एक प्रसंग जिंदगी का :-

 एक प्रसंग जिंदगी का :-

एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो परमात्मा के साथ खाये।

1 दिन उसने 1 थैले में 5, 6 रोटियां रखीं और परमात्मा को ढूंढने निकल पड़ा।
चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया।

उसने देखा नदी के तट पर 1 बुजुर्ग बूढ़ा बैठा हैं, और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों।

वो 6 साल का मासूम बालक,बुजुर्ग बूढ़े के पास जा कर बैठ गया,।अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।और उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढे की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा,बूढे ने रोटी ले ली,। बूढ़े के झुर्रियों वाले चेहरे पर अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे,,,,

बच्चा बुढ़े को देखे जा रहा था, जब बुढ़े ने रोटी खा ली बच्चे ने एक और रोटी बूढ़े को दी।

बूढ़ा अब बहुत खुश था। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।
जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाज़त ले घर की ओर चलने लगा।

वो बार बार पीछे मुड़ कर देखता , तो पाता बुजुर्ग बूढ़ा उसी की ओर देख रहा था।
बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,बच्चा बहूत खुश था।

माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा, तो बच्चे ने बताया !
माँ,….आज मैंने परमात्मा के सांथ बैठ कर रोटी खाई,आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,,माँ परमात्मा् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,,मैं आज बहुत खुश हूँ माँ

उस तरफ बुजुर्ग बूढ़ा भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा बूढ़ा बहुत खुश हैं,तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा????
बूढ़ा बोलां,,,,मैं 2 दिन से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था,,मुझे पता था परमात्मा आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।

आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे साथ बैठ कर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई,बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया,,परमात्मा बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

✔ एक सीख:- –

इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है। असल में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में परमात्मा के लिए प्यार बहुत सच्चा है। और परमात्मा ने दोनों को,दोनों के लिये, दोनों में ही (परमात्मा) खुद को भेज दिया। *जब मन परमात्मा भक्ति में रम जाता है तो हमे हर एक में वो ही नजर आने लग जाते है।

1978 की हकीकत –

1978 की हकीकत –

एक बार जे. आर. डी. टाटा फ्लाइट मे बैठे थे, उनके बगल मे दिलीप कुमार बैठे थे। दिलीप कुमार से रहा नही गया उन्होंने अपना परिचय दिया ,मैं नामी filmstar हूँ , आपने मेरी film देखी होगी।
JRD Tataने जबाब दिया -‘ नहीं ,कौन दिलीप कुमार ?’
उस वक्त दिलीप कुमार की बेइज्जती हो गई. सभी news paper मे खबर आई थी।

आज देश के अनमोल रत्न , रतन जी टाटा पर पूरे देश को गर्व है।
इनके जीवन की तीन घटनाएं जो मैने पढ़ी है ,आपको बताता हूँ।

1, एकबार अमिताभ इनके बगल की सीट पर फ्लाइट में सफर कर रहे थे।अमिताभ ने पूछा, आप फ़िल्म देखते है,इन्होंने कहा समय नहीं मिलता,अमिताभ ने बताया कि वो फ़िल्म स्टार है।इन्होंने कहा बहुत खुशी हुई आपसे मिलकर।अमिताभ बहुत प्रसन्न थे ।अपना फिल्मस्टार वाला एटीट्यूड दिखा रहे थे।जब एयरपोर्ट पर उतरे तो अमिताभ ने पूछा कि आपने अपना परिचय नहीं दिया तो इन्होंने कहा कि टाटा ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का चेयर मैन हूँ, रतन टाटा नाम है। अमिताभ को काटो तो खून नहीं।
2, दूसरी घटना मुम्बई हमलों के बाद की है।पाकिस्तान से टाटा सूमो का हजारो गाड़ियों का आर्डर था जो मुम्बई हमले के बाद टाटा ने डिलीवरी कैंसिल कर दी व यह कहकर गाड़ियां देने से मना कर दिया कि मैं उस देश को गाड़ियां नहीं दे सकता जो मेरे देश के खिलाफ इन गाड़ियों को इस्तेमाल करे।

3,तीसरी घटना मुम्बई हमले के बाद की है,मुम्बई ताज होटल का मॉडिफिकेशन होना था।पाकिस्तान की एक पार्टी इस काम के लिए इनसे मिलने आई, इन्होंने मिलने से ही मना कर दिया।पार्टी ने दिल्ली जाकर आनन्द शर्मा से सिफारिश करवाई।शर्मा जी ने पार्टी की तारीफ करते हुए कहा कि इन्हें काम दे दीजिए ये अच्छा काम करेंगे। रतन टाटा का जवाब था “you may be shameless, I am not”( आप बेशर्म हो सकते हैं, मैं नहीं!)
प्रधानमंत्री के आग्रह पर वो व्यक्ति दीया
लिए खड़ा है।यही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने कोरोना फण्ड में 1500 करोड़ रुपये दान किये है और कहा है जरूरत पड़ने पर अपनी पूरी सम्पत्ति देश के लिए दे सकता है।
ऐसे देश भक्त महान पुरुष व कर्मयोद्धा को सादर करबद्ध नमन।ये है हमारे देश के असली हीरो। आज के युवा को इन्हें अपना आदर्श मानना चाहिए और इन पर गौरव करना चाहिए,न कि टुच्चे नेताओ को हीरो मानकर उनके आगे पीछे चक्कर लगाना चाहिए।
मेरी नजर में भारत रत्न का हकदार ये असली रत्न,ये कर्मयोद्धा है जिसने भारत की औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व किया और उत्पादों की गुणवत्ता के सदैव मानक स्थापित किये ।
जय हिंद! वंदे मातरम!

दृष्टिकोण

दृष्टिकोण

एक अकेली साध्वी अपनी जीवन यात्रा में सांझ के समय एक गांव में पहुंची। उस गांव में थोड़े-से मकान थे। वह उन मकानों के सामने जाकर- लोगों से कहा कि ‘मुझे इस रात घर में ठहर जाने दें।’

एक अपरिचित स्त्री थी और उस गांव में जो लोग रहते थे, वह उनके धर्म को मानने वाली नहीं थी। लोगों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए।

दूसरा गांव बहुत दूर था। एक तो रात, फिर अकेली। वह उस रात एक खेत में जाकर एक चेरी के दरख्त के नीचे चुपचाप सो गई।

सर्दी थी, और सर्दी की वजह से रात दो बजे उसकी नींद खुल गई। उसने देखा – फूल सब खिल गए हैं और दरख्त पूरा फूलों से लदा है और चांद ऊपर आ गया है। बहुत अदभुत चांदनी है और उसने उस आनंद के क्षण को अनुभव किया।

सुबह वह उस गांव में गई और उन-उन को धन्यवाद दिया, जिन्होंने रात्रि द्वार बंद कर लिए थे। उन्होंने कहा, ‘काहे का धन्यवाद!’

उसने कहा, ‘प्रेमवश, तुम सब ने मुझ पर करुणा और दया करके रात अपने द्वार बंद कर लिए, उसका धन्यवाद।

“मैं एक बहुत अदभुत क्षण को उपलब्ध कर सकी। मैंने चेरी के फूल खिले देखे और मैंने पूरा चांद देखा। मैंने कुछ ऐसा देखा जो मैंने जीवन में नहीं देखा था। और अगर आपने मुझे जगह दे दी होती तो मैं वंचित रह जाती। तब मैं समझी, उसकी करुणा कि परमात्मा ने क्यों मेरे लिए द्वार बंद कर रखे थे।”

यह एक दृष्टिकोण है। आप भी हो सकता था उस रात द्वार से लौटा दिए गए होते तो शायद आप इतने गुस्से में होते आपके मन में उन लोगों के लिए इतनी घृणा और क्रोध होता रात भर कि शायद आपको चेरी में फूल खिलते, दिखाई तो नहीं पड़ते और जब चांद ऊपर आता, तो आपको पता ही नहीं चलता। धन्यवाद तो बहुत दूर था, आप यह सब अनुभव भी नहीं कर पाते।

जीवन में एक और स्थिति भी है – जब हम प्रत्येक चीज के प्रति धन्यवाद से भर जाते हैं।

हमें हमेशा याद रखना है कि हमें सकारात्मक सोच के साथ हर एक के प्रति आभारी रहना चाहिय और यह विशवास होना चाहिय कि *जीवन में जो कुछ होता है वह उस रचयिता की रचना का हिस्सा है!
कहा भी है –
तेरी सत्ता के बिना, हे प्रभु मंगलमूल!
पत्ता तक हिलता नहीं, खिले न कोई फूल!!

🙏🏽🙏🙏🏼सुप्रभात🙏🏿🙏🏾🙏🏻

*एक ऐसा प्रसंग जो हमें बहुत बड़ा सन्देश देता है।*

*एक ऐसा प्रसंग जो हमें बहुत बड़ा सन्देश देता है।*

एक पर्यटक ऐसे शहर मे आया जो शहर उधारी में डूबा हुआ था!

पर्यटक ने *500 रुपए का नोट* होटल रेस्टोरेंट के काउंटर पर रखे और कहा : *मैं जा रहा हूँ आपके होटेल के अंदर कमरा पसंद करने !*
होटल का मालिक फ़ौरन भागा घी वाले के पास और उसको वही *500 रुपए का नोट* देकर घी का हिसाब चुकता कर लिया!
घी वाला भागा दूध वाले के पास और जाकर वही *500 रुपए का नोट* देकर दूध का हिसाब पूरा करा लिया!
दूध वाला भागा गाय वाले के पास और गायवाले को वही *500 रुपए का नोट* देकर दूध का हिसाब पूरा करा दिया!
गाय वाला भागा चारे वाले के पास और चारे के खाते कि उधारी उसी *500 रुपए का नोट* को देकर कटवा आया!
अंत में चारे वाला गया उसी होटल पर- वो वहां कभी कभी उधार में रेस्टोरेंट मे खाना खाता था! उसने भी वही *500 रुपए का नोट* देके अपना हिसाब चुकता किया!

पर्यटक होटल के अन्दर कमरा देखकर वापस आया और यह कहकर अपना *500 रुपए का नोट* वापस ले गया कि *उसे कोई रूम पसंद नहीं आया!*

*न किसी ने कुछ लिया – न किसी ने कुछ दिया! सबका हिसाब चुकता भी हो गया।*

*अब बताओ गड़बड़ कहाँ हुई?*
गड़बड़ कहीं भी नहीं है बल्कि यह हम सभी की गलतफहमी है कि *रुपये हमारे हैं।*

सचमुच हम भूल बैठे कि *खाली हाथ आये थे और एक ना एक दिन खाली हाथ ही इस संसार से जाना है।*

इस बात पर गंभीरता के साथ विचार करें और *जीवन के महत्व को समझकर उसका आनंद लें।*

😄 हमेशा खुश रहे मस्त रहे 😁
*आपका जीवन मंगलमय बना रहे!*

सच्ची सेवा भावना

सच्ची सेवा भावना

एक संत ने एक विश्व-विद्यालय आरंभ किया। इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसका विषय था – “जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।”
निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई। किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों। वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए। आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।
यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे। संत ने सबको शांत कराते हुए बोले, “प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था। आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा। यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया। सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।

*💐💐शिक्षा-💐💐*

*जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।”*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

*🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏*

*एक साधु महाराज का इंटरव्यू*

एक साधु महाराज का न्यूयार्क में बडे पत्रकार इंटरव्यू ले रहे थे।

पत्रकार-
*सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क (contact) और संजोग (connection) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इसे समझा सकते हैं?*

साधु मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग तरीके से उल्टा पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दिया कि *क्या “आप न्यूयॉर्क से हैं?”*

पत्रकार – *जी हां!*

सन्यासी: *”आपके घर मे कौन कौन हैं?”*

पत्रकार को लगा कि साधु महाराज उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे है क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था।

फिर भी पत्रकार बोला : *मेरी “माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं ! सब शादीशुदा हैं!”*

साधू ने चेहरे पर एक मुस्कान के साथ पूछा: *”आप अपने पिता से बात करते हैं?”*

*पत्रकार चेहरे से गुस्से में लगने लगा!*

साधू ने फिर पूछा, *”आपने अपने फादर से last बात कब की?”*

पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : *”शायद एक महीने पहले!”*
.
साधू ने पूछा: *”क्या आप सभी भाई-बहिन अक़्सर मिलते हैं, आप सब आखिर में कब मिले एक परिवार की तरह?*

इस सवाल पर पत्रकार के माथे पर पसीना आ गया और अंदर ही अंदर सोचने लगा कि, *इंटरव्यू मैं इस साधू का ले रहा हूँ या ये साधु मेरा?*
क्योंकि उनकी वार्तालाप से यही लग रहा था कि *साधु महाराज ही पत्रकार का इंटरव्यू ले रहे हैं!*

एक आह के साथ पत्रकार बोला : *”क्रिसमस पर 2 साल पहले हम सभी भाई बहन मिले थे!*”

साधू ने पूछा: *”कितने दिन आप सब साथ में रहे ?”*

पत्रकार अपनी आँखों से निकले
आँसुओं को पोंछते हुये बोला : *”केवल 3 दिन!”*

साधु: *”कितना वक्त आप सभी भाई बहनों ने अपने पिता के बिल्कुल करीब बैठ कर गुजारा?*

पत्रकार हैरान और शर्मिंदा दिखा और एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा…

साधु ने पूछा: *”क्या कभी आपने पिता के साथ नाश्ता, लंच या डिनर लिया?*
*क्या आपने अपने पिता से पूछा के वो कैसे हैं और माता की मृत्यु के बाद उनका वक्त कैसा गुज़र रहा है?*

साधु ने पत्रकार का हाथ पकड़ा और कहा:
*”शर्मिंदा या दुखी मत होना। मुझे खेद है अगर मैंने आपको अनजाने में चोट पहुंचाई हो लेकिन ये ही आपके सवाल का असली जवाब है कि -*
“संपर्क और संजोग” (contact and connection) आप अपने पिता के सिर्फ संपर्क (contact) में हैं पर आपका उनसे कोई “connection” (जुड़ाव ) नहीं है।

इसलिए वास्तविकता यही है कि *you are not connected to him. आप अपने father से संपर्क में तो हैं लेकिन जुड़े नहीं हैं!*

*Connection हमेशा आत्मा से आत्मा का होता है। heart से heart होता है। एक साथ बैठना, भोजन साझा करना और एक दूसरे की देखभाल करना, स्पर्श करना, हाथ मिलाना, आँखों का संपर्क होना, कुछ समय एक साथ बिताना आप अपने पिता, भाई और बहनों के संपर्क (contact) में हैं लेकिन सच्चाई यही है कि *आपका आपस मे कोई जुड़ाव (connection) नहीं है!”*

पत्रकार ने आंखें पोंछी और साधू महाराज से बोला: *”मुझे एक अच्छा और अविस्मरणीय सबक सिखाने के लिए आपका धन्यवाद!”*
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि – *वो साधु महाराज और कोई नहीं “स्वामी विवेकानंद” थे।”*

आज हमारे समाज की भी सच्चाई यही है हम सोसियल मीडिया के माध्यम से सबके हज़ारो संपर्क (contacts) हैं पर हमारा आपस में कोई दिली connection नहीं है, कोई विचार-विमर्श नहीं, हर आदमी अपनी नकली दुनिया में झूठी वाहवाही पाने में खोया हुआ है।

यह इस भारत भूमि का सौभाग्य ही है कि *समय समय पर स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेरित करने के लिए महापुरुषों का पदार्पण होता रहा है!*

आज के तनावपूर्ण माहौल में अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुविख्यात प्रेम आदरणीय *श्री प्रेम रावत जी* पिछले 56 सालों से पूरे संसार में लोगों को ख़ुद से जुड़ने की युक्ति बता रहे हैं!
उनका कहना है कि *आज की विकट परिस्थितियों में भी “शान्ति सम्भव है!”*

इसके लिय वे समझाते हैं कि – *आप सबसे पहले खुद से जुड़े, अपने अंदर की असली ताकत को पहचानें! अपने अंदर का आनन्द कैसे लिया जाय इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से युक्ति बतलाते हैं!*
वे दावे के साथ कहते हैं कि *जब व्यक्ति का खुद से connection होगा, अंदर जाने की विधि का अभ्यास करेगा तो वह आन्तरिक आनंद पाकर अभिभूत होगा, शान्त होगा – तभी पूरे संसार में शान्ति सम्भव हो पायेगी!*
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*आपका जीवन मंगलमय हो!*
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हृदय रूपी मन्दिर में , प्रभु दर्शन

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कि कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता है, तब मेरे पास भागा-भागा आता है और मुझे सिर्फ अपनी परेशानियां बताने लगता है,मेरे पास आकर कभी भी अपने सुख या अपनी संतुष्टि की बात नहीं करता मेरे से कुछ न कुछ मांगने लगता है!

अंतत: भगवान ने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- कि हे देवो, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही शास्वत स्वरूप में रह कर साधना कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट करने शुरू किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि आप किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं”।

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, क्योंकि मनुष्य बाहर की प्रकृति की तरफ को देखता है दूसरों की तरफ को देखता है खुद के हृदय के अंदर कभी झांक कर नहीं देखता इसलिए वह यहाँ आपको कदापि तलाश नहीं करेगा।

करोड़ों में कोई एक जो आपको अपने ह्रदय में तलाश करेगा वह आपसे शिकायत करने लायक नहीं रहेगा क्योंकि उसकी बाहरी इच्छा शक्ति खत्म हो चुकी होगी ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और भगवान हमेशा के लिए मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, पर्वत पहाड़ कंदरा गुफा ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।
परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर ईश्वर को ढूंढने की कोशिश नहीं करता है
इसलिए मनुष्य “हृदय रूपी मन्दिर” में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता और ईश्वर को पाने के चक्कर में दर-दर घूमता है पर अपने ह्रदय के दरवाजे को खोल कर नहीं देख पाता..!!

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सुकरात और आईना

दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।
तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ! सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा। वह कुछ बोला नहीं सिर्फ मुस्कराने लगा।

विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, *”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ शायद तुम सोच रहे हो कि *मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है?”*

शिष्य कुछ नहीं बोला, *उसका सिर शर्म से झुक गया।*

सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया, *“शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ!”*

*“नहीं ”*, शिष्य बोला।

गुरु जी ने कहा, *“मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं।” आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं।*
इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि *अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।*

शिष्य को ये बात बहुत अच्छी लगी परंतु उसने साथ ही साथ एक शंका प्रकट की कि – *”तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए?”*

*“ऐसी बात नही!”* सुकरात समझाते हुए बोले, *”उन्हें भी आईना अवश्य देखना चाहिए!*
इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि *वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें!*
ऐसा ना हो कि *कहीं उनके बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे।*

शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो निशब्द हो गया।

इस प्रसंग का आशय यही है कि *सुन्दरता मन व भावों मेन होनी चाहिय! शरीर की सुन्दरता तात्कालिक है जबकि मन और विचारों की सुन्दरता की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है।*

अपने मन को पवित्र करने का सबसे अच्छा माध्यम ईश्वर की भक्ति में लीन होना बताया गया है। जब भी हम ईश्वर के सानिध्य में जाते हैं तो हमारा मन और तन अपने आप पवित्र होता है और हमारा जीवन आनन्दमय बन जाता है! यहाँ तक कि *हम जीते जी मोक्ष्य और बन्धन की परिकल्पनाओं से मुक्त हो जाते हैं!*

उपनिषद में कहा भी है कि –
*मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।*
*बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः॥*
~ अमृतबिन्दु उपनिषद्
यानी *”मन ही मानव के बंधन और मोक्षका कारण है। इन्द्रिय विषयासक्त मन बंधन का कारण है और विषयोँ से विरक्त मन मुक्ति का कारण है।”*

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उपयुक्त समय

अमावस्या का दिन था। एक व्यक्ति उसी दिन समुद्र-स्नान करने के लिए गया, किन्तु स्नान करने के बजाय वह किनारे बैठा रहा।

किसी ने पूछा, *“स्नान करने आये हो तो किनारे पर ही क्यों बैठे हो ? स्नान कब करोगे ?*

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि *“इसी समय समुद्र अशान्त है। उसमे ऊँची-ऊँची लहरे उठ रही है; जब लहरे बंद होगी और जब उपयुक्त समय आएगा तब मैं स्नान कर लूंगा। ”*

पूछने वाले को हँसी आ गयी । वह बोला, *“भले आदमी ! समुद्र की लहरे क्या कभी रुकने वाली हैं ? ये तो आती रहेंगी । समुद्र-स्नान तो लहरो के थपेड़े सहकर ही करना पड़ता है। नहीं तो स्नान कभी नहीं हो सकता।”*

यह हम सभी की बात है। *हम सोचते है कि ‘सभी प्रकार की अनुकूलताये होगी, तभी अपनी संकल्पना के अनुरूप कोई सत्कर्म करेंगे , किन्तु सभी प्रकार की अनुकुलताये जीवन में किसी को कभी मिलती नहीं। संसार तो समुद्र के समान है*।

जिसमे बाधा रूपी तरंगे तो हमेशा उठती ही रहेगी। एक परेशानी दूर होने पर दूसरी आएगी। जैसे वह व्यक्ति स्नान किए बिना ही रह गया, उसी प्रकार सभी प्रकार की अनुकूलता की राह देखने वाले व्यक्ति से कभी सत्कर्म नहीं हो सकता।

सत्कर्म या किसी और शुभ कार्य के लिए उपयुक्त समय की राह मत देखो। प्रत्येक दिन और प्रत्येक क्षण सत्कर्म के लिए अनुकूल है। ‘कोई परेशानी नहीं रहेगी तब सत्कर्म करूँगा’ – ऐसा सोचना निरी मूर्खता है।

*प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै:*
*प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्या:।*
*विघ्नै: पुन:पुनरपि प्रतिहन्यमाना:*
*प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति ।।*

विघ्न के भय से जो कार्य की शुरुआत ही नहीं करते *वे निम्नकोटि के पुरुष है।*
कार्य का आरम्भ करने के बाद विघ्न आने पर जो रूक जाते है, *वे मध्यम पुरुष है।*
परंतु
कार्य के आरम्भ से ही, बार बार विघ्न आने पर भी जो अपना निश्चित किया कार्य नहीं छोड़ते, *वही उत्तम पुरुष होते है!*

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डिग्रियों की कीमत

रूस के प्रसिद्ध लेखक लियो टॉलस्टॉय को एक बार अपना काम-काज देखने के लिए एक आदमी की ज़रुरत पड़ी।इस बारे में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से भी कह दिया कि यदि उनकी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति हो तो उसे भेजें।

कुछ दिनों बाद एक मित्र ने किसी को उनके पास भेजा। वह काफी पढ़ा लिखा था और उसके पास कई प्रकार के सर्टिफिकेट और डिग्रियां थीं। वह व्यक्ति टॉलस्टॉय से मिला, लेकिन तमाम डिग्रियां होने के बावजूद टॉलस्टॉय ने उसे नौकरी पर नहीं रखा , बल्कि एक अन्य व्यक्ति जिसके पास ऐसी कोई डिग्री नहीं थी उसका चयन कर लिया…. क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूँ ?”

टॉलस्टॉय ने बताया , “मित्र, जिस व्यक्ति का मैंने चयन किया है उसके पास तो अमूल्य प्रमाणपत्र हैं, उसने मेरे कमरे में आने के पूर्व मेरी अनुमति मांगी। दरवाजे पर रखे गए डोरमैट पर जूते साफ करके रूम में प्रवेश किया। उसके कपड़े साधारण, लेकिन साफसुथरे थे। मैंने उससे जो प्रश्न किये उसके उसने बिना घुमाए-फिराए संक्षिप्त उत्तर दिए , और अंत में मुलाकात पूरी होने पर वह मेरी इज़ाज़त लेकर नम्रतापूर्वक वापस चला गया। उसने कोई खुशामद नहीं की, ना किसी की सिफारिस लाया, अधिक पढ़ा-लिखा ना होने के बावजूद उसे अपनी काबिलियत पर विश्वास था, इतने सारे प्रमाणपत्र बहुत कम लोगों के पास होते है।

और तुमने जिसे व्यक्ति को भेजा था उसके पास इनमे से कोई भी प्रमाणपत्र नहीं था , वह सीधा ही कमरे में चला आया, बिना आज्ञा कुर्सी पर बैठ गया , और अपनी काबिलियत की जगह तुमसे जान-पहचान के बारे में बताने लगा….. तुम्ही बताओं, उसकी इन डिग्रियों की क्या कीमत है ?”

मित्र टॉलस्टॉय की बात समझ गया, वह भी असल प्रमाणपत्रों की महत्ता जान चुका था।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*मित्रों,अपने जीवन मे डिग्रियों के साथ साथ अपना आचरण भी उच्च कोटि का रखना चाहिए ताकि डिग्रियों की जगह अपने व्यवहार के कारण अपनी पहचान बना सके।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏