पांच मिनट

पांच मिनट

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गंवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है।

इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट।

उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है।

उसने वहां लिख दिया कि उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले।

अगले पेज पर लिखा था कि उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है, तो उसने लिख दिया कि उसका दोस्त चुनाव हार जाए।

इस तरह, वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया।

जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ, अब कुछ नहीं हो सकता।

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत कर दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया।

अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था।

💐💐शिक्षा💐💐
यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचे, और न ही बुरा करें। दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

हमारे कभी न खत्म होने वाले काम

हमारे कभी न खत्म होने वाले काम
🏵️🌼🍥 *******

एक दिन एक व्यक्ति पहाड़ पर घूमने गया जहाँ एक साध्वी ध्यान कर रही थी। उसने उन्हें दंडवत किया और उनसे पूछा “इतनी एकांत जगह पर आप यहां अकेले क्या कर रही हैं?”🌼

साध्वी ने जवाब दिया:- यहां मेरे पास बहुत काम है।”
🍥
“यहां आपके पास काम कैसे हो सकता है?
मुझे यहां आस-पास कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है?”
🏵️
“मुझे दो बाज और दो चील को प्रशिक्षित करना है, दो खरगोशों को सिखाना है, एक साँप को अनुशासित करना है, एक गधे को प्रेरित करना है और एक शेर को वश में करना है।”
🏵️ 🍥
“और, वे कहाँ गए हैं कि मैं,उन्हें देख नहीं पा रहा?”
🏵️
“ये सभी मेरे भीतर हैं।”
*****
बाज हर चीज पर पैनी नजर रखते हैं मेरी दोनों आँखें जो मेरे दोनों बाज हैं, उन्हें सिखाना है कि जो कुछ भी मेरे सामने है, अच्छा या बुरा, उनमें से केवल अच्छी चीजों को देखना है। मेरे दोनों हाथ मेरी दो चील हैं जो अपने पंजों से चोट पहुँचा सकते हैं और विनाश कर सकते हैं, मुझे उन्हें किसी को भी चोट न पहुँचाने के लिए प्रशिक्षित करना है।मेरे दोनों पैर मेरे दो खरगोश हैं। वे स्वेच्छा से भ्रमण करना चाहते हैं और कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते हैं। मुझे उन्हें दुख या ठोकर लगने पर भी शांत रहना सिखाना है।
🏵️
गधा हमेशा थका हुआ, जिद्दी होता है और हर बार चलने पर बोझ नहीं उठाना चाहता। वह मेरा शरीर है। मुझे इससे मेहनती बनना है।मेरी जुबान साँप के समान है। साँप को वश में करना सबसे कठिन है। यद्यपि यह 32 दाँत स्वरूप सलाखों के साथ एक मजबूत पिंजरे में बंद है, फिर भी यह हमेशा किसी को भी डंक मारने, काटने और जहर उगलने को तैयार रहती है। मुझे इसे अनुशासित करना है।मेरे पास एक शेर भी है। ओह, कितना गर्व, व्यर्थ, वह सोचता है कि “वह राजा है।” मुझे उसे वश में करना है। और वह मेरा अहंकार है।
🏵️
मेरे पास कितने काम हैं, जिन्हें खत्म करने
में शायद मेरा जीवन ही लग जाए।
🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️
बहुत फर्क होता है-
किसी को “जानने और समझने में”
जानता वो है “जो साथ होता है”
और समझता वो है “जो पास होता है”।
🏵️

समर्पण का भाव

समर्पण का भाव

एक बार एक बेहद ख़ूबसूरत महिला समुद्र के किनारे रेत पर टहल रही थी।
समुद्र की लहरों के साथ कोई एक बहुत चमकदार पत्थर छोर पर आ गया।
महिला ने वह नायाब सा दिखने वाला पत्थर उठा लिया।
वह पत्थर नहीं असली हीरा था।
महिला ने चुपचाप उसे अपने पर्स में रख लिया।
लेकिन उसके हाव-भाव पर बहुत फ़र्क नहीं पड़ा।
पास में खड़ा एक बूढ़ा व्यक्ति बडे़ ही कौतूहल से यह सब देख रहा था।

अचानक वह अपनी जगह से उठा और उस महिला की ओर बढ़ने लगा।
महिला के पास जाकर उस बूढ़े व्यक्ति ने उसके सामने हाथ फैलाये और बोला :—-
मैंने पिछले चार दिनों से कुछ भी नहीं खाया है।
क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो???
उस महिला ने तुरंत अपना पर्स खोला और कुछ खाने की चीज ढूँढ़ने लगी।
उसने देखा बूढ़े की नज़र उस पत्थर पर है जिसे कुछ समय पहले उसने समुद्र तट पर रेत में पड़ा हुआ पाया था।

महिला को पूरी कहानी समझ में आ गयी।
उसने झट से वह पत्थर निकाला और उस बूढ़े को दे दिया।
बूढ़ा सोचने लगा कि कोई ऐसी क़ीमती चीज़ भला इतनी आसानी से कैसे दे सकता है???
बूढ़े ने गौर से उस पत्थर को देखा वह असली हीरा था
बूढ़ा सोच में पड़ गया।

इतने में औरत पलट कर वापस अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुकी थी।
बूढ़े ने उस औरत से पूछा :— क्या तुम जानती हो कि
यह एक बेशकीमती हीरा है???
महिला ने जवाब देते हुए कहा :—- जी हाँ और मुझे यक़ीन है कि यह हीरा ही है।
लेकिन मेरी खुशी इस हीरे में नहीं है बल्कि मेरे भीतर है।
समुद्र की लहरों की तरह ही दौलत और शोहरत आती जाती रहती है।

अगर अपनी खुशी इनसे जोड़ेंगे तो कभी खुश नहीं रह सकते।बूढ़े व्यक्ति ने हीरा उस महिला को वापस कर दिया और कहा कि यह हीरा तुम रखो और
मुझे इससे कई गुना ज्यादा क़ीमती वह समर्पण का भाव दे दो
जिसकी वजह से तुमने इतनी आसानी से यह हीरा मुझे दे दिया!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

💐💐सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे💐💐

💐💐सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे💐💐

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता।

एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये। पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ? सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।

महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये। मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।

पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है। महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है? सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है। महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

फिर महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी! तुम्हारी आयु कितनी है? सेठ ने कहा-महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी रह न सके और बोले-सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनय की महाराज! झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे? दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ? तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा चरण-शरण ग्रहण करके गुरु धारण किए मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

जब कभी सन्त सज्जन महापुरुषों का मिलाप होता है उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है, वास्तव में वही घड़ी सफल है। शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

ताश के पत्तों का मर्म

ताश के पत्तों का मर्म

हम ताश खेलते है, अपना मनोरंजन करते है। पर शायद कुछ ही लोग जानते होंगे कि ताश का आधार वैज्ञानिक है व साथ साथ ही प्राकृति से भी जुड़ा हुआ है:-

आयताकार मोंटे कागज़ से बने पत्ते चार प्रकार के …..ईंट, पान, चिड़ी, और हुक्म, प्रत्येक 13 पत्तों को मिलाकर कुल 52 पत्ते होते हैं।
पत्ते…. एक्का से दस्सा, गुलाम, रानी एवं राजा ।
1. 52 पत्ते …….52 सप्ताह
2. 4 प्रकार के पत्ते …….4 ऋतु
3. प्रत्येक रंग के 13 पत्ते….प्रत्येक ऋतु में 13 सप्ताह
4. सभी पत्तों का जोड़ ..1 से 13 = 91 × 4 = 364
5. एक जोकर….. 364+1= 365 दिन…1 वर्ष
6. दूसरा जोकर गिने..365 +1=366 दिन..लीप वर्ष
7. 52 पत्तों में 12 चित्र वाले पत्ते – 12 महिने
8. लाल और काला रंग … दिन और रात!

💥 पत्तों का अर्थ

1 दुक्की – पृथ्वी और आकाश
2. तिक्की- ब्रम्हा, विष्णू, महेश
3. चौकी – चार वेद (अथर्व वेद, सामवेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद)
4. पंजी – पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान)
5. छक्की – षड रिपू (काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ)
6. सत्ती- सात सागर
7. अटठी- आठ सिद्धी
8. नव्वा- नौ ग्रह
9. दस्सी- दस इंद्रियां
10. गुलाम- मन की वासना
11. रानी- माया
12. राजा – सबका शासक
13. एक्का- मनुष्य का विवेक

अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

बहुत समय पहले की बात है। नदी के तट पर एक गांव बसा था और उसी के नजदीक एक संत का आश्रम था। एक बार संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे, तभी एक राहगीर वहां आया और संत से पूछने लगा, ‘‘महाराज, मैं परदेस से आया हूं और इस जगह पर नया हूं। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में किस तरह
के लोग रहते हैं?’’

यह सुनकर संत ने उससे कहा, ‘‘भाई, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूंगा। पहले तुम मुझे यह बताओ कि तुम अभी जहां से आए हो, वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?’’

इस पर वह व्यक्ति बोला, ‘‘उनके बारे में क्या कहूं महाराज! वहां तो एक से एक कपटी, दुष्ट और बुरे लोग बसे हुए हैं।’’
तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें इस गांव में भी बिल्कुल उसी तरह के लोग मिलेंगे-कपटी, दुष्ट और बुरे।’’

इतना सुनकर वह राहगीर आगे बढ़ गया। कुछ समय बाद वहां से एक और राहगीर का गुजरना हुआ। वह भी किसी नई जगह पर बसने की इच्छा रखता था। उसने संत से पूछा, ‘‘महात्मन, मुझे यहां की आबोहवा ठीक लगती है। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में कैसे लोग रहते हैं?’’
संत ने उससे भी वही सवाल पूछा, जो उन्होंने पहले राहगीर से पूछा था। इस पर राहगीर ने जवाब दिया, ‘‘महात्मन, मैं जहां से आया हूं, वहां तो बहुत ही सभ्य, सुलझे और नेक दिल इंसान रहते हैं।’’

तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें यहां भी उसी तरह के लोग मिलेंगे। सभ्य, सुलझे हुए और नेकदिल। तुम्हें यहां रहने में कोई परेशानी नहीं होगी।’’ इतना सुनते ही वह राहगीर संत को प्रणाम कर आगे बढ़ गया।

शिष्य यह सब देख रहे थे। राहगीर के जाते ही उन्होंने संत से पूछा, ‘‘गुरुदेव, आपने दोनों राहगीरों को एक ही स्थान के बारे में अलग-अलग बातें क्यों बताईं?’’

इस पर संत ने उनसे कहा, ‘‘वत्स, आमतौर पर हम चीजों को वैसे नहीं देखते, जैसी वे हैं। बल्कि उन्हें हम उसी हिसाब से देखते हैं, जैसे कि हम खुद हैं। हर जगह हर प्रकार के लोग होते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को देखना चाहते हैं। अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमें अच्छे लोग मिलेंगे और बुराई देखना चाहें तो बुरे।’’

यह सुनकर शिष्यों को उनकी बात का मर्म समझ में आ गया और उन्होंने जीवन में सिर्फ अच्छाइयों पर ध्यान केंद्रित करने का निश्चय किया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

श्रद्धा और विश्वास

श्रद्धा और विश्वास

एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।

शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज़ चलता है।

भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।

रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।

खैर करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।”

शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?”

वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।”

सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।”
वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।

शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः ….. ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।

शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो…?”

महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।

शास्त्री जी बोले क्या मतलब ??”

महिला बोली की आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा “भव सागर” तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।”

शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी।

किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।”

“इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूं। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले मां चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

💐💐संगत💐💐

💐💐संगत💐💐

एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी ! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ!
भंवरा भोजन खाने पहुँचा! बाद में भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिये मुझे गोबर खाना पड़ा! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रन दिया कि तुम कल मेरे यहाँ आओ!

अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया! कीड़े ने परागरस पिया! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और बिहारी जी के चरणों में चढा दिया! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुये! चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला! संध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़ दिए! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था! इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र! क्या हाल है? कीड़े ने कहा-भाई! जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी! ये सब अच्छी संगत का फल है!

संगत से गुण ऊपजे, संगत से गुण जाए
लोहा लगा जहाज में , पानी में उतराय!
कोई भी नही जानता कि हम इस जीवन के सफ़र में एक दूसरे से क्यों मिलते है,

सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता हैं,हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

एक राजा के पास एक व्यक्ति एक हीरा लाया और बोला- महाराज! मैं यह हीरा बेचना चाहता हूँ।

एक राजा के पास एक व्यक्ति एक हीरा लाया और बोला- महाराज! मैं यह हीरा बेचना चाहता हूँ।

राजा ने मूल्य पूछा तो वह बोला- श्रीमान! आप जो दे देंगे। बस अन्याय न हो। हीरे का जितना मूल्य उचित हो उतना दे दें।

राजा ने मन्त्रियों और जौहरियों से परामर्श किया, पर हीरे के सही मूल्य का निर्णय न हो सका। किसी ने कहा पाँच हजार तो किसी ने कहा पचास हजार, किसी ने एक लाख कहा तो किसी ने पाँच लाख।

अंत में हार कर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि हमारे पास एक हीरा आया है, जो कोई भी इस हीरे का उचित मूल्य बताएगा उसे हम यथायोग्य पुरस्कार देंगे।

एक संत सेवी लड़के ने यह बात सुनी। वह एक जौहरी का ही पुत्र था और अपने गुरू जी के पास रहता हुआ उनके उपदेश सुनता था। वह राजमहल पहुंचा। उसने हीरे तीन महीने तक परखा और अन्ततः हीरे के गुणों का वर्णन करता हुआ बोला- महाराज! इसका मूल्य सवा करोड़ रुपये है।

राजा ने हीरा लाने वाले को सवा करोड़ रुपये दे दिए और हीरा ले लिया।

पर अब यह प्रश्न यह उत्पन्न हुआ कि इस लड़के को क्या पुरस्कार दिया जाए?
किसी ने कहा पाँच हजार तो किसी ने कहा दस हजार। तीसरे ने कहा कि इतना कुशल लड़का है, इसे बीस हजार रुपये तो देने ही चाहिए।

निर्णय नहीं हुआ तो राजा ने फिर घोषणा कराई कि निर्णय हो कि इस लड़के को क्या पुरस्कार दिया जाए?

इस घोषणा को उस लड़के के गुरू जी ने भी सुना। वे राजमहल आए, बोले- महाराज! मैं बताता हूँ कि इसे क्या पुरस्कार दिया जाए।

इसे कड़कती धूप में खड़ा कर दिया जाए, और जब यह पसीना-पसीना हो जाए तब इसे दस जूते लगाए जाएँ, यही इसका पुरस्कार है।

राजा ने आश्चर्य से कहा- यह कैसा पुरस्कार है?

गुरू जी बोले- यही उचित पुरस्कार है महाराज। भगवान ने इसे इतनी अच्छी बुद्धि दी है। इसने उस आत्मा को, अंदर के असली हीरे को, पहचानने में नहीं, पत्थर को पहचानने में अपना जीवन लगा दिया। ऐसे मनुष्य को यही फल मिलना चाहिए।

अब हम भी स्वयं अपने आप से पूछें कि हम अपना ध्यान, अपनी बुद्धि कहाँ लगा रहे हैं।।🙏🙏

भगवान से मिलना

भगवान से मिलना

एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर भगवान से मिलने की जिद किया करता था। उसे भगवान् के बारे में कुछ भी पता नहीं था, पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो भगवान के साथ बैठकर खाये।

एक दिन उसने एक थैले में 5,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।

चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया। उसने देखा एक नदी के तट पर एक बुजुर्ग माता बैठी हुई हैं, जिनकी आँखों में बहुत ही गजब की चमक थी, प्यार था, किसी की तलाश थी , और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठी उसका रास्ता देख रहीं हों।

वो मासूम बालक बुजुर्ग माता के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।
फिर उसे कुछ याद आया तो उसने अपना रोटी वाला हाथ बूढी माता की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढी माता ने रोटी ले ली, माता के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी खुशी आ गई आँखों में खुशी के आंसू भी थे।

बच्चा माता को देखे जा रहा था , जब माता ने रोटी खाली बच्चे ने एक और रोटी माता को दे दी।
माता अब बहुत खुश थी। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।

जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत लेकर घर की ओर चलने लगा और वो बार- बार पीछे मुड़कर देखता ! तो पाता बुजुर्ग माता उसी की ओर देख रही होती हैं।

बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देखकर जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,
बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो खुशी का कारण पूछा,
तो बच्चे ने बताया!

माँ ! ….आज मैंने भगवान के साथ बैठकर रोटी खाई, आपको पता है माँ उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,, पर माँ भगवान् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,, मैं आज बहुत खुश हूँ माँ….

उधर बुजुर्ग माता भी जब अपने घर पहुँची तो गांव वालों ने देखा माता जी बहुत खुश हैं, तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा ..??

माता जी बोलीं,,,, मैं दो दिन से नदी के तट पर अकेली भूखी बैठी थी,, मुझे पता था भगवान आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।
आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठकर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी ओर देखते थे। जाते समय मुझे गले भी लगाया,, भगवान बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है।
वास्तव में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में ईश्वर के लिए अगाध सच्चा प्रेम था।
और प्रभु ने दोनों को, दोनों के लिये, दोनों में ही ( ईश्वर) खुद को भेज दिया।

जब मन ईश्वर भक्ति में रम जाता है तो, हमें हर एक जीव में वही नजर आता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏