मेरे मन का भरम मिटाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
बहा जात था भव धारा में, मल विक्षेप कीचड़ गारा में।
अपने हाथ उठाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
काम, क्रोध मम दुश्मन भारा, तीक्ष्ण तेग ज्ञान की धारा।
देकर वीर बनाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
सगुण रूप में आप संभाला, निर्गुण घट का खोला ताला।
अपने देश बसाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
दिव्य देश के सतगुरु वासी, दीपक दीन्हा स्वयं प्रकाशी।
घट घट आप समाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
समझाई गुरु अकथ कहानी, बिन रसना मन-मोहनि बानी।
बिन स्वर शब्द सुनाया, गुरु कर कमलों की छाया ॥
चेतन देव गुरु हंस हमारे, सभी ओम के काज संवारे।
शरण दास तेरी आया, गुरु कर कमलों की छाया ॥







