सरलता से प्रभु मिलते हैं

सरलता से प्रभु मिलते हैं

बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद।
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दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो।
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वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं।
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उसने मन में सोचा यह बढ़िया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं ?
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लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं
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गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी
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आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा …
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अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो।
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महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या
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गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।
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उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो …. हम नहीं कर सकते उपवास… हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया ?
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गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो।
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मरता क्या न करता… गया रसोई में, गुरुजी फिर आए “”देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई।
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ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।
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लगा भजन गाने
आओ मेरे राम जी , भोग लगाओ जी
प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए…..
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कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे।
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भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं । पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है।
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फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं….
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तो सुनो प्रभु … आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबको एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो…
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श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए।
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भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं।
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चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं।
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बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो,
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और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए।
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अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे।
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फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं।
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गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज ले जा।
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अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई
प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…
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प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए।
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भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया।
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लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई।
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फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं ? इस बार अनाज ज्यादा देना।
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गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में कहा इसे जितना अनाज चाहिए दे दो और छुप कर उसे देखने चल पड़े।
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इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं।
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फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए…
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सारा राम दरबार मौजूद… इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है।
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भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया,
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प्रभु ने पूछा क्यों ? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो….
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राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से… लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु..
प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से।
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लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा।
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माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे।
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इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया ?
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बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ…..
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गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा
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भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है।
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प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं ?
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प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता।
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बोला : क्यों , वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप ?
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प्रभु बोले , माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता….
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आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे,
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गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सब कुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं।
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प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई।
यह भक्ति कथा लोकश्रुति पर आधारित है।

अपेक्षाएं छोड़ खुद से बात करें

*-अपेक्षाएं छोड़ खुद से बात करें-*

एक मटका व गुलदस्ता यदि साथ खरीदें और घर लाते ही 100 रुपये का मटका फूट जाए तो *हमें इस बात का दुःख होता है, क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमें कल्पना भी नहीं थी।*
परंतु
गुलदस्ते के फूल जो 200 रूपये के हैं, वे शाम तक मुरझा जाते है तो भी *हम दुःखी नहीं होते क्योंकि ऐसा होने वाला ही है यह हमें पता था।*

*मटके के इतनी जल्दी फूटने की हमें अपेक्षा नहीं थी, इसलिए फूटने पर दुःख का कारण भी बना। फूलों से अपेक्षा नहीं थी, इसलिए​ वे दुःख का कारण नहीं बने।*

इसका यही आशय निकला कि –
*जिससे जितनी अपेक्षा अधिक उससे उतना ही दुःख अधिक और जिससे जितनी अपेक्षा कम उससे उतना ही दुःख भी कम।*

अपेक्षा और वास्तविकता के बीच मे जो अंतर है, *वही तनाव है।*
हम संतुष्ट रहेंगे तो *हमारा जीवन भी शांतिपूर्ण व सरल रहेगा।*
इच्छाओं का भी अपना चरित्र होता है, *खुद के मन की हो तो बहुत अच्छी लगती हैं दूसरों के मन की हो तो बहुत खटकती है।*

बहुत जरूरी है *ज़िन्दगी में इच्छाओं/अपेक्षाओं के बोझ से थोड़ा खालीपन, यही वो समय है जहां हमारी मुलाकात हमसे होती है।*

इसलिए *अपेक्षाएं छोड़, खुद को खुद के साथ जोड़ने के लिए थोड़ा समय निकालें।*
ताकी *अपने ही अन्दर के आनन्द को प्राप्त किया जा सके!*

घोर घने वन में

घोर घने वन में
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एक बार विदुर जी संसार भ्रमण करके धृतराष्ट्र के पास पहुँचे तो धृतराष्ट्र ने कहा, “विदुर जी ! सारा संसार घूमकर आये हो आप, कहिये कहाँ-कहाँ पर क्या देखा आपने?”
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विदुर जी बोले, “राजन् ! कितने आश्चर्य की बात देखी है मैंने। सारा संसार लोभ शृंखलाओं में फँस गया है। काम, क्रोध, लोभ, भय के कारण उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता, पागल हो गया है। आत्मा को वह जानता ही नहीं।”
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तब एक कथा उन्होंने सुनाई। एक वन था बहुत भयानक। उसमें भूला-भटका हुआ एक व्यक्ति जा पहुँचा। मार्ग उसे मिला नहीं। परन्तु उसने देखा कि वन में शेर, चीते, रीछ, हाथी और कितने ही पशु दहाड़ रहे हैं। भय से उसके हाथ-पाँव काँपने लगे। बिना देखे वह भागने लगा।

भागता-भागता एक स्थान पर पहुँच गया। वहाँ देखा कि पाँच विषधर साँप फन फैलाये फुङ्कार रहे हैं। उनके पास ही एक वृद्ध स्त्री खड़ी है। महाभयंकर साँप जब इसकी और लपका तो वह फिर भागा और अन्त में हाँफता हुआ एक गढ़ में जा गिरा जो घास और पौधों से ढका पड़ा था।

सौभाग्य से एक बड़े वृक्ष की शाखा उसके हाथ में आ गई। उसको पकड़कर वह लटकने लगा। तभी उसने नीचे देखा कि एक कुआँ है और उसमें एक बहुत बड़ा साँप ―एक अजगर मुख खोले बैठा है। उसे देखकर वह काँप उठा। शाखा को दृढ़ता से पकड़ लिया कि गिरकर अजगर के मुख में न जा पड़े। परन्तु ऊपर देखा तो उससे भी भयंकर दृश्य था। छः मुख वाला एक हाथी वृक्ष को झंझोड़ रहा था और जिस शाखा को उसने पकड़ रखा था, उसे सफेद और काले रंग के चूहे काट रहे थे। भय से उसका रंग पीला पड़ गया, परन्तु तभी शहद की एक बूँद उसके होंठों पर आ गिरी।

उसने ऊपर देखा। वृक्ष के ऊपर वाले भाग में मधु-मक्खियों का एक छत्ता लगा था, उसी से शनैः–शनैः शहद की बूँदें गिरती थीं। इन बूँदों का स्वाद वह लेने लगा। इस बात को भूल गया कि नीचे अजगर है। इस बात को भूल गया कि वृक्ष को एक छः मुख वाला हाथी झंझोड़ रहा है। इस बात को भी भूल गया कि जिस शाखा से वह लटका है उसे सफेद और काले चूहे काट रहे हैं और इस बात को भी कि चारों ओर भयानक वन है जिसमें भयंकर पशु चिंघाड़ रहे हैं।
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धृतराष्ट्र ने कथा को सुना तो कहा, “विदुर जी ! यह कौन से वन की बात आप कहते हैं? कौन है वह अभागा व्यक्ति जो इस भयानक वन में पहुँचकर संकट में फँस गया?”
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विदुर जी ने कहा― “राजन् ! यह संसार ही वह वन है। मनुष्य ही वह अभागा व्यक्ति है। संसार में पहुँचते ही वह देखता है कि इस वन में रोग, कष्ट और चिन्तारुपी पशु गरज रहे हैं। यहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के पाँच विषधर साँप फन फैलाये फुङ्कार रहे हैं।

यहीं वह बूढ़ी स्त्री रहती है जिसे वृद्धावस्था कहते हैं और जो रुप तथा यौवन को समाप्त कर देती है। इनसे डरकर वह भागा। वह शाखा,जिसे जीने की इच्छा कहते हैं, हाथ में आ गई। इस शाखा से लटके-लटके उसने देखा कि नीचे मृत्यु का महासर्प मुँह खोले बैठा है।

वह सर्प, जिससे आज तक कोई भी नहीं बचा, ना राम, न रावण, न कोई राजा न महाराजा, न कोई धनवान् न कोई निर्धन, कोई भी कालरुपी सर्प से आज तक बचा नहीं; और छः मुख वाला हाथी जो इस वृक्ष को झंझोड़ रहा था वह वर्ष है―छः ऋतु वाला। छः ऋतुएँ ही उसके मुख हैं। लगातार वह इस वृक्ष को झंझोड़ता रहता है; और इसके साथ ही काले और श्वेत रंग के चूहे इस शाखा को तीव्रता से काट रहे हैं; ये रात और दिन आयु को प्रतिदिन छोटा कर रहे हैं,यही दो चूहे हैं।

हम सभी जानते हैं कि एक मुसाफिर की तरह इस दुनिया में हम सबका आगमन हुआ है! सांसारिक यात्रा में हमें पता होता है

हम सभी जानते हैं कि एक मुसाफिर की तरह इस दुनिया में हम सबका आगमन हुआ है! सांसारिक यात्रा में हमें पता होता है कि *”हमारी यात्रा कब, कहाँ से शुरू होगी और कितने समय पर समाप्त होगी लेकिन जीवन यात्रा में जाने का समय बहुत ही अनिश्चित है! कब, कहाँ और किस उम्र में इस लोक से प्रस्थान करके परलोक जाना होगा – इसका किसी को पता नहीं है!”*

अभी तीन दिन पहले मेरे पूज्य बड़े भाई साहब *स्वनामधन्य श्री त्रिलोक सिंह गहतोड़ी जी* को अपनी परलोकगमन की यात्रा में जाना पडा!
उन पर महाराजी की असीम दया थी कि *महाराज जी ने असीम कृपा करके, उनको 1975 में अपनाया और उनकी दुनिया को अपने ज्ञानालोक से रोशन करके, उन्हें जीते जी शांति में रहने की युक्ति का बोध कराया!*

मैंने उनके भोतिक और आध्यात्मिक जीवन को करीब से देखा और पाया कि *उनकी बाहरी दुनिया उथल-पुथल और अनिश्चितताओं से भरी हुई थी! पारिवारिक रिश्तेनातों के मकडजाल में बुरी तरह से उलझे होने के बावजूद भी उन्होंने महाराजी की कृपा से अपनी आंतरिक दुनिया को बेहद सुकून और प्रतिबद्धता के साथ जिया!*

सहोदर भाई होने के नाते उनके भोतिक विछोह से हम आहत तो जरूर हैं फिर भी महाराजी की कृपा और शुभ चिंतकों के स्नेहषीशों के बदोलत हमें आप सबका आत्मिक सहारा मिल रहा है और हम विधि के विधान को नतमस्तक करते हुए इस विरद में भी अपने को संयत करने का प्रयास कर रहे हैं !

मुझे यह आभास भी प्रत्यक्ष रूप में हुआ कि *इस अमूल्य स्वांस की डोरी टूटने के बाद संसार की सारी भोतिक चीजें, उपलब्धियां और रिश्ते नातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है! मान-गुमान, महल-अटारियां, अपने-पराये का अन्तर एक ही पल में धराशायी होता दिखायी देता हैं!*

जीवित अवस्था की चकाचौंध और एकाकी परलोकगमन के बीच केवल *एक स्वांस का अन्तर* होता है! *इसी अनमोल स्वांस की महत्ता समय के सदगुरु समझाते हैं! लेकिन हम मायावी लोग अक्सर उनके इस इशारे की अनदेखी / अहवेलना किया करते हैं और यही हमारे पछतावे का कारण बनता है!*

संतों कहा भी है कि *”यह शरीर एक मिट्टी डिब्बा है और स्वांस रूपी कीमती हार इसके अन्दर हुआ है! तभी यह देव-दुर्लभ नरतन कहलाता है!”*

परन्तु *अज्ञानता के कारण हम केवल डिब्बे से ही प्यार करते हैं, उसको सजाने और सवारने की कोशिश किया करते हैं और कीमती स्वांस रूपी हीरे को भूल जाते हैं फ़लस्वरूप अंत में पछतावा ही होता है!*

एक काल्पनिक लेख जो कडुवा तो जरूर है पर सार्वभौमिक सत्त्यता को प्रतिबिम्बित करता है- इस कडुवाहट भरे लेख को आपके साथ भी शेयर कर रहा हूँ!

आशा है आपको भी इस देव-दुर्लभ मनुष्य शरीर के अन्दर कीमती स्वांस की अनुपस्थिति और इसके साथ अपनों के द्वारा किये गए सलूक का भान जरूर होगा!

🌸🌸अर्थी के मन का आवेग और जीवितों के लिये संदेश🌸🌸

अर्थी पर पड़े हुए शव पर लाल कपड़ा बाँधा जा रहा है। गिरती हुई गरदन को सँभाला जा रहा है। पैरों को अच्छी तरह रस्सी बाँधी जा रही है, कहीं रास्ते में मुर्दा गिर न जाए। गर्दन के इर्दगिर्द भी रस्सी के चक्कर लगाये जा रहे हैं। पूरा शरीर लपेटा जा रहा है। अर्थी बनाने वाला बोल रहा है: *‘तू उधर से खींच’* दूसरा बोलता है : *‘मैने खींचा है, तू गाँठ मार।’*

लेकिन यह गाँठ भी कब तक रहेगी? रस्सियाँ भी कब तक रहेंगी? अभी जल जाएँगी और रस्सियों से बाँधा हुआ शव भी जलने को ही जा रहा है! धिक्कार है इस नश्वर जीवन की अज्ञानता को! धिक्कार है इस नश्वर देह की झूठी ममता को! धिक्कार है इस शरीर के बृथा अभिमान को!

अर्थी को कसकर बाँधा जा रहा है। आज तक तुम्हारा नाम सेठ साहब की लिस्ट (सूची) में था। *अब वह मुर्दे की लिस्ट में आ गया।* लोग कहते हैं: ‘*मुर्दे को बाँधो जल्दी से।’* अब ऐसा नहीं कहेंगे कि *‘सेठ जी को, साहब को, मुनीम को, नौकर को, संत को, असंत को बाँधो!* केवल यही कहेंगे कि ‘*मुर्दे को बाँधो।’*

हो गया *हमारे पूरे जीवन की उपलब्धियों का अंत।*
आज तक हमने जो कमाया था *वह हमारा न रहा।*
आज तक हमने जो जाना था *वह मृत्यु के एक झटके में छूट गया।*
हमारे इन्कम टेक्स (आयकर) के कागजातों को,
हमारे प्रमोशन और रिटायरमेन्ट की बातों को,
हमारी उपलब्धि और अनुपलब्धियों को सदा के लिए
*अलविदा होना पड़ा।*

हाय रे मनुष्य! तेरा श्वास! हाय रे तेरी कल्पनाएँ! हाय रे तेरी नश्वरता! हाय रे मनुष्य; तेरी वासनाएँ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि *इतना पाया है और इतना पाँऊगा, इतना जाना है और इतना जानूँगा, इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा, इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा।*

अरे! *हम अपने को मौत से तो न बचा पाए! अपने को जन्म मरण से भी न बचा पाए! देखी तेरी ताकत! देखी तेरी कारीगरी !*

*हमारा शव बाँधा जा रहा है। हम अर्थी के साथ एक हो गये हैं। शमशान यात्रा की तैयारी हो रही है। लोग रो रहे हैं। चार लोगों ने अर्थी को उठाया और घर के बाहर हमें ले जा रहे हैं। पीछे-पीछे अन्य सब लोग चल रहे हैं।*

कोई स्नेहपूर्वक आया है, कोई मात्र दिखावा करने आये है। कोई निभाने आये हैं कि *समाज में बैठे हैं तो पाँच-दस आदमी सेवा के हेतु आये हैं।* उन लोगों को पता नहीं कि *उनकी भी यही हालत होगी।* अपने को कब तक अच्छा दिखाओगे? अपने को समाज में कब तक ‘सेट’ करते रहोगे? सेट करना ही है तो *अपने को परमात्मा में ‘सेट’ क्यों नहीं करते भैया?*

दूसरों की शवयात्राओं में जाने का नाटक करते हो? ईमानदारी से शवयात्राओं में जाया करो। अपने आपको समझाया करो कि *तेरी भी यही हालत होनेवाली है। तू भी इसी प्रकार उठनेवाला है, इसी प्रकार जलनेवाला है। बेईमान मन! तू अर्थी में भी ईमानदारी नहीं रखता? जल्दी करवा रहा है? घड़ी देख रहा है? ‘आफिस जाना है… दुकान पर जाना है…’ अरे! आखिर में तो शमशान में जाना है ऐसा भी तू समझ ले! आफिस जा, दुकान पर जा, सिनेमा में जा, कहीं भी जा लेकिन आखिर तो शमशान में ही जाना है। तू बाहर कितना जाएगा?*

🌺अर्थी का आखिरी संदेश🌺*
😭😭😭😭😭😭
यह *राम नाम सत्य है!* के *सत्य* को जीते जी ही जानना चाहिय! जिस स्वांस की अनुपस्थिति में यह *शव यात्रा* निकल रही है उस शक्ति का सभी को *जीते जी साक्षात्कार* करना चाहिय!
😭😭😭😭😭😭
इसलिये –
*हर पल हरि सुमिरन (अभ्यास) में ही जीवन व्यतीत करो! पल-पल मृत्यु की ओर बढ़ रहे हो और गफलत की नीद में बेहोश सोये पड़े हुए हो! जागो! अंतर्मुखी बनो! इस शरीर रूपी डिब्बे से नहीं बल्कि इसके अन्दर स्वांस रूपी हीरे से प्यार करो!*

🕉 शान्ति🙏,,,,

बुद्ध के जीवन में घटना है उनके अंतिम दिन की।

बुद्ध के जीवन में घटना है उनके अंतिम दिन की।
सुबह हुई है, पक्षियों ने गीत गाए हैं, फूल खिले हैं और उन्होंने अपने सारे शिष्यों को इकट्ठा किया है और उनसे कहा है कि मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। ध्यान करना!

उन्होंने कहा, मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं।
वे सब निश्चित बहुत आतुर हो उठे। क्योंकि बुद्ध ने चालीस वर्षों के शिक्षण में कभी भी यह न कहा था कि मैं तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं। हालांकि उनके हर शब्द में सिवाय सुखद समाचार के और कुछ भी न था। आज कौन सी अनूठी बात घटनी थी? आज कौन सा कोहिनूर उनके शब्दों में जगेगा? आज कौन सा सूरज उगेगा? एक सन्नाटा छा गया।

बुद्ध ने कहा, आज मैं शरीर छोड़ रहा हूं। जीवन को बहुत देख लिया। जीवन को बहुत जी लिया। आज मैं मौत के अंधेरे में प्रवेश कर रहा हूं! लेकिन वह अंधेरा दूसरों के लिए होगा। वह अंधेरा मेरे लिए नहीं है। मैं इतना ही ज्योतिर्मय, इतना ही प्रकाशोज्ज्वल उस अंधेरे से भी गुजर जाऊंगा जैसे जीवन से गुजरा हूं। इसलिए मैंने कहा कि तुम्हें एक सुखद समाचार देता हूं।

मृत्यु का समाचार और सुखद। तुम्हें कुछ पूछना हो, तुम पूछ लो।

दस हजार भिक्षुओं में किसकी हिम्मत थी और किसकी जुर्रत थी कि जिस आदमी ने चालीस वर्षों तक हर बात को समझाया हो, आज मरने की घड़ी में भी उसको चैन से न मरने दिया जाए!

उनकी आंखों में आंसू थे लेकिन उनकी जुबानों पर कोई सवाल नहीं था। उन्होंने कहा, हमें कुछ पूछना नहीं है। आपने हमें इतना दिया है कि जितना हमने कभी सोचा भी न था। आपने हमारे वे उत्तर भी हमारे हाथों में थमा दिए हैं जिनके लिए हमारे पास प्रश्न भी नहीं हैं।हम आपसे क्या पूछें?
तो बुद्ध ने कहा, मैं विदा ले सकता हूं और उन्होंने आंखें बंद कीं। और घटना बड़ी प्यारी है कि उन्होंने पहले चरण में शरीर को छोड़ दिया। दूसरे चरण में मन को छोड़ दिया। तीसरे चरण में हृदय को छोड़ दिया।

और तभी पास के ही गांव से एक आदमी भागा हुआ आया और उसने कहा कि ठहरो, चालीस साल से बुद्ध मेरे गांव से गुजरते रहे हैं लेकिन मैं अंधा आदमी हूं। हमेशा सोचता रहा कि अगली बार जब जाएंगे। तब मिल लूंगा। यूं जल्दी भी क्या है? कभी मेहमान घर में थे, कभी दुकान पर भीड़ थी और कभी पत्नी बीमार थी और बहाने ही खोजने हों तो अंतहीन बहाने उपलब्ध हैं। बुद्ध आते रहे, जाते रहे।
अभी-अभी मैंने सुना कि वे जीवन छोड़ रहे हैं और मुझे एक प्रश्न पूछना है।

बुद्ध के प्रमुख शिष्य आनंद ने कहा, अब देर हो गयी, अब बहुत देर हो गयी। वे तो जा भी चुके।

लेकिन यह क्या? बुद्ध ने आंखें खोल दीं और बुद्ध ने कहा, आनंद, तू मेरे ऊपर दोषारोपण करवा देगा। आने वाली सदियां कहेंगी कि मैं जिंदा था और एक आदमी मेरे द्वार से प्यासा लौट गया!

मेरा शरीर छूट जाए, मन छूट जाए, हृदय छूट जाए लेकिन मैं तो हूं और मैं तो कभी छूटने वाला नहीं हूं।
तुम मेरे शरीर को जाकर अर्थी पर चढ़ाकर जला देना लेकिन अगर किसी के हृदय से भरकर मुझसे प्रश्न पूछा तो उसे उत्तर मिल जाएगा। क्योंकि मैं तो हूं, मैं तो रहूंगा। मुझे जलाने का कोई उपाय नहीं है और मुझे मिटाने का कोई उपाय नहीं है। मैं अमृत हूं।

यद्यपि यह बात सबकी समझ में आना आसान नहीं है तो भी सच्चे गुरु-शिष्य जिनके सम्बन्ध असीम होते हैं उनको यह बात समझ में आ जाती है क्योंकि सच्चे सदगुरु शरीर की सीमाओं से परे उस तत्व से जुड़ने के लिय अपने शिष्य को तैयार करते है जो जो पहले से थी, अब भी है और आगे भी रहेगी!
लेकिन जो मनुष्य हमेशा केवल नाशवान चीजों (जो कभी नहीं थी, आज है और आगे नहीं रहेगी ) के पीछे ही पड़ा रहता है- उसके लिय अविनाशी को समझ पाना कठिन होगा!

उस अविनाशी को समझने के लिय ही महाराजी बार बार सेवा, सत्संग और अभ्यास करने के लिय कहते हैं!
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श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे! इन्हें रामायण का श्रवण करने अत्यधिक लालशा रहती थी!।

*श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे! इन्हें रामायण का श्रवण करने अत्यधिक लालशा रहती थी!। जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते करते रहते थे।*

एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं। वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे ।

पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा कि *महाराज ! क्या सेवा करे?*

संत ने कहा – *पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।*

पंडित जी ने कहा – *ठीक है महाराज। संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे।*

पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।
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जब कथा समाप्त हुई तब संत ने पंडित जी से कहा – *पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी। हम बहुत प्रसन्न हैं, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो।*

पंडित जी बोले – *महाराज हम बहुत गरीब हैं, हमें बहुत सारा धन मिल जाये!*

संत ने प्रार्थना की कि *प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये।*
भगवान् ने मुस्कुरा दिया!
संत बोले – *तथास्तु।*
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फिर संत ने पूछा – *मांगो और क्या चाहते हो?*

पंडित जी बोले – *हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए।*
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संत ने पुनः प्रार्थना की और प्रभु मुस्करा दिए।
संत बोले – *तथास्तु, तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा।*

फिर संत बोले *और कुछ माँगना है तो मांग लो।*

पंडित जी बोले – *श्री राम जी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो।*
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संत बोले – *नहीं! यह नहीं मिलेगा।*
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पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए कि *महात्मा क्या बोल गए!* यह बात समझ नहीं आयी ।

संत बोले – *तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है। दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् की भक्ति की है।*
*जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते हैं तब तक भक्ति नहीं मिलती।*
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भगवान् ने जब केवट से पूछा कि *तुम्हे क्या चाहिए? केवट ने कुछ नहीं माँगा।*
प्रभु ने पूछा – *तुम्हे बहुत सा धन देते है!* केवट बोला *नहीं!*
प्रभु ने कहा – *ध्रुव पद ले लो!*
केवट बोला – *नहीं।* इंद्र पद, पृथ्वी का राजा और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया!
तब जाकर प्रभु ने *उसे भक्ति प्रदान की।*

हनुमान जी को जानकी माता ने अनेकों वरदान दिए – *बल, बुद्धि ,सिद्धि ,अमरत्व आदि परंतु उन्हे प्रसन्नता नहीं हुई।*

अंत में; *जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया।*

प्रह्लाद जी ने भी कहा कि *हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की।*

इस प्रसंग को पढने के बाद मुझे याद आया कि *एक सच्चा गुरु भक्त भी तो ज्ञान प्राप्त करने के बाद जब अपने अन्दर का आनन्द पाने लगता है तो हर रोज यही प्रार्थना करता है कि -*
*भक्ति दान मोहे दीजिये, गुरु देवन के देव!*
*और नहीं कुछ चाहिए, निश दिन तुम्हरी सेव!!*

अब प्रश्न उठता है कि *क्या वाकई में हमारे भाव सदा इस वादे के अनुरूप रहते हैं- जो आरती के समय हम अपने महाराजी के सामने रोज किया करते हैं?*

यदि हाँ, *तो सही मानों में हमने अपने महाराजी के सामने सच्चे दिल से दिये गये वचन को निभाकर अपना जीवन सफल कर लिया?*

यदि नहीं, *तो हम क्या कर रहे हैं और यह पाप क्यों कर रहे हैं? इस बात को हमें अपने आप से बार-बार पूछना ही चाहिय कि *क्यों हम स्वयं अपने साथ धोखा कर रहे हैं और ज्ञान दाता के साथ भी वादाखिलापी का पाप कर रहे हैं?*

अतः एक बार नहीं बल्कि यह तो हर पल के लिय सचेत होने का काम है – हम सभी के लिय बहुत जरूरी है कि *हम अनवरत अपने स्वासों को सुमिरन के माध्यम से सार्थक करें!*

त्याग का रहस्य

🌳 त्याग का रहस्य 🌳

एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।

नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ, वे उसके वैभव की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे।

उन्होंने उससे पूछा कि.. “वृक्षराज, तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?”

सेमर के वृक्ष ने हंसते हुए ऋषि के प्रश्न का उत्तर दिया कि- “भगवान्! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।”

नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।

सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा- ‘अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्प वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए।‘

पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी तूफान की तरह चल दिया।

सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ डाले और ठूंठ की तरह खड़ा हो गया।
पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ढूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।

कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे, पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों का त्यों हरा भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

उन्होंने सेमर से पूछा- “पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो, इसका क्या रहस्य है?”

वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक निवेदन किया- “ऋषिराज! मेरे पास इतना वैभव है पर मैं इसके मोह में बँधा हुआ नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए इतने पत्तों को धारण किये हुए हूँ! जब जरूरत समझता हूँ इस सारे वैभव को बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता हूँ और ठूँठ बन जाता हूँ।

मुझे वैभव का गर्व नहीं है वरन् अपने ठूँठ होने का अभिमान है! इसीलिए मैंने पवन की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य को अधिक बताया था।
आप देख रहे हैं कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ हूँ।“

नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है।

यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले कर्मयोगी साधु के लिए उसका घर ही तपोभूमि है!

*जीवन में “ब्रेक” का महत्व*

*जीवन में “ब्रेक” का महत्व*

एक बार भौतिक विज्ञान की कक्षा में शिक्षक ने विद्यार्थियों से पूछा, *”कार में ब्रेक क्यों लगाते हैं?”*

एक छात्र ने उठकर उत्तर दिया, *”सर, कार को रोकने के लिए।”*
एक अन्य छात्र ने उत्तर दिया, *”कार की गति को कम करने और नियंत्रित करने के लिए।”*
एक अन्य ने कहा, *”टक्कर से बचने के लिए।”*

जल्द ही, जवाब दोहराए जाने लगे। इसलिए शिक्षक ने स्वयं प्रश्न का उत्तर देने का निर्णय लिया।

चेहरे पर एक मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, “मैं आप सभी की सराहना करता हूँ कि आप इस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि मेरा मानना ​​​​है कि यह सब व्यक्तिगत धारणा का मामला है। पर मैं इसे इस तरह से देखता हूँ कि *कार के ब्रेक, हमें इसे और तेज चलाने में सक्षम बनाते हैं।*

कक्षा में गहरा सन्नाटा छा गया! इस जवाब की किसी ने कल्पना नहीं की थी।

शिक्षक ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, *”एक पल के लिए मान लेते हैं कि हमारी कार में कोई ब्रेक नहीं है। अब हम अपनी कार को कितनी तेज चलाने के लिए तैयार होंगे?”*

आगे उन्होंने कहा, *”यह ब्रेक ही हैं जिनके कारण हम कार को तेजी से चलाने की हिम्मत करते हैं और अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।”*

कक्षा के सभी छात्र सोच में पड़ गए। उन्होंने पहले कभी इस तरह से “ब्रेक” के बारे में नहीं सोचा था।

*आइए विचार करें!*

जीवन रुपी गाड़ी चलाते समय हमारे सामने भी कई ऐसे ब्रेक आते हैं, जो हमें निराश करते हैं। हमारे माता-पिता, शिक्षक, शुभचिंतक और हमारे मित्र, हमारी प्रगति की दिशा या जीवन में निर्णय के बारे में हमसे पूछते हैं तो हम उनके प्रश्नों तथा जीवन की कठिन स्थितियों को “ब्रेक” के रूप में देखते हैं, जो हमारी गति को बाधित करते हैं।

लेकिन *कैसा हो अगर हम उन ब्रेकों को, समस्याओं को अपने लिय “समर्थक या उत्प्रेरक” के रूप में देखें?* ऐसे उपकरण के रूप में जो *हमें जोखिम लेने में सक्षम बनाते हैं, साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि हम अपनी रक्षा भी कर सकें।*

क्योंकि, *कभी-कभी हमें रुकना पड़ता है। यहाँ तक की एक कदम पीछे भी हटना पड़ता है, ताकि हम एक लंबी छलांग लगा सकें।*

ऐसे सवालों और परिस्थितियों (समय-समय पर ब्रेक) के कारण ही हम आज जहॉं हैं, वहाँ पहुँचने में कामयाब रहे हैं।

जीवन में इन “ब्रेकों” के बिना हम फिसल सकते थे, दिशा खो सकते थे या एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का शिकार हो सकते थे।

*ये ब्रेक हमें वापस पीछे धकेलने या हमें बांधने के लिए नहीं होते हैं। इसके बजाय वे हमें पहले की तुलना में तेजी से आगे बढ़ने में सहायक होते हैं ताकि हम अपने गंतव्य तक शीघ्र और सुरक्षित पहुँच सकें!*

*क्या हम अपने जीवन में “ब्रेक” के लिए आभारी हैं या हम उन्हें केवल अपने काम में बाधा के रूप में देखते हैं?*
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*”जब हम जीवन में कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, तो हम पहले से ज्यादा मजबूत और अनुभवी होकर उभरते हैं।”*

गधे और बाघ की तकरार का परिणाम

गधे और बाघ की तकरार का परिणाम

एक बार गधे और बाघ के बीच बड़ी लड़ाइ हो गयी!

गधे ने बाघ से कहा, घास नीली है!
बाघ ने कहा, घास हरी है!

“विवाद बढ़ता गया और *दोनों के बीच गर्मागर्मी तेज हो गई!” दोनों ही अपने-अपने कथन में दृढ़ थे!

इस विवाद को समाप्त करने के लिए दोनों जंगल के राजा शेर के पास गए!

पशु साम्राज्य के बीच में सिंहासन पर बैठा एक शेर था!

बाघ के कुछ कहने से पहले ही गधा चिल्लाने लगा, महाराज, घास नीला है ना?

शेर ने कहा – हाँ, घास नीली है!

तब गधा गुमान में आकर कहता है, महाराज, ये बाघ नहीं मान रहा, इसे ठीक से सजा दी जाए!!

शेर राजा ने घोषणा की कि, बाघ को एक साल की जेल होगी!
राजा का फैसला गधे ने सुना और वह पूरे जंगल में खुशी से झूम रहा था!

बाघ को एक साल की जेल की सजा सुनाई गई! बाघ शेर के पास गया और पूछा, क्यों महाराज ! घास हरी है, क्या यह सही नहीं है?

शेर ने कहा – हाँ! घास हरी है!
बाघ ने कहा तो मुझे जेल की सजा क्यों दी गई है?

शेर ने कहा, आपको घास नीले या हरे रंग के लिए सजा नहीं मिली, आपको उस मूर्ख गधे के साथ बहस करने के लिए दंडित किया गया है! आप जैसे बहादुर और बुद्धिमान जीव ने गधे से बहस की और निर्णय लेने के लिए मेरे पास आये!

जरा सोचे, क्या कभी कभार अपने को समझदार और ज्ञानी मानकर हमको भी अपने जीवन में ऐसे गधों का सामना करना नहीं करना पड़ता?
क्या हम अपने विचारों की सत्यता पर मुहर लगाने की कोशश नहीं किया करते?
और जब हमारे हिसाब से वाजिव उत्तर हमें नहीं मिलता तो हम भ्रमित नहीं होते?

इसलिय जरूरी यही है कि इस परिवर्तन से परिपूर्ण संसार में भ्रमित नहीं होना है और अपने रोल को, अपने लक्ष्य को, अपने समय को अपने लिय जीना है!
क्योंकि यह हमको जीवन दूसरों के लिय नहीं बल्कि अपने जीवन का आनन्द लेने के लिय मिला है!

मृत्यु अवश्यम्भावी है!

मृत्यु अवश्यम्भावी है!

हम सबने क्या कभी किसी पक्षी को मरते देखा?
ऐसे सरल, ऐसे सहज, चुपचाप विदा हो जाता है! पंख भी नहीं फड़फड़ाता। शोरगुल भी नहीं मचाता। पक्षी तो इतने चुपचाप विदा हो जाते हैं,  इतनी सरलता से विदा हो जाते हैं! ज़रा नोच-खचोंट नहीं। ज़रा शोरगुल नहीं। मौत में भी एक अपूर्व शांति होती है।

वही जब आदमी को मरते देखो तो कितना उपद्रव मचाता है, कितना रोकने की अपने को चेष्टा करता है!

इसका क्या कारण होता होगा?

कारण एक ही है – उस समय स्पष्ट महसूस होता है कि अनमोल जिंदगी व्यर्थ गई और बेरहम मौत आ गई – वही एक पल और जीने की छटपटाहट होती है!

लेकिन अब आगे कोई समय बचा ही नहीं। *खाली आए और खाली गए! जीवन में कुछ भराव नहीं और यह मौत आ गई।
ऐसे में इन्सान तड़फे नहीं तो क्या करे ?

जिन लोगों को समय के सदगुरु का सानिध्य मिलता है – वे इस अवागमन के दुःख से बच जाते हैं! क्योंकि गुरुमहाराजी बतलाते हैं कि -तुम खाली हाथ आये जरूर थे पर तुमको खाली हाथ जाने की जरूरत नहीं है!

यही कारण है कि प्राचीन ऋषि मनीषी अंत समय में समांधिष्ट हो जाते थे! जिसने भी यह समझ लिया हो कि वह निश्चित समय के लिय यहाँ मुसाफिर के रूप में आया है और उसने अपने जीवन में जीवन का जीते जी आनन्द भी लिया हो वह व्यक्ति शांति से, उल्लास से, उमंग से विदा होते हैं!

जैसे किसी प्यारी यात्रा पर जा रहे हों! ज़रा भी, क्षण-भर के लिय, कण-भर का भी उन्हें मोह नहीं होता उनको अपनी जीवन नैया के इस तट से बंधे रहने का कोई लालच नहीं होता, वे छोड़ देते अपनी नाव को उस पार जाने के लिय। खोल देते अपने पंख। यही सोच कर कि कूच करने की विराट पुकार आ गई, वह आवाज, संदेश आ गया।

फिर रुकना कैसा? जब इस तट को खूब जी लिया, मन भर कर जी लिया जी भरकर जी लिया! इस तट के गीत भी सुन लिए, इस तट का गीत भी गा लिया। इस तट के नृत्य भी देख लिए, इस तट का नाच भी नाच लिया। इस तट पर जो भी सुंदर था, जो भी मूल्यवान था, सबका स्वाद ले लिया। जाने की घड़ी आ ही गई। अब और तटों पर होंगे। अब और नृत्य और गीत उठेंगे। अब और दीए जलेंगे। एक उल्लास है। एक जाने की तत्परता है। अगर गीत न गाया गया हो तो मुश्किल खड़ी होती है।

मृत्यु उनके लिय पीड़ादायक अवश्य है – जिन्होंने जीते जी इस जीवन का गीत गाया नहीं है। गीत गाने की तो बात दूर, उनके साज भी टूट गया है। वीणा के तार भी उखड़ गए हैं। वाद्य भी विकृत हो गया है। आवाज भी मर गई है। वह आवाज जो गीत गाने को दी गई थी – वह दूसरों को गालियां देते-देते मर गई है। ये प्राण जो प्रार्थना के लिए दिए थे- उनका प्रार्थना से तो कोई संबंध ही न जुड़ा! सारी शक्ति पद-प्रतिष्ठा की आपा-धापी में ही लग गये! ये धड़कनें जो परमात्मा के साथ नाचने के लिए थीं – इन्हें भी झूठे प्यार में बिता दिया!

जब लोग आत्मा बेच कर मरते हैं – तो रोते हुए मरते हैं, पछताते हैं!
यह पछतावा न हो – महाराजी बतलाते हैं कि जीते जी उस शान्ति से सम्बन्ध बना लो क्योंकि शांति सम्भव है!

जीवन एक यात्रा है इसे जबरदस्ती तय ना करें,
बल्कि इस यात्रा को जबरदस्त तरीके से तय करें।
मृत्यु के डर से तड़पने की बजाए
जीवन को संयमित रहते हुए
सेवा, सत्संग और अभ्यास के द्वारा जीवन का उत्सव बनाएं
जिससे विदा की बेला में पछताना ना पड़े।