।

अचानक सम्राट को महसूस हुआ कि अरे यह मैंने क्या कर दिया इतने अद्भुत आदमी को नहीं पहचान पाया। 6 महीने इनके साथ सत्संग भी नहीं कर पाया। सत्संग करता भी तो कैसे मेरे मन में तो यही चल रहा था कि यह एक ढोंगी बाबा है।

तुरंत सम्राट ने साधु के पैर पकड़ लिए और बोला, “नहीं महाराज, अब मैं आपको नहीं जाने दूँगा।”

साधु ने कहा “देख मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं फिर से तेरे महल मे चल दूँगा लेकिन फिर तुझे परेशानी होगी।”

ऐसा सुनते ही फिर सम्राट के मन में वही विचार आया कि यह साधु तो फिर आसानी से मान गया।

साधु ने सम्राट के चेहरे की तरफ बड़ी ध्यान से देखा और फिर बोले, “लेकिन नहीं, अब मैं नहीं आऊँगा क्योंकि तू फिर नहीं सुधरेगा। फिर तुझे परेशानी होगी और तू फिर से चिंता में पड़ जाएगा। हमारा क्या हम तो सन्यासी हैं। हमारे लिए महल और जंगल सब एक जैसे हैं। हमें कोई भी समस्या नहीं है क्योंकि जिसे समस्या है, वह सन्यासी ही नहीं है। मेरी बाँसुरी जैसे महल में बजाती थी, वैसी ही जंगल में भी बजेगी और बजती ही रहेगी।”

यह कहकर वह साधू वहाँ से चले गए और सम्राट वही खडे-खडे उस साधु को जाते हुए देख रहे थे।

इस प्रसंग में एक गहरा संदेश हम सभी के लिए छुपा है।
हम ऐसा सोचते हैं कि हम भी आजादी का जीवन जी रहे हैं, पर वास्तव में हम अवचेतन मन के द्वारा चलाए जा रहे हैं। हम अवचेतन मन के गुलाम है। वह साधु वास्तव में अपने मन को चला रहा था और हमें वास्तव में हमारा मन चला रहा है।

“यदि एक बार मन सामंजस्यपूर्ण स्थिति में आ जाए तो फिर न बाहरी परिस्थितियों और वातावरण का उस पर कोई प्रभाव होगा और न ही आंतरिक अशांति होगी।

मृत्यु एक सत्य हैं

एक राधेश्याम नामक युवक था! स्वभाव का बड़ा ही शांत एवम सुविचारों वाला व्यक्ति था! उसका छोटा सा परिवार था जिसमे उसके माता- पिता, पत्नी एवम दो बच्चे थे! सभी से वो बेहद प्यार करता था!

इसके अलावा वो कृष्ण भक्त था और सभी पर दया भाव रखता था! जरूरतमंद की सेवा करता था! किसी को दुःख नहीं देता था! उसके इन्ही गुणों के कारण श्री कृष्ण उससे बहुत प्रसन्न थे और सदैव उसके साथ रहते थे! और राधेश्याम अपने कृष्ण को देख भी सकता था और बाते भी करता था! इसके बावजूद उसने कभी ईश्वर से कुछ नहीं माँगा! वह बहुत खुश रहता था क्यूंकि ईश्वर हमेशा उसके साथ रहते थे! उसे मार्गदर्शन देते थे! राधेश्याम भी कृष्ण को अपने मित्र की तरह ही पुकारता था और उनसे अपने विचारों को बाँटता था!

एक दिन राधेश्याम के पिता की तबियत अचानक ख़राब हो गई! उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया! उसने सभी डॉक्टर्स के हाथ जोड़े! अपने पिता को बचाने की मिन्नते की! लेकिन सभी ने उससे कहा कि वो ज्यादा उम्मीद नहीं दे सकते! और सभी ने उसे भगवान् पर भरोसा रखने को कहा!

तभी राधेश्याम को कृष्ण का ख्याल आया और उसने अपने कृष्ण को पुकारा! कृष्ण दौड़े चले आये! राधेश्याम ने कहा – मित्र ! तुम तो भगवान हो मेरे पिता को बचा लो!

कृष्ण ने कहा – मित्र ! ये मेरे हाथों में नहीं हैं! अगर मृत्यु का समय होगा तो होना तय हैं!
इस पर राधेश्याम नाराज हो गया और कृष्ण से लड़ने लगा, गुस्से में उन्हें कौसने लगा!
भगवान् ने भी उसे बहुत समझाया पर उसने एक ना सुनी!

तब भगवान् कृष्ण ने उससे कहा – मित्र ! मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ लेकिन इसके लिए तुम्हे एक कार्य करना होगा!

राधेश्याम ने तुरंत पूछा कैसा कार्य?
कृष्ण ने कहा – तुम्हे, किसी एक घर से मुट्ठी भर ज्वार लानी होगी और ध्यान रखना होगा कि उस परिवार में कभी किसी की मृत्यु न हुई हो!
राधेश्याम झट से हाँ बोलकर तलाश में निकल गया!
उसने कई दरवाजे खटखटायें! हर घर में ज्वार तो होती लेकिन ऐसा कोई नहीं होता जिनके परिवार में किसी की मृत्यु ना हुई हो! किसी का पिता, किसी का दादा, किसी का भाई, माँ, काकी या बहन! दो दिन तक भटकने के बाद भी राधेश्याम को ऐसा एक भी घर नहीं मिला!

तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि मृत्यु एक अटल सत्य हैं! इसका सामना सभी को करना होता हैं! इससे कोई नहीं भाग सकता! और वो अपने व्यवहार के लिए कृष्ण से क्षमा मांगता हैं और निर्णय लेता हैं जब तक उसके पिता जीवित हैं उनकी सेवा करेगा!

थोड़े दिनों बाद राधेश्याम के पिता स्वर्ग सिधार जाते हैं! उसे दुःख तो होता हैं लेकिन ईश्वर की दी उस सीख के कारण उसका मन शांत रहता है!

इसी प्रकार हम सभी को इस सच को स्वीकार करना चाहिये कि मृत्यु एक अटल सत्य हैं उसे नकारना मूर्खता हैं!
दुःख होता हैं लेकिन उसमे फँस जाना गलत हैं क्यूंकि केवल आप ही उस दुःख से पीड़ित नहीं हैं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति उस दुःख से रूबरू होती ही हैं! ऐसे सच को स्वीकार कर आगे बढ़ना ही जीवन है!

कई बार हम अपने किसी खास के चले जाने से इतने बेबस हो जाते हैं कि सामने खड़ा जीवन और उससे जुड़े लोग हमें दिखाई ही नहीं पड़ते! ऐसे अंधकार से निकलना मुश्किल हो जाता हैं! जो मनुष्य मृत्यु के सत्य को स्वीकार कर लेता हैं उसका जीवन भार विहीन हो जाता हैं और उसे कभी कोई कष्ट तोड़ नहीं सकता! वो जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ता जाता है!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है!
किसी भी रिश्ते की कदर जीते-जी करिए और जी-जान से करिए!
संसार से जाने वाला कभी वापिस नहीं आता, चाहे वह कितना ही करीबी क्यों न हो!

सबसे-बड़ा-मूर्ख

एक बहुत धनी व्यापारी था। उसने बहुत धन सम्पत्ति इकट्ठा कर रखी थी। उसका एक नौकर था सम्भु। जो अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा गरीबों की मदद में खर्च कर देता था। व्यापारी रोज उसे धन बचाने की शिक्षा देता। लेकिन सम्भु पर कोई असर नहीं होता था।

इससे तंग आकर एक दिन व्यापारी ने सम्भु को एक डन्डा दिया और कहा कि जब तुझे अपने से भी बड़ा कोई मूर्ख मिले तो इसे उसको दे देना।

इसके बाद व्यापारी अक्सर उससे पूछता कि कोई तुझसे बड़ा मूर्ख मिला?

सम्भु विनम्रता से इनकार कर देता।

एक दिन व्यापारी बीमार हो गया। रोग इतना बढ़ा कि वह मरणासन्न हो गया।

अन्तिम समय उसने सम्भु को अपने पास बुलाया और कहा कि अब मैं इस संसार को छोड़कर जाने वाला हूँ।

सम्भु ने कहा, “मालिक मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”

व्यापारी ने प्यार से डांँटते हुए कहा, “वहांँ कोई किसी के साथ नहीं जाता।”

सम्भु ने फिर कहा, ”फिर तो आप धन-दौलत, सुख- सुविधा के सामान जरूर ले जाइये और आराम से वहांँ रहियेगा।”

व्यापारी ने कहा, ”पगले! वहांँ कुछ भी लेकर नहीं जाया जा सकता। सबको अकेले और खाली हाथ ही जाना पड़ता है।”

इस पर सम्भु बोला, “मालिक! तब तो यह डन्डा आप ही रखिये। जब कुछ लेकर जाया नहीं जा सकता। तो आपने बेकार ही पूरा जीवन धन दौलत और सुख सुविधाओं को एकत्र करने में नष्ट कर दिया। न तो दान पुण्य किया, न ही भगवान का भजन-सुमिरण। इस डंडे के असली हकदार तो आप ही हो।”

इसलिए अधिक धन का लोभ नहीं करना चाहिए। क्योंकि अन्त समय में मनुष्य के साथ कुछ नहीं जाता केवल सेवा, सतसंग, नाम-सुमिरण की कमाई ही साथ जायेगी।

राम से बड़ा राम का ‘नाम’

रामदरबार में हनुमानजी महाराज श्री रामजी की सेवा में इतने तन्मय हो गए कि गुरू वशिष्ठ k आने का उनको ध्यान ही नहीं रहा. .. सबने उठ कर उनका अभिवादन किया लेकिन हनुमानजी नहीं कर पाए. ..

वशिष्ठ जी ने श्री रामजी से कहा कि राम गुरु का भरे दरबार में अभिवादन नहीं कर अपमान करने पर क्या सजा होनी चाहिए।

श्री रामजी ने कहा गुरुवर आप ही बताएं
वशिष्ठ जी ने कहा:- “मृत्यु दण्ड”
श्रीराम जी ने कहा:- स्वीकार है

तब श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव आप बताएं कि यह अपराध किसने किया है..

बता दूंगा पर “राम” वो तुम्हारा इतना प्रिय है कि, तुम अपने आप को सजा दे दोगे पर उसको नहीं दे पाओगे

श्रीराम जी ने कहा:- गुरुदेव,राम के लिए सब समान हैं, मैंने सीता जैसी पत्नी का सहर्ष त्याग धर्म के लिए कर दिया….फिर भी आप संशय कर रहे हैं..

नहीं, “राम”! मुझे तुम्हारे उपर पर संशय नहीं है पर, मुझे दण्ड के परिपूर्ण होने पर संशय है…. अत:यदि तुम यह विश्वास दिलाते हो कि,तुम स्वयं उसे मृत्यु दण्ड अपने अमोघ बाण से दोगे तो ही मैं अपराधी का नाम और अपराध बताऊंगा

श्रीराम जी ने पुन: अपना संकल्प व्यक्त कर दिया. .

तब वशिष्ठ जी ने बताया कि यह अपराध हनुमान जी ने किया है।

हनुमानजी ने भी स्वीकार कर लिया. ..
तब दरबार में रामजी ने घोषणा की कि कल सांयकाल सरयु के तट पर,हनुमानजी को में स्वयं अपने अमोघ बाण से मृत्यु दण्ड दूंगा।

हनुमानजी के घर जाने पर उदासी की अवस्था में माता अंजनी ने देखा तो चकित रह गई कि मेरा लाल महावीर, अतुलित बल का स्वामी, ज्ञान का भण्डार, आज इस अवस्था में..

माता ने बार बार पुछा, पर जब हनुमान चुप रहें तो माता ने अपने दूध का वास्ता देकर पूछा. ..
तब हनुमानजी ने बताया कि, यह प्रकरण हुआ है अनजाने में..

माता! आप जानती हैं कि हनुमान को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं मार सकता, पर भगवान श्रीराम के अमोघ बाण से भी कोई बच भी नहीं सकता…

तब “माता” ने कहा:-
हनुमान,मैंने भगवान शंकर से, “राम” मंत्र (नाम) प्राप्त किया था ,और तुम्हें भी जन्म के साथ ही यह नाम घुटी में पिलाया…

जिसके प्रताप से तुमने बचपन में ही सूर्य को फल समझ मुख में ले लिया था,उस राम नाम के होते हुए हनुमान कोई भी तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता,चाहे वो राम स्वयं ही क्यों ना हों…

राम नाम की शक्ति के सामने राम की शक्ति और राम के अमोघ शक्तिबाण की शक्तियां महत्वहीन हो जाएंगी।

जाओ मेरे लाल,अभी से सरयु के तट पर जाकर राम नाम का उच्चारण करना आरंभ करदो।
माता के चरण छूकर हनुमानजी,सरयु किनारे राम राम राम राम रटने लगे…

सांयकाल,राम अपने सम्पूर्ण दरबार सहित सरयु तट आए….

सबको कोतूहल था कि क्या राम हनुमान को सजा देंगे..

लेकिन जब श्रीराम ने बार बार रामबाण,अपने महान शक्तिधारी,अमोघशक्ति बाण चलाए पर हनुमानजी के ऊपर उनका कोई असर नहीं हुआ तो गुरु वशिष्ठ जी ने शंका जताई:-
राम क्या तुम अपनी पुर्ण निष्ठा से बाणों का प्रयोग कर रहे हो..

तब श्रीराम ने कहा:- हां गुरूदेव, मैं गुरु के प्रति अपराध की सजा देने को अपने बाण चला रहा हूं,उसमें किसी भी प्रकार की चतुराई करके मैं कैसे वही अपराध कर सकता हूं..

तो तुम्हारे बाण अपना कार्य क्यों नहीं कर रहे हॆ
तब श्रीराम ने कहा:- गुरुदेव हनुमान राम राम राम की अंखण्ड रट लगाये हुए है,मेरी शक्तिंयों का अस्तित्व राम नाम के प्रताप के समक्ष महत्वहीन हो रहा है…

इससे मेरा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो रहा है,आप ही बताएं गुरु देव ! मैँ क्या करुं..

गुरु देव ने कहा:- हे राम! आज से मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे दरबार को त्याग कर,अपने आश्रम जा रहा हूं जहां राम नाम का निरंतर जप करुंगा…

जाते -जाते, गुरुदेव वशिष्ठ जी ने घोषणा की….हे राम ! मैं जानकर,मानकर,यह घोषणा कर रहा हूं कि स्वयं राम से राम का नाम बडा़ है,राम नाम महाअमोघशक्ति का सागर है..

जो कोई जपेगा,लिखेगा,मनन करेगा,उसकी लोक कामनापूर्ति होते हुए भी,वो मोक्ष का भागी होगा।

मैंने सारे मंत्रों की शक्तियों को राम नाम के समक्ष न्युनतर माना है. .

तभी से राम से बडा राम का नाम माना जाता है,वो पत्थर भी तैर जातें है जिन पर राम का नाम लिखा रहता है।

भाइयों का सम्बंध

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा, “एक बात पूंछूँ भइया?”

“माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था?

उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई।

ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?”

राम मुस्कुराए। बोले, “जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?”

भरत संतुष्ट नहीं हुए। कहा, “यह तो मोह है भइया, और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है। एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया, समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है।”

राम गम्भीर हो गए! कुछ क्षण के मौन के बाद कहा, “अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत ! माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई अपने अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं, पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं। अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया, फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं। वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए, पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा।”

राम के नेत्रों में जल उतर आया था और भरत आदि भाई मौन हो गए थे।

राम ने फिर कहा, “और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत ! यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता। मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था, पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है।”

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे। वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

पुण्य और कर्तव्य

एक बार की बात है। एक बहुत ही पुण्यशाली व्यक्ति अपने परिवार सहित तीर्थ यात्रा के लिए निकला।

कई कोस दूर जाने के बाद पूरे परिवार को प्यास लगने लगी, ज्येष्ठ का महीना था, आस पास कहीं पानी नहीं दिखाई पड़ रहा था।

उसके बच्चे प्यास से व्याकुल होने लगे। समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे… अपने साथ लेकर चलने वाला पानी भी समाप्त हो चुका था!

एक समय ऐसा आया कि उसे भगवान से प्रार्थना करनी पड़ी कि हे प्रभु! अब आप ही कुछ करो!

इतने में उसे कुछ दूर पर एक साधु तप करता हुआ नजर आये। व्यक्ति ने उस साधु से जाकर अपनी समस्या बताई।
साधु बोले कि यहाँ से एक कोस दूर उत्तर की दिशा में एक छोटी दरिया बहती है, जाओ जाकर वहां से पानी की प्यास बुझा लो।

साधु की बात सुनकर उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने साधु को धन्यवाद बोला।

पत्नी एवं बच्चों की स्थिति नाजुक होने के कारण वहीं रुकने के लिए बोला और खुद पानी लेने चला गया।

जब वो दरिया से पानी लेकर लौट रहा था तो उसे रास्ते में पांच व्यक्ति मिले जो अत्यंत प्यासे थे। पुण्य आत्मा को उन पाँचों व्यक्तियों की प्यास देखी नहीं गयी और अपना सारा पानी उन प्यासों को पिला दिया। जब वो दोबारा पानी लेकर आ रहा था तो पांच अन्य व्यक्ति मिले जो उसी तरह प्यासे थे। पुण्य आत्मा ने फिर अपना सारा पानी उनको पिला दिया।

यही घटना बार-बार हो रही थी और काफी समय बीत जाने के बाद जब वो नहीं आया तो साधु उसकी तरफ चल पड़ा!

बार-बार उसके इस पुण्य कार्य को देखकर साधु बोला – “हे पुण्य आत्मा तुम बार-बार अपनी बाल्टी भरकर दरिया से लाते हो और किसी प्यासे के लिए ख़ाली कर देते हो। इससे तुम्हें क्या लाभ मिला?

पुण्य आत्मा ने बोला, मुझे क्या मिला? या क्या नहीं मिला इसके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा। पर मैंने अपना स्वार्थ छोड़कर अपना धर्म निभाया।

साधु बोले – “ऐसे धर्म निभाने से क्या फ़ायदा जब तुम्हारे अपने बच्चे और परिवार ही जीवित ना बचे? तुम अपना धर्म ऐसे भी निभा सकते थे जैसे मैंने निभाया।

पुण्य आत्मा ने पूछा – “कैसे महाराज ?

साधु बोले- “मैंने तुम्हें दरिया से पानी लाकर देने के बजाय दरिया का रास्ता ही बता दिया। तुम्हें भी उन सभी प्यासों को दरिया का रास्ता बता देना चाहिए था, ताकि तुम्हारी भी प्यास मिट जाये और अन्य प्यासे लोगों की भी… फिर किसी को अपनी बाल्टी ख़ाली करने की जरुरत ही नहीं होगी।”
इतना कहकर साधु अंतर्ध्यान हो गये!

पुण्य आत्मा को सब कुछ समझ आ गया कि अपना पुण्य ख़ाली कर दूसरों को देने के बजाय, दूसरों को भी पुण्य अर्जित करने का रास्ता या विधि बतायें!

आज संसार में सब कुछ होते हुए भी आदमी आत्म शान्ति के लिए प्यासा है!

एक सच्चे भक्त को अगर उसके भाग्य से सद्गुरु मिले हों और अन्दर की शान्ति पाने का तरीका मिल चुका हो तो उस संदेश से सभी ज्ञान और आनन्द के पिपासु को परिचित कराना चाहिए!

उनको उनके खुद के अंदर बैठे अविनाशी तक पहुंचकर अपनी शान्ति की प्यास बुझाने का तरीका बतलाना चाहिए ताकि उन्हें भी हमेशा के लिए उस परमानंद का लाभ मिल सकें!

रिश्तें बड़े अनमोल होते हैं – थोड़े से ऐश्वर्य धन या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना!

सेठ घनश्याम के दो पुत्रों में जायदाद और ज़मीन का बँटवारा चल रहा था और एक चार बेड रूम के घर को लेकर विवाद गहराता जा रहा था।

एक दिन दोनों भाई मरने मारने पर उतारू हो चले तो पिता जी बहुत जोर से हँसे।

पिताजी को हँसता देखकर दोनो भाई लड़ाई को भूल गये और पिताजी से हँसी का कारण पूछा।

पिताजी ने कहा-इस छोटे से ज़मीन के टुकडे के लिये इतना लड़ रहे हो! छोड़ो इसे; आओ मेरे साथ एक अनमोल खजाना दिखता हूँ मैं तुम्हे!

पिता घनश्याम जी और दोनो पुत्र पवन और मदन उनके साथ रवाना हुये ।

पिताजी ने कहा देखो, यदि तुम आपस मे लड़े तो फिर मैं तुम्हे उस खजाने तक नहीं लेकर जाऊँगा और बीच रास्ते से ही लौटकर आ जाऊँगा!

अब दोनो पुत्रों ने खजाने के चक्कर मे एक समझौता किया कि चाहे कुछ भी हो जाये पर हम लड़ेंगे नहीं प्रेम से यात्रा पर चलेंगे!
गाँव जाने के लिये एक बस मिली पर सीट दो की मिली,और वो तीन थे!
अब पिताजी के साथ थोड़ी देर पवन बैठे तो थोड़ी देर मदन!
ऐसे चलते-चलते लगभग दस घण्टे का सफर तय किया, तब गाँव आया।

घनश्याम जी दोनो पुत्रों को लेकर एक बहुत बड़ी हवेली पर गये हवेली चारों तरफ से सुनसान थी।
घनश्याम जी ने देखा कि हवेली में जगह जगह कबूतरों ने अपना घोसला बना रखा है, तो घनश्याम वहीं बैठकर रोने लगे।

पुत्रों ने पूछा, क्या हुआ पिताजी; आप रो क्यों रहे हैं?

रोते हुये उस वृद्ध पिता ने कहा, जरा ध्यान से देखो इस घर को, जरा याद करो वो बचपन- जो तुमने यहाँ बिताया था!

तुम्हे याद है बच्चों, इसी हवेली के लिये मैंने अपने बड़े भाई से बहुत लड़ाई की थी! ये हवेली तो मुझे मिल गई पर मैंने उस भाई को हमेशा के लिये खो दिया। क्योंकि वो दूर देश में जाकर बस गया और फिर वक्त्त बदला!एक दिन हमें भी ये हवेली छोड़कर जाना पड़ा!

अच्छा तुम ये बताओ बेटा कि जिस सीट पर हम बैठकर आये थे – क्या वो बस की सीट हमें मिल गई? और यदि मिल भी जाती तो क्या वो सीट हमेशा-हमेशा के लिये हमारी हो जाती?

मतलब कि उस सीट पर हमारे सिवा और कोई न बैठ सकता?

दोनो पुत्रों ने एक साथ कहा कि ऐसे कैसे हो सकता है? बस की यात्रा तो चलती रहती है और उस सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं! पहले हम बैठे थे,आज कोई और बैठा होगा और पता नही, कल कोई और बैठेगा और वैसे भी उस सीट में क्या धरा है जो थोड़ी सी देर के लिये हमारी है!

पिताजी पहले हँसे और फिर आंखों में आंसू भरकर बोले , देखो यही मैं तुम्हें समझा रहा हूँ कि जो थोड़ी देर के लिये जो तुम्हारा है , तुमसे पहले उसका मालिक कोई और था, थोड़ी सी देर के लिये तुम हो और थोड़ी देर बाद कोई और हो जायेगा।

बस बेटा एक बात ध्यान रखना कि इस थोड़ी सी देर के लिये कही तुम अपने अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना! यदि पैसों का प्रलोभन आये तो इस हवेली की इस स्थिति को देख लेना कि अच्छे अच्छे महलों में भी एक दिन कबूतर अपना घोंसला बना लेते हैं!

बेटा मुझे यही कहना था कि बस की उस सीट को याद कर लेना – जिसकी रोज सवारियां बदलती रहती हैं! उस सीट के खातिर अनमोल रिश्तों की आहुति न दे देना। जिस तरह से बस की यात्रा में तालमेल बिठाया था बस वैसे ही जीवन की यात्रा मे भी तालमेल बिठाते रहना!

दोनो पुत्र पिताजी का अभिप्राय समझ गये और पिता के चरणों में गिरकर अपने व्यव्हार पर अफ्सोच करने लगे!

यह प्रसंग हम सभी को यह सीख देता है की चाहे कितना ही ऐश्वर्य, धन-सम्पदा हमारे पास है – वो सबकुछ बस थोड़ी देर के लिये ही है! थोड़ी-थोड़ी देर में यात्री भी बदल जाते हैं और मालिक भी। रिश्तें बड़े अनमोल होते हैं – थोड़े से ऐश्वर्य धन या सम्पदा के चक्कर मे कहीं किसी अनमोल रिश्तें को न खो देना!

ईश्वर जैसा नि:स्वार्थ और दयालु कोई नहीं है। ऐसा नि:स्वार्थ और दयालु न कभी हुआ, न होगा।

एक व्यक्ति रेल की लाइन में टिकट खरीदने के लिए लगा हुआ था। जब उसका नंबर आया तो क्लर्क ने कहा कि “तीन रुपए खुले दो, तो टिकट मिलेगा।”
यात्री के पास तीन रुपए खुले नहीं थे। उसने अपने पास वाले यात्री से पूछा, “क्या आपके पास तीन रुपय खुले हैं. अगर आप मुझे दे दें, तो मुझे टिकट मिल जाएगा. मैं कुछ देर में आपको तीन रुपए वापस लौटा दूंगा।”

पास वाले यात्री ने उसे खुले तीन रूपये दे दिए। उसने टिकट ले ली और बाहर जाकर पैसे खुले करवाए। उसने उस यात्री को तीन रूपये लौटा दिए और उसका बहुत धन्यवाद किया, आभार माना कि आप की सहायता से मुझे ठीक प्रकार से रेल टिकट मिल गया। मैं आपका हृदय से आभारी हूं।”

आप देखिए, यह कितनी छोटी सी घटना है। आज के समय में तीन रुपए का कोई बहुत मूल्य नहीं है। फिर भी उसने तीन रूपये वापस भी लौटाए, बहुत धन्यवाद किया और हृदय से आभार भी माना।

जब लोग सांसारिक कार्यों में इतनी सभ्यता निभाते हैं। छोटे और बड़े सब कार्यों में पूरा ध्यान देते हैं।

तो क्या कभी आपने ऐसा सोचा है कि ईश्वर ने भी आपको बहुत कुछ दिया है। क्या आप ईश्वर का इस प्रकार से धन्यवाद करते हैं? क्या उसका हृदय से आभार मानते हैं? क्या उसका उपकार स्वीकार करते हैं?

यदि नहीं करते, तो यह अच्छी बात नहीं है।

“ईश्वर का तो अनंत उपकार मानना चाहिए। क्योंकि ईश्वर ने हम आप और सब लोगों पर जो उपकार किए हैं, उसका तो कोई मूल्य आप सोच भी नहीं सकते।”

जैसे कि ईश्वर ने आपको मन बुद्धि इंद्रियां शरीर और पंचमहाभूत बना कर दिए। अनेक प्रकार के फल फूल शाक सब्जियां जड़ी बूटियां औषधियां वनस्पतियां आदि आदि, न जाने क्या-क्या सुख सुविधाएं दी हैं।

ईश्वर ने आपको बहुत सा धन दिया है। अच्छे-अच्छे माता-पिता गुरुजन आदि दिए। इसके अतिरिक्त आपके लिए बहुत सा श्रम किया है। ईश्वर अनादि काल से आपके प्रत्येक कर्म का पूरा-पूरा हिसाब रखता है। ठीक न्याय से आप को प्रत्येक कर्म का सही समय पर फल देता है। कभी भी अन्याय नहीं करता।

जो दुष्ट व्यक्ति आपकी हानि करता है, उसको ईश्वर दंड देता है। उस दुष्ट व्यक्ति द्वारा की गई आपकी हानि की पूर्ति भी ईश्वर समय आने पर कर देता है। यदि आप किसी का उपकार करते हैं, तो उसका पुण्य फल भी ईश्वर आपको अनादि काल से देता आ रहा है, और भविष्य में भी अनन्त काल देता रहेगा।

उसके हिसाब में कहीं भी, कोई भी, कभी भी भूल नहीं होती। इस सब श्रम के बदले में ईश्वर आपसे कुछ भी फीस/ शुल्क भी नहीं लेता है। और भविष्य में भी अनंत काल तक ईश्वर ऐसे ही मुफ्त में आप पर उपकार करता रहेगा। इतने बड़े उपकारों के बदले में आपको ईश्वर का कितना अधिक धन्यवाद करना चाहिए, और हृदय से उसका आभार मानना चाहिए! उसके पास बैठकर उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करके उससे वर्तमान में और भी आनंद लाभ प्राप्त करना चाहिए।”

ठीक ही कहा है कि – मेरे दाता की दुकान में सब दुनिया का खाता!

दुनिया में बुराईयां क्यों है ?

एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में बुराई का अस्तित्व है या नहीं?

सभी ने कहा, “हां! “

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब बुराई थी ही,और है ही और रहेगी भी।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर!

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि बुराई का अस्तित्व है ही।

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

प्रोफेसर ने कहा, “पूछो।”

विद्यार्थी ने पूछा , “सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?”

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।”

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, “सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?”

प्रोफेसर ने कहा, “बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।”

विद्यार्थी ने कहा, “नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, “तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।”

विद्यार्थी ने फिर कहा, “सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं।
सर, ठीक इसी तरह “अस्तित्व में सिर्फ अच्छी चीज है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई का कोई अस्तित्व है नहीं। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।”

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास की कमी का नाम है।

वास्तव में ज्ञान का भाव ही अज्ञानता है! इसलिय हमें जो है उस तरफ ही उन्मुख रहना चाहिय!

शिक्षक का अदभुत ज्ञान, शाकाहारी – मांसाहारी

शिक्षक का अदभुत ज्ञान
शाकाहारी – मांसाहारी

एक बार एक चिंतनशील शिक्षक ने अपने 7th – 8th स्टेंडर्ड के बच्चों से पूछा कि
आप लोग कहीं जा रहे हैं और
सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप, छिपकली या कोई गाय-भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया, जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा हो, तो प्रश्न यह है कि
आप कैसे पहचानेंगे कि
वह जीव अंडे देता है या बच्चे ?
क्या पहचान है उसकी ?

अधिकांश बच्चे मौन रहे
जबकि कुछ बच्चों में बस आंतरिक खुसर-फुसर चलती रही…।

मिनट दो मिनट बाद
फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने स्वयं ही बताया कि
बहुत आसान है,,
जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं वे सब बच्चे देते हैं
और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते हैं
वे अंडे देते हैं…. ।।
फिर दूसरा प्रश्न पूछा कि–
ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया… तो आप कैसे पहचानेंगे की यह शाकाहारी है या मांसाहारी ?
क्योंकि आपने तो उसे पहले भोजन करते देखा ही नहीं,
बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें…..

शिक्षक ने कहा–
देखो भाई बहुत आसान है,,
जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल होती है, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं,
जैसे-कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील या अन्य कोई भी आपके आस-पास का जीव-जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी ही होगा और है भी,
ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए होती है, वे सब के सब जीव शाकाहारी होते हैं,
जैसे- हिरन, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इत्यादि।
इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ….

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों से पूछा कि-
बच्चों अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली ?

इस बार सब बच्चों ने कहा कि मनुष्य की आंखें लंबाई वाली होती है…
इस बात पर
शिक्षक ने फिर बच्चों से पूछा कि
यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी ??
सब के सब बच्चों का उत्तर था शाकाहारी ।

फिर शिक्षक से पूछा कि
बच्चों यह बताओ कि
फिर मनुष्य में बहुत सारे लोग मांसाहार क्यों करते हैं ?
तो इस बार बच्चों ने बहुत ही गम्भीर उत्तर दिया
और वह उत्तर था कि अज्ञानतावश या मूर्खता के कारण।

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों को दूसरी बात यह बताई कि
जिन भी जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं,
जैसे- शेर, बिल्ली, कुत्ता, बाज, गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव….
और
जिन जीवों के नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब के सब शाकाहारी होते हैं,
जैसे-मनुष्य, गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, हिरण, बकरी इत्यादि।

इस हिसाब से भी अब ये बताओ बच्चों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले होते हैं या चौड़े चपटे ??

सभी बच्चों ने कहा कि
चौड़े चपटे,,

फिर शिक्षक ने पूछा कि
अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौन से जीवों की श्रेणी में हुआ ??
सब के सब बच्चों ने एक सुर में कहा कि शाकाहारी ।

फिर शिक्षक ने बच्चों से तीसरी बात यह बताई कि,
जिन भी जीवों अथवा पशु-प्राणियों को पसीना आता है, वे सब के सब शाकाहारी होते हैं,
जैसे- घोड़ा, बैल, गाय, भैंस, खच्चर, आदि अनेकानेक प्राणी… ।
जबकि
माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी जीभ निकाल कर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं
इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं…. ।

तो प्रश्न यह उठता है कि
मनुष्य को पसीना आता है या मनुष्य जीभ से अपने तापमान को एडजस्ट करता है ??

सभी बच्चों ने कहा कि मनुष्य को पसीना आता है, इसलिए मनुष्य भी शाकाहारी हुआ।
फिर शिक्षक ने एक पहचान और बताई कि जो मांसाहारी होते हैं वह जीभ से चाट कर पानी पीते हैं जबकि शाकाहारी सुरूक कर या खींच कर पीते हैं। बच्चों ने इस पर ताली बजाई।
शिक्षक ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि
इस बात से भी मनुष्य कौन सा जीव सिद्ध हुआ, सब के सब बच्चों ने एक साथ कहा –
शाकाहारी ।
सभी लोग विशेषकर अहिंसा में, सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं में विश्वास करने वाले लोग भी चाहे तो बच्चों को नैतिक-बौद्धिक ज्ञान देने अथवा सीखने-पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं,
इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा…
याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे….।

बच्चे अगर बड़े हो जाएं तो उनको यह भी बताएं कि कैसे शाकाहारी मनुष्य जानकारी के अभाव में मांसाहार का उपयोग करता है और कहता है कि जब अन्न नहीं उपजाया जाता था तब मनुष्य मांसाहार का सेवन करते थे, जो सरासर गलत है ; तब मनुष्य कंद-मुल एवं फलों पर जीवित रहते थे, जो सही है एवं मनुष्य के संरचना और स्वभाव से मेल भी खाता है।