बिनु सतसंग विवेक नहिं होई

सतसंग और विवेक ऐसी शक्ति है, जिसके बिना मानव सत्य-असत्य, अच्छे-बुरे का आकलन करने में असमर्थ रहता है।

इसके अभाव में मानव और पशु की सीमा-रेखा धुंधला जाती है। निद्रा, भोजन, भोग, भय के स्तर पर ज्ञान और विवेक के कारण ही मानव सबसे अलग नजर आता है।

आत्मज्ञान नहीं, विवेक नहीं, तो मानव भी मानव नहीं रहता।

सत्य का संग यानी सतसंग करने से ही विवेक प्राप्त किया जा सकता है।

सतसंग के लिए पढ़ा-लिखा या सम्पन्न, धनी होना भी जरूरी नहीं है।

शबरी को श्रीराम जी का संग प्राप्त हुआ। उसे इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा। श्रीराम जी के आगमन पर शबरी ने जो कुछ उसके पास उपलब्ध था उसी से उनकी सेवा की। सेवा और सतसंग जुड़े हुए हैं।

केवट ने तो सिर्फ श्रीराम जी के पाँव ही पखारे थे, उससे ही उसका उद्धार हो गया।

आत्मज्ञान सतसंग का प्राण है।
शबरी बेर खिला रही है और श्रीराम जी खा रहे हैं, लेकिन लक्ष्मण को कुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है।

यह मन की प्रवृत्ति है। मन सतसंग में आकर भी बुराइयाँ ही खोजता है। वह बुराइयाँ केवल ढूँढ़ता ही नहीं है उन्हें उजागर करने का हर सम्भव प्रयास करता है।

ऐसी निन्दा से सतसंग के फल को नष्ट कर लेना विवेक शून्यता की निशानी है।

श्रीराम जी जब नवधा भक्ति का उपदेश देने लगे तब केवल वे ही बोल रहे हैं, शबरी मौन है, एकदम शान्त और प्रतिक्रिया विहीन।

सच्चे सदगुरु के वचनों को आत्मसात करने के लिए जिस एकाग्रचित्तता की आवश्यकता होती है, वह शान्त रहकर ही प्राप्त होती है, हलचल में या बड़बोलेपन नहीं।

इसलिए यह सुनना और सुनाना दोनों सफल हुआ, सार्थक हुआ। सतसंग में लक्ष्य पर ही नजर होनी चाहिए। सतसंग में जाने से सेवा भी होती है और “सुमिरण-भजन” भी होता है।

यह सत्य है कि सतसंग में आने से सब कुछ मिल जाता है लेकिन, सतसंग में आकर भी कामनाओं, निन्दा, ईर्ष्या के पीछे भागना सतसंग के फल को नष्ट करना है।

सेवा और सुमिरण सतसंग रूपी वृक्ष के दो सुन्दर फल हैं क्योंकि सतसंग में चलकर जाना भी सेवा है। वहाँ बैठना, सुनना, जय सच्चिदानन्द करना सब सेवा के रूप हैं।

जब ऐसी मनोस्थिति बन जाती है तब “नाम-सुमिरण” हर स्वाँस में स्वतः होता है, तब अभ्यास के समय बिना प्रयास के मन “नाम-सुमिरण” में लीन हो जाता है और मेरे-तेरे का भेद मिट जाता है।

उसी पल प्राणों के अन्दर परमानन्द के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल हो जाता है।

जीवन में परिवर्तन लाने के लिए सच्चे सद्गुरु का संग व सेवा करने के लिए कहा है।
🌹 – श्री हंस जी महाराज

Prem Rawat Quote

Use the strength of knowing to climb the mountains of ignorance.
अज्ञानता के पहाड़ों पर चढ़ने के लिए ज्ञान की शक्ति का उपयोग करें। -Prem Rawat

Take account of your true strengths.
अपनी असली ताकत का हिसाब लें। -Prem Rawat

वास्तविकता क्या है और हमारे हृदय की आवश्यकता क्या है; उन्होंने इस विषय पर ध्यान केंद्रित करने का प्रोत्साहन दिया। संशय की प्रकृति पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि संशय कैसे चिंता और भय की ओर ले जाता है। उन्होंने व्यक्त किया कि हमें अपने हृदय को स्पष्ट रखना सीखना चाहिए अन्यथा संदेह होगा।

श्री प्रेम रावत जी ने स्वीकार किया कि जीवन हमेशा सरल नहीं होता है, किन्तु इस जीवन के लिए स्वयं को कृतज्ञता से भरना याद रखना चाहिए। जब तक हम जीवित हैं, तब तक सब कुछ ठीक है, और हम अपनी क्षमता पर भरोसा कर सकते हैं।

हमारा लक्ष्य : टेक्नोलॉजी और ऐसी चीजें जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाती है, उन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय हमें स्वयं के संपर्क में रहना चाहिए ।
श्री प्रेम रावत जी ने साझा किया कि “समय के चोर” के विरुद्ध सचेत होना ही एकमात्र सुरक्षा प्रणाली है क्योंकि जो समय वो हमसे चुरा लेता है – उससे हम दोबारा पा नहीं कर सकते।”

“When you feel small, when you feel weak, remember who you are. You’re powerful.” – Prem Rawat

“Maybe we cannot change the world, but we can definitely feel the peace that is inside of us”. – Prem Rawat

The challenge is to remember what is important every moment.
चुनौती यह याद रखना है कि हर पल में क्या महत्वपूर्ण है। -Prem Rawat

Learn to recognize the important things in your life every day.
हर दिन अपने जीवन में महत्वपूर्ण चीजों को पहचानना सीखें।
-Prem Rawat