गुरुवर तुमसे लगन लगी है।
तुम्हरे दरश की आस जगी है।
निशदिन तेरा ध्यान धरूं मैं, तेरे ही गुण गाऊं।
तन-मन-धन सब वारूं तुम पर, तेरी ही हो जाऊं ॥
कृपा करो मुझ पर मेरे दाता, मैं बलिहारी जाऊं।
ऐसा ज्ञान दिया मेरे सतगुरू, मन का भरम मिटाऊं ॥
जग के झूठे बंधन काटे, अपनी शरण लगाया।
सतगुरु संत मिले सखी ऐसे, मेरा मन हरषाया ॥
बिन दर्शन हैं व्याकुल अँखियां, पल छिन चैन न आये।
दर्शन की अभिलाषा लेकर, तेरे दर पे आये ॥
आ जाओ, अब दरश दिखा दो, कब से आस लगाये ॥







