बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए।

बहेलियां ने तीर छोड़ा,  वह लता बल्लरियों की बाधाओं को चीरता, राजकुमार सुकर्णव के मस्तिष्क पर जा लगा। राजकुमार वही धराशाई हो गए। *

समस्त अंतापुर रो पड़ा अपने राजकुमार की याद में!ऐसा कोई प्रजाजन नहीं था जिसने सुकर्णव की अर्थी देख आँसू ना बहाए हों।

दाह संस्कार संपन्न हुआ। पुत्र शोक अब प्रतिशोध की ज्वाला में भड़क उठा और महाराज वेनुविकर्ण ने कारागृह से बंदी बहेलिया को उपस्थित करने का आदेश दिया।

बहेलिया लाया गया। महाराज ने तड़पते हुए पूछा – दुष्ट बहेलियां! तूने राजकुमार का वध किया है, बोल तुझे मृत्युदंड क्यों न दिया जाए?

बहेलिया ने एक बार सभा भवन में बैठे हर व्यक्ति पर दृष्टि दौड़ाई। फिर राजपुरोहित पर एक क्षण को उसकी दृष्टि ठहर गई। उसे कुछ याद आया!

बहेलिए ने कहा – “महाराज मेरा इसमें क्या दोष?  मृत्यु ने राजकुमार को मारने का निश्चय किया था! मुझे माध्यम बनाया! मेरी बुद्धि भ्रमित की और मैंने राजकुमार को कस्तूरी मृग समझकर तीर छोड़ दिया! जो दंड आप मुझे देना चाहते हैं – वही मृत्यु को दें। चाहे तो राजपुरोहित से पूछ ले!

यह भी तो कहते हैं कि विधाता ने जितनी आयु लिख दी – उसे कोई घटा या बढ़ा नहीं सकता। घटनाएं तो मृत्यु के लिए मात्र माध्यम होती हैं।”

विकर्ण का क्रोध विस्मय में बदल गया। उन्होंने राजपुरोहित की ओर दृष्टि डाली तो लगा कि सचमुच वे भी बहेलिया का मूक समर्थन कर रहे हैं।

उन्होंने मृत्यु का आव्हान किया! मृत्यु उपस्थित हुई । महाराज ने उससे पूछा- “आपने राजकुमार को मारने का विधान क्यों रचा?”
“उनका काल आ गया था! मृत्यु बोली।”

तो फिर काल को बुलाया गया।

काल ने कहा,- “मैं क्या कर सकता था – महामहिम *!!
यह तो राजकुमार के कर्मों का दोष था। कर्मफल से कोई बच नहीं सकता। राजकुमार ही उसके अपवाद कैसे हो सकते थे ?”

कर्म की पुकार की गई।

उसने उपस्थित होकर कहा – “आर्य श्रेष्ठ!अच्छा हूँ या बुरा – मैं तो जड़ हूं। मुझे तो आत्म चेतना चलाती है! उसकी इच्छा ही मेरा अस्तित्व है। आप राजकुमार की आत्मा को ही बुला कर पूछ लें! उन्होंने मुझे क्रियान्वित ही क्यों किया? “

और अंत में राजकुमार की आत्मा बुलाई गई।

दंड नायक ने प्रश्न किया- भन्ते! जब तुम कर्ता की स्थिति में थे! क्या यह सच है कि तुमने कोई ऐसा कार्य किया- जिसके फलस्वरूप तुम्हें अकाल, काल-कबलित होना पड़ा?

शरीर के बंधन से मुक्त, आकाश में स्थिर, राजकुमार की आत्मा थोड़ा मुस्कुराई ! फिर गंभीर होकर बोली -“राजन! पूर्व जन्म में, मैंने इसी स्थान पर मांस भक्षण की इच्छा से एक मृग का वध किया था। मृग में मरते समय प्रतिशोध का भाव था! उसी भाव ने बहेलिया को भ्रमित किया! इसीलिए बहेलिये का कोई दोष नहीं, ना मुझे काल ने मारा है। 🕉️मनुष्य के कर्म ही उसे मारते और जलाते हैं,🕉️ इसीलिए तुम मेरी चिंता छोडो़, कर्म की गति बड़ी गहन है। अपने कर्मों का हिसाब करो।भावी जीवन की प्रगति और उससे स्वर्ग मुक्ति, सब कर्म की गति पर ही आधारित है। सो तात!  तुम भी अपने कर्म सुधारो।
इसीलिय कहा गया है कि –
कर्म प्रधान विश्व रची रखा!
जो जस करहीं सो तस फल चाखा!!
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संगत का असर

संगत का असर

एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला! थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था! तो डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी!

वहीं से एक अति सुन्दर हंस उड़कर जा रहा था! उस हंस ने देखा कि वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें।

जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, * इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया।

तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था! मैं तो आपको छाँव दे रहा था और आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष?

तब समय उस शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ हो आपकी सोच भी आपके तन की तरह ही सुंदर हैं! आपके संस्कार शुद्ध हैं! यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे लेकिन आपसे एक गलती हो गयी कि जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था।

उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया हैं ।

संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, बुद्धि और कार्य से परमहंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये!
कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है।
व्यक्ति को जीवन के अंतिम क्षणों में गति भी उसकी संगति के अनुसार ही मिलती है। संगति का जीवन में बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। संगति से मनुष्य जहां महान बनता है, वहीं बुरी संगति उसका पतन भी करती है।

छत्रपति शिवाजी बहादुर बने। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी मां ने उन्हें वैसा वातावरण दिया।
नेपोलियन जीवन भर बिल्ली से डरते रहे, क्योंकि बचपन में बिल्ली ने उन्हें डरा दिया था।
माता-पिता के साथ-साथ बच्चे पर स्कूली शिक्षा का गहरा प्रभाव पड़ता है। कई बार व्यक्ति पढ़ाई-लिखाई करके उच्च पदों पर पहुंच तो जाता है, लेकिन संस्कारों के अभाव में, सही संगति न मिलने के कारण वह हिटलर जैसा तानाशाह बन जाता है।
सदाचरण के पालन से चाहे तो व्यक्ति ऐसा बहुत कुछ कर सकता है, जिससे उसका जीवन सार्थक हो सके, परंतु सदाचरण का पालन न करने से वह अंतत: खोखला हो जाता है।

हो सकता है कि चोरी-बेईमानी आदि करके वह धन कमा ले, कुछ समय के लिए पद-प्रतिष्ठा अर्जित कर ले, लेकिन उसका अंत बुरा ही होता है।
सत्संगति का, अच्छे विचारों का बीज बच्चे के मन में बचपन में ही बो देना चाहिए।
व्यक्ति की अच्छी संगति से उसके स्वयं का परिवार तो अच्छा होता ही है, साथ ही उसका प्रभाव समाज व राष्ट्र पर भी गहरा पड़ता है।

जहां अच्छी संगति व्यक्ति को कुछ नया करते रहने की समय-समय पर प्रेरणा देती है, वहीं बुरी संगति से व्यक्ति गहरे अंधकूप में गिर जाता है।

अच्छी संगति व्यक्ति का मन व चित्त निर्मल करती है। उसकी प्रसन्नता बनी रहती है। दिन-प्रतिदिन उसके व्यक्तित्व में निखार आता है।
संगति कैसी है, इस बात से व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता चलता है। जीवन का हर कदम मायने रखता है।

इसलिए उसे फूंक-फूंककर आगे बढ़ना चाहिए।

अक्सर ऐसा देखने में आता है कि कुछ बच्चे स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे होते हैं, लेकिन बुरी संगति में फंसकर नशा या मद्यपान करने लगते हैं। उनका जीवन बर्बाद हो जाता है। वे झूठी चकाचौंध में फंसकर स्वयं की वास्तविक शक्ति को नहीं पहचानते हैं। कई बार सत्संगति न मिलने के कारण उपयुक्त वातावरण न होने के चलते बच्चा अपनी प्रतिभा का विकास नहीं कर पाता, जबकि सत्संगति से उसमें अटूट विश्वास जगता है और वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏🏼

बदलाव – अपने में

बदलाव – अपने में

बूढ़े दादा जी को उदास बैठे देख बच्चों ने पूछा, “क्या हुआ दादा जी, आज आप इतने उदास बैठे क्या सोच रहे हैं?”

“कुछ नहीं , बस यूँही अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोच रहा था!”, दादा जी बोले ।

“जरा हमें भी अपनी लाइफ के बारे में बताइये न …” बच्चों ने ज़िद्द् की।

दादा जी कुछ देर सोचते रहे और फिर बोले, “जब मैं छोटा था, मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थ , मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी, मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था!

जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ – बुद्धि कुछ बढ़ी तो सोचने लगा कि ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है!
इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया! सोचा दुनिया न सही मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूँ!

पर जब कुछ और समय बीता- मैं अधेड़ होने को आया तो लगा कि ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है! हर कोई ऐसा नहीं कर सकता है! चलो मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूँ!

पर अफ़सोस कि मैं वो भी नहीं कर पाया !

और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूँ तो मुझे एहसास होता है कि अगर मैंने खुद को बदलने का सोचा होता तो मैं ऐसा ज़रूर कर पाता और हो सकता है मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर ये देश भी कुछ बदल जाता और तब शायद मैं इस दुनिया को भी बदल पाता!

ये कहते-कहते दादा जी की आँखें नम हो गयीं और वे धीरे से बोले, “बच्चों ! तुम मेरी जैसी गलती मत करना! कुछ और बदलने से पहले खुद को बदलना बाकि सब अपने आप बदलता चला जायेगा!

सचमुच में, हम सभी में दुनिया बदलने की ताकत है पर इसकी शुरआत खुद से ही करनी होती है! कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा! हमें खुद को तैयार करना होगा! अपने कौशल को मजबूत करना होगा! अपने attitude को सकारात्मक बनाना होगा! अपने लक्ष्य को फौलाद करना होगा और तभी हम वो हर एक बदलाव ला पाएंगे जो हम सचमुच लाना चाहते हैं।
प्रेम रावत भी यही कहते हैं कि जब हर एक आदमी शांति का अनुबह्व करने लगेगा तो विश्व शांति स्वत हो जाएगी!
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जब भी वह समय के महापुरुष के चरणों में जाये उसको कभी भी डिमाण्ड और कमांड की इच्छा त्याग देनी चाहिय!

जब तक व्यक्ति के भीतर पाने की इच्छा शेष है, तब तक उसे दरिद्र ही समझना चाहिए।
श्री सुदामा जी को गले लगाने के लिए आतुर श्री द्वारिकाधीश इसलिए भागकर नहीं गए कि सुदामा के पास कुछ नहीं है अपितु इसलिए गए कि सुदामा के मन में कुछ भी पाने की इच्छा अब शेष नहीं रह गयी थी।।

इसलिए ही संतों ने कहा है कि जो कुछ नहीं माँगता उसको भगवान स्वयं अपने आप को दे देते हैं।

द्वारिकापुरी में आज सुदामा राजसिंहासन पर विराजमान हैं और कृष्ण समेत समस्त पटरानियाँ चरणों में बैठकर उनकी चरण सेवा कर रही हैं। सुदामा अपने प्रभाव के कारण नहीं पूजे जा रहे हैं अपितु अपने स्वभाव और कुछ भी न चाहने के भाव के कारण पूजे जा रहे हैं।।

सुदामा की कुछ भी न पाने की इच्छा ने ही उन्हें द्वारिकापुरी के सदृश भोग ऐश्वर्य प्रदान कर दिया। मानो कि भगवान ये कहना चाह रहे हों कि जिसकी अब और कोई इच्छा बाकी नहीं रही वो मेरे ही समान मेरे बराबर में बैठने का अधिकारी बन जाता है।

मनुष्य की निष्कामता अथवा कामना शून्यता ही उसे अबसे अधिक मूल्यवान,अनमोल और उस प्रभु का प्रिय बना देती है।
जिसके जीवन में कामना नहीं होती उसे दु:खों का सामना भी नहीं करना पड़ता है।
जिसमें डिमांड नहीं होती वो ही डायमंड होता है!
इसलिय भक्त को याद रखना चाहिय कि –
जब भी वह समय के महापुरुष के चरणों में जाये उसको कभी भी डिमाण्ड और कमांड की इच्छा त्याग देनी चाहिय!
और शरणागत भाव से सेवा करते हुए उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान का अभ्यास करना चाहिय!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

माटी का खिलौना माटी में मिल जायेगा!

मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की और कहा, भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।

लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी! भयंकर गङ्ढ था!

मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’

हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी पर उसने कुछ ध्यान न दिया।

फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘*हमारी यात्रा बड़ी सुखद हुई! साथी-संगी रहे, मित्रता बनी! अब मैं जाती हूं! कोई काम हो तो मुझे कहना!

तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी! उसने कहा, ‘तू कौन है – कुछ पता नहीं! कब तू आयी! कब तू मेरे शरीर पर बैठी! कब तू उड़ गयी – इसका भी मुझे कोई पता नहीं है।

लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी…

सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है तो हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है?

लेकिन हम भी मक्खी कि तरह बड़ा शोरगुल मचाते हैं।
सोचने की बात है कि वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी?
वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, तू भी है! तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहती थी।

हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता! दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है।

इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि
किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें! हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।

हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये!
स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें!
धन इकट्ठा करते, मकान बनाते तो दूसरों को दिखाने के लिये
दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण।
हकीकत यही है कि-
हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे!
हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं!
वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं।

हमारा अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि उसे वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

इसलिय; याद रखना चाहिए कि आ*त्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा!
इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर जब तक जीवन है
सदभावना पूर्वक जीना चाहिए!
और
सबका सम्मान करना चाहिए!
क्योंकि
जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा  हैं।
🙏🙏🙏🌸🌸🌸🙏🙏🙏

अपना-अपना भाग्य

अपना-अपना भाग्य

एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया। मालिक ने सोचा इसकी तन्खाह बढ़ा दी जाये तो यह और लगन से काम करेगा और उसकी तन्खाह बढ़ा दी।

अगली बार जब उसको तन्खाह से अधिक पैसे दिये, तो वह कुछ नहीं बोला चुपचाप पैसे रख लिये। कुछ महीनों बाद वह फिर अनुपस्थित हो गया। मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया, सोचा इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ, यह नहीं सुधरेगा और उसने बढ़ी हुई तन्खाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही तन्खाह दी। वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और कुछ ना बोला। मालिक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने उससे पूछा कि जब मैंने तुम्हारे अनुपस्थित होने के बाद तुम्हारी तन्खाह बढ़ा कर दी तुम कुछ नहीं बोले और आज तुम्हारी अनुपस्थिति पर तन्खाह कम कर के दी फिर भी शान्त ही हो, इसकी क्या वजह है ?

उसने जवाब दिया, जब मैं पहले अनुपस्थित हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। आपने मेरी तन्खाह बढ़ा कर दी तो मैं समझ गया, परमात्मा ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेज दिया है और जब दोबारा मैं अनुपस्थित हुआ तो मेरी माता जी
का निधन हो गया था। जब आप ने मेरी तन्खाह कम दी तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का उनके साथ ही चला गया। अब मैं उस तनख्वाह के लिये क्यों चिन्तित होऊँ जिसका हिसाब स्वयं परमात्मा ने ले रखा है।

बहुत ही मजबूत रिश्ता है मेरे और भगवान के बीच में, ज्यादा मैं माँगता नहीं और कम वो देता नहीं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

रिटायरमेंट के बाद का दर्द/फ्यूज बल्ब

शहर जयपुर में बसे मालवीय नगर में एक आईएएस अफसर रहने के लिए आए जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे।‌ ये बड़े वाले रिटायर्ड आईएएस अफसर हैरान-परेशान से रोज शाम को पास के पार्क  में टहलते हुए अन्य लोगों को तिरस्कार भरी नज़रों से देखते और किसी से भी बात नहीं करते थे। एक दिन एक बुज़ुर्ग के पास शाम को गुफ़्तगू के लिए बैठे और फिर लगातार उनके पास बैठने लगे लेकिन उनकी वार्ता का विषय एक ही होता था – मैं भोपाल में इतना बड़ा आईएएस अफ़सर था कि पूछो मत, यहां तो मैं मजबूरी में आ गया हूं। मुझे तो दिल्ली में बसना चाहिए था- और वो बुजुर्ग प्रतिदिन शांतिपूर्वक उनकी बातें सुना करते थे। परेशान होकर एक दिन जब बुजुर्ग ने उनको समझाया – आपने कभी फ्यूज बल्ब देखे हैं? बल्ब के फ्यूज हो जाने के बाद क्या कोई देखता है‌ कि‌ बल्ब‌ किस कम्पनी का बना‌ हुआ था या कितने वाट का था या उससे कितनी रोशनी या जगमगाहट होती थी? बल्ब के‌ फ्यूज़ होने के बाद इनमें‌‌ से कोई भी‌ बात बिलकुल ही मायने नहीं रखती है।

लोग ऐसे‌ बल्ब को‌ कबाड़‌ में डाल देते‌ हैं है‌ कि नहीं! फिर जब उन रिटायर्ड‌ आईएएस अधिकारी महोदय ने सहमति‌ में सिर‌ हिलाया तो‌ बुजुर्ग फिर बोले‌ – रिटायरमेंट के बाद हम सब की स्थिति भी फ्यूज बल्ब जैसी हो‌ जाती है‌। हम‌ कहां‌ काम करते थे‌, कितने‌ बड़े‌/छोटे पद पर थे‌, हमारा क्या रुतबा‌ था,‌ यह‌ सब‌ कुछ भी कोई मायने‌ नहीं‌ रखता‌। मैं सोसाइटी में पिछले कई वर्षों से रहता हूं और आज तक किसी को यह नहीं बताया कि मैं दो बार संसद सदस्य रह चुका हूं। वो जो सामने वर्मा जी बैठे हैं, रेलवे के महाप्रबंधक थे। वे सामने से आ रहे मीणा साहब सेना में ब्रिगेडियर थे। वो बैरवा.. जी इसरो में चीफ थे। ये बात भी उन्होंने किसी को नहीं बताई है, मुझे भी नहीं पर मैं जानता हूं सारे फ्यूज़ बल्ब करीब – करीब एक जैसे ही हो जाते हैं, चाहे जीरो वाट का हो या 50 या 100 वाट हो। कोई रोशनी नहीं‌ तो कोई उपयोगिता नहीं। उगते सूर्य को जल चढ़ा कर सभी पूजा करते हैं। पर डूबते सूरज की कोई पूजा नहीं‌ करता‌। कुछ लोग अपने पद को लेकर इतने वहम में होते‌ हैं‌ कि‌ रिटायरमेंट के बाद भी‌ उनसे‌ अपने अच्छे‌ दिन भुलाए नहीं भूलते। वे अपने घर के आगे‌ नेम प्लेट लगाते‌ हैं – रिटायर्ड आइएएस‌/रिटायर्ड आईपीएस/रिटायर्ड पीसीएस/ रिटायर्ड जज‌ आदि – आदि। अब ये‌ रिटायर्ड IAS/IPS/PCS/तहसीलदार/ पटवारी/ बाबू/ प्रोफेसर/ प्रिंसिपल/ अध्यापक और न जाने कौन-कौन सी पोस्ट होती है भाई?माना‌ कि‌ आप बहुत बड़े‌ आफिसर थे‌, बहुत काबिल भी थे‌, पूरे महकमे में आपकी तूती बोलती‌ थी‌ पर अब क्या? अब यह बात मायने नहीं रखती है। बल्कि मायने‌ रखती है‌ कि पद पर रहते समय आप इंसान कैसे‌ थे, आपने आम लोगों को कितनी तवज्जो दी, समाज को क्या दिया, मित्र बन्धुओं के कितने काम आएं, समाज के  कितने लोगों की मदद की या सिर्फ घमंड मे ही सूजे हुए रहे? पद पर रहते हुए कभी घमंड आये तो बस याद कर लीजिए कि एक दिन सबको फ्यूज होना है।

शिक्षा

यह पोस्ट उन लोगों के लिए आईना है जो पद और सत्ता होते हुए कभी अपनी कलम से समाज का हित नहीं कर सकते। और रिटायरमेंट होने के बाद समाज के लिए बड़ी चिंता होने लगती है। अभी भी वक्त है इस पोस्ट को पढ़िए, चिंतन करिए तथा समाज का यथासंभव हित कीजिए। अपने पद रूपी बल्ब से समाज व देश को रोशन करिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

परमात्मा को पाने के लिए खुद को समर्पित करो!

एक गाँव में यज्ञ हो रहा था और गाँव का राजा एक बकरे की बलि चढ़ा रहा था।

भगवान बुद्ध गाँव से गुज़र रहे थे तो वो वहाँ पहुँच गए और उन्होंने उस राजा को कहा कि, “ये क्या कर रहे हो? इस बकरे को किसलिए चढ़ा रहे हो?”

तो राजा ने कहा कि, “इसके चढ़ाने से बड़ा पुण्य होता है।”

तब बुद्ध ने कहा, “मुझे चढ़ा दो, तो और भी ज़्यादा पुण्य होगा।”

राजा थोड़ा डरा और विचारशुन्य होकर मन ही मन सोचने लगा कि बकरे को चढ़ाने में कोई हर्ज़ा नहीं है लेकिन बुद्ध को चढ़ाना! उसके भी हाथ-पैर कांपने लगे!

भगवान बुद्ध ने कहा कि, “अगर सच में ही कोई लाभ करना हो तो अपने आप को चढ़ा दो। बकरा चढ़ाने से क्या होगा?”

उस राजा ने कहा, “इस बकरे का कोई नुकसान नहीं है, स्वर्ग चला जाएगा।”

बुद्ध ने कहा, “ये बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की ही तलाश कर रहा हूँ, तुम मुझे चढ़ा दो। तुम मुझे स्वर्ग भेज दो और तुम अपने माता-पिता को क्यों नहीं भेजते स्वर्ग और ख़ुद को क्यों रोके हुए हो?

जब तुमको स्वर्ग जाने की ऐसी सरल और सुगम तरकीब मिल ही गई है तो काट लो गर्दन।
बकरे को बेचारे को क्यों भेज रहे हो? जो शायद जाना भी न चाहता हो स्वर्ग!

बकरे को ख़ुद ही चुनने दो कि कहाँ उसे जाना है।”

राजा को बात समझ में आयी क्योंकि भगवान बुद्ध ने सहजता से कटु सत्य कहा था!

उन्होंने आगे कहा कि तुमने परमात्मा को सब चढ़ाया है- धन चढ़ाया, फूल चढ़ाए। जबकि फूल भी तुम्हारे नहीं… वो भी परमात्मा के हैं! वृक्षों पर पहले से चढ़े ही हुए थे।

उन फूलों का वृक्षों पर सजीव रूप में खिलना, सुगंध देना क्या परमात्मा के चरणों में चढ़ना नहीं था?

वृक्षों के ऊपर से उनकी परमात्मा की यात्रा हो ही रही थी। वहीं तो जा रही थी वह सुगन्ध और कहाँ जाती?

तुमने उनको वृक्षों से तोड़ के उन फूलों को मुर्दाकर लिया और फिर मुर्दा फूलों को जाकर मन्दिर में चढ़ा आए और समझने लगे कि बड़ा काम कर आए हो!

कभी धूप-दीप जलाए तो कभी जानवर चढ़ाए तो कभी आदमी भी चढ़ा दिए!

अपने को कब चढ़ाओगे?

और सत्य यही है कि जो अपने को चढ़ाता है, खुद को पूर्ण रूप से समर्पित करता है – वही उस परमात्मा को पाता है।

इसलिए, अगर जीते जी स्वर्ग का अनुभव करना चाहते हो, भगवान के लिए कुछ करना चाहते हो, उनको प्रसन्न करना चाहते हो तो *खुद को ही भेंट स्वरूप चढ़ाओ – तभी उनसे भेट होगी! खुद को समर्पित किये बिना कुछ भी नहीं हो सकता!
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एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक कौवा एक वन में रहा करता था,उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह सन्तुष्ट था!

एक दिन उड़ते हुए वह एक सरोवर के किनारे पहुँचा! वहाँ उसने एक उजले सफ़ेद हंस को तैरते हुए देखा।

उसे देखकर वह सोचने लगा – “यह हंस कितना सौभाग्यशाली है, जो इतना सफेद और सुन्दर है। इधर मुझे देखो, मैं कितना काला और बदसूरत हूँ।ये हंस अवश्य इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा!”

वह हंस के पास गया और अपने मन की बात उसे बता दी। सुनकर हंस बोला, “नहीं मित्र! वास्तव में ऐसा नहीं है।

पहले मैं भी सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का सबसे सुन्दर पक्षी हूँ. इसलिए बहुत सुखी और खुश था लेकिन एक दिन मैंने तोते को देखा; जिसके पास दो रंगों की अनोखी छटा है!

उसके बाद से मुझे यकीन हुआ कि वही दुनिया का सबसे सुन्दर और खुश पक्षी है”

हंस की बात सुनने के बाद कौवा तोते के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह दुनिया का सबसे खुश पक्षी है?

तोते ने उत्तर दिया, “मैं बहुत ही खुशगवार जीवन व्यतीत कर रहा था! लेकिन जब मैंने मोर को देखा था तो अब मुझे लगता है कि मोर से सुन्दर तो कोई हो ही नहीं सकता। इसलिये मेरी समझ से वही दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी है।

इसके बाद कौवा मोर की खोज में निकला उड़ते-उड़ते वह एक चिड़ियाघर पहुँचा! वहाँ उसने देखा कि *मोर एक पिन्जरे में बन्द है और उसे देखने के लिए बहुत सारे लोग जमा हैं और सभी मोर की बहुत सराहना कर रहे थे!

सबके जाने के बाद कौवा मोर के पास गया और उससे बोला, “तुम कितने सौभाग्यशाली हो, जो तुम्हारी सुन्दरता के कारण हर रोज़ हजारों लोग तुम्हें देखने आते हैं! मुझे तो लोग अपने आस-पास भी फटकने नहीं देते और देखते ही भगा देते हैं! तुम इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो ना?”

कौवे की बात सुनकर मोर उदास हो गया।

वह बोला, “मित्र! मुझे भी अपनी सुन्दरता पर बड़ा गुमान था।

मैं सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का क्या, बल्कि इस पूरे ब्रम्हाण्ड का सबसे सुन्दर पक्षी हूंँ। इसलिए खुश भी बहुत था। लेकिन मेरी यही सुन्दरता मेरी शत्रु बन गई है और मैं इस चिड़ियाघर में बन्द हूंँ।

यहांँ आने के बाद इस पूरे चिड़ियाघर का अच्छी तरह मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंँचा हूंँ कि कौवा ही एक ऐसा पक्षी है जो यहांँ कैद नहीं है।

इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं सोचने लगा हूंँ कि काश मैं कौवा होता तो कम से कम आजादी से बाहर घूम सकता और तब मैं इस दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी होता।

हम भी अपने जीवन में हमेशा दूसरों को देखकर स्वयंँ की तुलना व्यर्थ ही उनसे करने लगते हैं और दुखी हो जाते हैं! भगवान ने सब को अलग बनाया है और अलग गुण दिए हैं! हम उसका महत्व नहीं समझते और अपनी ही तुलनात्मक दृष्टि के कारण दुख के चक्र में फंँस जाते हैं। इसलिए दूसरों के पास जो है उसे देखकर ईर्ष्या करने की बजाय यह सोचने के कि हमें हमारे पास जो भी है उसके साथ खुश रहना सीखना चाहिए; खुशी बाहर ढूंढने से नहीं मिलती, वह तो हमारी अन्दर ही छिपी हुई है।

इस ईर्ष्या का त्याग केवल मात्र भजन सुमिरणसे ही हो सम्भव है इसलिए हमें श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा में रहकर भजन सुमिरण करना चाहिए। अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

सुमति

सुमति

एक बार किसी ने तुलसी दास जी से पूछा — महाराज ! सम्पूर्ण रामायण का सार क्या है ?
क्या कोई चौपाई ऐसी है जिसे हम सम्पूर्ण रामायण का सार कह सकते हैं ? तुलसी दास जी ने कहा -हाँ है, और वह है।

जहां सुमति तह सम्पत्ति नाना
जहां कुमति तहँ विपत्ति आना

जहां सुमति होती है, वहां हर प्रकार की सम्पत्ति, सुख-सुविधाएं होती है!
और जहां कुमति होती है, वहां विपत्ति, दुःख और कष्ट पीछा नहीं छोड़ते।

सुमति थी अयोध्या में – भाई-भाई में प्रेम था, पिता और पुत्र में प्रेम था, राजा-प्रजा में प्रेम था, सास-बहू में प्रेम था और मालिक-सेवक में प्रेम था, तो उजड़ी हुई अयोध्या फिर से बस गई।

कुमति थी लंका में तो – एक भाई ने दूसरे भाई को लात मारकर निकाल दिया। कुमति और अनीति के कारण सोने की लंका राख का ढेर हो गई।

गुरु वाणी में आता है।
इक लख पूत सवा लख नाती
ता रावण घर दीया ना बाती

पाँच पाण्डवों में सुमति थी तो उन पर कितनी विपदाएं आई, लेकिन अंत में विजय उनकी ही हुई और हस्तिनापुर में उनका राज्य हुआ।
कौरवों में कुमति थी अनीति थी, अनाचार था, अधर्म था, तो उनकी पराजय हुई और सारे भाई मारे गए।

यदि जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो जीवन में सुमति अपनाओ।