प्रकृति के नियम…

प्रकृति के नियम…

खाना जो हम खाते हैं, एकाध दिन के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।
पानी जो हम पीते हैं, दो-चार घण्टे के अंदर शरीर से बाहर निकल जाना चाहिए, वरना हम बीमार हो जायेंगे।
हवा जो हम सांस लेते हैं, कुछ सेकण्ड में ही वापस बाहर निकल जानी चाहिए, वरना हम मर ही जायेंगे ।

लेकिन कुछ नकारात्मक बातें—
जैसे कि घृणा, गुस्सा, ईर्ष्या आदि आदि।
जिनको हम अपने अंदर दिन, महीने और सालों तक रखे रहते हैं ।
यदि इन नकारात्मक विचारों को समय-समय पर अपने अंदर से नहीं निकालेंगे तो एक दिन निश्चित ही हम मानसिक रोगी बन जायेंगे ।

निर्णय आपका
क्योंकि…
शरीर है आपका
जीवन है आपका

पुनश्च, जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

सन्तोष

सन्तोष

महात्मा बुद्ध के एक भक्त थे पूरण| एक बार पूरण ने बिहार के “सूखा” नामक क्षेत्र में धर्म प्रचार के लिए जाने का मन बनाया| उसने महात्मा जी से आज्ञा मांगी|

महात्मा बुद्ध ने फरमाया कि “वहां लोग बड़े कठोर हैं ; वे अपमान कर देंगे|”
पूरण ने कहा, अगर ऐसा है तो “मैं वहीं जाकर ही सेवा करूंगा|”

महात्मा बुद्ध ने पूरण से तीन सवालों के जवाब मांगे|
पहला, “अगर वहां लोग तुझे गालियां दें, अपमान करें तो तुझे क्या होगा?”
पूरण ने कहा, “मैं यह सोच लूंगा कि सिर्फ गालियों से ही अपमान करते हैं बेचारे| मारते तो नहीं है, मार भी तो सकते थे|”

महात्मा बुद्ध ने दूसरा सवाल किया!
“अगर वे लोग तुझे मारें पीटें, पत्थर फेंके, जूतों से स्वागत करें, तो तेरा क्या हाल होगा?”
पूरण ने उत्तर दिया, “मैं यह सोच लूंगा तब कि कितने भले लोग हैं| सिर्फ मारपीट ही रहे हैं, जान से तो नहीं मार डाला!”
महात्मा बुद्ध ने आखिरी सवाल किया!
”अगर वे लोग तुझे मार ही डालें, तो मरते वक्त तुम्हे क्या महसूस होगा?
पूरण ने उत्तर दिया, ”मैं तब यह सोच लूंगा कि कितने भले लोग हैं| ये तो मुझे उस जीवन से छुटकारा दिला रहे हैं, जिसमें भूल चूक हो सकती है!”
महात्मा बुद्ध ने फरमाया कि *अब तू पूर्ण भक्त हुआ पूरण! क्योंकि संतोष की अवस्था को उपलब्ध हो चुके हो तुम! अब तुम जा सकते हो अपने धर्म प्रचार करने की सेवा पर!

श्री गुरु नानक देव जी ने भी फरमाया है कि “योगी, संतोष और लज्जा की मुद्रा बनाओ| प्रतिष्ठा की झोली धारण करो|” अर्थात कंधे पर झोली टांग कर मोहमाया के पीछे भागते रहना परमात्मा का मार्ग नहीं है|

बुढ़ापे में लोग संतोष करते हैं; गरीबी में भी लोग संतोष करते हैं| संतोष कोई असहायता नहीं है; हेल्पलैस नहीं है और यह नकारात्मकता भी नहीं है| इंसान का संतोष करना तो एक बहुत ऊंची अवस्था है|

संतोष का अर्थ है, “जितना मुझे चाहिए था, उससे ज्यादा मेरे पास है| मेरी जरूरत से ज्यादा मेरे पास उपलब्ध है| जो मैंने मांगा ही नहीं था, वह भी मुझे मिला हुआ है| संतोष का अर्थ तो अनुग्रह का ही भाव है ; धन्यवाद का भाव है| मेरे परमात्मा, तेरी मर्जी बड़ी महान है; जो तूने इतना दे दिया है मुझ गरीब को|

इसी संतोष की झोली बांध कर परमात्मा के मार्ग पर चला जा सकता है| संतोष को उपलब्ध हुए बिना हम सतगुरु के नियमों व वचनों का पालन कैसे करेंगे? सोचें जरा!

एक सेवक ने अपने गुरू को अरदास की कि, जी मैं सत्सँग भी सुनता हूँ, सेवा भी करता हूँ, मग़र फिर भी मुझे कोई फल नहीं मिला!

एक सेवक ने अपने गुरू को अरदास की कि, जी मैं सत्सँग भी सुनता हूँ, सेवा भी करता हूँ, मग़र फिर भी मुझे कोई फल नहीं मिला!

सतगुरु ने प्यार से पूछा, बेटा तुम्हे क्या चाहिए?
सेवक बोला, मैं तो बहुत ही ग़रीब हूँ दाता!
सतगुरु ने हँस कर पूछा, बेटा तुम्हें कितने पैसों की ज़रूरत है?

सेवक ने अर्ज किया कि, गुरू जी, बस इतना बख्श दो कि सिर पर छत हो, समाज में पत हो! 🙏

गुरु ने पूछा, और ज़्यादा की भूख तो नहीं है बेटा?

सेवक हाथ जोड़ के बोला कि, नहीं जी, बस इतना ही बहुत है!

गुरु ने उसे चार मोमबत्तियां दीं और कहा, मोमबत्ती जलाक्र पूरब दिशा में जाओ, जहाँ ये बुझ जाये, वहाँ खुदाई करके खूब सारा धन निकाल लेना!

अगर कोई इच्छा बाकी हो तो –
दूसरी मोमबत्ती जला कर पश्चिम में जाना और चाहिए तो उत्तर दिशा में जाना, लेकिन सावधान, दक्षिण दिशा में कभी मत जाना, वर्ना बहुत भारी मुसीबत में फँस जाओगे
सेवक बहुत खुश हो कर चल पड़ा! जहाँ मोमबत्ती बुझ गई, वहाँ खोदा, तो सोने का भरा हुआ घड़ा मिला! बहुत खुश हुआ और सतगुरु का शुक्राना करने लगा!

थोड़ी देर बाद सोचा, थोड़ा और धन माल मिल जाये, फिर आराम से घर जा कर ऐश करूँगा! मोमबत्ती जलाई पश्चिम की ओर चल पड़ा – वहां हीरे मोती मिल गये!

खुशी तो बहुत बढ़ गई, मग़र मन की भूख भी और बढ़ गई! तीसरी मोमबत्ती जलाई और उत्तर दिशा में चला और वहाँ से भी बेशुमार धन मिल गया!

सोचने लगा कि, *चौथी मोमबत्ती और दक्षिण दिशा के लिये गुरू ने मना किया था और सोचा, शायद वहाँ से भी क़ोई अनमोल चीज़ मिलेगी!
मोमबत्ती जलाई और चला दक्षिण दिशा की ओर! जैसे ही मोमबत्ती बुझी वो जल्दी से ख़ुदाई करने लगा! खुदाई की तो एक दरवाजा दिखाई दिया, दरवाजा खोल के अंदर चला गया! अंदर इक और दरवाजा दिखाई दिया उसे खोल के अन्दर चला गया!

अँधेरे कमरे में उसने देखा, एक आदमी चक्की चला रहा है! 😳😳😳😳
सेवक ने पूछा, भाई तुम कौन हो?
चक्की चलाने वाला बहुत खुश हो कर बोला, ओह! आप आ गये?
यह कह कर उसने वो चक्की गुरू के सेवक के आगे कर दी! सेवक कुछ समझ नहीं पाया! सेवक चक्की चलाने लगा!
सेवक ने पूछा – भाई, तुम कहाँ जा रहे हो? अपनी चक्की सम्भालो!

उस आदमी ने कहा, मैने भी अपने सतगुरु का हुक्म नहीं माना था और लालच के मारे यहाँ फँस गया था, बहुत रोया, गिड़गिड़ाया, तब मेरे सतगुरु ने मुझे दर्शन दिये और कहा था, बेटा जब कोई तुमसे भी बड़ा लालची यहाँ आयेगा, तभी तुम्हारी जान छूटेगी! आज तुमने भी अपने गुरु के आदेश कि अहवेलना की है!अब भुगतो!! 😡

सेवक बहुत शर्मसार हुआ और रोते रोते चक्की चलाने लगा!
वो आज भी इंतज़ार कर रहा है कि कोई उससे भी बड़ा लालची, पैसे का भूखा आयेगा, तभी उसकी मुक्ति होगी!😭😭😭😭

इसलिय असली गुरु भक्त को हमेशा अपने सतगुरु की रज़ा में ही राज़ी रहना चाहिए! सतगुरू को सब कुछ पता है, कि उनके बच्चों को, कब और क्या चाहिए! किस चीज में उसका आनन्द है! 👏

जितना भी सतगुरु ने हमें बख्शा है, हमारी औकात से भी ज़्यादा है! बस, अब सब्र करो और प्रेम से भजन करो!👏🌹🙏👏
कल तो क्या एक पल का भी भरोसा नहीं है, आज का मौका है, अब में कुछ कर लो, नहीं तो बहुत पछताना होगा!
कहा भी है कि –

यही घड़ी, यही वेला साधो,
यही घड़ी, यही वेला रे!
लाख खरच फिर हाथ ना आवे,
मानुस जनम दुहेला रे!!,
साधो यही घड़ी यही वेला रे….
आज भी हमारे सद्गुरु अपने जीवन के हर पल को हम गुरुभक्तों का मार्गदर्शन करने में लगे हैं! पर हम अपने भले के लिय उनकी एक बात कि एक घंटा अन्दर की दिशा में भी जाओ का हमेशा उल्लघंन करते हैं और बहिर्मुख होकर चारों दिशाओं का धन बटोरना चाहते हैं!
तो यह स्पष्ट है कि आज्ञा न मानने वालों के लिय, अभ्यास न करने वालों के लिय चक्की पीसने का आप्सन हमेशा मौजूद है! अब मरजी हमारी है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मांस का मूल्य

मांस का मूल्य

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा :

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए

सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :
राजन,

सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।

तब सम्राट ने उनसे पूछा :
आपका इस बारे में क्या मत है ?

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा :
शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय 💓 का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और

उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और

सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख
दीं ।

सम्राट ने पूछा :
यह सब क्या है ?
तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए

इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपना जान बचाने मे असमर्थ है।

और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं ।

तो क्या बस इसी कारण उनसे जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार !

अगर ये लेख आपको अच्छा लगे तो हर व्यक्ति तक जरुर भेजे।

बेजुबानो को मारो नही अपितु सेवा करो, बहुत पूण्य मिलेगा
🙏🙏

समुद्र के किनारे एक लहर आई। वो एक बच्चे की चप्पल अपने साथ बहा ले गई। बच्चा ने रेत पर अंगुली से लिखा-“समुद्र चोर है।”

समुद्र के किनारे एक लहर आई। वो एक बच्चे की चप्पल अपने साथ बहा ले गई। बच्चा ने रेत पर अंगुली से लिखा-“समुद्र चोर है।”

उसी समुद्र के दूसरे किनारे पर कुछ मछुआरों ने बहुत सारी मछली पकड़ी। एक मछुआरे ने रेत पर लिखा-“समुद्र मेरा पालनहार है।”

एक युवक समुद्र में डूब कर मर गया। उसकी मां ने रेत पर लिखा-“समुद्र हत्यारा है।”

दूसरे किनारे पर एक गरीब बूढ़ा, टेढ़ी कमर लिए रेत पर टहल रहा था। उसे एक बड़ी सीप में अनमोल मोती मिला। उसने रेत पर लिखा-“समुद्र दानी है।”

अचानक एक बड़ी लहर आई और सारे लिखे को मिटा कर चली गई।

लोग समुद्र के बारे में जो भी कहें, लेकिन विशाल समुद्र अपनी लहरों में मस्त रहता है। अपना उफान और शांति वह अपने हिसाब से तय करता है।

अगर विशाल समुद्र बनना है तो किसी के निर्णय पर अपना ध्यान ना दें। जो करना है अपने हिसाब से करें। जो गुजर गया उसकी चिंता में ना रहें। हार-जीत, खोना-पाना, सुख-दुख इन सबके चलते मन विचलित ना करें। अगर जिंदगी सुख शांति से ही भरी होती तो आदमी जन्म लेते समय रोता नहीं। जन्म के समय रोना और मरकर रुलाना इसी के बीच के संघर्ष भरे समय को जिंदगी कहते हैं।

‘कुछ ज़रूरतें पूरी, तो कुछ ख्वाहिशें अधूरी

इन्ही सवालों का संतुलित जवाब है– ज़िन्दगी

मानवता व इंसानियत किसी की बपौती नहीं है

 मानवता व इंसानियत किसी की बपौती नहीं है

वासु भाई और वीणा बेन गुजरात के एक शहर में रहते हैं। आज दोनों यात्रा की तैयारी कर रहे थे। 3 दिन का अवकाश था वे पेशे से चिकित्सक थे ।लंबा अवकाश नहीं ले सकते थे ।परंतु जब भी दो-तीन दिन का अवकाश मिलता ,छोटी यात्रा पर कहीं चले जाते हैं ।

आज उनका इंदौर – उज्जैन जाने का विचार था । दोनों साथ-साथ मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे, वहीं पर प्रेम अंकुरित हुआ ,और बढ़ते – बढ़ते वृक्ष बना। दोनों ने परिवार की स्वीकृति से विवाह किया । 2 साल हो गए ,संतान कोई थी नहीं ,इसलिए यात्रा का आनंद लेते रहते थे ।

विवाह के बाद दोनों ने अपना निजी अस्पताल खोलने का फैसला किया , बैंक से लोन लिया ।वीणा बेन स्त्री रोग विशेषज्ञ और वासु भाई डाक्टर आफ मेडिसिन थे ।इसलिए दोनों की कुशलता के कारण अस्पताल अच्छा चल निकला था ।

आज इंदौर जाने का कार्यक्रम बनाया था । जब मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे वासु भाई ने इंदौर के बारे में बहुत सुना था । नई नई वस्तु है। खाने के शौकीन थे । इंदौर के सराफा बाजार और 56 दुकान पर मिलने वाली मिठाईयां नमकीन के बारे में भी सुना था, साथ ही महाकाल के दर्शन करने की इच्छा थी इसलिए उन्होंने इस बार इंदौर उज्जैन की यात्रा करने का विचार किया था ।

यात्रा पर रवाना हुए ,आकाश में बादल घुमड़ रहे थे । मध्य प्रदेश की सीमा लगभग 200 किलोमीटर दूर थी। बारिश होने लगी थी।
म.प्र. सीमा से 40 किलोमीटर पहले छोटा शहर पार करने में समय लगा। कीचड़ और भारी यातायात में बड़ी कठिनाई से दोनों ने रास्ता पार किया।
भोजन तो मध्यप्रदेश में जाकर करने का विचार था । परंतु चाय का समय हो गया था ।उस छोटे शहर से चार 5 किलोमीटर आगे निकले ।सड़क के किनारे एक छोटा सा मकान दिखाई दिया ।जिसके आगे वेफर्स के पैकेट लटक रहे थे ।उन्होंने विचार किया कि यह कोई होटल है । वासु भाई ने वहां पर गाड़ी रोकी, दुकान पर गए , कोई नहीं था ।आवाज लगाई , अंदर से एक महिला निकल कर के आई।
उसने पूछा क्या चाहिए ,भाई ?
वासु भाई ने दो पैकेट वेफर्स के लिए ,और कहा बेन दो कप चाय बना देना ।थोड़ी जल्दी बना देना , हमको दूर जाना है ।
पैकेट लेकर के गाड़ी में गए ।वीणा बेन और दोनों ने पैकेट के वैफर्स का नाश्ता किया ।
चाय अभी तक आई नहीं थी ।
दोनों कार से निकल कर के दुकान में रखी हुई कुर्सियों पर बैठे ।वासु भाई ने फिर आवाज लगाई ।

थोड़ी देर में वह महिला अंदर से आई ।बोली -भाई बाड़े में तुलसी लेने गई थी , तुलसी के पत्ते लेने में देर हो गई ,अब चाय बन रही है ।
थोड़ी देर बाद एक प्लेट में दो मैले से कप ले करके वह गरमा गरम चाय लाई।
मैले कप को देखकर वासु भाई एकदम से अपसेट हो गए ,और कुछ बोलना चाहते थे ।परंतु वीणाबेन ने हाथ पकड़कर उनको रोक दिया ।

चाय के कप उठाए ।उसमें से अदरक और तुलसी की सुगंध निकल रही थी ।दोनों ने चाय का एक सिप लिया । ऐसी स्वादिष्ट और सुगंधित चाय जीवन में पहली बार उन्होंने पी ।उनके मन की हिचकिचाहट दूर हो गई।
उन्होंने महिला को चाय पीने के बाद पूछा कितने पैसे ?
महिला ने कहा – बीस रुपये
वासु भाई ने सौ का नोट दिया ।
महिला ने कहा कि भाई छुट्टा नहीं है । ₹. 20 छुट्टा दे दो ।वासुभाई ने बीस रु का नोट दिया। महिला ने सौ का नोट वापस किया।
वासु भाई ने कहा कि हमने तो वैफर्स के पैकेट भी लिए हैं !
महिला बोली यह पैसे उसी के हैं ।चाय के पैसे नहीं लिए ।
अरे चाय के पैसे क्यों नहीं लिए ?
जवाब मिला ,हम चाय नहीं बेंचते हैं। यह होटल नहीं है ।
-फिर आपने चाय क्यों बना दी ?
– अतिथि आए ,आपने चाय मांगी ,हमारे पास दूध भी नहीं था । यह बच्चे के लिए दूध रखा था ,परंतु आपको मना कैसे करते ।इसलिए इसके दूध की चाय बना दी ।
-अभी बच्चे को क्या पिलाओगे ?
-एक दिन दूध नहीं पिएगा तो मर नहीं जाएगा । इसके पापा बीमार हैं वह शहर जा करके दूध ले आते ,पर उनको कल से बुखार है ।आज अगर ठीक हो जाएगे तो कल सुबह जाकर दूध ले आएंगे।

वासु भाई उसकी बात सुनकर सन्न रह गये। इस महिला ने होटल ना होते हुए भी अपने बच्चे के दूध से चाय बना दी और वह भी केवल इसलिए कि मैंने कहा था ,अतिथि रूप में आकर के ।
संस्कार और सभ्यता में महिला मुझसे बहुत आगे हैं ।
उन्होंने कहा कि हम दोनों डॉक्टर हैं ,आपके पति कहां हैं बताएं ।महिला उनको भीतर ले गई । अंदर गरीबी पसरी हुई थी ।एक खटिया पर सज्जन सोए हुए थे । बहुत दुबले पतले थे ।
वासु भाई ने जाकर उनका मस्तक संभाला ।माथा और हाथ गर्म हो रहे थे ,और कांप रहे थे वासु भाई वापस गाड़ी में , गए दवाई का अपना बैग लेकर के आए । उनको दो-तीन टेबलेट निकालकर के दी , खिलाई ।
फिर कहा- कि इन गोलियों से इनका रोग ठीक नहीं होगा ।
मैं पीछे शहर में जा कर के और इंजेक्शन और इनके लिए बोतल ले आता हूं ।वीणा बेन को उन्होंने मरीज के पास बैठने का कहा ।
गाड़ी लेकर के गए ,आधे घंटे में शहर से बोतल ,इंजेक्शन ,ले कर के आए और साथ में दूध की थैलीयां भी लेकरआये।
मरीज को इंजेक्शन लगाया, बोतल चढ़ाई ,और जब तक बोतल लगी दोनों वहीं ही बैठे रहे ।
एक बार और तुलसी और अदरक की चाय बनी ।
दोनों ने चाय पी और उसकी तारीफ की।
जब मरीज 2 घंटे में थोड़े ठीक हुए, तब वह दोनों वहां से आगे बढ़े।

3 दिन इंदौर उज्जैन में रहकर , जब लौटे तो उनके बच्चे के लिए बहुत सारे खिलौने ,और दूध की थैली लेकर के आए ।
वापस उस दुकान के सामने रुके ,महिला को आवाज लगाई , तो दोनों बाहर निकल कर उनको देख कर बहुत खुश हो गये।
उन्होंने कहा कि आप की दवाई से दूसरे दिन ही बिल्कुल स्वस्थ हो गया ।
वासु भाई ने बच्चे को खिलोने दिए ।दूध के पैकेट दिए । फिर से चाय बनी, बातचीत हुई ,अपनापन स्थापित हुआ। वासु भाई ने अपना एड्रेस कार्ड दिया ।कहा, जब भी आओ जरूर मिले ,और दोनों वहां से अपने शहर की ओर ,लौट गये ।

शहर पहुंचकर वासु भाई ने उस महिला की बात याद रखी। फिर एक फैसला लिया।

अपने अस्पताल में रिसेप्शन पर बैठे हुए व्यक्ति से कहा कि ,अब आगे से आप जो भी मरीज आयें, केवल उसका नाम लिखेंगे ,फीस नहीं लेंगे ।फीस मैं खुद लूंगा।

और जब मरीज आते तो अगर वह गरीब मरीज होते तो उन्होंने उनसे फीस लेना बंद कर दिया ।
केवल संपन्न मरीज देखते तो ही उनसे फीस लेते ।
धीरे धीरे शहर में उनकी प्रसिद्धि फैल गई । दूसरे डाक्टरों ने सुना ।उन्हें लगा कि इस कारण से हमारी प्रैक्टिस कम हो जाएगी ,और लोग हमारी निंदा करेंगे । उन्होंने एसोसिएशन के अध्यक्ष से कहा ।
एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ वासु भाई से मिलने आए ,उन्होंने कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो ?
तब वासु भाई ने जो जवाब दिया उसको सुनकर उनका मन भी उद्वेलित हो गया ।
वासु भाई ने कहा कि मैं मेरे जीवन में हर परीक्षा में मेरिट में पहली पोजीशन पर आता रहा ।एमबीबीएस में भी ,एमडी में भी गोल्ड मेडलिस्ट बना ,परंतु सभ्यता संस्कार और अतिथि सेवा में वह गांव की महिला जो बहुत गरीब है ,वह मुझसे आगे निकल गयी। तो मैं अब पीछे कैसे रहूं?

इसलिए मैं अतिथि सेवा में मानव सेवा में भी गोल्ड मेडलिस्ट बनूंगा । इसलिए मैंने यह सेवा प्रारंभ की । और मैं यह कहता हूं कि हमारा व्यवसाय मानव सेवा का है। सारे चिकित्सकों से भी मेरी अपील है कि वह सेवा भावना से काम करें ।गरीबों की निशुल्क सेवा करें ,उपचार करें ।यह व्यवसाय धन कमाने का नहीं ।
परमात्मा ने मानव सेवा का अवसर प्रदान किया है ,
एसोसिएशन के अध्यक्ष ने वासु भाई को प्रणाम किया और धन्यवाद देकर उन्होंने कहा कि मैं भी आगे से ऐसी ही भावना रखकर के चिकित्सकीय सेवा करुंगा।

कभी कभार ऐसी पोस्ट भी वाट्सएप पर आ जाती हैं। और फॉरवर्ड करने को मजबुर कर देती हैं।
🙏🙏🙏

Ashwatthama or Drauni was the son of guru Drona

Ashwatthama or Drauni was the son of guru Drona and he is the grandson of the Brahmin sage Bharadwaja. Ashwatthama is the avatar of one of the eleven Rudras and he is one of the seven Chiranjivi.After Arjuna and Karna, Ashwatthama killed most number of warriors in the Kurukshetra war on behalf of the Kauravas.

Krishna cursed Ashwatthama with leprosy and to roam the world for 3,000 years as an unloved castaway.

In another version, it is believed that he is cursed to remain alive till the end of the Kaliyuga. It is believed that Ashwatthama migrated to the land currently known as Arabian peninsula.

A doctor in Madhya Pradesh claimed to have a tough patient with a septic forehead. After several applications of a fail-proof potion, the wound was still fresh and kept bleeding. Amazed at this, the doctor said that his wound seems ageless and cureless. He added, by saying, “I wonder, are you Ashwathama”, and laughed.

When he turned to apply the next doze, he found the patient seat empty. The patient just disappeared into thin air – the story it was claimed was true.

Some Yogis like Pilot Baba also claim that they have met Ashwatthama who was living among tribes at Himalayan Foothills. It is believed that Ashwatthama offers flowers to a Shivling each morning.

Apart from this, according to locals a very tall man with noticeable dent in his forehead and in the middle of his forehead visits a restaurant owner once every year, somewhere on the foothills of the Himalayas.

Only once a year, he goes and eats “all” the food prepared by the owner and drinks a minimum of 100 litres of water. These “claims” have been made by locals who see the man every year.

The villagers on the other hand “claim” that the man after quenching his thirst and anger then quietly disappears in the forest only to “apppear” next year.

It is said that in the Dwayapar Yuga the average height of a man used to be anywhere between 12-14 foot and a man of this stature cannot be from this era. Also they had massive appetites and could live on food they ate once a year for the whole of next year.

However, even with all these stories, Ashwatthama sightings are very rare since he has the power to choose to be visible or remain invisible.

Jai Hind

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन तो भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहती

🙏जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले… तो काल आया और जैसे ही काल आया …
तो गीधराज जटायु ने मौत को ललकार कहा, —

” खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना… मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूँगा… लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकता… जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु ” श्रीराम ” को नहीं सुना देता…!

मौत उन्हें छू नहीं पा रही है… काँप रही है खड़ी हो कर…
मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही… यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला।

किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे… आँखों में आँसू हैं … रो रहे हैं… भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं…!
कितना अलौकिक है यह दृश्य … रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं…
प्रभु ” श्रीराम ” रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं…
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान ” श्रीकृष्ण ” हँस रहे हैं… भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं… ?

अंत समय में जटायु को प्रभु ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली… लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली….!
जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है….

प्रभु ” श्रीराम ” की शरण में….. और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं….
ऐसा अंतर क्यों?…

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था… विरोध नहीं कर पाये थे …!
दुःशासन को ललकार देते… दुर्योधन को ललकार देते… लेकिन द्रौपदी रोती रही… बिलखती रही… चीखती रही… चिल्लाती रही… लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे… नारी की रक्षा नहीं कर पाये…!

उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और ….
जटायु ने नारी का सम्मान किया…
अपने प्राणों की आहुति दे दी… तो मरते समय भगवान ” श्रीराम ” की गोद की शय्या मिली…!

जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं … उनकी गति भीष्म जैसी होती है …
जो अपना परिणाम जानते हुए भी…औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है।

🙏 गलत का विरोध जरूर करना चाहिए। ” सत्य परेशान जरूर होता है, पर पराजित नही ” ।🙏🏻

बलराम की पत्नी रेवती की कहानी : प्राचीनकाल में समय यात्रा का प्रमाणहिन्दू धर्म ग्रन्थों, 

बलराम की पत्नी रेवती की कहानी : प्राचीनकाल में समय यात्रा का प्रमाण
हिन्दू धर्म ग्रन्थों, कथाओं में समय यात्रा कोई नयी बात नहीं है. हजारों सालों से ये कहानियाँ हम सुनते चले आ रहे हैं, जबकि Western world में यह नयी बात है. महाभारत में राजा काकुदमी की कहानी (Raja Kakudami story) इसका प्रमाण है.
प्राचीन काल में भारत के कुसस्थली नामक राज्य (आधुनिक द्वारका, गुजरात) में काकुदमी नामक राजा राज करते थे. राजा की एक अत्यत सुंदर पुत्री थी, जिसका नाम रेवती था. रेवती का जन्म अग्निकुंड की दिव्य अग्नि से हुआ था. रेवती मात्र एक सामान्य सुंदर लड़की न थी, वो शुभलक्षणों युक्त, सदाचारी, शील गुणों से परिपूर्ण प्रतिभावान युवती थी.

जब रेवती विवाह योग्य हुई तो राजा काकुदमी को उसके विवाह की चिंता हुई. अपनी असाधारण कन्या के लिए कोई भी वर उन्हें उपयुक्त न लगता था. अनन्तः राजा काकुदमी ने अपनी कन्या रेवती के साथ ब्रह्मलोक जाने का निश्चय किया. उन्हें आशा थी कि परमपिता ब्रह्मा ही स्वयं रेवती के लिए कोई सुयोग्य वर बता सकते हैं.

जब राजा काकुदमी ब्रह्मलोक पहुंचे तो ब्रह्मा जी की सभा में गन्धर्वो द्वारा नृत्य-संगीत की प्रस्तुति हो रही थी. राजा काकुदमी ने विचार किया कि इस कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद ब्रह्मा जी से वो अपना आशय प्रकट करेंगे.

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद राजा काकुदमी ब्रह्मा जी के समक्ष पहुंचे, उन्हें झुककर प्रणाम किया और उनसे अपने आने का कारण व्यक्त किया. साथ ही राजा काकुदमी ने कुछ सम्भावित वरों की एक सूची भी ब्रह्मदेव को दी.

ब्रह्मा जी उनकी बात और वह सूची देखकर हँसने लगे. ब्रह्देव बोले – हे राजन ! समय की गति अद्भुत होती है. ब्रह्मांड के अलग-अलग स्थानों में समय की गति अलग-अलग होती है. जितनी देर आपने ब्रह्मलोक में प्रतीक्षा की और समय व्यतीत किया, उतने समय में पृथ्वी पर 27 युग बीत चुके हैं. अब ये सूची किसी काम की नहीं क्योंकि ये सभी वर तो पृथ्वी पर वर्षों पूर्व मर चुके हैं.

इसके बाद ब्रह्मदेव बोले – हे राजन ! अब आप पिता-पुत्री ही शेष बचे हो, पृथ्वी पर आपका राजपाट, घर-परिवार, मित्रगण, सेना, धन-सम्पत्ति भी कभी के नष्ट हो चुके हैं. आपको तो अब जल्द ही अपनी कन्या का विवाह करना पड़ेगा नहीं तो कलयुग आने वाला है.

राजा काकुदमी यह सब जानकर दंग रह गये और किंकर्तव्यविमूढ़ से हो गये. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें दिलासा दिया और बताया कि इस समय पृथ्वी पर स्वयं जगतपालन कर्ता भगवान विष्णु कृष्ण और बलराम के रूप में विद्यमान हैं. ब्रह्मदेव ने कहा कि आपकी कन्या रेवती के लिए बलराम जी ही सबसे उपयुक्त वर हैं.

इसके पश्चात राजा काकुदमी कन्या रेवती के साथ पृथ्वी पर आ गये. पृथ्वी पर आकर उन्हें महान आश्चर्य हुआ. उनके अनुसार तो उन्हें आने जाने में केवल कुछ समय ही लगा था लेकिन अब तो पूरी पृथ्वी का स्वरुप ही बदल चुका है.

पृथ्वीलोक का मौसम, वातावरण और बनावट अब पहले जैसे न थी और मनुष्यों के गुणों, आकार और बुद्धि में भी भारी परिवर्तन आ चुका था.

इस विषय में भगवतपुराण में वर्णन है – अब पृथ्वी पर पहले के समान जीव-जन्तु, जानवर और पेड़-पौधे न थे, वर्तमान में तो सभी का आकार पहले से काफी कम हो गया था. मनुष्य भी अब पहले जैसे शक्तिशाली और दीर्घकाया के न थे, साथ ही उनके बुद्धि और आध्यात्मिकता का भी काफी ह्रास हो चुका है.
बलराम और रेवती का विवाह – Balram Revati story in Hindi :
राजा काकुदमी अब बिना देर करते रेवती के साथ बलराम जी से मिलने पहुँचे और उन्हें सब बातों से अवगत कराया. रेवती और बलराम अवश्य ही एक दूसरे के लिए सुयोग्य वर थे, लेकिन एक छोटी सी समस्या थी. रेवती पूर्वयुग में पैदा होने के कारण आकार में बलराम जी से बहुत लम्बी और विशालकाय थीं.
बलराम जी ने इसका भी समाधान निकाल दिया. उन्होंने अपना हल उठाया जोकि उनका प्रमुख अस्त्र है. बलराम जी ने अपने दिव्य हल से राजकुमारी रेवती के सिर और कन्धो को स्पर्श कराया.

क्षण भर में ही रेवती का आकार घटकर बलराम जी के लिए उपयुक्त आकार में हो गया. इसके पश्चात श्री बलराम और रेवती विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ और वो पति-पत्नी सम्बन्ध में बंध गये.

ये पौराणिक कहानी एक आश्चर्यजनक प्रणाम है कि हमारे पूर्वज समयकाल-यात्रा से अनभिज्ञ न थे. ब्रह्मलोक में समय पृथ्वी की अपेक्षा धीमी गति से बढ़ता था. कहा भी गया है कि ब्रह्मा जी का एक दिन और रात 2 कल्प के बराबर होता है. 2 कल्प करीब 8 करोड़ वर्ष के बराबर होता है. कहानी के अनुसार राजा काकुदमी और रेवती ने केवल कुछ क्षण ही व्यतीत किये थे.

आधुनिक विज्ञान में आइंस्टीन के बाद से समय यात्रा के सिद्धांत को काफी बल मिला. आज के वैज्ञानिकों की टाइम ट्रेवल के सम्बन्ध में कई मान्यताएं हैं.

ऐसा कहा जाता है कि अगर आप अन्तरिक्ष में ब्लैकहोल में प्रवेश करके वापस आयें तो उतने समय में पृथ्वी पर कई वर्ष बीत चुके होंगे. Einstein कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अत्यधिक तेजी से ट्रेवल करता है तो वो समय से आगे निकल सकता है.

Astronauts इस तथ्य का सही उदाहरण हैं, वे पृथ्वी से दूर तेजी से घूमते हुए Space Station में काफी समय व्यतीत करते हैं. विज्ञान के अनुसार जब यह Astronauts पृथ्वी पर वापस आते हैं तो उनकी उम्र में कुछ सेकंड का अंतर आ चुका होता है.

ये सब Modern Science की जटिल गणना और Analysis के बाद पता लगा पाया है, जबकि हमारे आदिग्रन्थों में यह कितने सटीक तरीके से Time Travel कहानी के माध्यम से बताई गयी है. कम से कम अब तो हमें अपने महान इतिहास पर गर्व होना ही चाहिए.

सद्गुरु की कृपा,,,,

सद्गुरु की कृपा,,,,

एक बार एक चोर ने गुरु से नाम ले लिया, और बोला गुरु जी चोरी तो मेरा काम है ये तो नहीं छूटेगी मेरे से..
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अब गुरु जी बोले ठीक है मैं तुझे एक दूसरा काम देता हुँ, वो निभा लेना…
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बोले पराई इस्त्री को माता बहन समझना..
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चोर बोला ठीक है जी ये मैं निभा लूंगा।
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एक राजा के कोई संतान नहीं थी तो उसने अपनी रानी को दुहागण कर रखा था
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10-12 साल से बगल मे ही एक घर दे रखा उसमे रहती और साथ ही सिपाहियों को निगरानी रखने के लिए बोल दिया।
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उसी चोर का उस रानी के घर मे चोरी के लिए जाना हुआ.. रानी ने देखा के चोर आया है।
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उधर सिपाहियों ने भी देख लिया के कोई आदमी गया है रानी के पास…
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राजा को बताया राजा बोला मैं छुप-छुप के देखूंगा… अब राजा छुप छुप के देखने लगा।
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रानी बोली चोर को कि तुम किस पे आये हो..
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चोर बोला ऊंट पे..

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रानी बोली की तुम्हारे पास जितने भी ऊंट हैं मैं सबको सोने चांदी से भरवां दूंगी बस मेरी इच्छा पुरी कर दो।
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चोर को अपने गुरु का प्रण याद आ गया.. बोला नहीं जी.. आप तो मेरी माता हो..
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जो पुत्र के लायक वाली इच्छा हो तो बताओ और दूसरी इच्छा मेरे बस की नहीं है।
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राजा ने सोचा वाह चोर होके इतना ईमानदार…
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राजा ने उसको पकड़ लिया और महल ले गया.. बोला मैं तेरी ईमानदारी से खुश हुँ तू वर मांग..
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चोर बोला जी आप दोगे पक्का वादा करो..
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राजा बोला हाँ मांग..
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चोर बोला मेरी मां को जिसको आपने दुहागण कर रखा है उसको फिर से सुहागन कर दो..
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राजा बड़ा खुश हुआ उसने रानी को बुलाया.. और बोला रानी मैंने तुझे भी बड़ा दुख दिया है तू भी मांग ले कुछ भी आज..
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रानी बोली के पक्का वादा करो दोगे और मोहर मार के लिख के दो के जो मांगूंगी वो दोगे।
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राजा ने लिख के मोहर मार दी।
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रानी बोली राजा हमारे कोई औलाद नहीं है इस चोर को ही अपना बेटा मान लो और राजा बना दो।
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अब सतसंगियों गुरु के एक वचन की पालना से राज दिला दिया।
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अगर हमारा विश्वास है तो दुनिया की कोई ताक़त नहीं जो हमें डिगा दे.. सतगुरु के वचनों अनुसार चलते रहे।