account for four annas

चार आने का हिसाब

बहुत समय पहले की बात है! चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था! दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी! उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी! पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। बहुत से विद्वानो से मिला! किसी से कोई हल प्राप्त नहीं हुआ! उसे शांति नहीं मिली।

एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा ही था कि तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी , किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था।

किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दें ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये।

राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – मैं एक राहगीर हूँ! मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं ! चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए *ये मुद्राएं तुम ही रख लो।

किसान बोला – ना – ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं! इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें! मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं।

राजा को किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी! वह बोला – धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं?

किसान बोला – सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ!

राजा ने अचरज से पूछा कि क्या? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं , यह कैसे संभव है?

किसान बोला – सेठ जी, प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है! प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है।

राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया कि तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो?

किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया कि –
इन चार आनो में से –
एक को मैं कुएं में डाल देता हूँ!
दूसरे से कर्ज चुका देता हूँ!
तीसरा उधार में दे देता हूँ!
और चौथा मिटटी में गाड़ देता हूँ!

राजा सोचने लगा , उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था पर वो जा चुका था।

राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा।

दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया तो अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया।

बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया।

राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया और उस किसान से पुछा कि मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ! बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो?

किसान बोला, *हुजूर , जैसा की मैंने बताया था कि –
मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ!
दूसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ!
तीसरा मैं उधार दे देता हूँ यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ!
और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ।

राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था! वह जान चुका था कि यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा।

आज के माहोल में देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है?

पैसों के मामलों में हम भी कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं! जीवन को संतुलित बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी उस राजा के समान प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे!

कहा भी है कि –
विपत्ति भए धन ना रहें, रहें जो लाख करोर।
नभ तारे छिप जात है, ज्यों रहीम यह भोर।
यानी – जिस प्रकार सवेरा होते ही समस्त तारे छिप जाते हैं उसी प्रकार विपत्ति आने पर धन संपत्ति भी चली जाती है- भले वह लाखों करोड़ों में क्यों न हो!

अमीर आदमी का अनुभव।

अमीर आदमी का अनुभव।

जॉन डी रॉकफेलर दुनिया के सबसे अमीर आदमी और पहले अरबपति थे।

25 साल की उम्र में, वे अमेरिका में सबसे बड़ी तेल रिफाइनरियों में से एक के मालिक बने और 31 साल की उम्र में, वे दुनिया के सबसे बड़े तेल रिफाइनर बन गए।

38 साल उम्र तक, उन्होंने यू.एस. में 90% रिफाइंड तेल की कमान संभा ली और 50 की उम्र तक, वह देश के सबसे अमीर व्यक्ति हो गए थे। जब उनकी मृत्यु हुई, तो वह दुनिया के सबसे अमीर आदमी थे।

एक युवा के रूप में वे अपने प्रत्येक निर्णय, दृष्टिकोण और रिश्ते को अपनी व्यक्तिगत शक्ति और धन को बढ़ाने में लगाते थे।

लेकिन 53 साल की उम्र में वे बीमार हो गए। उनका पूरा शरीर दर्द से भर गया और उनके सारे बाल झड़ गए।

नियति को देखिए,
उस पीड़ादायक अवस्था में, दुनिया का एकमात्र अरबपति जो सब कुछ खरीद सकता था, अब केवल सूप और हल्के से हल्के स्नैक्स ही पचा सकता था।

उनके एक सहयोगी ने लिखा, “वह न तो सो सकते थे, न मुस्कुरा सकते थे और उस समय जीवन में उसके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता था।”

उनके व्यक्तिगत और अत्यधिक कुशल चिकित्सकों ने भविष्यवाणी की कि वह एक वर्ष ही जी पाएंगे। उनका वह साल बहुत धीरे-धीरे, बहुत पीड़ा से गुजर रहा था।

जब वह मृत्यु के करीब पहुंच रहे थे, एक सुबह उन्हें अहसास हुआ कि वह अपनी संपत्ति में से कुछ भी, अपने साथ अगली दुनिया में नहीं ले जा सकते।

जो व्यक्ति पूरी व्यापार की दुनिया को नियंत्रित कर सकता था, उसे अचानक एहसास हुआ कि उसका अपना जीवन ही उसके नियंत्रण में नहीं हैं।

उनके पास एक ही विकल्प बचा था। उन्होंने अपने वकीलों, एकाउंटेंट और प्रबंधकों को बुलाया और घोषणा की कि वह अपनी संपत्ति को अस्पतालों में, अनुसंधान के कार्यो में और धर्म-दान के कार्यों के लिए उपयोग में लाना चाहते हैं।

जॉन डी. रॉकफेलर ने अपने फाउंडेशन की स्थापना की।

इस नई दिशा में उनके फाउंडेशन के अंतर्गत, अंततः पेनिसिलिन की खोज हुई, मलेरिया, तपेदिक और डिप्थीरिया का इलाज ईजाद हुआ।

लेकिन शायद रॉकफेलर की कहानी का सबसे आश्चर्यजनक हिस्सा यह है कि जिस क्षण उन्होंने अपनी कमाई का हिस्सा धर्मार्थ देना शुरू किया, उसके शरीर की हालात आश्चर्यजनक रूप से बेहतर होती गई।

एक समय ऐसा लग रहा था कि वह 53 साल की उम्र तक ही जी पाएंगे, लेकिन वे 98 साल तक जीवित रहे।

रॉकफेलर ने कृतज्ञता सीखी और अपनी अधिकांश संपत्ति समाज को वापस कर दी और ऐसा करने से वह ना केवल ठीक हो गए बल्कि एक परिपूर्णता के अहसास में भर गए। उन्होंने बेहतर होने और परिपूर्ण होने का तरीका खोज लिया।

ऐसा कहा जाता हैं कि रॉकफेलर ने जन कल्याण के लिए अपना पहला दान स्वामी विवेकानंद के साथ बैठक के बाद दिया और उत्तरोत्तर वे एक उल्लेखनीय परोपकारी व्यक्ति बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने रॉकफेलर को संक्षेप में समझाया कि उनका यह परोपकार, गरीबों और संकटग्रस्त लोगों की मदद करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।

अपनी मृत्यु से पहले, उन्होंने अपनी डायरी में लिखा – मुझे जीवन ने काम करना सिखाया, मेरा जीवन एक लंबी, सुखद यात्रा है! काम और आनंद से भरपूर, मैंने राह की चिंता छोड़ दी और ईश्वर ने मुझे हर रोज एक अच्छाई से नवाजा!

देने का सुख ही जीवन जी ने का सुख है – “दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा जरूरी हैं मन की शांति की।”

इसलिए हमेशा संतों ने कहा है कि – आप वो प्रयास तो करें ही जिससे भगवान मिले पर वो भी काम जरूर करें जिससे दुआ मिले।

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा करने वाला हमेशा सुख की नींद सोता है!

क्षमा हमेशा व्यक्ति को ऊँचा उठाती है। व्यक्ति बदला लेकर दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है, पर इस प्रयास में वो खुद बहुत नीचे उतर जाता है।

जो व्यक्ति अहंँकार बस सतसंग नहीं सुनते, तर्क-कुतर्कों में पड़कर, महाराज की सेवा नहीं करते, ऐसे व्यक्तियों का जीवन गुस्से से व्यर्थ चला जाता है।

उनकी जीवात्मा हमेशा कष्ट पाती है। चौरासी योनियों का दुख पाती है। इस जन्म में भी और चौरासी लाख योनियों में भी कष्ट पाते हैं।

एक बार एक धोबी नदी किनारे की शिला पर रोज की तरह कपडे धोने आया। उसी शिला पर कोई महात्मा जी ध्यानस्थ थे।

धोबी ने आवाज़ लगायी, उसने नहीं सुनी। धोबी को जल्दी थी, दूसरी आवाज़ लगायी,वो भी नहीं सुनी, तो फिर धोबी ने महात्मा जी को धक्का मार दिया।

ध्यानस्थ महात्मा जी की आँखें खुली, क्रोध की जवाला उठी!दोनों के बीच में खूब मार -पीट और हाथा पायी हुई।

लुटपिट कर दोनों अलग अलग दिशा में बैठ गये।

एक व्यक्ति दूर से ये सब बैठकर देख रहा था।

महात्मा जी के नजदीक आकर पूछा, महात्मा जी आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी, उसने बहुत मारा आपको।

महात्मा जी ने कहा, उस समय आप छुडाने क्यों नहीं आये?

व्यक्ति ने कहा, आप दोनों के बीच में, जब युद्ध हो रहा था, उस समय में यह निर्णय नहीं कर पाया कि धोबी कौन है और महात्मा कौन है?

प्रतिशोध और बदले की भावना महात्मा को भी धोबी के स्तर पर उतार लाती है।

इसीलिए कहा जाता है कि, बुरे के साथ बुरे मत बनो, नहीं तो महात्मा और दुष्ट की क्या पहचान।

दूसरी तरफ, क्षमा करके व्यक्ति अपने स्तर से काफी ऊँचा उठ जाता है।

इस प्रतिक्रिया में वो सामने वाले को भी ऊँचा उठने और बदलने की गुप्त प्रेरणा या मार्गदर्शन देता है।

“प्रतिशोध और गुस्से से हम कभी कभार खुद को नुक्सान पहुँचा बैठते हैं। जिससे हमें बाद में खुद बहुत पछतावा होता है!

इसलिए समझना होगा कि गुस्सा अपना ही नुक़सान करता है!

गुस्से में लिया गया फैसला अक्सर गलत ही साबित होता है, इसलिए हमें खुद पर काबू रखना बहुत जरुरी है।

हमेशा निरन्तर भगवान के अव्यक्त-नाम का सुमिरन करना चाहिए।

क्षमा करने से सामने वाले व्यक्ति के नजर में हमारी इज्जत, सम्मान और बढ़ जाती है।

यानी भजन-सुमिरण करने वाले के सिर पर हमेशा परमात्मा का हाथ रहता है।

गुस्से में हमेशा अक्सर वो काम हो जाता है जिससे हम दूसरों को और खुद को भी नुक्सान पहुँचाने के साथ साथ लोगों के दिलों में नफरत पैदा कर देते हैं।

गुरु दरबार की सेवा, ध्यान-सुमिरण से मन के अन्दर दया प्रेम पैदा होता है। गुस्सा शान्त हो रहता है।

आपको जब भी गुस्सा आये या किसी के ऊपर गुस्सा हो तो हमें चाहिए कि उस समय हम अपने दिमाग और मन को शान्त रखें (नियन्त्रण करना सीखें) नाम-सुमिरण या फिर हम वहांँ से कहीं दूसरी जगह पर चले जाएँ।

यह मन बड़ा चंँचल और स्वार्थी है, इसलिए हमेशा समय के महापुरुष के सानिध्य में रहें! नियमित सतसंग सुनें! अभ्यास करें! सेवा करें और अपने मानव जीवन को सार्थक करें!
यही जीवन का सार है।

चार आदमी और चार स्त्रियां

चार आदमी और चार स्त्रियां

एक बार एक आदमी जंगल से गुज़र रहा था। उसे चार स्त्रियां मिली।
उसने पहली से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या हैं ?

उसने कहा “बुद्धि “

तुम कहाँ रहती हो?
उत्तर मिला – मनुष्य के दिमाग में।

दूसरी स्त्री से पूछा – बहन तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया ” लज्जा,।”

फिर पूछा कि तुम कहाँ रहती हो?

उत्तर मिला – आँखों में!

तीसरी से पूछा – तुम्हारा क्या नाम है?

उत्तर मिला “साहस”

कहाँ रहती हो ?
मुनष्य के ह्रदय में ।

चौथी से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जवाब आया – “स्वास्थ्य “

कहाँ रहती हो?
मनुष्य के पेट में।

वह आदमी अब थोड़ा आगे बढा तो फिर उसे चार पुरूष भी मिले।
उसने पहले पुरूष से पूछा –

तुम्हारा नाम क्या है?

उसने बताया – ” क्रोध “

कहाँ रहते हो?
मनुष्य के दिमाग में!

दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं, तुम कैसे रहते हो?

जब मैं वहाँ रहता हूँ तो बुद्धि वहाँ से विदा हो जाती है!

दूसरे पुरूष से पूछा – तुम्हारा नाम क्या हैं?

उसने कहा- मेरा नाम *”लोभ” है!

कहाँ रहते हो?
लोगों की आँखों में।

आँख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो?
जब मैं आता हूँ तो लज्जा वहाँ से प्रस्थान कर जाती है!

तीसरें से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?
जबाब मिला “भय”।

कहाँ रहते हो?
मनुष्य केहृदय में।

ह्रदय में तो आनन्द रहता है। तुम कैसे रहते हो?

जब मैं आता हूँ तो आनन्द वहाँ से नौ दो ग्यारह हो जाता है!

चौथे से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है?

उसने कहा – “रोग”।

कहाँ रहते हो?
इन्सान के पेट में।

पेट में तो स्वास्थ्य रहता है
जब मैं आता हूँ तो *स्वास्थ्य वहाँ से रवाना हो जाता है।

सांसारिक जीवन की हर विपरीत परिस्थिति में यदि हम उपरोक्त वर्णित बातों को याद रखें तो कई दुखदायी चीजें टाली जा सकती हैं।

इसलिए,
अन्दर बाहर प्रभु के अस्तित्व को स्वीकार करो! समय के सदगुरु के मार्गदर्शन में रहकर अंदर के आनन्द के क़रीब रहो!

भगवान को पाने के लिए सरल बन जाओ! आपके अन्दर छल, कपट, अहंकार के साथ क्रोध और लोभ नहीं होना चाहिए! ताकि हर पल निर्भयता के साथ इस जीवन का भरपूर मात्रा में आनन्द लिया जा सके!

सुप्रभात

मृत्यु के लिये प्रवेश!

मेरे निकट मित्र का यह संस्मरण, जिसे आपके साथ शेयर किया जा रहा है। आशा है यह लेख आपको भी सोचने को मजबूर करेगा।

वाराणसी के एक गेस्ट हाउस का एकाउंट है, जहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं। इसे ‘काशी लाभ मुक्ति भवन’ कहा जाता है।

एक हिंदु मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है, प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने वाराणसी जाने का फैसला किया, यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा, जिन्होंने न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो।

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया। उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे।

इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा, “शुक्ला जी, आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे।”

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये। लेकिन इस श्रृंखला में एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया।

वह जीवन का असली पाठ है- ‘जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें।

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे। जिनका नाम राम सागर मिश्रा था। मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया। इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई, अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में, मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14वें दिन मिश्रा जी ने, 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा, “यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है। मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ।”

14वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया। जल्द ही, उनके सबसे छोटे भाई आ गए।

मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा। उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया। उनका चेहरा शांत हो गया और उसी क्षण वह चल बसे।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे केवल अपनी यात्रा के समय इसे छोड़ना चाहते हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए। किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए!

क्योंकि अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है।

जरा सोचें…क्या कुछ ऐसा है या कोई है जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

घट में है सूजे नहीं, लानत ऐसी जिंद।
तुलसिया संसार को भयो मोतिया बिंद।

जब तुम कहते हो, भगवान! “अगर तू है तो अपने को दिखा दे!’’
तो वह अंदर से ही दरवाज़ा खटखटाता है- मैं यहाँ हूँ। तू मुझे बाहर ढूँढ़ता है और मैं तेरे अंदर बैठा हूँ।

लोग कहते हैं कि ‘‘भगवान को सबकुछ मालूम है!’’

जिसको सब कुछ मालूम है उसको यह भी तो मालूम होगा कि तुमको उसकी ज़रूरत पड़ेगी।

सबके घट में वह परमानंद विराजमान है, परंतु सब बाहर दौड़ लगा रहे हैं। उसी दौड़ को अंदर की तरफ लगाना है।

जैसे ही हम अंदर की तरफ दौड़ लगाना शुरू करेंगे, वह परमानंद हमें स्वयं अपने पास बुलाएगा। क्योंकि वहाँ है हृदय, और हृदय के अंदर उसकी प्यास लगी हुई है।

उस प्यास को बुझाने की क्या विधि है?

वह विधि मैं जगह-जगह जाकर लोगों को बताता हूँ और कहता हूँ कि परमानंद तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। उसको अपना बॉस बनाओ, उसकी चाकरी करो तो तुम्हारे जीवन के अंदर भी सुख और आनंद की बारिश हो जायेगी। जो व्यक्ति शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाना चाहता है, उनका मैं मार्गदर्शन कर सकता हूँ।

  • Prem Rawat

भक्ति दान मोहि दीजिये…..

एक गरीब आदमी था।वो हर रोज अपने गुरु जी के आश्रम जाकर वहांँ पर साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था।
अक्सर वो अपने गुरु जी से कहता कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाये।

एक दिन गुरु जी ने पूछ ही लिया कि क्या तुम आश्रम में इसीलिए सेवा करने आते हो?
उसने पूरी ईमानदारी से कहा कि हांँ, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाये, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूंँ। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूंँ। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आयेंगे।
गुरु जी ने कहा कि – तुम चिन्ता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आयेगा तब तुम्हें कोई आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।

युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, काम-धन्धा खूब चलने लगा वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि आश्रम में जाना ही छूट गया। कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही आश्रम पहुंँचा और साफ-सफाई करने लगा।

गुरु जी ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा- क्या बात है, इतने बरसों बाद आये हो? सुना है बहुत बड़े सेठ बन गये हो।

वो व्यक्ति बोला- बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियांँ की! पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में शान्ति नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूंँ! पर आ ना सका! गुरु जी आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिन्दगी में शान्ति नहीं दी?

गुरु जी ने कहा कि तुमने मेरे पास शान्ति (चैन) मांँगा ही कब था? जो तुमने मांँगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहांँ क्या करने आए हो।

उसकी आंँखों में आंँसू भर आए! गुरु जी के श्रीचरणों में गिर पड़ा और बोला – अब कुछ मांँगने के लिए सेवा नहीं करूंँगा। दिल को शान्ति मिल जाये, बस।

गुरू जी ने कहा- पहले तय कर लो कि अब कुछ माँगने के लिए आश्रम की सेवा नहीं करोगे! बस मन की शान्ति के लिए ही आओगे।

उन्होंने ने समझाया कि चाहे मांँगने से कुछ भी मिल जाये पर दिल का (चैन) शान्ति कभी नहीं मिलती इसलिए सेवा के बदले कुछ मांँगना नहीं है।
वो व्यक्ति अपने गुरुदेव को सुनता रहा और बोला- गुरू जी मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए।

यह सत्य है कि – सच्चे गुरू की शरणागत होने पर उनके दरवार में डिमाण्ड और कमांड वाली सोच को त्यागना होगा! तभी अलोकिक आनन्द मिल पायेगा जो सदा भक्त की कल्पना से परे की स्थिति होती है!

एक ही बार परखिये,परखिये ना बारम्बार।

एक ही बार परखिये,
परखिये ना बारम्बार।

बालू तो हूं किरकिरी,
जो छाने सौ बार।

★अर्थ: किसी व्यक्ति को परखना है तो बस एक बार में ही परख लेना चाहिए!
जिस प्रकार रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो उसकी किरकिरी दूर नहीं होती!

उसी प्रकार दुर्जन को भी बार बार भी परखो; तब भी वह अपनी दुष्टता से भरा हुआ वैसा ही मिलेगा! जबकि सज्जन की परख एक बार में ही हो जाती है।

कहानी सलाह यह या वह
🌸🌸🌸🌸🌸

एक धनी व्यक्ति का बटुआ बाजार में गिर गया। उसे घर पहुंच कर इस बात का पता चला। बटुए में जरूरी कागजों के अलावा कई हजार रुपये भी थे। फौरन ही वो मंदिर गया और प्रार्थना करने लगा कि बटुआ मिलने पर प्रसाद चढ़ाउंगा, गरीबों को भोजन कराउंगा आदि।

संयोग से वो बटुआ एक बेरोजगार युवक को मिला।

बटुए पर उसके मालिक का नाम लिखा था। इसलिए उस युवक ने सेठ के घर पहुंच कर बटुआ उन्हें दे दिया। सेठ ने तुरंत बटुआ खोल कर देखा। उसमें सभी कागजात और रुपये यथावत थे।

सेठ ने प्रसन्न हो कर युवक की ईमानदारी की प्रशंसा की और उसे बतौर इनाम कुछ रुपये देने चाहे, जिन्हें लेने से युवक ने मना कर दिया।

इस पर सेठ ने कहा, अच्छा कल फिर आना।

युवक दूसरे दिन आया तो सेठ ने उसकी खूब खातिर की। युवक चला गया।

युवक के जाने के बाद सेठ अपनी इस चतुराई पर बहुत प्रसन्न था कि वह तो उस युवक को सौ रुपये देना चाहता था। पर युवक बिना कुछ लिए सिर्फ खा -पी कर ही चला गया।

उधर युवक के मन में इन सब का कोई प्रभाव नहीं था,

क्योंकि उसके मन में न कोई लालसा थी और न ही बटुआ लौटाने के अलावा और कोई विकल्प ही था।

सेठ बटुआ पाकर यह भूल गया कि उसने मंदिर में कुछ वचन भी दिए थे।

सेठ ने अपनी इस चतुराई का अपने मुनीम और सेठानी से जिक्र करते हुए कहा कि देखो वह युवक कितना मूर्ख निकला। हजारों का माल बिना कुछ लिए ही दे गया।

सेठानी ने कहा, तुम उल्टा सोच रहे हो। वह युवक ईमानदार था। उसके पास तुम्हारा बटुआ लौटा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसने बिना खोले ही बटुआ लौटा दिया। वह चाहता तो सब कुछ अपने पास ही रख लेता। तुम क्या करते? ईश्वर ने दोनों की परीक्षा ली। वो पास हो गया, तुम फेल। अवसर स्वयं तुम्हारे पास चल कर आया था, तुमने लालच के वश उसे लौटा दिया। अब अपनी गलती को सुधारो और जाओ उसे खोजो। उसके पास ईमानदारी की पूंजी है, जो तुम्हारे पास नहीं है। उसे काम पर रख लो।

सेठ तुरत ही अपने कर्मचारियों के साथ उस युवक की तलाश में निकल पड़ा।

कुछ दिनों बाद वह युवक किसी और सेठ के यहां काम करता मिला।

सेठ ने युवक की बहुत प्रशंसा की और बटुए वाली घटना सुनाई, तो उस सेठ ने बताया,

उस दिन इसने मेरे सामने ही बटुआ उठाया था। मैं तभी अपने गार्ड को लेकर इसके पीछे गया।

देखा कि यह तुम्हारे घर जा रहा है। तुम्हारे दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सब कुछ देखा व सुना। और फिर इसकी ईमानदारी से प्रभावित होकर इसे अपने यहां मुनीम रख लिया। इसकी ईमानदारी से मैं पूरी तरह निश्चिंत हूं।

बटुए वाला सेठ खाली हाथ लौट आया। पहले उसके पास कई विकल्प थे! उसने निर्णय लेने में देरी की। उस ने एक विश्वासी पात्र खो दिया।

युवक के पास अपने सिद्धांत पर अटल रहने का नैतिक बल था। उसने बटुआ खोलने के विकल्प का प्रयोग ही नहीं किया।

युवक को ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया। दूसरे सेठ के पास निर्णय लेने की क्षमता थी।

उसे एक उत्साही , सुयोग्य और ईमानदार मुनीम मिल गया।

एक बहुत बड़े विचारक सोरेन कीर्कगार्ड ने अपनी पुस्तक आइदर -और अर्थात यह या वह में लिखा है कि जिन वस्तुओं के विकल्प होते हैं उन्हीं में देरी होती है। विकल्पों पर विचार करना गलत नहीं है। लेकिन विकल्पों पर ही विचार करते रहना गलत है। हम यह या वह के चक्कर में फंसे रह जाते हैं।

किसी संत ने एक जगह लिखा है , विकल्पों में उलझ कर निर्णय पर पहुंचने में बहुत देर लगाने से लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है।
सुप्रभात
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टोकरी में पानी

संत सदानंद का शिक्षा देने का अलग ही ढंग था। वह सिर्फ सैद्धांतिक ज्ञान का सहारा नहीं लेते थे। शिष्य अच्छी तरह से उनकी बात समझ सकें, इसके लिए व्यावहारिक उपायों से विषयों को समझाते थे। एक दिन उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और सबके हाथ में बांस की एक-एक टोकरी थमा दी। संत ने शिष्यों से कहा, ‘आज तुम सभी को इन टोकरियों में जल भरकर लाना है। उसी जल से आश्रम की सफाई करनी है। याद रखना जल केवल वही होना चाहिए जो इस टोकरी में भरकर लाया गया हो।’
गुरु की आज्ञा मानकर सभी शिष्य नदी की ओर चल पड़े। एक शिष्य बोला, ‘बांस की टोकरी में पानी कैसे भर पाएंगे?’ पानी तो बांस की टोकरी से बाहर निकल जाएगा। दूसरे शिष्य ने कहा, ‘पता नहीं इसके माध्यम से गुरुजी हमें कौन सा व्यावहारिक ज्ञान सिखाना चाहते हैं!’ सभी शिष्य टोकरी में जल भरने लगे। लेकिन जैसे वे जल भरते, वैसे ही पानी टोकरियों के छिद्र से बाहर निकल जाता। शिष्यों ने तीन-चार बार कोशिश की। फिर वे अपनी टोकरियां वहीं फेंक कर वापस चले गए। उनमें एक शिष्य था
सदाव्रत। उसने हिम्मत नहीं हारी।कुछ घंटों बाद वह शिष्य यह देखकर हैरान रह गया कि अब टोकरी से पानी का रिसना बंद हो गया है। हुआ यह कि थोड़े समय पानी में रहने के बाद बांस की कमचियां फूल गईं और बीच की खाली जगह भर गई। वह जो पानी उठाता, टोकरी में ठहर जाती। शिष्य सदाव्रत ने टोकरी में पानी लाकर उससे आश्रम की सफाई कर दी। संत सदानंद ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘आज मैं तुम सबके धैर्य की परीक्षा लेना चाहता था। लेकिन केवल शिष्य सदाव्रत ही उसमें उत्तीर्ण हो सका। जीवन में किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी होता है कि लगातार प्रयत्न किए जाएं, तुरंत हार न मानी जाए।’

जीवन का आनंद!

एक सम्राट राजा अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था।

वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि अब वह अमर होना चाहता था।
उसने पता लगाया कि कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है।

देश – दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार राजा ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था।

वह एक पुरानी गुफा थी, जहां पर कोई आता जाता नहीं था।

देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी, लेकिन राजा ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया।

वहां पर उसने देखा कि गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है।

उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि एक कौवे की आवाज आई।

कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था। कौवा जोर से बोला, ठहरो, रुक जाओ, यह भूल मत करो।

सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। वह बड़ी ही दयनीय अवस्था में था, पंख झड़ गए थे। पंजे गिर गए थे। वह अपंग भी हो गया था। बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था।

राजा ने कहा, तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? यह अमृत पीने से मुझे तू कैसे रो सकता है?

तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि मैं भी अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था और मैंने जल्दबाजी में बिना सोच विचार के अमृत पी लिया। अब मैं कभी मर नहीं सकता, लेकिन अब मैं मरना चाहता हूं पर मर नहीं सकता। देखो मेरी हालत!
कौवे की बात सुनकर राजा देर तक सोचता रहा। सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीये ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया।

राजा समझ चुका था कि जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है; जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं।

इसलिए, जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए। हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए!

क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते हैं।

जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

इसलिए जीवन को बिंदास रहकर जियो। दुनिया भर का टेंशन मत लो। मृत्यु के कुछ समय बाद तुम्हे सब भूल जाएंगे!
साथ रहेंगे तो केवल अविनाशी और अविनाशी तक पहुंचने का रास्ता बताने वाले सद्गुरु !

सद्गुरु यही कहते हैं कि –
जिन्दगी जबरदस्त है-
इसे जबरदस्ती ना जिएं;
बल्कि
जबरदस्त तरीके से जिएं!
तभी –
इस जीवन में जीवन के असली आनन्द का अनुभव हो पायेगा!
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