कर्म और ज्ञान

कर्म और ज्ञान

एक बार एक जंगल में आग लग गई! उसमें दो व्यक्ति फँस गए थे!
उनमें से एक अँधा तथा दूसरा लंगड़ा था! दोनों बहुत डर गए थे। अंधे ने आव देखा न ताव बस दौड़ना शुरू कर दिया!
अंधे को यह भी ख्याल नहीं रहा कि वो आग की तरफ दौड़ रहा था! लंगड़ा उसे आवाज़ देता रहा पर अंधे ने पलटकर जवाब नहीं दिया।
लंगड़ा आग को अपनी तरफ आती तो देख रहा था पर वह भाग नहीं सकता था।
अंत में दोनों आग में जलकर मर गए।

अंधे ने भागने का कर्म किया था पर उसे ज्ञान नहीं था की किस तरफ भागना है।
लंगड़े को ज्ञान था कि किस तरफ भागना है पर वो भागने का कर्म नहीं कर सकता था।

अगर दोनों एक साथ रहते और अँधा, लंगड़े को अपने कंधे पर बिठा कर भागता तो दोनों की जान बच सकती थी।

इस प्रसंग से यही अर्थ निकलता है कि कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है और ज्ञान के बिना कर्म व्यर्थ है!

यदि कोई अपने को ज्ञानी समझता हो तो उसे सतत्त ज्ञान का अभ्यास करना होगा अन्यथा ज्ञान होने के बाद भी खतरा निश्चित है!

पिता की प्रार्थना

पिता की प्रार्थना

एक बार पिता और पुत्र जलमार्ग से यात्रा करते समय रास्ता भटक कर एक टापू पर पहुंच गये। उनकी नौका उन्हें ऐसी जगह ले आई थी जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई।
         
परिस्थितियों से चिंतित होकर पिता ने पुत्र से कहा- “लगता है, हम दोनों का अंतिम समय निकट आ गया है। यहां तो दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है तो क्यों न हम ईश्वर से प्रार्थना करें।”
         
उन्होंने दोनों टापू आपस में बाँट लिए। एक पर पिता और एक पर पुत्र और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा- “हे भगवन! इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें।” ईश्वर ने उसकी प्रार्थना अविलंब सुनी। तत्काल वहां पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। यह देखकर उसके मुख से बरबस ही निकल गया- “ये तो चमत्कार हो गया।”
         
अपनी पहली प्रार्थना पूर्ण होते देखकर उसने पुनः प्रार्थना की-” एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ।” तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ?

उसने ऐसा ही किया और उसने प्रार्थना की-” एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ।”

तत्काल वहां नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा। तभी एक आकाशवाणी ने उसे चोंका दिया- “बेटा! तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ?”

आकाशवाणी सुनकर पुत्र ने कहा- “उनको छोड़ो! प्रार्थना तो उन्होंने भी की होगी लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ?’

पूत्र की बात का आशय समझ कर पुनः आकाशवाणी में कहा गया- “क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ?क्या तुम यह नहीं जानना चाहोगे कि उनकी कौन सी प्रार्थना स्वीकार हुई और कौन सी अस्वीकार?”
         
पुत्र बोला-“हां, मैं अवश्य जानना चाहूंगा।”
         
आकाशवाणी में कहा गया-” तो सुनो!तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की- हे भगवन! मेरा बेटा आपसे जो माँगे, उसे दे देना और इस प्रकार आज तुम्हें जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है।”

         
💐💐शिक्षा💐💐

स्वार्थ की राह पर निकल कर हम अपने सगे-संबंधियों और शुभचिंतकों से दूर हो जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं। और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर पछताना पड़ता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

चूहा और हम।

चूहा और हम।

एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके डेरे पर बहुत दिनों से एक चूहा भी रहता आ रहा था। यह चूहा ऋषि से बहुत प्यार करता था। जब वे तपस्या में मग्न होते तो वह बड़े आनंद से उनके पास बैठा भजन सुनता रहता। यहाँ तक कि वह स्वयं भी ईश्वर की उपासना करने लगा था!

लेकिन कुत्ते-बिल्ली और चील-कौवे आदि से वह सदा डरा-डरा और सहमा हुआ सा रहता।
एक बार ऋषि के मन में उस चूहे के प्रति बहुत दया आ गयी। वे सोचने लगे कि यह बेचारा चूहा हर समय डरा-सा रहता है,क्यों न इसे शेर बना दिया जाए!

ताकि इस बेचारे का डर समाप्त हो जाए और यह बेधड़क होकर हर स्थान पर घूम सके। ऋषि बहुत बड़ी दैवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर उस चूहे को शेर बना दिया और सोचने लगे कि अब यह चूहा किसी भी जानवर से नहीं डरेगा और निर्भय होकर पूरे जंगल में घूम सकेगा!

लेकिन चूहे से शेर बनते ही चूहे की सारी सोच बदल गई! वह सारे वन में बेधड़क घूमता। उससे अब सारे जानवर डरने लगे और प्रणाम करने लगे।

उसकी जय-जयकार होने लगी।
किन्तु ऋषि यह बात जानते थे कि यह मात्र एक चूहा है वास्तव में शेर नहीं है।

अतः ऋषि उससे चूहा समझकर ही व्यवहार करते यह बात चूहे को पसंद नहीं आई कि कोई भी उसे चूहा समझ कर ही व्यवहार करे!

वह सोचने लगा कि ऐसे में तो दूसरे जानवरों पर भी बुरा असर पड़ेगा! लोग उसका जितना मान करते हैं, उससे अधिक घृणा और अनादर करना आरम्भ कर देंगे।

अतः चूहे ने सोचा कि क्यों न मैं इस ऋषि को ही मार डालूं!

फिर न रहेगा बाँस, न बजेगी बांसुरी; यही सोचकर वह ऋषि को मारने के लिए चल पड़ा!

ऋषि ने जैसे ही क्रोध से भरे शेर को अपनी ओर आते देखा तो वे उसके मन की बात समझ गये।उनको शेर पर बड़ा क्रोध आ गया।

अतः उसका घमंड तोड़ने के लिए  ऋषि ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे एक बार फिर चूहा बना दिया!

इस प्रसंग हमें सचेत करता है कि हमको भी कभी भी अपने हितैषी का अहित नहीं करना चाहिए, चाहे हम कितने ही बलशाली क्यों न हो जाए!
हमें उन लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए जिन्होंने हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दिया होता है! इसके अलावा हमें अपने बीते वक्त को भी नहीं भूलना चाहिए!
चूहा यदि अपनी असलियत याद रखता तो उसे फिर से चूहा नहीं बनना पड़ता! बीता हुआ समय हमें घमंड से बाहर निकालता है!
ज्ञान मार्ग में यह अक्सर देखने को मिलता है कि जब व्यक्ति अपने गुरु महाराजी के शरण में जाता है तो उस समय उसकी हालात भी उस चूहे के समान होती है!
जब महाराज जी अपनाते हैं, दया और करुणावश ज्ञान देते हैं, उसका हर प्रकार से डर दूर करके ज्ञान का उपहार देकर उसे सबल करते हैं, सेवा का अवसर भी देते हैं तो कुछ भक्त*ज्ञान अभ्यास से विमुख होकर वह अपनी पूर्व स्थिति को भूलकर उस चूहे की तरह अहंकारी बन जाते हैं और उनके मन में सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता भाव को भी खो देते हैं!
कहावत है कि –
धोबी का कुत्ता, घर का ना घाट का।
वही हाल अहंकारी और संवेदनहीन भक्त का होता है।
इसलिए,
एक अच्छे और सच्चे भक्त को बिना मन बुद्धि लगाए महाराजी की सेवा करना ही उसके लिए अभीष्ट है।

🙏🏻 सुप्रभात🙏

सकारात्मक रवैया !!

सकारात्मक रवैया !!

एक आदमी एक सेठ की दुकान पर नौकरी करता था। वह बेहद ईमानदारी और लगन से अपना काम करता था। उसके काम से सेठ बहुत प्रसन्न था और सेठ द्वारा मिलने वाली तनख्वाह से उस आदमी का गुज़ारा आराम से हो जाता था।

ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे। एक दिन वह आदमी बिना बताए काम पर नहीं आया। उसके न आने से सेठ का काम रूक गया।

तब सेठ ने सोचा कि यह आदमी इतने दिनों से ईमानदारी से काम कर रहा है। मैंने कब से इसकी तन्ख्वाह नहीं बढ़ाई। इतने पैसों में इसका गुज़ारा कैसे होता होगा?

सेठ ने सोचा कि अगर इस आदमी की तन्ख्वाह बढ़ा दी जाए, तो यह और मेहनत और लगन से काम करेगा। उसने उसी महीने से ही उस आदमी की तनख्वाह बढ़ा दी।

उस आदमी को जब एक तारीख को बढ़े हुए पैसे मिले, तो वह हैरान रह गया। लेकिन वह कुछ नहीं बोला और चुपचाप पैसे रख लिये! धीरे-धीरे बात आई गई हो गयी। कुछ महीनों बाद वह आदमी फिर कुछ दिन ग़ैर हाज़िर हो गया।

यह देखकर सेठ को बहुत गुस्सा आया। वह सोचने लगा- कैसा कृतघ्न आदमी है। मैंने इसकी तनख्वाह बढ़ाई, पर न तो इसने धन्यवाद दिया और न ही अपने काम की जिम्मेदारी समझी।

इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ? यह नहीं सुधरेगा! और उसी दिन सेठ ने बढ़ी हुई तनख्वाह वापस लेने का फैसला कर लिया।

अगली 1 तारीख को उस आदमी को फिर से वही पुरानी तनख्वाह दी गयी। लेकिन हैरानी यह कि इस बार भी वह आदमी चुप रहा।

उसने सेठ से ज़रा भी शिकायत नहीं की। यह देख कर सेठ से रहा न गया और वह पूछ बैठा- बड़े अजीब आदमी हो भाई। जब मैंने तुम्हारे ग़ैर-हाज़िर होने के बाद पहले तुम्हारी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तब भी तुम कुछ नहीं बोले। और आज जब मैंने तुम्हारी ग़ैर-हाज़री पर तन्ख्वाह फिर से कम करके दी, तुम फिर भी खामोश रहे। इसकी क्या वजह है?

उस आदमी ने जवाब दिया- जब मैं पहली बार ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था। उस वक्त आपने जब मेरी तन्ख्वाह बढ़ा कर दी, तो मैंने सोचा कि ईश्वर ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेजा है। इसलिए मैं ज्यादा खुश नहीं हुआ!

जिस दिन मैं दोबारा ग़ैर-हाजिर हुआ, उस दिन मेरी माता जी का निधन हो गया था। आपने उसके बाद मेरी तन्ख्वाह कम कर दी, तो मैंने यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्से का अपने साथ ले गयीं! फिर मैं इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ?

यह सुनकर सेठ गदगद हो गया। उसने उस आदमी को गले से लगा लिया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी।

उसके बाद उसने न सिर्फ उस आदमी की तनख्वाह पहले जैसे कर दी, बल्कि उसका और ज्यादा सम्मान करने लगा।

हमारे जीवन में अक्सर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की घटनाएं होती रहती हैं।

जो आदमी एक अच्छी घटना से खुश होकर अनावश्यक उछलता नहीं और नकारात्मक घटनाओं पर अनावश्यक दु:ख नहीं मनाता और हर दशा में अपनी सोच को सकारात्मक बनाए रखते हुए सच्ची लगन और ईमानदारी से कार्य करता रहता है, वही आदमी जीवन में स्थाई सफलता प्राप्त करता है!

🙏🙏🏻 सुप्रभात🙏🏽🙏🏾

अंधविश्वास भरी बातों की तरफ बिल्कुल ध्यान मत दो और सूर्यग्रहण भी जरूर देखो बस सूर्य की तरफ देखते समय आंखों पर काला चश्मा या कुछ और जरूर लगा लें क्योंकि सूर्य की रोशनी आपकी आंखों पर प्रभाव डाल सकती है

एक राजा बड़ा सनकी था।

एक बार सूर्यग्रहण हुआ तो उसने राजपंडितों से पूछा, ‘‘सूर्यग्रहण क्यों होता है?’’

पंडित बोले, ‘‘राहू के सूर्य को ग्रसने से।’’

राहू क्यों और कैसे ग्रसता है? बाद में सूर्य कैसे छूटता है?’’

पंडितों ने एक से बढ़कर एक कथा सुनाई, किसी ने क्या, किसी ने क्या बताया, सुझाया।

जब उसे इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले तो उसने आदेश दिया,

‘‘हम खुद सूर्य तक पहुंचकर सच्चाई पता करेंगे। एक हजार घोड़े और घुड़सवार तैयार किए जाएं।’’

राजा की इस बात का विरोध कौन करे? उसका वफादार मंत्री भी चिंतित हुआ। मंत्री का एक बेटा था वह छोटी उम्र में ही बड़ा होशियार था, विज्ञान और बुद्धि का बेहतरीन इस्तेमाल करता था।

जब बेटे को पिता की चिंता का कारण पता चला तो उसने कहा, ‘‘पिता जी! मैं भी आपके साथ यात्रा पर चलूंगा।’’

पिता, ‘‘बेटा! राजा की आज्ञा नहीं है। तू अभी छोटा है।’’

“नहीं पिता जी! पुरुषार्थ एवं विवेक उम्र के मोहताज नहीं होते है। मैं राजा को आने वाली विपदा से बचाकर ऐसी सीख दूंगा जिससे वह दोबारा कभी ऐसी आज्ञा नहीं देगा।”*

मंत्री, ‘‘अच्छा ठीक है पर जब सभी आगे निकल जाएं, तब तू धीरे से पीछे-पीछे आना।’’

राजा को यही ज्ञान था कि सूर्य तक पहुंचा जा सकता है लेकिन राजा सैनिकों के साथ निकल तो पड़ा पर चलते-चलते काफिला एक घने जंगल में फंस गया। तीन दिन बीत गए। भूखे-प्यासे सैनिकों और राजा को अब मौत सामने दिखने लगी। हताश होकर राजा ने कहा, ‘‘सौ गुनाह माफ हैं, किसी के पास कोई उपाय हो तो बताओ।’’

मंत्री, *‘‘महाराज! इस काफिले में मेरा बेटा भी है। उसके पास इस समस्या का हल है। आपकी आज्ञा हो तो…’’

‘‘हां-हां, तुरंत बुलाओ उसे।’’

राजा मंत्री का बेटा हाजिर होकर बोला, ‘‘महाराज! मुझे पहले से पता था कि हम लोग रास्ता भटक जाएंगे क्योंकि आपने राजपण्डितों के चक्कर मे आकर गलत निर्णय लिया। आपके जानने, समझने के स्रोत पूर्णतः गलत थे इसीलिए सबसे पहले हम घर कैसे पहुंचे उसके लिए मैं अपनी प्रिय घोड़ी को साथ लाया हूं। इसका दूध-पीता बच्चा घर पर है। जैसे ही मैं इसे लगाम से मुक्त करूंगा, वैसे ही यह सीधे अपने बच्चे से मिलने के लिए भागेगी और हमें रास्ता मिल जाएगा।’’

ऐसा ही हुआ और सब लोग सकुशल राज्य में पहुंच गए।

राजा ने पूछा, बेटे! तुमको कैसे पता था कि हम राह भटक जाएंगे और घोड़ी को रास्ता पता है? यह युक्ति तुम्हें कैसे सूझी?’’*

‘‘राजन! सूर्य हमसे करोड़ों कोस दूर है और कोई भी रास्ता सूरज तक नहीं जाता। तमाम गप्पें केवल मनुष्यों को मूर्ख बनाने के लिए गढ़ी गई हैं। एक समय हमारे पास सच तक पहुंचने के साधन नहीं थे तब यह सत्य लगते थे लेकिन आज सत्य सामने हैं और सत्य को ठुकरा कर असत्य को सत्य मान बैठे हैं अत: कहीं न कहीं फंसना स्वाभाविक था।’’

दूसरा, ‘‘पशुओं की भी अपनी योग्यता है कि वे कैसी भी अनजान राह में हों उन्हें अपने घर का रास्ता ज्ञात होता है। उनका मस्तिष्क याददाश्त के मामले में हमसे कहीं बेहतर होता है।

तीसरा, ‘‘समस्या बाहर होती है, समाधान भीतर होता है। जहां बड़ी-बड़ी शास्त्र व लोग काम करना बंद करते हैं वहां विज्ञान व सच्चा गुरु ज्ञान ही मनुष्य का उद्धार कर सकते हैं। आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं?’’

‘‘नि:संकोच कहो।’’

‘‘यदि आप अपने जानने, समझने के स्रोत को ठीक कर दो तो आने वाली पीढ़ी तर्कशील और प्रगतिशील बनेंगी अन्यथा जिंदगी भर, पीढ़ी दर पीढ़ी झूठ के सहारे जीती रहेगी। जागृति से प्रजा भी उन्नत होगी, जिससे राज्य में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ेगी।’’

राजा उसकी बातों से बहुत प्रभावित हुआ, बोला, ‘‘मैं तुम्हें एक हजार स्वर्ण मोहरें पुरस्कार में देता हूं और आज से अपना सलाहकार मंत्री नियुक्त करता हूं। अब भी अपने राज्य में उन्नत शिक्षा को जीवन में लाऊंगा।’’

इस घटना से आपको आज 21 जून को लगने वाले सूर्यग्रहण के विषय मे समझना होगा। 21 जून यानी उत्तरी ध्रुव में सबसे बड़ा दिन। आज ही इस साल का सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण भी लग रहा है सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण एक सामान्य सी (नेचुरल) घटना है जो सौरमंडल बनने के बाद अब तक लगातार जारी है।

यह तो आजकल स्कूल की पांचवी कक्षा की किताबों में ही बता दिया जाता है कि जब सूर्य और धरती के बीच चंद्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है।

शुरू में मनुष्य इन आकाशीय घटनाओं को लेकर आशंकित रहा होगा क्योंकि उनके बारे में इसे कोई ज्ञान नहीं था. लेकिन विज्ञान और टेक्नोलॉजी की तरक्की के साथ इन आकाशीय घटनाओं के बारे में मनुष्य के विचार में बदलाव आता गया और इस प्रकार उनका इन घटनाओं से डरने की भावना धीरे-धीरे समाप्त होती गई।

इसके विपरीत भारत में इन आकाशीय घटनाओं से लोगों में अभी भी डर व्याप्त है। लोगों में डर फैलाने की अहम भूमिका ज्योतिषी निभा रहे हैं क्योंकि यह घटनाएं उनको मोटी कमाई करने का अवसर प्रदान करती हैं।

यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे समाज में लोग अभी भी अंधविश्वास से ग्रस्त हैं, ऐसे तो यह अंधविश्वास और भी बहुत से देशों में है, लेकिन भारत में कुछ ज्यादा ही है। कल सुबह से ही बहुत सारे ज्योतिष शास्त्री या हमारे न्यूज़ चैनल या दूसरे धार्मिक चैनल एडवाइजरी देने शुरू कर देंगे कि हमें कब क्या करना है, कब खाना खाना है, कब पानी पीना है, कब पानी भरना है, और कब खाना बनाना है, किस पर ग्रहण का क्या प्रभाव पड़ेगा।

गर्भवती महिलाओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इससे बचने के लिए हमें कौन से दान करने हैं, कैसा पूजा पाठ करना है, ग्रहण समाप्त होने तक बस यह सब ड्रामा चलता रहेगा और हमारी मूर्ख जनता भी इन बातों को को सच मानकर इन बातों का अनुसरण करती रहेगी, बहुत सारे लोग तो शायद ग्रहण समाप्त होने तक नहीं खाना बनाएंगे और ना ही खाएंगे कुछ तो शायद पानी भी नहीं पिएंगे।

इसलिए इन अंधविश्वास भरी बातों की तरफ बिल्कुल ध्यान मत दो और सूर्यग्रहण भी जरूर देखो बस सूर्य की तरफ देखते समय आंखों पर काला चश्मा या कुछ और जरूर लगा लें क्योंकि सूर्य की रोशनी आपकी आंखों पर प्रभाव डाल सकती है वह चाहे आप सूर्य ग्रहण के समय देखो या बिना सूर्य ग्रहण के समय बाकि यह सब खगोलीय घटनाएं हैं जिनका किसी होनी-अनहोनी से कोई लेना देना नहीं होता है, न राहु-केतु जैसा कोई ग्रह है, न पूजा, पाठ, दान, दक्षिणा से इसमें ककी फर्क पड़ने वाला है। कभी इन ढोंग फैलाने वाले चैनल्स को छोड़कर डिस्कवरी या अन्य साइंस फिक्शन चैनल्स व प्रोग्राम जरूर देखिये तथा जाग्रत एवं उन्नत बनिये। धन्यबाद।

सूर्य ग्रहण 25th October 2022, evening

गिलहरी

गिलहरी

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी!

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी।

क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था !

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ!
वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा!

गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा! एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया!

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब ये अखरोट मेरे किस काम के?

पूरी जिन्दगी काम करते – करते दाँत तो घिस गये – इन्हें खाऊँगी कैसे!

यह कहानी आज हम सभी के जीवन की हकीकत बन चुकी है!

क्योंकि हर इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !

60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है या बैंक बैलेंस होता है तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है!

तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है!

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा कि आपने इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये अपनी कितनी इच्छायें मारी होंगी? आपको कितनी तकलीफें मिली होंगी? आपके कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके!

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके !

इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो,
मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो
भजन करो मस्त जवानी में बुढ़ापा किसने देख्या है।
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आपका दिन मंगलमय हो!

समय की कीमत

!! समय की कीमत !!

कल्पना कीजिए कि आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है| आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते| इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते है और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता | यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| हो सकता है कि कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद| लेकिन इतना तो निश्चित है कि यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा|

ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे ? जाहिर है आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे क्योंकि यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है| क्या आप जानते है कि ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)” और इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते है जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है| हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते है और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे| यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है इसलिए देर मत कीजिए आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इसलिए समय का सदुपयोग कीजिए|

अगर किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा | क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है| हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते है| खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता| उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है| बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ|

बीते हुए कल को भूल जाइए, उसका आज कोई वजूद नहीं| आज आपका है, आज एक नयी शुरुआत कीजिए| “जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है..!!’

निमित्तमात्र

निमित्तमात्र

उस दिन सबेरे 6 बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला, मैं रेलवे स्टेशन पहुचा , पर देरी से पहुचने कारण मेरी ट्रेन निकल चुकी थी, मेरे पास 9.30 की ट्रेन के आलावा कोई चारा नही था

मैंने सोचा कही नाश्ता कर लिया जाए, बहुत जोर की भूख लगी थी मैं होटल की ओर जा रहा था।

अचानक रास्ते में मेरी नजर फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी, दोनों लगभग 10-12 साल के रहे होंगे बच्चों की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। कमजोरी के कारण अस्थिपिंजर साफ दिखाई दे रहे थे, वे भूखे लग रहे थे।

छोटा बच्चा बड़े को खाने के बारे में कह रहा था, बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था, मैं अचानक रुक गया दौड़ती भागती जिंदगी में यह ठहर से गये।

जीवन को देख मेरा मन भर आया l

सोचा इन्हें कुछ पैसे दे दिए जाए, मैंने उन्हें 10 रु दे कर आगे बढ़ गया। तुरंत मेरे मन में एक विचार आया कितना कंजूस हु मैं, 10 रु क्या मिलेगा, चाय तक ढंग से न मिलेगी, स्वयं पर शर्म आयी फिर वापस लौटा।

मैंने बच्चों से कहा: कुछ खाओगे ?

बच्चे थोड़े असमंजस में पड़े मैंने कहा बेटा मैं नाश्ता करने जा रहा हु, तुम भी कर लो, वे दोनों भूख के कारण तैयार हो गए।

उनके कपड़े गंदे होने से होटल वाले ने डाट दिया और भगाने लगा, मैंने कहा भाई साहब उन्हें जो खाना है वो उन्हें दो पैसे मैं दूंगा।
होटल वाले ने आश्चर्य🤔🤔 से मेरी ओर देखा..

उसकी आँखों में उसके बर्ताव के लिए शर्म साफ दिखाई दी। बच्चों ने नाश्ता मिठाई व् लस्सी मांगी। सेल्फ सर्विस के कारण मैंने नाश्ता बच्चों को लेकर दिया बच्चे जब खाने लगे, उनके चेहरे की ख़ुशी😊😊 कुछ निराली ही थी।

मैंने बच्चों को कहा बेटा अब जो मैंने तुम्हे पैसे दिए है उसमे 1 रु का शैम्पू ले कर हैण्ड पम्प के पास नहा लेना।

और फिर दोपहर शाम का खाना पास के मन्दिर में चलने वाले लंगर में खा लेना, और मैं नाश्ते के पैसे दे कर फिर अपनी दौड़ती दिनचर्या की ओर बढ़ निकला।

वहा आसपास के लोग बड़े सम्मान के साथ देख रहे थे होटल वाले के शब्द आदर मे परिवर्तित हो चुके थे।

मैं स्टेशन की ओर निकला, थोडा मन भारी लग रहा था मन थोडा उनके बारे में सोच कर दुखी हो रहा था।

रास्ते में मंदिर आया मैंने मंदिर की ओर देखा और कहा हे भगवान ! आप कहा हो ? इन बच्चों की ये हालत ये भूख, आप कैसे चुप बैठ सकते है।

दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया, पुत्र अभी तक जो उन्हें नाश्ता दे रहा था वो कौन था?
क्या तुम्हें लगता है तुमने वह सब अपनी सोच से किया।
मैं स्तब्ध हो गया, मेरे सारे प्रश्न समाप्त हो गए
ऐसा लगा जैसे मैंने ईश्वर से बात की हो।
मुझे समझ आ चुका था हम निमित्त मात्र है उसके कार्य कलाप के वो महान है।

शिक्षा:-भगवान हमे किसी की मदद करने तब ही भेजता है जब वह हमे उस काम के लायक समझता है, किसी मदद को मना करना वैसा ही है जैसे भगवान के काम को मना करना।

जय श्रीराम

शुभरात्रि

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

प्राथमिकता मुख्य उत्तरदायित्व को दें!

जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी वो एकांत जगह की तलाश में घूम रही थी कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिये वहां पहुँचते ही उसे प्रसव पीडा शुरू हो गयी।

उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कडकने लगी।

उसने बायें देखा तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था।
घबराकर वह दाहिने मुड़ी तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था।
सामने सूखी घास आग पकड चुकी थी और पीछे मुड़ी तो नदी में जल बहुत था।

मादा हिरनी करती तो क्या ही करती?

वह प्रसव पीडा से व्याकुल थी।
अब क्या होगा?
क्या हिरनी जीवित बचेगी?
क्या वो अपने शावक को जन्म दे पायेगी?
क्या शावक जीवित रहेगा?
क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी?
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पायेगी?
क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी?
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है।
क्या करेगी वो?

हिरनी ने अपने आप को शून्य में छोड़ अपने प्राथमिक उत्तरदायित्व अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी।

कुदरत का करिश्मा देखिये –
बिजली चमकी
और तीर छोडते हुए
शिकारी की आँखे चौंधिया गयी
उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते
शेर की आँख में जा लगा!
शेर दहाडता हुआ इधर उधर भागने लगा
और
शिकारी
शेर को घायल ज़ानकर
भाग गया!
घनघोर बारिश शुरू हो गयी
और
जंगल की आग
बुझ गयी!
इस प्रकार
हिरनी ने शावक को जन्म दिया।
किसी ने सही कहा है कि –
जाको राखे साइयां, मार सके न कोय!
बाल न बांका करि सके जो जग बैरी होय!!

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते हैं-
जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं!
और
कोई निर्णय नहीं ले पाते!
तो
तब समर्पण भाव से
सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर
अपने उत्तरदायित्व व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
अन्तत:
यश- अपयश, लाभ-हानी, हार-जीत, जीवन-मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है।

हमें उस परम शक्ति पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

सर्व निंदक महाराज

सर्व निंदक महाराज

एक थे सर्वनिंदक महाराज। काम-धाम कुछ आता नहीं था पर निंदा गजब की किया करते थे। हमेशा औरों के काम में टाँग फँसाते थे।

अगर कोई व्यक्ति मेहनत करके सुस्ताने भी बैठता तो कहते, ‘मूर्ख एक नम्बर का कामचोर है। अगर कोई काम करते हुए मिलता तो कहते, ‘मूर्ख जिंदगी भर काम करते हुए मर जायेगा।’

कोई पूजा-पाठ में रुचि दिखाता तो कहते, ‘पूजा के नाम पर देह चुरा रहा है। ये पूजा के नाम पर मस्ती करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।’ अगर कोई व्यक्ति पूजा-पाठ नहीं करता तो कहते, ‘मूर्ख नास्तिक है! भगवान से कोई मतलब ही नहीं है। मरने के बाद पक्का नर्क में जायेगा।’

माने निंदा के इतने पक्के खिलाड़ी बन गये कि आखिरकार नारदजी ने अपने स्वभाव अनुसार.. विष्णु जी के पास इसकी खबर पहुँचा ही दिया। विष्णु जी ने कहा ‘उन्हें विष्णु लोक में भोजन पर आमंत्रित कीजिए।’

नारद तुरंत भगवान का न्योता लेकर सर्वनिंदक महाराज के पास पहुँचे और बिना कोई जोखिम लिए हुए उन्हें अपने साथ ही विष्णु लोक लेकर पहुँच गये कि पता नहीं कब महाराज पलटी मार दे।

उधर, लक्ष्मी जी ने नाना प्रकार के व्यंजन अपने हाथों से तैयार कर सर्वनिंदक महाराज को परोसा। सर्वनिंदक जी ने जमकर हाथ साफ किया। वे बड़े प्रसन्न दिख रहे थे। विष्णु जी को पूरा विश्वास हो गया कि सर्वनिंदक जी लक्ष्मी जी के बनाये भोजन की निंदा कर ही नहीं सकते। फिर भी नारद जी को संतुष्ट करने के लिए पूछ लिया, और महाराज भोजन कैसा लगा?

सर्वनिंदक जी बोले, महाराज भोजन का तो पूछिए मत, आत्मा तृप्त हो गयी। लेकिन… भोजन इतना भी अच्छा नहीं बनना चाहिए कि आदमी खाते-खाते प्राण ही त्याग दे।

विष्णु जी ने माथा पीट लिया और बोले, ‘हे वत्स, निंदा के प्रति आपका समर्पण देखकर मैं प्रसन्न हुआ। आपने तो लक्ष्मी जी को भी नहीं छोडा़, वर माँगो।

सर्वनिंदक जी ने शर्माते हुए कहा — हे प्रभु मेरे वंश में वृद्धि होनी चाहिए।

तभी से ऐसे निरर्थक सर्वनिंदक हमारे आसपास ही नहीं वरन सभी जगहों में पाए जाने लगे..।

सार : हम चाहे कुछ भी कर लें.. इन सर्वनिंदकों की प्रजाति को संतुष्ट नहीं कर सकते!अतः ऐसे लोगों की परवाह किये बिना अपने कर्तव्य पथ पर हमें अग्रसर रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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