सतगुरु तेरी महिमा कैसे गाऊं ॥
जनम जनम भूला था मैं, सद्मार्ग दिखलाया।
परम दयालु दाता मेरे, किरपा कर अपनाया ॥
हरदम तेरा सुमिरण होवे, बार-बार बलि जाऊं ॥
ऐसा ज्ञान दिया मेरे मालिक, घट में हुआ उजाला।
अनहद की धुन प्यारी-प्यारी, सत्यनाम की माला ॥
अमृत बूंद झरे घट माहीं, पीकर प्यास बुझाऊं ॥
सेवा में जो आनंद मिलता, मुख से कहा न जाये।
दाता तेरी मोहिनी मूरत, हृदय बीच समाये ॥
परमपिता अब जग में आये, जन-जन को बतलाऊं ॥
बड़े भाग्य से सत्संग मिलता, संशय दूर भगाये।
प्रेम सहित जो दिन-दिन सुनता, जीवन सफल बनाये ॥
छोड़ के गोरख धंधे सारे, सत्संग में नित जा







