समय रहते अपना घर बना ले

एक निर्धन विद्वान व्यक्ति चलते चलते पड़ोसी राज्य में पहुँचा।
संयोग से उस दिन वहाँ हस्तिपटबंधन समारोह था! *जिसमें एक हाथी की सूंड में माला देकर नगर में घुमाया जाता था। वह जिसके गले में माला डाल देता था उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा बना दिया जाता था।*

वह निर्धन व्यक्ति भी समारोह देखने लगा। हाथी ने उसके ही गले में माला डाल दी।
*सभी ने जयजयकार करते हुए उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा घोषित कर दिया।*

राजपुरोहित ने उसका राजतिलक किया और वहाँ के नियम बताते हुए कहा कि *आपको केवल 5 वर्ष के लिए राजा बनाया जा रहा है। 5 वर्ष पूर्ण होते ही आपको मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नदी में छोड़ दिया जाएगा।*

यदि आप में ताकत होगी तो आप उनका मुकाबला करके नदी के पार वाले गाँव में पहुँच सकते हो। लेकिन *आप को वापिस इस नगर में आने नहीं दिया जाएगा।*

वह निर्धन विद्वान व्यक्ति तो सिहर गया पर उसने सोचा कि *अभी तो 5 वर्ष का समय है। कोई उपाय तो निकल ही जाएगा।*

*उसने 5 वर्ष तक विद्वत्तापूर्वक राज्य किया। राज्य की संचालन प्रक्रिया को पूरे मनोयोग से निभाया और इस प्रकार केवल राज्य पर ही नहीं लोगों के दिलों पर भी राज्य करने लगा। जनता ने ऐसा प्रजावत्सल राजा कभी नहीं देखा था।*

5 वर्ष पूर्ण हुए। नियमानुसार राजा को फिर से हाथी पर बैठाकर जुलूस निकाला गया। लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। नदी के तट पर पहुँच कर राजा हाथी से उतरा। राजपुरोहित ने कहा कि *अब आप नदी पार करके दूसरी ओर जा सकते हैं।*

अश्रुपूरित विदाई समारोह के बीच उसने कहा कि *मैं इस राज्य के नियमों का सम्मान करता हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दें।*

जैसे ही राजा ने नदी की ओर कदम बढाए! लोगों ने अपनी सजल आँखों को ऊपर उठाया तो *वहाँ नज़ारा देखकर वे लोग खुशी से नाचने लगे!*
कारण कि *राजा ने अपने इस पांच साल की अवधि में उनके द्वारा नदी पर इस पार से उस पार तक एक पुल बनवाया था और उस पर राजा शांत भाव से नदी के उस पार वाले सुंदर से गाँव की ओर चले जा रहे थे!*

इस प्रसंग से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि *क्या ऐसा ही कुछ हमारे जीवन साथ भी तो घटित नहीं हो रहा? क्योंकि हमें भी तो बनाने वाले ने एक निश्चित समय के लिए श्वांसो की अनमोल पूंजी देकर इस अमूल्य जीवन की बागडोर सौंपी गई है।*

*नियत समय पूरा होते ही हमें यह राज्य छोड़ कर भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना है जहां से हमें फिर से इस राज्य में आने की आज्ञा नहीं है।*

यदि हमने आत्म ज्ञान का पुल नहीं बनाया तो *हमें भी मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नरकों में डाल दिए जाएगा और हम उनका ग्रास बन जाएंगे।*
अगर हम शांत भाव से भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना चाहते हैं तो *अभी से वह आनंद रुपी पुल बनाने की शुरूआत कर देनी चाहिए क्योंकि आयु काल पूरा होने के बाद तो निश्चित ही जाना है।*

ये सुन्दर पंक्तियाँ हमारे समझने के लिय काफी है कि *हम यहाँ मुसाफिर की तरह ही हैं और जीवन का हर पल हमारे हाथ से निकल रहा है!*

तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

सब कुछ पाया इस जीवन में,
फिर भी इच्छाएं बाकी हैं
दुनिया से हमने क्या पाया,
यह लेखा – जोखा बहुत हुआ,
*इस जग ने हमसे क्या पाया,
बस ये गणनाएं बाकी हैं।*

इस भाग-दौड़ की दुनिया में
हमको इक पल का होश नहीं,
वैसे तो जीवन सुखमय है,
पर फिर भी क्यों संतोष नहीं !

क्या यूं ही जीवन बीतेगा,
क्या यूं ही सांसें बंद होंगी ?
औरों की पीड़ा देख समझ
कब अपनी आंखें नम होंगी ?
मन के अंतर में कहीं छिपे
इस प्रश्न का उत्तर बाकी है।

मेरी खुशियां, मेरे सपने
मेरे बच्चे, मेरे अपने
यह करते – करते शाम हुई
इससे पहले तम छा जाए
इससे पहले कि शाम ढले

कुछ दूर परायी बस्ती में
इक दीप जलाना बाकी है।
तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

*जीवन की सारी दौड़ केवल अतिरिक्त के लिए है! अतिरिक्त पैसा, अतिरिक्त पहचान, अतिरिक्त शोहरत, अतिरिक्त प्रतिष्ठा, यदि यह अतिरिक्त पाने की लालसा ना हो तो जीवन एकदम सरल है!*

*आइए, इस गंभीर प्रसंग पर गहराई से विचार करें!*

*🙏🏿🙏🏼🙏*सुप्रभात *🙏🏽🙏🏻🙏🏾*

*!! समय की कीमत !!*

कल्पना कीजिए कि *आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है! आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते!*

इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि *जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते हैं और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता! यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*

हो सकता है कि *कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद!*

लेकिन इतना तो निश्चित है कि *यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा!*

*ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे?*
जाहिर है *आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे!*

क्योंकि *यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*

क्या आप जानते है कि *ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)”* और *इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते हैं – जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते हैं और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे! यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*
इसलिए देर मत कीजिए *आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इस समय का सदुपयोग कीजिए!*

कोई भी समझदार आदमी *जिस किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा!*

*क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है? हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते हैं?*
*खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता| उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है! बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ!*

इसलिय समझदारी इसी में है कि *बीते हुए कल को भूल जाइए, बीते कल का आज कोई वजूद नहीं! आज आपका है! आज से एक नयी शुरुआत कीजिए! अपने स्वांसों को व्यर्थ मत गंवाइए!*

जिस किसी ने संतों की चेतावनी को नज़रअंदाज किया; उनके लिए सच ही कहा है कि *“जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है!!’’*
कबीर दास जी ने कहते हैं कि –
*कहता हूँ कही जात हूँ, कहूँ बजा के ढोल।*
*स्वांस जो खाली जात है, ये तीन लोक का मोल।।*
इसका लाभ कैसे लिया जा सकता है? यह मार्ग दर्शन भी संतों ने दिया है –
*स्वांस स्वांस सुमिरन करो, वृथा स्वांस मत खोय।*
*ना जाने इस स्वांस का, आवन होय न होय।।*

*🙏🏼🙏🙏🏽सुप्रभात*🙏🏻🙏🏾🙏🏿

उपकार का बदला

उपकार का बदला ,,,,,,,,,,

🌹एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गई और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी।

🌹जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे। भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे। कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था।

🌹लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्रीकृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर है !

🌹प्रभु ने कुम्हार से कहा कि ‘कुम्हार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।

🌹तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया ।

🌹कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गई और कुम्हार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्हार !

🌹तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है क्या ?

🌹कुम्हार ने कह दिया -नहीं मैया, मैंने कन्हैया को नहीं देखा।

🌹श्री कृष्ण ये सब बातें बडे़े से घड़े के नीचे छुप कर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गई।

🌹अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं – ‘कुम्हार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।

🌹कुम्हार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।

🌹भगवान मुस्कुराये और कहा – ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।’ कुम्हार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।

🌹प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।

🌹अब कुम्हार कहता है – ‘बस, प्रभु जी ! एक विनती और है उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।

🌹भगवान बोले -वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?

🌹कुम्हार कहने लगा – ‘प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है।

🌹मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।

🌹भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।

🌹प्रभु बोले -अब तो तुम्हारी सब इच्छाएं पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।

🌹तब कुम्हार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन !

🌹बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे।

🌹बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।

🌹कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया ।

🌹फिर कुम्हार ने बालक श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।

🌹 प्रिय पाठको !!!!..जरा सोच करके देखिये, जो बालक श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं,क्या वे ,,,,,,,,,

🌹 विशेष ==🌹 १. क्या वे एक घड़ा नहीं उठा सकते थे। २. अपनी इच्छा से घड़े से बाहर क्यों नहीं आये और उन्होंने कुम्हार को ही क्यों पुकारा ?
उत्तर == १. गोवर्धन पर्वत को उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा ( परोपकार के भाव के कारन ) करने के लिए उठाया था जबकि यहां ऐसा कोइ भाव व्याप्त नहीं था बल्कि घड़ा कुम्हार का था और दूसरे की चीज़ के प्रयोग या हस्तक्षेप में उसके स्वामी की स्वीकृति आवश्यक होती है !
२. श्री कृष्ण भगवान् विष्णु के अवतार है और उनके अन्तःकरण में व्याप्त देवत्व के कारण यह देवताओं में यह स्वाभाविक होता है की ” उचित एवं अनुचित ” का विचार करे साथ ही उन्होंने ” शिष्टाचारवश” अपने ऊपर उपकार करने वाले से बाहर आने की स्वीकृति लेना ठीक समझा !
( ii ) कहानी में अन्य विशेष सन्दर्भ अपने ध्यान में रखने लायक == कुम्हार ने चरणामृत का पान किया ! सनातन धर्म में यह विश्वास एवं मान्यता है की भगवान् विष्णु के चरणों को छू कर आया जल मोक्ष प्रदान करता है और यह तर्क संगत भी है क्योंकि उसमे तुलसी होती है जिसे मोक्षदायनी कहा गया है !
🌹जय श्री राधे कृष्ण 🌹
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संकल्प पर ध्यान देना जरूरी

संकल्प पर ध्यान देना जरूरी

जैसे एक ही बिजली दो प्रकार से मारती है- एक चिपका कर मारती है तो दूसरी झटका देकर फेंक मारती है।
ऐसे ही एक ही मोह दो प्रकार से मारता है- मोह राग बन कर चिपका कर मारता है तो विमोह द्वेष बन कर फेंक मारता है।

हम कहते हैं कि मोह से कैसे बचें?
रेलगाड़ी की खिड़की से जो दृश्य जगत चलता हुआ दिखाई देता है, हम उस पर विशेष ध्यान न दें तो हमारी वृत्ति कहीं टिकती है? नहीं टिकती। क्यों?
क्योंकि दृश्य आया और गया, हममें किसी दृश्य का कोई संकल्प ही न उठा।*

पर हमने जैसे ही किसी दृश्य पर ध्यान दिया कि संकल्प उठा, वृत्ति उठी, मन दौड़ा और मोहजनित राग या द्वेष हुआ।
ऐसे ही संसार के किसी भी दृश्य पर अगर हम विशेष ध्यान न दें तो संकल्प उठेगा ही नहीं, मोह कैसे होगा?

यदि कोई कहे कि ध्यान बिना दिए काम कैसे चलेगा? ध्यान तो देना ही पड़ता है।

अगर कहीं ध्यान देना अवश्यम्भावी लगे तो उस वस्तु पर ध्यान दो पर उसे अपना मत समझो। जिसे तुम अपना न समझोगे, उससे भी मोह नहीं होगा।

जैसे किसी बैंक कर्मचारी को देखो। वह नोट गिनता है, बड़े ध्यान से एक-एक नोट गिनता है, रोज लाखों रुपए का लेन-देन करता है, पर न लेते हुए सुख मानता है, न देते हुए दुख पाता है। बस लेता है और देता है।

क्योंकि वह उस धन को अपना नहीं मानता। हम भी ऐसा ही अपने जीवन में करें तो सुख दुख कैसे हो? मोह कैसे हो? राग द्वेष कैसे हों?

नाशवान से आगे देखो। अविनाशी की ओर बढ़ो। तब नाशवान से मोह नहीं होगा। इसलिय मन को जोडते वक्त ध्यान जरूर दें।

एक गुरुभक्त अपने सद्गुरु से जब ज्ञान की याचना करता है तो वह भी संकल्प लेता है कि वह अनवरत अपने सदगुरु से जुडा रहेगा! ज्ञान का अभ्यास करेगा! पर ज्यों ही उस संकल्प को भूलता है तो माया के DC करन्ट के झटके झेलने को मजबूर हो जाता है!*

इसलिय संकल्प से सिद्धि पाने का एक ही रास्ता है कि हम अपने त्रिकोण को – जो हम उस ज्ञान और गुरु महाराज जी से जुड़े रहने पर बनाते हैं, उसे बरकरार रखें! उसमें किसी चौथे व्यक्ति, वस्तु का प्रवेश न होने दें! तभी हर पल आनंदित रहा जा सकता है!

कामना युक्त या कामना मुक्त जीवन

कामना का अर्थ है, नासमझी की दौड़ यानी जहां हम खडे हैं, वहां नहीं है आनंद। जहां कोई और खड़ा है, वहां है आनंद। वहां मुझे पहुंचना है।
और मजे की बात यह है कि जहां कोई और खड़ा है, और जहां हमें आनंद मालूम पड़ता है, वह भी कहीं और पहुंचना चाहता है! वह भी वहां होने को राजी नहीं है। उसे भी वहां आनंद नहीं है। उसे भी कहीं और आनंद प्रतीत होता है!

नासमझों के लिय कामना का अर्थ है – आनंद कहीं और है। उस जगह को छोड़कर जहां हम खड़े हैं, और कहीं भी हो सकता है आनंद। उस जगह नहीं है, जहां हम हैं। जहाँ हम हैं, वहां आनंद नहीं है। वह तो कहीं भी हो सकता है पृथ्वी पर; पृथ्वी के बाहर, चांदत्तारों पर; लेकिन वहां नहीं है, जिस जगह को हम घेरे हुए या घेरते हैं। जिस होने की स्थिति में हम हैं, वह जगह आनंदरिक्त है!

कामना से मुक्ति का अर्थ है, हम जहाँ कहीं हो या न हो आनंद, जहां हम हैं, वहां पूरा है; जो हम हैं, वहां पूरा है। संतृप्ति की पराकाष्ठा कामना से मुक्ति है।
जब हम में इंच भर भी कहीं और जाने का मन नहीं होगा , हम केवल अपने आप में ही मगन होना चाहेंगे – उसी समय हम कामना से मुक्त हो जाएंगे।*

कामना के बीज, कामना के अंकुर, कामना के तूफान क्यों उठते हैं? 
क्या इसलिए कि सच में ही आनंद कहीं और है? या इसलिए कि जहां हम खड़े हैं, उस जगह से अपरिचित हैं?

अज्ञानी से पूछिएगा तो वह कहेगा, कामना इसलिए उठती है कि सुख कहीं और है। और अगर खिन तक भी जाना है तो बिना कामना के मार्ग से जाइएगा कैसे? 
लेकिन सदगुरु के सानिध्य पाए ज्ञानी से पूछिएगा तो वह कहेगा कि,  कामना के अंधड़ इसलिए उठते हैं कि जहां आप हैं, जो आप हैं, उसका आपको कोई पता ही नहीं है। 

काश, हम समझने लग जाएँ और हमको पता चल जाए कि हम क्या हैं? तो कामना ऐसे ही तिरोहित हो जाती है, जैसे सुबह सूरज के उगने पर ओस-कण तिरोहित हो जाते हैं।

इसलिय हमें स्वयं को जानने के लिय जरूरी है कि पहले समय के सदगुरु से स्वयं का बोध प्राप्त करें, उस विधि को जानें तब उसका अनवरत अभ्यास करके जहाँ भी है, जैसे भी हैं – कामना मुक्त जीवन, एक आनन्ददायी जीवन जी सकते हैं!
👏👏👏👏👏👏

भिखारी राजा और दयालु युवक : एक प्रेरक कथा

भिखारी राजा और दयालु युवक : एक प्रेरक कथा

 एक बार की बात है प्राचीन भारत  के एक राज्य में एक बहुत नेकदिल राजा राज करता था. उस राजा की कोई संतान न थी जिसे कि वह अपना उत्तराधिकारी बनाता. राजा बूढ़ा होता जा रहा था. वह एक सुयोग्य उत्तराधिकारी चुनना चाहता था ताकि उसका राज्य सुरक्षित रहते हुए समय के साथ और समृद्ध होता रहे. राजा ने पूरे राज्य में मुनादी करवाते हुए उत्तराधिकारी के रूप में योग्य युवाओं को साक्षात्कार के लिए अपने पास आमंत्रित किया. साक्षात्कार के आधार पर ही नए उत्तराधिकारी का चयन किया जाना था. उम्मीदवारों के लिए सिर्फ एक शर्त थी कि उनके दिल में अपने देशवासियों के प्रति अगाध प्रेम होना चाहिए. पूरे राज्य के युवाओं में नया राजा बनने की संभवनाओं को लेकर बेहद उत्साह था. एक सीमांत इलाके के पिछड़े गांव में रहने वाले एक गरीब युवक तक भी यह सूचना पहुंची. वह भी बहुत उत्साहित था. उसने राजा से अपने साक्षात्कार की तैयारियां शुरू कर दी. युवक बहुत दयालू और मेहनती था पर कई वजहों के चलते वह बहुत गरीब था. उसके पास राजा के पास साक्षात्कार के लिए जाने को ठीक-ठाक कपड़े तक न थे.

युवक ने बहुत मेहनत से काम करते हुए थोड़े ज्यादा पैसे कमाए ताकि वह कुछ कपड़े खरीद सके. कपड़ों के साथ उसने खाने-पीने का कुछ जरूरी सामान भी खरीदा ताकि वह राजा के महल तक की लंबी यात्रा पूरी कर सके. नए कपड़े पहनकर और खाने-पीने का सामान एक पोटली में बांधकर युवक ईश्वर का नाम लेकर लंबी यात्रा पर निकल पड़ा. वह कई दिनों तक पैदल चलता रहा और अंतत: महल के बहुत करीब पहुंच गया. महल के करीब ही उसे सड़क के किनारे एक बहुत फटेहाल भिखारी दिखा. वह फटे कपड़ों में ठंड में कांप रहा था. युवक को देखकर भिखारी ने अपने हाथ फैलाए और मदद की याचना की. वह कंपकंपाती आवाज में बोला – मुझे बहुत ठंड लग रही है और मैं बहुत भूखा भी हूं. साहब मेरी कुछ मदद करो!

युवक उसकी इतनी खराब हालत देख पिघल गया. उसने तुरंत अपने नए कपड़े निकालकर भिखारी को दे दिए. उसने अपने पास बची खाने-पीने की चीजें भी उसे दे दी. भिखारी उसके सम्मुख नतमस्तक हो गया. उसने युवक को सुखी जीवन की हजार दुआएं दीं. युवक ने क्योंकि अपने कपड़े भिखारी को दे दिए थे, उसे राजा के सम्मुख साक्षात्कार के लिए जाने में थोड़ी हिचकिचाहट हो रही थी. लेकिन उसने बहुत हिम्मत करके अपने पुराने कपड़ों में ही राजमहल के भीतर जाने का मन बनाया. राजमहल के भीतर प्रवेश करने के बाद राजा के सिपाहियों ने उसे उस हॉल का रास्ता दिखाया जहां सभी युवक राजा से साक्षात्कार के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे. यात्रा की थकान मिटाने के लिए दिए गए थोड़े से वक्त में आराम कर लेने के बाद उसे उस कक्ष में ले जाया गया जहां राजा एक-एक कर सभी युवा उम्मीदवारों से साक्षात्कार कर रहा था. कक्ष में प्रवेश करने के बाद वह राजा का अभिवादन करने के लिए बहुत नीचे तक झुका. लेकिन जब उसने नजर उठाकर राजा के चेहरे की ओर देखा तो वह सकते में आ गया. उसे राजा का चेहरा पहचाना सा लगा. और तब उसे याद आया कि यह चेहरा हूबहू उस भिखारी के चेहरे से मिलता था जिसे उसने अपने नए कपड़े और खाने-पीने की चीजें दी थीं. राजा उसके चेहरे पर हैरानी के भाव देखकर मुस्कराते हुए बोला – हां हां, तुमने ठीक पहचाना. मैं वही भिखारी हूं जिसे तुमने रास्ते में देखा था.

लेकिन आपने खुद को भिखारी के रूप में क्यों बदला. आप तो राजा हैं – युवक ने हैरत भरे भाव से पूछा.

क्योंकि मुझे यह सुनिश्चित करना था कि तुम सचमुच अपने राज्य के लोगों को सच्चा प्रेम करते हो – राजा ने कहा.

मैं जानता था कि अगर मैं तुम्हारे सम्मुख राजा के रूप में आता, तो तुमने मुझे प्रभावित करने के लिए कुछ भी किया होता. लेकिन तब मैं तुम्हारे दिल की सच्चाई नहीं जान पाता कि वह वस्तुत: कैसा है. बदले में किसी भी चीज की अपेक्षा किए बिना जरूरतमंद लोगों के प्रति दिखाई गई उदारता एक महान हृदय की पहचान है. एक भिखारी के प्रति तुम्हारे प्रेम और उदारता को देखकर यह साबित होता है कि तुम वास्तव में सच्चे मन से अपने राज्य के लोगों को चाहते हो और उनके लिए कुछ भी कर सकते हो. इस राज्य को ऐसे ही लीडर की जरूरत है, जो पूरे राज्य के लिए काम करे न कि सिर्फ राज-सिंहासन की चापलूसी करने वालों के लिए. तुमने साबित किया है कि मेरा उत्तराधिकारी बनने के लिए तुम ही सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हो – राजा ने मुस्कराकर युवक की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा.

जीवन में दया और करूणा बुद्धिमत्ता से कहीं बेहतर और जरूरी है. इस बात की समझ ही बुद्धिमत्ता की शुरुआत है. अपने साथी मनुष्यों के प्रति प्रेम और करूणा से भरा हुआ दिल इस संसार के लिए सबसे बड़ा उपहार है .

आखिरी दुआ

“अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता। अस्सी पार कर चुके हैं । अब बस सेवा कीजिये ।” डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला ।

“डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा। साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है ।”

“शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ। बस आप इन्हें खुश रखिये। इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है ।” डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया।

शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था। उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है। माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था। उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे। कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे। बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी। ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो। शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला –

“सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े , हरी चटनी बनाओ । मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ ।”

पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी। वह भी अपने काम में लग गई। कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की। शंकर भी जलेबियाँ ले आया था । वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया । उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला –

“बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ । थोड़ी जलेबी खायेंगे।”पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए। वह अस्फुट आवाज में बोले -“पकौड़े बन रहे हैं क्या ?”

“हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है। अरे सुषमा ! जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ ।”

शंकर ने आवाज लगाईं !”लीजिये बाबू जी एक और।” उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा।

“बस ….अब पूरा हो गया। पेट भर गया । जरा सी जलेबी दे .” पिता बोले । शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया। पिता उसे प्यार से देखते रहे।

“शंकर ! सदा खुश रहो बेटा। मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ .” पिता बोले।

“बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है । आप मेरे तेंदुलकर हो ,” आँखों में आंसू बहने लगे थे।

वह मुस्कुराए और बोले – “तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है। अगला मैच खेलना है। तेरा पोता बनकर आऊंगा , तब खूब खाऊंगा बेटा ।”

पिता उसे देखते रहे . शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी । मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे । आँख भी नहीं झपक रही थी शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई । तभी उसे ख्याल आया , पिता कहा करते थे –

“श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर , जो खिलाना है अभी खिला दे ।”

माँ बाप का सम्मान करें और उन्हें जीते जी खुश रखे।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏

🌿काल का वकील मन एक शातिर ठग🌿

🌿काल का वकील मन एक शातिर ठग🌿

हमारे भीतर ही शांति है और हमारे भीतर ही अशांति है। हमारे भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार का भीड़ भरा ऐसा संसार भी है जिसका राजा काल है और अहंकारी मन उसका वकील है। जब भी हम ध्यान में बैठते हैं तो यह काल का वकील मन हमें बहुत सारे प्रलोभन दिखाकर इसलिए इस भीड़ वाले बाजार में ले जाता है ताकि हम साक्षी भाव से अपने स्वांसों पर ध्यान केन्द्रित न कर सकें और काल की सत्ता में कोई विघ्न न आए। अहंकारी मन तोड़ने का काम करता है। इसलिए इसे काल का शातिर वकील कहते हैं। अभ्यास के समय इस काल के शातिर वकील की फिक्र ही छोड़ दो। तुम धीरे-धीरे तटस्थ और उदासीन हो जाओ। इस अहंकारी वकील को जो करना है, करने दो। उसकी जैसी मौज। अगर उसने ठगना ही तय किया है तो वो अपनी योजना बनाता रहे।

अभ्यास के समय तुम मन की लच्छेदार बातों में तनिक-सी भी दिलचस्पी मत लो वरना वो तुम्हें भी बहका कर अटका देगा। क्योंकि हमें जिससे लड़ना होता है तो उसके पास ही रहना होता है। इस अहंकारी वकील की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी। इससे दोस्ती करें तो फंस जाते हैं और दुश्मनी करें तो फंस जाते हैं। इसलिए इसे पता ही नहीं चलना चाहिए कि दोस्त हैं या दुश्मन। सिर्फ इस ठगने वाले शातिर वकील के तर्क वितर्क में तनिक सी भी दिलचस्पी नहीं लेना है। इस प्रकार के साक्षी भाव के अभ्यास से हम धीरे-धीरे मन के पार हो जाते हैं। ऐसा अभ्यास मन को स्वांसों की मधुर धुन में लीन कर देता है और हृदय के उस स्थान पर ले जाता है जहां काल की पहुंच नहीं होती और न ही इस काल के शातिर वकील मन की अदालत लगती है। वह स्थान समय के पार होता है जहां अविनाशी विराजमान है। तभी शांति का अनुभव हो जाता है और मनुष्य जीवन सफल हो जाता है।

प्रभू का पत्र

मेरे प्रिय…
सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात
करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!!

फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!!

फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे…तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया।

मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो,तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात
ही नहीं की…

एक मौका ऐसा भी आया जब तुम
बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठे रहे,लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया।

दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर-
उधर देख रहे थे,तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दिन का अब भी काफी समय बचा था। मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जायेगी,लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये। जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे। देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे।
तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गये।

मेरा बड़ा मन था कि मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं…

तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ…

तुम्हारी कुछ सुनूं…

तुम्हे कुछ सुनाऊँ।

कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय
ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया।

मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ।

हर रोज़ मैं इस बात का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और
अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे।

पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे आगे रख के चले जाते हो।और मजे की बात तो ये है
कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते
भी नहीं। ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह जाता हूँ।

खैर कोई बात नहीं…हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये!!!

ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुम
में आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम…आस्था और विश्वास ही तो है।

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तुम्हारा ईश्वर…👣

ज़िन्दगी की टेंशन खत्म करने वाली कहानी

ज़िन्दगी की टेंशन खत्म करने वाली कहानी

✍️एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है,

✍️इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था
🌹❤️🌹
✍️एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी!!

✍️होमवर्क का टाइटल था 🌹

👉वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं👈।

✍️इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था •••
🌹
● ✍️मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं

● ✍️मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं

● ✍️मैं सुबह – सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ

● ✍️मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं

✍️बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया

●● ✍️मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है।
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●● ✍️मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं।
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●● ✍️मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं।
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✍️हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया ••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।
इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।
❤️🌹
✍️हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए – नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।