💐💐चिंता💐💐

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

शिक्षा:
अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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मजदूर के जूते

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले।

उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तैयारी कर रहा था। शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा, “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!” शिक्षक गंभीरता से बोले, “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है।

क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!” शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।
मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया।
उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट-पलट कर देखने लगा। फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए।

अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद। उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी. “मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं ।

शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”

शिक्षा :-
शिष्य बोला, “आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा।
आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है, देने का आनंद असीम है, देना देवत्त है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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अनोखा फैसला

अनोखा फैसला

एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था… कि इस साधु ने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थी।

साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया….. शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था…. साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते….

साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकने के बाद चला ही जाना चाहता था….. कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दें दी…

साधु ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिऐ प्रार्थना की….. फिर आगे चल दिया….. साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह वे फिर इक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था…….

वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहित जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है …… एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी….. बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये…..

उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई….. इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु को कपड़ों से पकड़ कर कहने लगा अंधा है…… तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गये हैं और कीचड़ से भर गये हैं…..

साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था…. जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुजर रहा था….. महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा…. लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई…..

राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ…. लड़खड़ाता हुऐ कीचड़ में जा पड़ा…..

युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया.. बूढे साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़….

लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है……..यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया…. दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया…..

थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुक गए……वह अपने घर पहुंच गए थे…. वे युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियां तय कर रहा था….

बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा…. महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपके…..

लेकिन देर हो चुकी थी युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर मे ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफुसी होने लगीं कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को शाप दिया है….

अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है….. कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया एक युवा कहने लगा कि आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को शाप दे बैठे……
भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता ….आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सके….. साधु बाबा कहने लगा भगवान की क़सम मैंने इस युवा को शाप नहीं दिया….

अगर आप ने शाप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया ?

तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है ? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा….. हाँ मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।

साधु ने अगला सवाल किया…..मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े को दागी किया था ? युवा बोला….. नहीं…. लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे।

मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा.. फिर युवक ने मुझे क्यों मारा ? युवा कहने लगा…… क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे….. इसलिए उस युवक ने आपको मारा….

युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया….. तो भगवान की क़सम मैंने शाप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है….

अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और… वह इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है ….
उस परमात्मा की लाठी दिखती नहीं और आवाज भी नही करती लेकिन पडती हैं तो बहुत दर्द देती है।

*हमारें कर्म ही हमें उसकी लाठ़ी से बचातें हैं बस कर्म अच्छे होने चाहिये….

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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सबसे बड़ा गुण

एक राजा को अपने लिए सेवक की आवश्यकता थी। उसके मंत्री ने दो दिनों के बाद एक योग्य व्यक्ति को राजा के सामने पेश किया। राजा ने उसे अपना सेवक बना तो लिया पर बाद में मंत्री से कहा, ‘‘वैसे तो यह आदमी ठीक है पर इसका रंग-रूप अच्छा नहीं है।’’ मंत्री को यह बात अजीब लगी पर वह चुप रहा।

एक बार गर्मी के मौसम में राजा ने उस सेवक को पानी लाने के लिए कहा। सेवक सोने के पात्र में पानी लेकर आया। राजा ने जब पानी पिया तो पानी पीने में थोड़ा गर्म लगा। राजा ने कुल्ला करके फेंक दिया। वह बोला, ‘‘इतना गर्म पानी, वह भी गर्मी के इस मौसम में, तुम्हें इतनी भी समझ नहीं।’’ मंत्री यह सब देख रहा था। मंत्री ने उस सेवक को मिट्टी के पात्र में पानी लाने को कहा। राजा ने यह पानी पीकर तृप्ति का अनुभव किया।

इस पर मंत्री ने कहा, ‘‘महाराज, बाहर को नहीं, भीतर को देखें। सोने का पात्र सुंदर, मूल्यवान और अच्छा है, लेकिन शीतलता प्रदान करने का गुण इसमें नहीं है। मिट्टी का पात्र अत्यंत साधारण है लेकिन इसमें ठंडा बना देने की क्षमता है। कोरे रंग-रूप को न देखकर गुण को देखें।’’ उस दिन से राजा का नजरिया बदल गया।

सम्मान, प्रतिष्ठा, यश, श्रद्धा पाने का अधिकार चरित्र को मिलता है, चेहरे को नहीं। चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य गुणों से उत्तम बनता है न कि ऊंचे आसन पर बैठने से या पदवी से। जैसे ऊंचे महल के शिखर पर बैठ कर भी कौवा, कौवा ही रहता है; गरुड़ नहीं बन जाता। उसी तरह अमिट सौंदर्य निखरता है मन की पवित्रता से, क्योंकि सौंदर्य रंग-रूप, नाक-नक्श, चाल-ढाल, रहन-सहन, सोच-शैली की प्रस्तुति मात्र नहीं होता। यह व्यक्ति के मन, विचार, चिंतन और कर्म का आइना है। कई लोग बाहर से सुंदर दिखते हैं मगर भीतर से बहुत कुरूप होते हैं। जबकि ऐसे भी लोग हैं जो बाहर से सुंदर नहीं होते मगर उनके भीतर भावों की पवित्रता इतनी ज्यादा होती है कि उनका व्यक्तित्व चुंबकीय बन जाता है। सुंदर होने और दिखने में बहुत बड़ा अंतर है।

शिक्षा:-
आपका चरित्र ही आपका सबसे बड़ा गुण है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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सरल-सा अर्थ है- ‘हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।’

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव,
त्वमेव सर्वम् मम देवदेवं।।

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सरल-सा अर्थ है- ‘हे भगवान! तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता, तुम्हीं बंधु, तुम्हीं सखा हो। तुम्हीं विद्या हो, तुम्हीं द्रव्य, तुम्हीं सब कुछ हो। तुम ही मेरे देवता हो।’

बचपन से प्रायः यह प्रार्थना हम सबने पढ़ी है।

अब विचारणीय यह है कि – इसमें ‘द्रविणं’ का क्या अर्थ है?

अच्छे खासे विद्वान भी इस द्रविणं पर चकराते हैं और अर्थ जानकर चौंक पड़ते हैं।

द्रविणं जिसका अर्थ है द्रव्य, धन-संपत्ति।

द्रव्य जो तरल है, निरंतर प्रवाहमान। यानी वह जो कभी स्थिर नहीं रहता। आखिर ‘लक्ष्मी’ भी कहीं टिकती है क्या!

कितनी सुंदर प्रार्थना है और उतना ही प्रेरक उसका ‘वरीयता क्रम’। ज़रा देखिए तो! समझिए तो!

सबसे पहले माता क्योंकि वह है तो फिर संसार में किसी की जरूरत ही नहीं। इसलिए हे प्रभु! तुम माता हो!

फिर पिता, अतः हे ईश्वर! तुम पिता हो! दोनों नहीं हैं तो फिर भाई ही काम आएंगे। इसलिए तीसरे क्रम पर भगवान से भाई का रिश्ता जोड़ा है।

जिसकी न माता रही, न पिता, न भाई तब सखा काम आ सकते हैं, अतः सखा त्वमेव!

वे भी नहीं तो आपकी विद्या ही काम आती है। यदि जीवन के संघर्ष में नियति ने आपको निपट अकेला छोड़ दिया है तब आपका ज्ञान ही आपका भगवान बन सकेगा। यही इसका संकेत है।

और सबसे अंत में ‘द्रविणं’ अर्थात धन। जब कोई पास न हो तब हे देवता तुम्हीं धन हो।

रह-रहकर सोचता हूं कि प्रार्थनाकार ने वरीयता क्रम में जिस धन-द्रविणं को सबसे पीछे रखा है,वहीं धन आजकल हमारे आचरण में सबसे ऊपर क्यों आ जाता है? इतना कि उसे ऊपर लाने के लिए माता से पिता तक, बंधु से सखा तक सब नीचे चले जाते हैं, पीछे छूट जाते हैं।

वह कीमती है, पर उससे ज्यादा कीमती माता, पिता, भाई,मित्र, विद्या हैं। उससे बहुत ऊँचे आपके अपने।

बार-बार ख्याल आता है, द्रविणं सबसे पीछे बाकी रिश्ते ऊपर। बाकी लगातार ऊपर से ऊपर, धन क्रमश: नीचे से नीचे!

याद रखिये दुनिया में झगड़ा रोटी का नहीं थाली का है! वरना वह देने वाला रोटी तो सबको देता ही है!

चांदी की थाली यदि कभी हमारे वरीयता क्रम को
पलटने लगे तो हमें इस प्रार्थना को जरूर याद कर लेना चाहिये।

विश्वास (believe) तथा विश्वास (trust) में अंतर

विश्वास (believe) तथा विश्वास (trust) में अंतर

एक बार, दो बहुमंजिली इमारतों के बीच, बंधी हुई एक तार पर लंबा सा बाँस पकड़े, एक कलाकार चल रहा था । उसने अपने कन्धे पर अपना बेटा बैठा रखा था । सैंकड़ों, हज़ारों लोग दम साधे देख रहे थे। सधे कदमों से, तेज हवा से जूझते हुए, अपनी और अपने बेटे की ज़िंदगी दाँव पर लगाकर, उस कलाकार ने दूरी पूरी कर ली ।

भीड़ आह्लाद से उछल पड़ी, तालियाँ, सीटियाँ बजने लगी । लोग उस कलाकार की फोटो खींच रहे थे, उसके साथ सेल्फी ले रहे थे। उससे हाथ मिला रहे थे । वो कलाकार माइक पर आया, भीड़ को बोला, “क्या आपको विश्वास है कि मैं यह दोबारा भी कर सकता हूँ ??”

भीड़ चिल्लाई, “हाँ हाँ, तुम कर सकते हो ।”

उसने पूछा, क्या आपको विश्वास है,भीड़ चिल्लाई हाँ पूरा विश्वास है, हम तो शर्त भी लगा सकते हैं कि तुम सफलता पूर्वक इसे दोहरा भी सकते हो ।

कलाकार बोला, पूरा पूरा विश्वास है ना । भीड़ बोली, हाँ हाँ

कलाकार बोला, “ठीक है, कोई मुझे अपना बच्चा दे दे, मैं उसे अपने कंधे पर बैठा कर रस्सी पर चलूँगा ।”

फिर एक दम खामोशी, शांति, चुप्पी सी फैल गयी।

कलाकार बोला, “डर गए…!” अभी तो आपको विश्वास था कि मैं कर सकता हूँ। असल में आप का यह विश्वास (believe) है, मुझमेँ विश्वास (trust) नहीं है । दोनों विश्वासों में फर्क है साहेब !

यही कहना है, “ईश्वर हैं !” ये तो विश्वास है ! परन्तु ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास नहीं है ।

You believe in God, but you don’t, trust him.

अगर ईश्वर में पूर्ण विश्वास है तो चिंता, क्रोध और तनाव क्यों ???

जरा सोचिए !!!

*सुप्रभात

ढोल

एक बार राजस्थान के एक छोटे से गांव नयासर में एक गरीब औरत अपने परिवार के साथ रहती थी,उस गरीब औरत के एक बेटा था,वह बड़े घरों में काम करके वो अपना गुजारा करती थी,वह अपने बच्चे के लिए कभी खिलौना नही ला सकी। एक दिन उसे काम के बदले अनाज मिला।

वह अनाज को हाट में बेचने जाती है और जाते समय उसने बेटे से पूछा, बोल, बेटे तेरे लिए हाट से क्या लेकर आऊं?”

बेटे ने झट जवाब दिया, ढोल, मेरे लिए एक ढोल ले आना मां।’

मां जानती थी कि उसके पास कभी इतने पैसे नहीं होंगे कि वह बेटे के लिए ढोल खरीद सके। वह हाट गई, वहां अनाज बेचा और उन पैसों से कुछ बेसन और नमक ख़रीदा।

उसे दुख था कि वह बेटे के लिए कुछ नहीं ला पाई। वापस आते हुए रास्ते में उसे लकड़ी का एक प्यारा-सा टुकड़ा दिखा। उसने उसे उठा लिया और आकर बेटे को दे दिया। बेटे की कुछ समझ में नहीं आया कि उसका वह क्या करे।

दिन के समय वह खेलने के लिए गया, तो उस टुकड़े को अपने साथ ले गया। एक बुढ़िया अम्मा चूल्हे में उपले(गोबर से बने हुए) जलाने की कोशिश कर रही थीं, पर सीले उपलों ने आग नहीं पकड़ी।

चारों तरफ़ धुआं ही धुआं हो गया। धुए से अम्मा की आंखों में पानी आ गया। लड़का रुका और पूछा, ‘अम्मा, रो क्यों रही हैं?”

बूढ़ी अम्मा ने कहा, ‘चूल्हा नहीं जल रहा है। चूल्हा नहीं जलेगा, तो रोटी कैसे बनेगी?

लड़के ने कहा, ‘मेरे पास लकड़ी का टुकड़ा है, चाहो तो उससे आग जला लो। अम्मा बहुत खुश हुई। उन्होंने चूल्हा जलाया, रोटियां बनाई और एक रोटी लड़के को दी।

रोटी लेकर वह चल पड़ा। चलते-चलते उसे एक कुम्हारिन मिली। उसका बच्चा मिट्टी में लोटते हुए ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। लड़का रुका और पूछा कि वह रो क्यों रहा है।

कुम्हारिन ने कहा कि वह भूखा है और घर में खाने को कुछ नहीं है। लड़के ने अपनी रोटी बच्चे को दे दी। बच्चा चुप हो गया और जल्दी जल्दी रोटी खाने लगा। कुम्हारिन ने उसका बहुत आभार माना और एक घड़ा दिया।

वह आगे बढ़ा। चलते-चलते वह नदी पर पहुंचा। वहां उसने धोबी और धोबिन को झगड़ते हुए देखा। लड़के ने रुककर इसका कारण पूछा। धोबी ने कहा, ‘चिल्लाऊं नहीं तो क्या करूं? इसने शराब के नशे में घड़ा फोड़ दिया। अब मैं कपड़े किस में उबालूं?’ लड़के ने कहा, ‘झगड़ा मत करो।

मेरा घड़ा ले लो। इतना बड़ा घड़ा पाकर धोबी खुश हो गया। बदले में उसने लड़के को एक कोट दिया।

कोट लेकर लड़का चल पड़ा। चलते-चलते वह एक पुल पर पहुंचा। वहां उसने मुक्त आदमी को ठंड से ठिठुरते हुए देखा। बेचारे के शरीर पर कुर्ती तक नहीं था। लड़के ने उसे पूछा कि उसका कुर्ता कहां गया। आदमी ने बताया, ‘मैं इस घोड़े पर बैठकर शहर जा रहा था, रास्ते में डाकुओं ने सब छीन लिया और तो और, कुर्ता तक उतरवा लिया।’

लड़के ने कहा, ‘चिंता मत करो। लो, यह कोट पहन लो। आदमी ने कोट लेते हुए कहा, ‘तुम बहुत भले हो, मैं तुम्हें यह घोड़ा भेंट करता हूं।”

लड़के ने घोड़ा ले लिया। थोड़ा आगे जाकर उसने एक बरात को देखा। लेकिन दूल्हा, बराती, गाने-बजाने वाले सब मुंह लटकाए हुए पेड़ के नीचे बैठे थे। लड़के ने पूछा कि वे उदास क्यों हैं।

दूल्हे के पिता ने कहा, ‘हमें लड़की वालों के यहां जाना है, पर दूल्हे के लिए घोड़ा नहीं है। जो घोड़ा लेने गया वह अभी तक लौटा नहीं। दूल्हा पैदल तो चलने से रहा। पहले ही बहुत देर हो गई है। कहीं विवाह का मुहूर्त न निकल जाए।’ लड़के ने उन्हें अपना घोड़ा दे दिया। सबकी बांछे खिल गई। दूल्हे ने लड़के से पूछा, ‘तुमने बड़ी मदद की। हम तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं? लड़के ने कहा, ‘आप अगर कुछ देना चाहते हैं, तो यह ढोल दिला दें।’ दूल्हे ने ढोल बजाने वाले से उसे ढोल दिला दिया।

लड़का भागा-भागा घर पहुंचा और ढोल बजाते हुए मां को पूरी कहानी सुनाने लगा कि उसकी दी हुईं लकड़ी से उसने ढोल कैसे प्राप्त किया। लड़का ढोल को पाकर बहुत खुश हो गया और माँ भगवान का धन्यवाद करने लगी।

*शिक्षा :- निस्वार्थ त्याग और सत्कर्म घूम फिर कर हमारे ही सामने आते है , उनका लाभ हमें ही मिलता है।इसलिए अच्छे कर्म करते रहिये ,भगवान हमारा हमेशा भला ही करेंगे।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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प्रभु हमारे तो हर चीज हमारी

एक राजा ने यह ऐलान करवा दिया कि कल सुबह जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा तब जिस शख़्स ने भी महल में जिस चीज़ को हाथ लगा दिया वह चीज़ उसकी हो जाएगी।

इस ऐलान को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं तो सबसे क़ीमती चीज़ को हाथ लगाऊंगा।

कुछ लोग कहने लगे मैं तो सोने को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग चांदी को तो कुछ लोग कीमती जेवरात को, कुछ लोग घोड़ों को तो कुछ लोग हाथी को, कुछ लोग दुधारू गाय को हाथ लगाने की बात कर रहे थे।

जब सुबह महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद चीज़ों के लिये दौड़ने लगे।

सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद चीज़ों को हाथ लगा दूँ ताकि वह चीज़ हमेशा के लिए मेरी हो जाऐ।

राजा अपनी जगह पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था।

उसी समय उस भीड़ में से एक शख्स राजा की तरफ बढ़ने लगा और धीरे-धीरे चलता हुआ राजा के पास पहुँच कर उसने राजा को छू लिया।

राजा को हाथ लगाते ही राजा उसका हो गया और राजा की हर चीज भी उसकी हो गयी।

जिस तरह राजा ने उन लोगों को मौका दिया और उन लोगों ने गलतियां की।

ठीक इसी तरह सारी दुनियाँ का मालिक भी हम सबको हर रोज़ मौक़ा देता है, लेकिन अफ़सोस हम लोग भी हर रोज़ गलतियां करते हैं।
हम प्रभु को पाने की बजाए उस परमपिता की बनाई हुई दुनियाँ की चीजों की कामना करते हैं। लेकिन कभी भी हम लोग इस बात पर गौर नहीं करते कि क्यों न दुनियां के बनाने वाले प्रभु को पा लिया जाए
अगर प्रभु हमारे हो गए तो ही उसकी बनाई हुई हर चीज भी हमारी हो जाएगी।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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मास्साब का स्कूटर

प्रवीण भारती जी, पेशे से प्राइमरी अध्यापक थे।

कस्बे से विद्यालय की दूरी 7 किलोमीटर थी।

एकदम वीराने में था उनका विद्यालय।

कस्बे से वहाँ तक पहुंचने का साधन यदा कदा ही मिलता था, तो अक्सर लिफ्ट मांगके ही काम चलाना पड़ता था और न मिले तो प्रभु के दिये दो पैर, भला किस दिन काम आएंगे।

“कैसे उजड्ड वीराने में विद्यालय खोल धरा है सरकार ने, इससे भला तो चुंगी पर परचून की दुकान खोल लो।”
लिफ्ट मांगते, साधन तलाशते प्रवीण जी रोज यही सोचा करते।

धीरे धीरे कुछ जमापूंजी इकठ्ठा कर, उन्होंने एक स्कूटर ले लिया।

चेतक का नया चमचमाता स्कूटर।

स्कूटर लेने के साथ ही उन्होंने एक प्रण लिया कि वो कभी किसी को लिफ्ट को मना न करेंगें।।
आखिर वो जानते थे जब कोई लिफ्ट को मना करे तो कितनी शर्मिंदगी महसूस होती है।

अब प्रवीण जी रोज अपने चमचमाते स्कूटर से विद्यालय जाते, और रोज कोई न कोई उनके साथ जाता। लौटते में भी कोई न कोई मिल ही जाता।

एक रोज लौटते वक्त एक व्यक्ति परेशान सा लिफ्ट के लिये हाथ फैलाये था, , अपनी आदत अनुसार प्रवीण जी ने स्कूटर रोक दिया। वह व्यक्ति पीछे बैठ गया।

थोड़ा आगे चलते ही उस व्यक्ति ने छुरा निकाल प्रवीण जी की पीठ पर लगा दिया।

“जितना रुपया है वो, और ये स्कूटर मेरे हवाले करो।” व्यक्ति बोला।

प्रवीण जी की सिट्टी पिट्टी गुम, डर के मारे स्कूटर रोक दिया। पैसे तो पास में ज्यादा थे नहीं, पर प्राणों से प्यारा, पाई पाई जोड़ कर खरीदा स्कूटर तो था।

“एक निवेदन है,” स्कूटर की चाभी देते हुए प्रवीण जी बोले ।

“क्या?” वह व्यक्ति बोला।

“यह कि तुम कभी किसी को ये मत बताना कि ये स्कूटर तुमने कहाँ से और कैसे चोरी किया, विश्वास मानो मैं भी रपट नहीं लिखाउँगा।” प्रवीण जी बोले।

“क्यों?” व्यक्ति हैरानी से बोला।

“यह रास्ता बहुत उजड्ड है, निरा वीरान | सवारी मिलती नहीं, उस पर ऐसे हादसे सुन आदमी लिफ्ट देना भी छोड़ देगा।” प्रवीण जी बोले।

व्यक्ति का दिल पसीजा, उसे प्रवीण जी भले मानुष प्रतीत हुए, पर पेट तो पेट होता है। ‘ठीक है कहकर’ वह व्यक्ति स्कूटर ले उड़ा।

अगले दिन प्रवीण जी सुबह सुबह अखबार उठाने दरवाजे पर आए, दरबाजा खोला तो स्कूटर सामने खड़ा था। प्रवीण जी की खुशी का ठिकाना न रहा, दौड़ कर गए और अपने स्कूटर को बच्चे जैसा खिलाने लगे, देखा तो उसमें एक कागज भी लगा था।

“मास्साब, यह मत समझना कि तुम्हारी बातें सुन मेरा हृदय पिघल गया।

कल मैं तुमसे स्कूटर लूट उसे कस्बे ले गया, सोचा भंगार वाले के पास बेच दूँ।
“अरे ये तो मास्साब का स्कूटर है। ” इससे पहले मैं कुछ कहता भंगार वाला बोला।

“अरे, मास्साब ने मुझे बाजार कुछ काम से भेजा है।” कहकर मैं बाल बाल बचा। परन्तु शायद उस व्यक्ति को मुझ पर शक सा हो गया था।

फिर मैं एक हलवाई की दुकान गया, जोरदार भूख लगी थी तो कुछ सामान ले लिया। “अरे ये तो मास्साब का स्कूटर है।
” वो हलवाई भी बोल पड़ा। “हाँ, उन्हीं के लिये तो ये सामान ले रहा हूँ, घर में कुछ मेहमान आये हुए हैं।” कहकर मैं जैसे तैसे वहां से भी बचा।

फिर मैंने सोचा कस्बे से बाहर जाकर कहीं इसे बेचता हूँ। शहर के नाके पर एक पुलिस वाले ने मुझे पकड़ लिया।

“कहाँ, जा रहे हो और ये मास्साब का स्कूटर तुम्हारे पास कैसे।” वह मुझ पर गुर्राया। किसी तरह उससे भी बहाना बनाया।

हे, मास्साब तुम्हारा यह स्कूटर है या आमिताभ बच्चन। सब इसे पहचानते हैं।
आपकी अमानत मैं आपके हवाले कर रहा हूँ, इसे बेचने की न मुझमें शक्ति बची है न हौसला। आपको जो तकलीफ हुई उस एवज में स्कूटर का टैंक फुल करा दिया है।”

पत्र पढ़ प्रवीण जी मुस्कुरा दिए, और बोले। “कर भला तो हो भला।”

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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अच्छी सोच

एक महान विद्वान से मिलने के लिये एक दिन रोशनपुर के राजा आये। राजा ने विद्वान से पुछा, ‘क्या इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति है जो बहुत महान हो लेकिन उसे दुनिया वाले नहीं जानते हो?’

विद्वान ने राजा से विनम्र भाव से मुस्कुराते हुये कहा, ‘हम दुनिया के ज्यादातर महान लोगों को नहीं जानते हैं।’ दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो महान लोगों से भी कई गुना महान हैं।

राजा ने विद्वान से कहा, ‘ऐसे कैसे संभव है’। विद्वान ने कहा, मैं आपको ऐसे कई व्यक्तियों से मिलवाऊंगा। इतना कहकर विद्वान, राजा को लेकर एक गांव की ओर चल पड़े। रास्ते में कुछ दुर पश्चात् पेड़ के नीचे एक बुढ़ा आदमी वहाँ उनको मिल गया। बुढ़े आदमी के पास एक पानी का घड़ा और कुछ डबल रोटी थी। विद्वान और राजा ने उससे मांगकर डबल रोटी खाई और पानी पिया।

जब राजा उस बूढ़े आदमी को डबल रोटी के दाम देने लगा तो वह आदमी बोला, ‘महोदय, मैं कोई दुकानदार नहीं हूँ। मैं बस वही कर रहा हूँ जो मैं इस उम्र में करने योग्य हूँ। मेरे बेटे का डबल रोटी का व्यापार है, मेरा घर में मन नहीं लगता इसलिये राहगिरों को ठंडा पानी पिलाने और डबल रोटी खिलाने आ जाया करता हूँ। इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है।

विद्वान ने राजा को इशारा देते हुए कहा कि देखो राजन् इस बुढ़े आदमी की इतनी अच्छी सोच ही इसे महान बनाती है।

फिर इतना कहकर दोनों ने गाँव में प्रवेश किया तब उन्हें एक स्कूल नजर आया। स्कूल में उन्होंने एक शिक्षक से मुलाकात की और राजा ने उससे पूछा कि आप इतने विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं तो आपको कितनी तनख्वाह मिलती है। उस शिक्षक ने राजा से कहा कि महाराज मैं तनख्वाह के लिये नहीं पढ़ा रहा हूँ, यहाँ कोई शिक्षक नहीं थे और विद्यार्थियों का भविष्य दाव पर था इस कारण मैं उन्हें मुफ्त में शिक्षा देने आ रहा हूँ।

विद्वान ने राजा से कहा कि महाराज दूसरों के लिये जीने वाला भी बहुत ही महान होता है। और ऐसे कई लोग हैं जिनकी ऐसी महान सोच ही उन्हें महान से भी बड़ा महान बनाती हैं।

इसलिए राजन् अच्छी सोच आदमी का किस्मत निर्धारित करती है।

इसलिए हमेशा अच्छी बातें ही सोचकर कार्य करें और महान बनें। आदमी बड़ी बातों से नहीं बल्कि अच्छी सोच व अच्छे कामों से महान माना जाता है।

💐शिक्षा💐:- Life में कुछ Achieve करने के लिये और सफलता हासिल करने के लिये बड़ी बातों को ज्यादा Importance देने के बजाय अच्छी सोच को ज्यादा महत्व देना चाहिये क्योंकि आपकी अच्छी सोच ही आपके कार्य को निर्धारित करती है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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