शरणागति

शरणागति
एक संत एक छोटे से आश्रम का संचालन करते थे।
एक दिन पास के रास्ते से एक राहगीर को रोककर अंदर ले आए और शिष्यों के सामने उससे प्रश्न किया कि यदि तुम्हें सोने की अशर्फियों की थैली रास्ते में पड़ी मिल जाए तो तुम क्या करोगे?

वह आदमी बोला – “तत्क्षण उसके मालिक का पता लगाकर उसे वापस कर दूंगा अन्यथा राजकोष में जमा करा दूंगा।”

संत हंसे और राहगीर को विदा कर शिष्यों से बोले – “यह आदमी मूर्ख है।”

शिष्य बड़े हैरान कि गुरुजी क्या कह रहे हैं? इस आदमी ने ठीक ही तो कहा है तथा सभी को ही यह सिखाया गया है कि ऐसे किसी परायी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए।

थोड़ी देर बाद फिर संत किसी दूसरे को रोककर अंदर ले आए और उससे भी वही प्रश्न दोहरा दिया।

उस दूसरे राहगीर ने उत्तर दिया कि क्या मुझे निरा मूर्ख समझ रखा है, जो स्वर्ण मुद्राएं पड़ी मिलें और मैं लौटाने के लिए मालिक को खोजता फिरूं? तुमने मुझे समझा क्या है?

वह राहगीर जब चला गया तो संत ने कहा – “यह व्यक्ति शैतान है।

शिष्य बड़े हैरान हुए कि पहला मूर्ख और दूसरा शैतान, फिर गुरुजी चाहते क्या हैं?

अबकी बार संत तीसरे राहगीर को अंदर ले आए और वही प्रश्न दोहराया।

राहगीर ने बड़ी सज्जनता से उत्तर दिया- “महाराज! अभी तो कहना बड़ा मुश्किल है।

इस चाण्डाल मन का क्या भरोसा, कब धोखा दे जाए?
एक क्षण की खबर नहीं।

“यदि परमात्मा की कृपा रही और सद्बुद्धि बनी रही तो लौटा दूंगा।”

संत खुश होकर बोले कि –
” यह आदमी सच्चा है। इसने अपनी डोर परमात्मा को सौंप रखी है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा कभी गलत निर्णय नहीं होता।

लेकिन जिनका मन शान्त नहीं है, जो इच्छाओं के पीछे भागते हैं – वह सबकुछ होने के बावजूद भी शान्ति को नहीं पाते।

ज्येष्ठ पांडव – सूर्यपुत्र कर्ण – कर्म, धर्म का भी ज्ञाता – क्या कारण था कि – अपने छोटे भाई अर्जुन से हार गया?

जबकि कर्म और धर्म दोनों में वो अर्जुन से कम नहीं था!

कारण यही था कि अर्जुन ने अपनी घर से निकलने से पहले ही अपनी जीवन रथ की डोरी भगवान श्री कृष्ण के हाथ में दे रखी थी! उसने अक्षणी सेना के बदले केवल कृष्ण को मांगा!

भगवान हमेशा से शरणागत की रक्षा करते हैं!

काल की चेतावनी !!

एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था और वह सोचता था कि मेरी किसी भी क्षण मृत्यु हो सकती है। वह करे तो क्या करे?
एक दिन उसे चतुराई सूझी और उसने काल को ही अपना मित्र बना लिया।

उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र! तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो- किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगे!

काल ने कहा:- ये मृत्यु लोक है। जो आया है उसे मरना ही है। सृष्टि का यह शाश्वत नियम है! इसलिए मैं मजबूर हूं पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा। मुझसे तुम क्या आशा रखते हो, साफ-साफ कहो।

व्यक्ति ने कहा- मित्र! मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं।

काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है – मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा और चिंता मत करो ये चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा। ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो।

वह व्यक्ति बड़ा ही प्रसन्न हुआ। सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया! मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

दिन बीतते गये – आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची! काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र! अब समय पूरा हुआ – मेरे साथ चलिए। मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोडूगा।

उस व्यक्ति के माथे पर बल पड़ गए! भृकुटी तन गयी और कहने लगा – धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर! मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती?” तुमने मुझे वचन दिया था कि आने से पहले पत्र लिखूंगा परंतु तुम तो बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए। मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया।

काल हंसा और बोला “मित्र इतना झूठ तो न बोलो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे – आपने एक भी उत्तर नहीं दिया।

उस व्यक्ति ने चौंककर पूछा, कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है? तो दिखाओ!
काल ने कहा मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं।

मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला! आपके काले सुन्दर बाल, उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। लेकिन आपने मेरे संदेश को अनसुना करके बनावटी रंग लगा कर अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं।

कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा! नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे! आपने दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया।

इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे।

मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बार एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है।

अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग-क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया।

वह व्यक्ति काल के भेजे हुए इन पत्रों के बारे में सुन कर फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा, अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल कभी भी नहीं आया।

काल ने कहा आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर तुमने कर्म किये। अब तुमको यह सब छोडकर चलना होगा!

उस व्यक्ति को जब कोई मार्ग दिखाई नहीं दिया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया।

काल ने हंसकर कहा मित्र! यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है मुझे नहीं।

कल ने समझया कि यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था,अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है। तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद,तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा, मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निर्वस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है।

अंततः काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा। सभी सम्बन्धियों को पुकारा पर कोई उसका साथ नहीं दे सका!

इस प्रकार काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर।

यह कथा हम सबके लिय भी लागू होती हैं! हमारे पास भी वे चार पत्र (अल्टीमेटम) आ रहे हैं या आयेंगे और हम अभी भी गफलत की नीद में उन संदेशों को अन्देखा करते रहते हैं! भूल जाते हैं कि हमको अविनाशी से जितनी जल्दी हो जुड़ जाना चाहिय!
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हमको याद दिलाने के लिय समय के सदगुरु आते हैं! वे हमारे और अविनाशी के बीच ज्ञान का पुल बनाते हैं! हमें समय समय पर आगाह भी करते हैं कि इस पुल पर बने रहना! नीचे भवसागर की नदी में मत कूदना! क्योंकि वे हमें अनन्त के साथ मिला देना चाहते हैं! अजर-अमर बना देना चाहते हैं!
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वास्तव में एक यही कटुसत्य है – जो अटल है – वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर! हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है- समय के गर्भ में छुपा होता है। परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है। समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु परमेश्वर की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए। कम से कम समय के सदगुरु के इशारों को समझना चाहिय!

बहुत ही सौभाग्य की बात है कि आज हमको श्री प्रेम रावत जी के दर्शनों का एक मौका मिलने वाला है! हमें उनके सानिध्य के पलों का बेसब्री से इंतजार है! जो भी आज का सन्देश होगा आपके साथ कल शेयर करेंगे!

जीवन में संतुलन

जीवन में संतुलन

एक कालेज का छात्र था जिसका नाम था – रवि। वह हमेशा बहुत चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था!

इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह क्लास में पढ़ रहा था। उसे गुमसुम बैठे देख कर अध्यापक महोदय उसके पास आये और क्लास के बाद मिलने को कहा।

क्लास खत्म होते ही रवि अध्यापक महोदय के कमरे में पहुंचा।

रवि मैं देखता हूँ कि तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो। इसलिए इसका सीधा असर तुम्हारी पढ़ाई में भी साफ नजर आ रहा है! इसका क्या कारण है ?” अध्यापक महोदय ने पूछा।

रवि बोला, मेरा भूतकाल का जीवन बहुत ही खराब रहा है, मेरी जिन्दगी में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ, और किसी चीज में ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता हूँ।

अध्यापक महोदय ने ध्यान से रवि की बातें सुनी और मन ही मन उसे फिर से सही रास्ते पर लाने का विचार करके *रविवार को घर पर बुलाया।

रवि निश्चित समय पर अध्यापक महोदय के घर पहुँच गया।

रवि क्या तुम नीबू शरबत पीना पसंद करोगे? अध्यापक ने पूछा।

जी। रवि ने झिझकते हुए कहा।

अध्यापक महोदय ने नीम्बू शरबत बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा कम ही रखी।

शरबत का एक घूँट पीते ही रवि ने अजीब सा मुंह बना लिया।

अध्यापक महोदय ने पूछा, क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?

जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है…. रवि अपनी बात कह ही रहा था कि अध्यापक महोदय ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, ओफ़-ओ, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम का नहीं रहा!

ऐसा कह कर अध्यापक महोदय गिलास उठा ही रहे थे कि रवि ने उन्हें रोकते हुए कहा, नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।

बिलकुल ठीक, रवि यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था…. अब इस स्थिति की तुम अपनी जिन्दगी से तुलना करो! शरबत में नमक का ज्यादा होना जिन्दगी में हमारे साथ हुए बुरे अनुभव की तरह है!

और अब इस बात को समझो, शरबत का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते!
इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को भी अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शरबत का स्वाद ठीक कर सकते हैं – उसी तरह पुरानी कड़वाहट और दुखों को मिटाने के लिए जिन्दगी में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।

यदि तुम अपने अतीत का ही रोना रोते रहोगे तो ना तुम्हारा वर्तमान सही होगा और ना ही भविष्य उज्ज्वल हो पाएगा। अध्यापक महोदय ने अपनी बात पूरी की।

रवि को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था! उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का प्रण लिया।

अक्सर बंद होते हुए दरवाजे की तरफ इतनी देर तक देखते रहते हैं कि हमें खुलते हुए अच्छे दरवाजों की भनक तक नहीं लगती और हमारा जीवन दुखों के सागर में ही डूबा रह जाता है!
जरुरी है कि हम अपनी पुरानी गलतियों या फिर तकलीफ़ों को भूलना सीखें और जिंदगी को फिर से नयी दिशा की और मोड़ें।
इसलिए –
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

नदी का घमंड

नदी का घमंड

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही गर्वीले शब्दों में कहा बताओ पानी के प्रचंड वेग से मैं तुम्हारे लिए  क्या बहा कर लाऊं ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूं ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है । उसने कहा, यदि मेरे लिए कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना । समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूं । नदी ने अपने पानी का प्रचंड प्रवाह घास उखाड़ने के लिए लगाया परंतु घास नहीं उखड़ी । नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी के वेग के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती । नदी को सफलता नहीं मिली ।

थकी हारी निराश नदी समुंद्र के पास पहुंची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान, वृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बहाकर ला सकती हूं परंतु घास उखाड़ कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचंड वेग से खास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आई ।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचंड वेग भी नहीं अखाड़ सकता । समुद्र की बात सुनकर नदी का घमंड भी चूर चूर हो गया ।

विनम्रता अर्थात् जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं । नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है । नम्रता में सर्व का सम्मान संचित है । नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है । नम्रता ही बड़प्पन है । दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहिए । संसार को विनम्रता से जीत सकते हैं । ऊंची से ऊंची मंजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिए ।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमंड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता । स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है । जहां विरोध हो जहां प्रतिरोध और बल से काम नहीं चल सकता । विनम्रता से ही समस्याओं का हल संभव है । विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता । जो व्यक्ति अहं कार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वप्रिय बन जाता है ।

परिवार से जुड़े रहे – जोड़ते रहे 🙏💐

अहँकार और विनम्रता

अहँकार और विनम्रता

एक बार नदी ने समुद्र से बड़े ही अहंकारी शब्दों में कहा, बताओ पानी की प्रचंँड वेग से मैं तुम्हारे लिए क्या बहा कर लाऊंँ? तुम चाहो तो मैं पहाड़, मकान, पेड़, पशु, मानव आदि सभी को उखाड़ कर ला सकती हूंँ।

समुद्र समझ गया कि नदी को अहंकार आ गया है। उसने कहा, यदि मेरे लिये कुछ लाना ही चाहती हो तो थोड़ी सी घास उखाड़ कर ले आना।

समुद्र की बात सुनकर नदी ने कहा, बस, इतनी सी बात ! अभी आपकी सेवा में हाजिर कर देती हूंँ।

नदी ने अपने पानी का प्रचन्ड प्रवाह घास उखाड़ने के लिये लगाया परन्तु घास नहीं उखड़ी। नदी ने हार नहीं मानी और बार-बार प्रयास किया पर घास बार-बार पानी बहाव के सामने झुक जाती और उखड़ने से बच जाती। नदी को सफलता नहीं मिली। थकी हारी निराश नदी समुद्र के पास पहुंँची और अपना सिर झुका कर कहने लगी, मैं मकान बृक्ष, पहाड़, पशु, मनुष्य आदि बाहर कर ला सकती हूंँ परन्तु घास उखाड़कर नहीं ला सकी क्योंकि जब भी मैंने प्रचन्ड वेग से घास पर प्रहार किया उसने झुककर अपने आप को बचा लिया और मैं ऊपर से खाली हाथ निकल आयीं।

नदी की बात सुनकर समुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा, जो कठोर होते हैं वह आसानी से उखड़ जाते हैं लेकिन जिसने घास जैसी विनम्रता सीख ली हो उसे प्रचन्ड पानी का वेग भी नहीं उखाड़ सकता।

समुद्र की बात सुनकर नदी का घमन्ड भी चूर-चूर हो गया।

इसलिए ज्ञान मार्ग में विनम्रता अर्थात जिसमें लचीलापन है, जो आसानी से मुड़ जाता है, वह टूटता नहीं। जिसमें नम्रता में जीने की कला है, शौर्य की पराकाष्ठा है – वही आनन्द प्राप्त करता है!
क्योंकि नम्रता में सबका सम्मान संँचित है। नम्रता हर सफल व्यक्ति का गहना है।नम्रता ही बड़प्पन है।

अगर दुनिया में बड़ा होना है तो नम्रता को अपनाना चाहियें। संँसार को विनम्रता से ही जीत सकते हैं। उँची से ऊँची मंँजिल हासिल कर लेने के बाद भी अहंकार से दूर रहकर विनम्र बने रहना चाहिये।

विनम्रता के अभाव में व्यक्ति पद में बड़ा होने पर भी घमन्ड का ऐसा पुतला बनकर रह जाता है जो किसी के भी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता। स्थान कोई भी हो, विनम्र व्यक्ति हर जगह सम्मान हासिल करता है।

जहांँ विरोध हो, जहांँ प्रतिरोध और बल से काम नहीं कर सकता। विनम्रता से ही समस्याओं का हल सम्भव है। विनम्रता के बिना सच्चा स्नेह नहीं पाया जा सकता है। जो व्यक्ति अहंँकार और वाणी की कठोरता से बचकर रहता है वही सर्वोपरि बन जाता है।
गुरु दरबार में भी विनम्रता से ही ज्ञान समझ में आता है।

क्रोध और नियंत्रण

क्रोध और नियंत्रण

एक समय की बात है। एक राजा घने जंगल में भटक गया। कई घंटों के बाद वह प्यास से व्याकुल होने लगा। तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहां एक डाली से टप-टप करती पानी की छोटी-छोटी बूंदें गिर रही थीं… राजा ने पत्तों का दोना बनाकर पानी इकट्ठा किया, राजा जैसे ही पानी पीने लगा।

एक तोता आया और झपट्टा मार दोने को गिरा दिया। राजा ने सोचा पंछी को प्यास लगी होगी इसलिए वह भी पानी पीना चाहता था लेकिन गलती से उसने झपट्टा मारकर पानी को गिरा दिया…

यह सोचकर राजा फिर से खाली दोने को भरने लगा, काफी देर के बाद वह दोना फिर भर गया। राजा ने हर्षचित्त होकर जैसे ही दोने को उठाया तो तोते ने वापस उसे गिरा दिया।

राजा को बहुत तेज गुस्सा आया और उसने चाबुक उठाकर तोते पर वार किया और उसके प्राण निकल गए…

राजा ने सोचा अब मैं शांति से पानी इकट्ठा कर अपनी प्यास बुझा पाऊंगा। यह सोचकर वह डाली के पास वापस पानी इकट्ठा होने वाली जगह पहुंचा तो उसके पांव के नीचे की जमीन खिसक गई…

उस डाली पर एक जहरीला सांप सोया हुआ था और उस सांप के मुंह से लार टपक रही थी। राजा जिसको पानी समझ रहा था वह सांप की जहरीली लार थी… राजा का मन ग्लानि से भर गया। उसने कहा काश मैंने संतों के बताए उत्तम क्षमा मार्ग को धारण कर क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो… मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नहीं जाती..!!

शिक्षा:-

जल्दबाजी और बिना सोचे-विचारे किया काम हमेशा परेशानी और पश्चाताप का कारण बनता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

सम्बन्ध- स्वार्थ के!

सम्बन्ध- स्वार्थ के!
एक बूढ़ा मर रहा था। मरा नहीं था, बस मर ही रहा था।

उसके चार बेटे उसके पास ही खड़े थे।
उनके नाम थे- सोम, मंगल, बुध, वीर। वह चाहता तो सात बेटे था, पर मंहगाई के चलते चार पर ही संतोष कर लिया था।

ये चारों बेटे आपस में अपने पिता की अंतिम यात्रा की तयारी कर रहे थे –

पहला बेटा सोम सलाह देता है कि, भाई! जब पिताजी मर जाएँगे तो उनकी शवयात्रा हम गुप्ता जी की मर्सिडीज़ में निकालेंगे। लोग भी तो देखें कि किसका बाप मरा है।

दूसरे बेटे मंगल ने कहा – भैया! गुप्ता जी कार दे तो देंगे पर सारी उम्र सुनाएँगे कि तुम्हारा बाप मरा था, तो मैंने कार दी थी। मैं अपने दोस्त बंटी की होंडा माँग लाऊँगा। होंडा भी कोई छोटी कार नहीं।

तीसरा बेटा बुध कहने लगा – अरे मंगल भाई! मालूम भी है कि होंडा धुलवाना कितना मंहगा है?
मैंने कल ही अपनी आल्टो ठीक करा ली है, उसी में ले चलेंगे। कार तो कार है, छोटी हो या बड़ी? और सारी जिंदगी पिताजी ने कंजूसी में बिताई है, क्या यह बात लोग नहीं जानते?

इतने में चौथे बेटे वीर ने भी अपनी राय दी कि – देखो भैया! बुरा न मानना। आल्टो में पिताजी की लाश ले तो जाएँगे पर फिर हमेशा उसमें बैठते वहम आया करेगा। श्मशान वालों ने इस काम के लिए एक ठेला बनाया हुआ है। अब कार हो या ठेला, मरने वाला तो मर ही गया, तब क्या फर्क पड़ता है?

जैसा कि शुरुआत में बताया कि अभी बूढ़ा मर रहा था, मरा नहीं था और वह तो अपने बेटों की बातों सब सुन रहा था।
वह बूढा व्यक्ति उठ कर बैठ गया और बोला- मेरी साइकिल कहाँ है? मेरी साइकिल लाओ! वह उठा और साइकिल चलाकर श्मशान घाट पहुँच गया! साइकिल से उतरा! साइकिल खड़ी की, भूमि पर लेटा और मर गया।

यही जगत के संबंधों की सच्चाई है। प्राण छूट जाने पर इस शरीर को कोई नाम ले कर भी नहीं बुलाता, सभी “लाश-लाश” कहते हैं। अभी भी समय है, जीते जी अपने अन्दर बैठे असली भगवान् से अपना संबंध बना लो। यही श्रेयष्कर होगा!
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सुप्रभात और सादर जय सच्चिदानंद
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

chandra grahan 2022

साल का यह अंतिम चंद्र ग्रहण 8 नवंबर 2022 को लगेगा. कार्तिक पूर्णिमा के दिन लगने वाला ये चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा. भारतीय समयानुसार, साल का ये अंतिम चंद्र ग्रहण 8 नवंबर 2022 को शाम 5 बजकर 32 मिनट से शुरू होगा और शाम 6 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा.

मेष राशि- चंद्र ग्रहण के चलते मेष राशि के लोगों की मानसिक चिंता में वृद्धि होगी. इस दौरान आप दैनिक रोजगार को लेकर तनाव में आ सकते हैं. दांपत्य और प्रेम संबंधों में टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है. इस दौरान आपके माता या पिता को कष्ट हो सकता है. 

वृषभ राशि-  भाई -बंधुओं के बीच तनाव हो सकता है. गृह और वाहन सुख को लेकर भी थोड़ा तनाव हो सकता है. इस दौरान आपको सुख में कमी महसूस होगी और नींद की बीमारी बढ़ेगी. आंतरिक शत्रुओं में वृद्धि होगी लेकिन अंत में जीत आपकी ही होगी. 

कर्क राशि- इस दौरान आपका मन अशांत रहेगा. स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं उत्पन्न होंगी. इस दौरान अकारण तनाव बढ़ेगा. अगर आप कोई डिग्री लेने की सोच रहे हैं तो निर्णय लेने में आपका मन हिचकिचाएगा. इस दौरान माता या पिता को लेकर चिंता की स्थिति बन रही है.  

सिंह राशि- सरकारी या उच्चाधिकारी से तनाव की स्थिति बन रही है. मनोबल और स्वास्थ्य में अवरोध की स्थिति बन रही है. पेट और पैर की समस्याओं में बढ़ोतरी होगी. इस दौरान विवाद से बचें और अपनी वाणी पर संयम बरतें.

कन्या राशि- इस दौरान वाणी की तीव्रता में वृद्धि होगी. ऐसे में इस दौरान किसी से भी संभलकर बात करें. आय के साधनों में तनाव की स्थिति बन रही है. इस दौरान माता के स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहे. इसके अलावा सुख में अवरोध की स्थिति पैदा हो सकती है. 

तुला राशि- इस दौरान मानसिक स्वास्थ्य में अवरोध की स्थिति उत्पन्न होगी. माता को किसी कष्ट का सामना करना पड़ सकता है. दांपत्य और प्रेम संबंधों में तनाव की स्थिति उत्पन्न होगी. परिश्रम में भी अवरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. पेट और पैर से जुड़ी समस्याओं के चलते इस दौरान आपका मन अशांत बना रहेगा.

वृश्चिक राशि- मनोबल और स्वास्थ्य को लेकर मन अप्रसन्न रहेगा. इस दौरान आपका मन काफी अशांत रहेगा और आपको हर वक्त ये एहसास होगा कि कुछ हुआ है. इस दौरान आपके खर्चों में वृद्धि होगी. 

धनु राशि- इस दौरान आपका अचानक से क्रोध बढ़ सकता है. ऐसे में जरूरी है कि आप खुद पर नियंत्रण रखें. दांपत्य सुख और प्रेम संबंधों में तनाव की स्थिति भी पैदा हो सकती है. इस दौरान शिक्षा में अवरोध पैदा होगा. माता या पिता को किसी कष्ट का सामना करना पड़ सकता है और संतान को लेकर मन बेचैन बना रहेगा. 

मकर राशि- इस दौरान स्वास्थ्य से संबंधित दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. जीवनसाथी और प्रेम संबंधों को लेकर मन अप्रसन्न रहेगा. आय के साधनों में अवरोध की स्थिति उत्पन्न होगी. संतान को लेकर चिंता लगी रहेगी. माता और पिता के स्वास्थ्य को लेकर भी थोड़ी सी चिंता लगी रहेगी.

मीन राशि- इस दौरान  संतान को लेकर चिंता साथ ही मनोबल में अवरोध उत्पन्न हो सकता है. इस दौरान आपके भाई-बहनों और मित्रों को कष्ट हो सकता है. पराक्रम और सम्मान में अवरोध पैदा होगा. पेट और पेशाब की समस्याओं के कारण तनाव रहेगा. इस दौरान अपनी वाणी पर कंट्रोल रखें.

नज़र का ऑपरेशन संभव है लेकिन नजरिए का नहीं!

एक गांव के एक किनारे के समीप कुछ मजदूर पत्थर के खंभे बना रहे थे। इत्तेफाक से उसी समय उधर से एक साधु गुजरे। पत्थरों से बनते खंभे देखकर उन्होंने उन्होंने एक मजदूर से प्रश्न किया – “यहां क्या बन रहा है?”

झुंझलाकर उस मजदूर ने कहा – “देखते नहीं, पत्थर काट रहा हूं?”

साधु ने कहा- ‘हां, देख तो रहा हूं। लेकिन यहां बनेगा क्या?”

मजदूर झुंझला कर बोला- “मालूम नहीं। यहां पत्थर तोड़ते- तोड़ते जान निकल रही है और इनको यह चिंता है कि यहां क्या बनेगा।”

मजदूर की बात सुनकर साधु महाराज आगे बढ़ गए। आगे एक दूसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी पूछा- “यहां क्या बनेगा?”

मजदूर ने साधु को ऊपर से नीचे निहारते हुए कहा- “देखिए साधु बाबा, यहां कुछ भी बने। चाहे मंदिर बने या जेल, मुझे क्या! मुझे तो दिन भर की मजदूरी के रूप में १०० ₹ मिलते हैं। बस शाम को ₹ मिलें और मेरा काम बने।मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि यहां क्या बन रहा है!”

साधु महाराज आगे बढ़े तो तीसरा मजदूर मिला। साधु ने उससे भी वही प्रश्न किया तो मजदूर ने कहा- “मंदिर। इस गांव में कोई बड़ा मंदिर नहीं है! इस गांव के लोगों को दूसरे गांव में उत्सव मनाने जाना पड़ता था। मैं भी इसी गांव का हूं। ये सारे मजदूर इसी गांव के हैं। मैं एक- एक छैनी चला कर जब पत्थरों को गढ़ता हूं तो छैनी की आवाज में मुझे मधुर संगीत सुनाई पड़ता है। मुझे आनंद की अनुभूति होती है। कुछ दिनों बाद यह मंदिर बन कर तैयार हो जाएगा और यहां धूमधाम से पूजा होगी। मेला लगेगा। कीर्तन होगा। मैं यही सोच कर मस्त रहता हूं। मेरे लिए यह काम, काम नहीं है। मैं हमेशा मंदिर बनाने की मस्ती में रहता हूं। मैं रात को सोता हूं तो मंदिर की कल्पना के साथ और सुबह जगता हूं तो मंदिर के खंभों को तराशने के लिए चल पड़ता हूं। बीच- बीच में जब ज्यादा मस्ती आती है तो भजन गाने लगता हूं। जीवन में इससे ज्यादा काम करने का आनंद कभी नहीं आया।”

साधु ने उसकी बातों को गंभीरता से सुनकर कहा- “यही जीवन का रहस्य है मेरे भाई। बस नजरिया का फर्क है।
कोई काम को बोझ समझ रहा है और पूरा जीवन झुंझलाते और हाय- हाय करते बिता रहा है लेकिन कोई काम को आनंद समझ कर जीवन का लुत्फ ले रहा है।जीवन से सम्बद्ध हर पल के प्रति हमारा नजरिया सकारात्मक होना चाहिए। सकारात्मकता सफलता की जननी है।

अपनी ज़िंदगी में बोई सकारात्मकता की फ़सल हमारे जीवन को तनावमुक्त कर हरा-भरा रखती। बस, अपने नज़रिए को बदलिए जीवन अपने आप बदल जायेगा!*
🙏🙏 सुप्रभात 🙏🏻🙏

रेत का घर

रेत का घर

एक गाँव में नदी के किनारे कुछ बच्चे खेलते हुए रेत के घर बना रहे थे। किसी का पैर किसी के घर को लग जाता और वो बिखर जाता! इस बात पर झगड़ा हो जाता। थोड़ी बहुत बचकानी उम्र वाली मारपीट भी हो जाती। फिर वह बदले की भावना से सामने वाले के घर के ऊपर बैठ जाता और उसे मिटा देता और फिर से अपना घर बनाने में तल्लीन हो जाया करता। यही बच्चो का काम था!

महात्मा बुद्ध चुपचाप एक ओर खड़े ये सारा तमाशा अपने शिष्यों के साथ देख रहे थे।

बच्चे अपने आप में ही मशगूल थे तो किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

इतने में एक स्त्री आकर बच्चो को कहती है – साँझ हो गयी है तुम सब की माताएं तुम्हारा रास्ता देख रही है।
बच्चो ने चौंकते हुए देखा दिन बीत गया है! साँझ हो गयी है और अँधेरा होने को है!

इसके बाद वो अपने ही बनाये घरों पर उछले कूदे सब मटियामेट कर दिया और किसी ने नहीं देखा कि कौन किसका घर तोड़ रहा है। सब बच्चे भागते हुए अपने घरों की और चल दिए!

महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा – तुम मानव जीवन की कल्पना इन बच्चों की इस क्रीडा से कर सकते हो!
क्योंकि
तुम्हारे बनाये शहर, राजधानियां सब ऐसे ही रह जाती है और तुम्हें एक दिन यह सब छोड़कर जाना ही होती है!तुम यहां जिन्दगी की भागदौड में सब भूल जाते हो और खुद से कभी मिल ही नहीं पाते!
जबकि
जाना तो सबका तय ही है!

इसलिए
कभी भी अधिक लम्बा सोचकर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए।
🌸🌸🙏🙏🙏🌸🌸