आत्मा के दर्शन

💓 *आत्मा के दर्शन* 💓

संत महात्मा जन बताते हैं कि *यदि एक हीरे को कीचड़ में डाल दिया जाए तो भी वह हीरा ही रहता है । कीचड़ से आच्छादित होने के बावजूद जिस क्षण उसे धोया जाएगा, उसी समय वह पहले की तरह चमकीला और प्रकाशमान हो जाएगा ।*

सदियों से उन्होंने यह भी बतलाया हैं कि *आत्मा भी एक हीरे के समान दीप्तियुक्त है । वह अपने आप में तो विशुद्ध है! पर विषयाशक्त कामनाओं के वशीभूत होकर अंधकार और बुराइयों से आच्छादित हो गई है।*

इस काले पर्दे को हटा देने के लिए यदि उपाय किये जाएं तो *उसी चिन्मय रूप में पूर्ववत् आत्मा फिर से चमकने लगेगी।*

लेकिन याद रखो कि *ये उपाय पूर्ण सद्गुरु से ही सीखने पड़ेंगे। उनकी आज्ञा के अनुसार आचरण करने से हमें छिपी हुई देदीप्यमान आत्मा के दर्शन हो जाएंगे!*

महापुरुषों ने यह भी समझाया हैं कि *मनुष्य की सर्व इच्छाओं, कामनाओं तथा वासनाओं के पीछे आत्मा की यह लालसा सर्वदा बनी रहती है कि उसका नित्य अस्तित्व हो, उसे पूर्ण ज्ञान हो और उसे अमर आनंद मिले। जब सत्-चित्-आनंद की अनुभूति होती है, तब उसकी अभीष्ट अभिलाषा पूरी हो जाती है। वह पूर्ण जो हम सभी में विद्यमान है, उसी से हमारी आत्मा की चेतना ओतप्रोत है तथा समाहित है।*

याद रहे कि *हम मिथ्या अहंकार तथा अज्ञान के कारण उस अध्यात्मिक वृत्ति को भूल ही जाते हैं। लेकिन समय के सद्गुरू के सानिध्य से, उनकी कृपा से ही वह आत्म ज्ञान तथा आत्मा की अनुभूति पाकर मुक्ति प्राप्त की जा सकती है ।*

प्रेम और परमात्मा

*🙏❣प्रेम और परमात्मा ❣🙏*

रामानुज एक गांव में ठहरे थे और एक आदमी ने आकर कहा कि *मुझे परमात्मा को पाना है।*
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तो उन्होंने कहा कि *तूने कभी किसी को प्रेम किया है?* उस आदमी ने कहा, *इस झंझट में मैं कभी पड़ा ही नहीं। प्रेम वगैरह की झंझट में नहीं पड़ा। मुझे तो परमात्मा को खोजना है।*
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रामानुज ने कहा, *तूने कभी झंझट ही नहीं की प्रेम की?*
उसने कहा, *मैं बिल्कुल सच कहता हूं आपसे।*
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और बेचारा ठीक ही कह रहा था। *क्योंकि धर्म की दुनिया में प्रेम एक डिस-क्वालिफिकेशन है, एक अयोग्यता है।*
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तो उसने सोचा कि *अगर मैं कहूं किसी को प्रेम किया है, तो वे कहेंगे, अभी प्रेम-व्रेम छोड़, यह राग-वाग छोड़, पहले इन सबको छोड़ कर आ, तब इधर आना।*
तो उस बेचारे ने किया भी हो तो वह कहता गया कि *मैंने नहीं किया है, नहीं किया है।*
ऐसा कौन आदमी होगा जिसने थोड़ा-बहुत प्रेम नहीं किया हो?
❤️
रामानुज ने तीसरी बार पूछा कि *तू कुछ तो बता, थोड़ा-बहुत भी कभी भी किसी को?*
उसने कहा, *माफ करिए, आप क्यों बार-बार वही बात पूछे चले जा रहे हैं? मैंने प्रेम की तरफ आंख उठा कर नहीं देखा। मुझे तो परमात्मा को खोजना है।*
❤️ ❤️

तो रामानुज ने कहा, *मुझे क्षमा कर, तू कहीं और खोज। क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि अगर तूने किसी को प्रेम किया हो तो उस प्रेम को फिर इतना बड़ा जरूर किया जा सकता है कि वह परमात्मा तक पहुंच जाए। लेकिन अगर तूने प्रेम ही नहीं किया है तो तेरे पास कुछ है ही नहीं जिसको बड़ा किया जा सके। बीज ही नहीं है तेरे पास जो वृक्ष बन सके। तो तू जा, कहीं और पूछ।*
प्रेम का बंधन ही भक्त के लिय सशक्त माध्यम है अपने प्रभु को पाने के लिय – ऐसे कई प्रसंग हैं!
कहा भी है –
*प्रबल परम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा!*
*अपना मान भले टल जाये, पर जन का मान न टलते देखा!!*
🌺🌹❤ ❤️🌹🌺

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका।यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका।
यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गंवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि *तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है।*

इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन *ध्यान रहे केवल 5 मिनट।*

उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि *उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है।*

उसने वहां लिख दिया कि *उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले।*

अगले पेज पर लिखा था कि *उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है!*
तो उसने लिख दिया कि *उसका दोस्त चुनाव हार जाए।*

इस तरह, वह पेज पलटता रहा और अंत में *उसे अपना पेज दिखाई दिया।*

जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा *वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ, अब कुछ नहीं हो सकता।*

*तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत कर दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया।*

अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया क्योंकि *सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था।*

“शिक्षा”
यदि ईश्वर ने हमको कोई भी शक्ति प्रदान की है तो *अपना समय कभी भी किसी की बुराई करने में ना बिताएं बल्कि अपना आत्मनिरीक्षण करें, अपने अन्दर दूसरों के लिय सदभाव रखें और एक कंजूस की तरह अपने हर पल को सुमिरन में लगाएं! दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा भी उस पर सदा उस पर बनी रहती है!*

माँ की ममता औऱ पिता की क्षमता का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता

“माँ की ममता औऱ पिता की क्षमता का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता..”

आज की कहानी माता पिता के प्यार की है | जीवन में आप कितने ही रिश्ते निभा लो मगर जो सच्चाई माँ बाप के प्यार में मिलेगी वो दुनिया में आप को कही नहीं मिले गी | अपना सब कुछ खो कर माँ बाप हमको बनाते है पर पता नहीं क्यू कुछ बनने के बाद बच्चे अपने माँ बाप को क्यू भूल जाते है |

यह कहानी है संदीप मिश्रा की | संदीप अपनी पत्नी गीता के साथ दिल्ली में लक्ष्मी नगर में एक छोटे से घर में रहता था | उसने ये घर किराए पे लिया था जिसका वो हर महीने 8000 रुपए देता था | संदीप के माता पिता कुशी नगर गाव में रहते थे जो की उत्तर प्रदेश में है | संदीप के पिता किसान थे | संदीप पढ़ लिख कर दिल्ली चला गया और वहा उसे अच्छी नौकरी भी मिल गई | लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहर में खरचे भी बहुत होते है | संदीप कमाता तो अच्चा था पर बहुत कम ही saving कर पाता था | कई महीने से संदीप अपने काम में बहुत ज्यादा व्यस्त हो गया था | उसको कुछ पैसो की परेशानी भी हो गई थी | वो आज कल काफी चिंता में रहता था |

एक दिन सुबह सुबह जब संदीप पूजा कर रहा था तब अचानक से घर की घंटी बजती है | संदीप की पत्नी गीता दरवाजा खोलती है और देखती है सामने तो उसके ससुर जी खड़े है | गीता उनके पैर छू कर उन्हें प्रणाम करती है और वही संदीप अपने पापा को देख कर चिंता में आ जाता है | संदीप को उसके पापा आवाज़ लागते है “क्या हुआ खुश नहीं हो हमें देख कर” | संदीप नहीं नहीं पापा आप को अचानक देखा तो bas यू ही | संदीप उनके पैर छू कर उन्हें कमरे में ले आता है | संदीप और गीता एक दुसरे से आँखों ही आँखों में बाते कर रहे होते है | संदीप का हाथ वैसे ही टाइट था और उसे डर था की कही पापा उस से कोई पैसो की मदद तो नहीं लेने आए | संदीप ने कई महीनो से अपने घर में कोई पैसा नहीं भेजा था |

वही गीता पापा को चाय पिला कर, उनके नहाने के लिए पानी गरम कर रही होती है | संदीप के पापा उनसे पूछते है “बेटा सब ठीक तो है न” तू उदास क्यू दिख रहा है | संदीप कहता है ऐसा कुछ नहीं है पापा, सब ठीक है | संदीप अपने दिमाग में सोचता है की कही पापा ने पैसे मांगे तो मै क्या बोलूँगा, पैसो का इंतजाम कैसे करूँगा तभी उसके पापा बोलते है फिर कहा खो गए बेटा, संदीप नहीं पापा कही नहीं | तभी गीता आवाज़ लगा के कहती है “आई पापा पानी गरम हो गया है नहा लीजिये” | जैसे ही वो नहाने जाते है तब गीता संदीप से पूछती है “पापा क्यू आए है, कही उनको पैसो की तो जरुरत नहीं” | संदीप कहता है पता नहीं उसी बात की तो मुझे चिंता है | गीता बोली अब क्या होगा कुछ समझ नहीं आ रहा | इतने में संदीप के पापा बहार आ जाते है | गीता उनसे खाने के लिए पूछती है तो वे कहते है “आज तो मै अपने बेटे बहु के साथ खाऊंगा” | गीता जल्दी से खाना लगा देती है और सब मिल के खाना खाने के लिए बैठ जाते है | एक अजीब सी खामोशी भी उनके आस पास होती है | संदीप के पापा गाव की बाते करने लगते है और संदीप सिर्फ हमम हमम कर रहा होता है और वही गीता भी सर निचे कर के सिर्फ खाने में देख रही होती है | उन दोनों को डर था कही ज्यादा बात करने से पापा उनसे पैसे ना मांग ले | दोनों ही पापा को एक तरह से ignor कर रहे थे | लेकिन संदीप के पापा का ध्यान बातो और खाने में था | वे अपने बेटे से इतने दिनों बाद मिले थे तो वे बहुत खुश थे |

संदीप के पापा संदीप से पूछते है अच्छा तम्हारा काम कैसे चल रहा है, अब संदीप को और डर लगता है की अब तो पक्का थोड़ी देर बाद पापा पैसे मांगे गे | संदीप सब ठीक है पापा | संदीप के पापा बेटा तम्हारे चहेरे से तो नहीं लगता | कोई परेशानी है तो हम को बताओ हम ठीक कर देंगे | तभी संदीप सोचता है अभी मै इनको अपनी परेशानी बताऊंगा तो फिर ये भी मुझे अपनी परेशानी बताएँगे | वही गीता भी डरी बैठी थी की कही पापा कुछ मांग ना ले |

खाना खाने के बाद जब सब कमरे में बैठे तो संदीप के पापा ने उसके हाथ में 30000 रुपये दिए | संदीप और गीता जैसे हैरान ही हो गए | संदीप पापा ये क्या | संदीप के पापा बोले रख लो बेटा तुम्हे जरुरत में काम आएगा | इस बार गाव में फसल अच्छी हुई है और फसलो के दाम भी अच्छे मिले है | तेरी माँ और मुझे तो कुछ ख़ास जरुरत नहीं पर तू तो बड़े शहर में रहता है, तुझे जरुरत पड़ती रहती होगी | बड़े शहर के खर्चे भी बड़े होते है बच्चे | ये सब देख कर जैसे संदीप और गीता अपने ही आँखों में गिर गए थे | दोनों ये सोच रहे थे कि हम कितने स्वार्थी है, एक बार भी पापा से उनका हाल नहीं पूछा | और पापा है कि बिन कहे ही हमारी परेशानी समझ गए | दोनों के आँखों में जैसे पानी ही आ गया |

तभी संदीप के पापा संदीप से कहते है, बेटा कभी कभी हम से मिलने आ जाया करो | तम्हारी माँ दरवाज़े में खड़ी तुम्हारी रहा देखती है | हम दोनों के लिए तो सब कुछ तुम ही हो | मानते है तुम शहर में काफी व्यस्त रहते होंगे पर कभी कभी हमें याद किया करो | बस अपना हाल सुना दिया करो कि तुम दोनों ठीक हो | बस इतना सुनने के लिए ही हम जीते है | ये सुन कर संदीप पापा के गले लग कर रोने लगा | अरे बेटा, क्या हुआ | संदीप कुछ नहीं पापा, आज फिर से आपने मुझे याद दिला दिया की मै आज भी आप का बेटा हु और आप मेरे पापा | आगे से आप को शिकायत का मौका नहीं दूंगा | संदीप के पापा, चल ab रोना बंद कर, मै हस कर जाना चाहता हु | संदीप, आप अभी चले जाएंगे, नहीं पापा कुछ दिन तो रुको | नहीं बेटा तेरी माँ घर में अकेली है और मुझे भी जरुरी काम है | किसी और दिन जरुर रुकुंगा | इस के बाद संदीप हर महीने अपने माता पिता को मिलने जाने लगा और अब तो गीता भी संदीप को हर महीने माँ पापा से मिलने को कहती |

हम कितने ही बड़े क्यू न हो जाए मगर हम अपने माँ बाप के लिए हमेशा बच्चे ही रहते है | हम अपना समय हर किसी को देते है पर कही ना कही हम उनको भूल जाते है जिन्होंने हमारे लिए अपना सब कुछ त्यागा है | माँ बाप अपने बच्चो का चेहरा देख के सब पता लगा लेते है कि उन्हें क्या चाहिए | उसी तरह से हमारा भी येही फ़र्ज़ बनता है कि हम इस बात का ध्यान रखे कि उनको क्या चाहिए..😊 |

भूले मन समझ के लाद लदनियां

एक बार मैं एक होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नाश्ता करने गया। क्योंकि नाश्ता का समय साढ़े दस बजे तक ही होता है, इसलिए होटल वालों ने बताया कि जिसे जो कुछ लेना है, वो साढ़े दस बजे तक ले ले। इसके बाद बुफे बंद कर दिया जाएगा।

कोई भी आदमी नाश्ता में क्या और कितना खा सकता है? पर क्योंकि नाश्ताबंदी का फरमान आ चुका था इसलिए मैंने देखा कि लोग फटाफट अपनी कुर्सी से उठे और कोई पूरी प्लेट फल भर कर ला रहा है, इडली, डोसा उठा लाया तो एक आदमी दो-तीन गिलास जूस के उठा लाया। कोई बहुत से टोस्ट प्लेट में भर लाया और साथ में शहद, मक्खन और सरसो की सॉस भी।

मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठ कर ये सब देखता रहा ।

एक-दो मांएं अपने बच्चों के मुंह में खाना ठूंस रही थीं। कह रही थीं कि फटाफट खा लो, अब ये रेस्त्रां बंद हो जाएगा।

जो लोग होटल में ठहरते हैं, आमतौर पर उनके लिए नाश्ता मुफ्त होता है। मतलब होटल के किराए में सुबह का नाश्ता शामिल होता है। मैंने बहुत बार बहुत से लोगों को देखा है कि वो कोशिश करते हैं कि सुबह देर से नाश्ता करने पहुंचें और थोड़ा अधिक खा लें ताकि दोपहर के खाने का काम भी इसी से चल जाए। कई लोग इसलिए भी अधिक खा लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुफ्त का है, तो अधिक ले लेने में कोई बुराई नहीं।

कई लोग तो जानते हैं कि वो इतना नहीं खा सकते, लेकिन वो सिर्फ इसलिए जुटा लेते हैं कि कहीं कम न पड़ जाए।

दरअसल हर व्यक्ति अपनी खुराक पहचानता है। वो जानता है कि वो इतना ही खा सकता है। पर वो लालच में फंस कर ज़रूरत से अधिक जुटा लेता है।

मैं चुपचाप अपनी कुर्सी से सब देखता रहा।

साढ़े दस बज गए थे। रेस्त्रां बंद हो चुका था। लोग बैठे थे। टेबल पर खूब सारी चीजें उन्होंने जमा कर ली थीं। पर अब उनसे खाया नहीं जा रहा था। कोई भला दो-तीन गिलास जूस कैसे पी सकता है? बहुत सारे टोस्ट। कई बच्चे मां से झगड़ रहे थे कि उन्हें अब नहीं खाना। मांएं भी खा कर और खिला कर थक चुकी थीं और अंत में एक-एक कर सभी लोग टेबल पर जमा नाश्ता छोड़ कर धीरे-धीरे बाहर निकलते चले गए। मतलब इतना सारा जूस, फल, ब्रेड सब बेकार हो गया।

🌟 यही बात हम सबकी ज़िंदगी के साथ भी देखने को मिलती है। 🌟

हम सब अपनी भूख से अधिक जुटाने में लगे हैं। हम सभी जानते हैं कि हम इसका इस्तेमाल नही कर पाएंगे। हम जानते हैं कि हमारे बच्चे भी इसे नहीं भोग पाएंगे। पर हम अपनी-अपनी टेबल पर ज़रूरत से अधिक जुटाते हैं।

जब हम जुटाते हैं तो हम इतने अज्ञानी नहीं होते कि हम नहीं जानते कि हम इन्हें पूरी तरह नहीं खा पाएंगे। हम जानते हैं कि हम इन्हें छोड़ कर दबे पांव शर्माते हुए रेस्त्रां से बाहर निकल जाएंगे, सबकुछ टेबल पर छोड़ कर। अच्छा तो यही होता कि हमारी समझ में आ जाय ….

उतना ही जमा कीजिए, जितने की आपको सचमुच ज़रुरत है।

ये दुनिया एक रेस्त्रां है।
कोई इस रेस्त्रां में सदा के लिए नहीं बैठ सकता।
कोई इस रेस्त्रां में लगातार नहीं खा सकता।

सबके खाने की सीमा होती है। रेस्त्रां में सबके रहने की भी अवधि तय होती है।
इसलिय,
उतना ही लीजिए, जिसमें आपको आनंद आए। उतना ही जुटाइए जितने से आपकी ज़रूरत पूरी हो सके। .
बाकी सब यहीं छूट जाता है। चाहे नाश्ता हो या कुछ और…

हम में से बहुत से लोग संसार रूपी रेस्त्रां से बहुत से लोगों को टेबल पर ढेर सारी चीज़ें छोड़ कर जाते हुए देखते हैं।
पर फिर भी नहीं समझते कि हमें कितने की ज़रूरत है।

हम जानते हैं कि हम भी सब छोड़ जाएंगे, लेकिन जुटाने के चक्कर में, जो है, हम उसका स्वाद लेना भी छोड़ देते हैं।
सदगुरु समझाते भी हैं कि –
भूले मन समझ के लाद लदनियां..
😔😔😔

भक्त और भगवान्

भक्त और भगवान्*
भगति कि साधन कहउँ बखानी।
सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥

मित्रों, जिस दिन भक्ति खो गई समझो उस दिन धर्म भी खो गया!
भक्ति है तो भगवान हैं!
और उनका भक्त भी, भक्ति के हटने पर धर्म कट्टर सिद्धांत के संपुट में बंद हो जाता है और मजहबी उन्माद बनकर सामाजिक समरसता को भंग कर सकता है!
परमात्मा को तभी जाना जा सकता है जब भक्ति का आनंद आंसू बनकर झरने लगता है।

प्रकृति के चारों तरफ उत्सव ही उत्सव है!
पक्षियों के कलरव में, पहाड़ों के सन्नाटो में, वृक्षों के शीतलताओ में, सागरों के गहराईयों में परमात्मा मौजूद है!
आप अगर ऐसा नहीं देख पा रहे हैं तो इसके लिए स्वयं जिम्मेदार हैं!
उत्सवी भक्ति परमात्मा से मिलाती है शास्त्र की बुद्धिविलासी चर्चाओं में वह नहीं है।

जब भाव विभोर होकर भक्त नाचता है तभी भगवान प्रकट होते हैं!
भक्ति में अद्भुत शक्ति होती है, यह भक्ति ईश्वर को भी प्रभावित करती है और उन्हें भक्त को गले लगाने के लिए मजबूर कर देती है!
सच्चे मन से की जाने वाली भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती!
ईश्वर उनकी अवश्य सुनता है जो उसे साफ मन से याद करते हैं!
सच्चा भक्त मिल गया तो समझे कि भगवान तुरंत मिलने वाले हैं।

जब तक हृदय की वीणा नहीं बजेगी तब तक परमात्मा समझ में नहीं आएगा! धर्म तर्क-वितर्क का विषय नहीं है! जैसे भोगी शरीर में उलझा रहता है वैसे बुद्धिवादी बुद्धि में उलझे रहते हैं! अंत में दोनों चूक जाते हैं, क्योंकि भगवान हृदय में है, परमात्मा इतना छोटा नहीं है कि उसे बुद्धि में बांधा जाये इसलिये परमात्मा की कोई परिभाषा नहीं है।

प्राणों में प्रेम के गीत उठते ही भगवान् भक्त के पास दौड़े चले आते है! भक्ति प्यास कि तरह ही है, जब धरती भीषण गरमी में प्यास से तड़पने लगती है तभी बादल दौड़े हुए आते हैं और उसकी प्यास बुझाते हैं।

जब भीतर विरह की अग्नि जलेगी तभी प्रभु की करुणा बरसेगी! छोटा शिशु जब पालने पर रोता है तो मां सहज ही दौड़ी चली आती है! इसी तरह भक्त के भजन में ऐसी ताकत होती है कि भगवान अपने को रोक नहीं सकते, आखिर सारे भजन तो तड़पते भक्त के आंसुओं की ही छलकन हैं।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।
प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं!
श्रवण (परीक्षितजी की तरह), कीर्तन (शुकदेवजी की तरह), स्मरण (प्रह्लादजी की तरह), पादसेवन (लक्ष्मीजी की तरह), अर्चन (पृथुराजा की तरह), वंदन (अक्रूरजी की तरह), दास्य (हनुमानजी की तरह), सख्य (अर्जुन की तरह) और आत्मनिवेदन (बलि राजा की तरह) इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं।

🌻 धार्मिक प्रश्नोतरी🌻

🌻 धार्मिक प्रश्नोतरी🌻

प्रश्न.1.श्री कृष्ण के धनुष का क्या नाम था?
उत्तर – शारंग
प्रश्न.2. अर्जुन के धनुष का क्या नाम है?
उत्तर- गांडीव
प्रश्न.3. शिव के धनुष का क्या नाम था?
उत्तर- पिनाक
प्रश्न.4. राम का नामकरण किस ऋषि ने किया था?
उत्तर- वशिष्ठ
प्रश्न.5. कृष्ण के कुलगुरु कौन थे?
उत्तर- गर्गाचार्य
प्रश्न.6. कृष्ण के शिक्षा गुरु कौन थे?
उत्तर- महार्षि सांदीपनि
प्रश्न.7. संजय को दिव्य दृष्टि किसने प्रदान की थी?
उत्तर- वेदव्यास
प्रश्न.8. शिखण्डी राजा किसके पुत्र थे?
उत्तर – द्रुपद
प्रश्न.9.अर्जुन को गांडीव किसने दिया था?
उत्तर – वरुण
प्रश्न.10. अहिल्या किसकी पत्नी थी?
उत्तर- महार्षि गौतम ऋषि
प्रश्न.11. वेदव्यास के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर- पराशर
प्रश्न.12. पांडवों के राज पुरोहित कौन थे?
उत्तर- धौम्य
प्रश्न.13. गुडाकेश किसका नाम था?
उत्तर- अर्जुन
प्रश्न.14. महाभारत में ऋषि किंडम ने किसे श्राप दिया था?
उत्तर- पाण्डु

प्रश्न.15. महाभारत में गृहस्थ आश्रम का वर्णन किसने किससे किया था?
उत्तर – शिव ने पार्वती से।
प्रश्न.16.महाभारत में कितने श्लोक हैं?
उत्तर – एक लाख शत सहस्री।
प्रश्न.17. शुकदेव किसके पुत्र थे?
उत्तर- वेदव्यास
प्रश्न.18. शुकदेव की पत्नी का क्या नाम था?
उत्तर- पीवरी
प्रश्न.19 शुकदेव की माता का नाम क्या था?
उत्तर- वाटिका
प्रश्न.20. बलराम के पिता का क्या नाम था?
उत्तर- वसुदेव
प्रश्न.21. अहिल्या को किसने श्राप दिया था?
उत्तर- महार्षि गौतम ।
प्रश्न.22. देवताओं के सेनापति कौन थे?
उत्तर – कार्तिकेय
प्रश्न.23. असुरों के गुरू कौन थे?
उत्तर- शुक्राचार्य
प्रश्न.24. देवताओं के गुरु कौन थे?
उत्तर – बृहस्पति
प्रश्न.25. पुत्रमोह के लिए कौन प्रसिद्ध थे?
उत्तर- धृतराष्ट्र
प्रश्न.26.भीष्म की माता का नाम क्या था?
उत्तर- गंगा
प्रश्न.27. कर्ण के गुरु थे?
उत्तर- परशुराम।
प्रश्न.28.कृपाचार्य अश्वत्थामा के कौन थे?
उत्तर- मातुल
प्रश्न.29. नरक के कितने द्वार हैं?
उत्तर- तीन 1. काम 2. क्रोध 3.मोह
प्रश्न.30.योगी कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर आठ (१. कर्मयोगी २.ज्ञानयोगी ३.ध्यानयोगी ४.लययोगी ५.हठयोगी ६.राजयोगी ७.मंत्रयोगी ८.अनाशक्तयोगी)।
प्रश्न.31 महाभारत का युद्ध किस युग में हुआ था ?
उत्तर – द्वापरयुग।
प्रश्न.32. धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे?
उत्तर- 101 । पुत्री की नाम – दुःशला
प्रश्न.33. बलराम की पत्नी का नाम क्या था?
उत्तर- रेवती
प्रश्न.34. इन्द्र की पत्नी का नाम क्या था?
उत्तर – शची
प्रश्न.35. पांडव भाईयों में ज्यैष्ठ कौन थे?
उत्तर- युधिष्ठिर
प्रश्न. 36. अर्जुन को मारने की प्रतीज्ञा किसने की थी?
उत्तर – कर्ण
प्रश्न.37. कुंती के ज्यैष्ठ पुत्र कौन था ?
उत्तर – कर्ण
प्रश्न.38. धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशला का विवाह किसके साथ हुआ था?
उत्तर- जयद्रथ
प्रश्न.39.योग कितने होते हैं?
उत्तर- 27
प्रश्न.40. कितने संवत् सर होते हैं?
उत्तर- 60
प्रश्न.41. ऋषि तर्पण किस दिशा में करना चाहिए?
उत्तर- उत्तर दिशा
प्रश्न.42.देव तर्पण किस दिशा में करना चाहिए?
उत्तर- पूर्व दिशा
प्रश्न.43.पितृ तर्पण किस दिशा में करना चाहिए?
उत्तर- दक्षिण दिशा में
प्रश्न.44. राम के कुलगुरु कौन थे?
उत्तर- वशिष्ठ
प्रश्न.45. राम को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा गुरु कौन थे?
उत्तर- विश्वामित्र
प्रश्न.46.सीता का जन्म कब हुआ था?
उत्तर- वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी तिथि पुष्य नक्षत्र
प्रश्न.47. गंगा अवतरण आख्यान किस काण्ड में वर्णित है?
उत्तर- बालकाण्ड
प्रश्न.48. रामायण में कुल कितने सर्ग हैं?
उत्तर- 500 सर्ग
प्रश्न.49. गंगा दशहरा कब मनाया जाता है?
उत्तर – ज्यैष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी तिथि
प्रश्न.50. राम का जन्म नक्षत्र क्या था?
उत्तर- पुनर्वसु
प्रश्न.51. राम का विवाह कब हुआ था?
उत्तर- मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि
प्रश्न.52. राम का जन्म कब हुआ था?
उत्तर- चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी तिथि
प्रश्न. 53. सीता का जन्म कब हुआ था?
उत्तर – वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी तिथि पुष्य नक्षत्र
प्रश्न.54. जाह्नवी किसका नाम था?
उत्तर- गंगा
प्रश्न.55 गंगा सप्तमी कब मनाई जाती है?
उत्तर- वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी
प्रश्न.56. पृथ्वी पर गंगा का अवतरण किस तिथि को हुआ था?
उत्तर- ज्यैष्ठ शुक्ल पक्ष दशमी
प्रश्न.57. रामायण किस रस की प्रधानता है?
उत्तर- करुण रस
प्रश्न.58. श्री कृष्ण का जन्म किस युग में हुआ था?
उत्तर- द्वापरयुग
प्रश्न.59.कृष्ण के भाई और बहन का क्या नाम था?
उत्तर- बलराम और सुभद्रा
प्रश्न.60. श्री कृष्ण के पालक माता पिता कौन थे?
उत्तर- यशोदा माता , नंदबाबा पिता
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विभीषण को गले से लगाया गया

विभीषण को गले से लगाया गया, सूर्पनखा को दृष्टि तक नहीं मिली। यहाँ तक की जब सुग्रीव ने पूछा कि भगवान आपने विभीषण को लंकापति बना दिया, यदि कल रावण भी शरण में आ गया तो उसे क्या देंगे? राम जी ने कहा कि मैं भरत को वन में बुला लूंगा, रावण को अयोध्या दे दूंगा।
*पूछा गया कि तब सूर्पनखा ने ही ऐसा कौन सा अपराध कर दिया, आप स्वीकार न करते, कम से कम एक बार नजर तो डाल देते।*
💫🌟〰️〰️
और भी देखें, उधर कृष्णलीला में, *भगवान ने पूतना के आने पर आँखों को बंद कर लिया, जबकि कुब्जा को स्वीकार कर लिया।*
देखें,
*भगवान के दो नियम हैं। एक तो यह कि भगवान को कपट स्वीकार नहीं।* विभीषण और कुब्जा कपटरूप बना कर नहीं आए, जैसे हैं वैसे ही आ गए। *जबकि सूर्पनखा और पूतना कपटवेष बनाकर आई हैं।*

*दूसरे,*
*भगवान तन नहीं देखते, मन देखते हैं।*
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*मन की दो ही धाराएँ हैं, भक्ति या आसक्ति।* और इस देह रूपी पंचवटी में दो में से एक ही होगी। *सीता जी भक्ति हैं, सूर्पनखा आसक्ति है।* भगवान की दृष्टि भक्ति पर से कभी हटती नहीं है, आसक्ति पर कभी पड़ती नहीं है।

*अब आप झांककर देखें, आपके अन्त:करण में कौन है?* यदि वहाँ भक्ति है, तो आप धन्य हैं, आपके भीतर सीता जी बैठी हैं, आपको पुकारना भी नहीं पड़ेगा, भगवान की दृष्टि आप पर टिकी है, टिकी रहेगी। *लेकिन यदि वहाँ आसक्ति का डेरा है, तो आपके भीतर सूर्पनखा का राज चल रहा है, आप लाख चिल्लाओ, भगवान चाहें तो भी आप पर कृपा दृष्टि डाल नहीं सकते।*
भगवान की दृष्टि में मन का सौंदर्य ही सौंदर्य है। इसीलिए भगवान के लिए जीर्ण शीर्ण बूढ़ी शबरी सुंदर है, सूर्पनखा नहीं। जहाँ भक्ति है, वहीं सौंदर्य है, *तन का सौंदर्य तो दो कौड़ी का है। चमड़ी की सुंदरता पर जो रीझ जाए, वह तो मूर्ख है, अंधा है। मन सुंदर हो, तब कुछ बात है*🙏

करले भजन की कमाई, क्या है भरोसा इस देह का।।

करले भजन की कमाई, क्या है भरोसा इस देह का।।

स्वांस पवन का अंदर बाहर रहता आना-जाना
बाहर का बाहर रह जावे, अंदर नहीं ठिकाना
काया किस काम आई, क्या है भरोसा इस देह का।।

स्वारथ वाले हैं जग वाले, जो शमसान जलावे।
हंस बिचारा जाय अकेला, कोई साथ नहीं जावे
प्रीति किस ने निभाई, क्या है भरोसा इस देह का।

अपनी करनी से पावेगा, योनि लख चौरासी।
हर योनि में भोग मिलेंगें, मिले नहीं अविनाशी
नाहक उमर गवाई, क्या है भरोसा इस देह का।।

करी कमाई खो दई सारी, अपना आपा भूल गया
मोह माया की बांधा गाँठडी,धन दौलत पै फूल गया
तेरा कोन्या भलाई, क्या है भरोसा इस देह का।।

सतगुरु का ले नाम, ध्यान सुमिरण हर स्वास किये जा
मानुष देह मिली है तुझको, इसको सफल किये जा।।
तेरी इसी में भलाई, क्या है भरोसा इस देह का।।

भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला असली राजा कौन था ?

भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला असली राजा कौन था ?
कौन था वह राजा जिसके राजगद्दी पर बैठने के बाद उनके श्रीमुख से देववाणी ही निकलती थी और देववाणी से ही न्याय होता था?
कौन था वह राजा जिसके राज्य में अधर्म का संपूर्ण नाश हो गया था।

महाराज विक्रमादित्य

बड़े ही दुख की बात है कि महाराज विक्रमादित्य के बारे में देश को लगभग शून्य बराबर ज्ञान है। जिन्होंने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था और स्वर्णिम काल लाया था।
● उज्जैन के राजा थे गन्धर्वसैन , जिनके तीन संताने थी , सबसे बड़ी लड़की थी मैनावती , उससे छोटा लड़का भृतहरि और सबसे छोटा वीर विक्रमादित्य…बहन मैनावती की शादी धारानगरी के राजा पदमसैन के साथ कर दी , जिनके एक लड़का हुआ गोपीचन्द , आगे चलकर गोपीचन्द ने श्री ज्वालेन्दर नाथ जी से योग दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए, फिर मैनावती ने भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग दीक्षा ले ली।
● आज ये देश और यहाँ की संस्कृति केवल विक्रमादित्य के कारण अस्तित्व में है।
अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था।
भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था, देश में बौद्ध और अन्य हो गए थे।

● रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया।
विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया विक्रमादित्य के 9 रत्नों में से एक कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् लिखा। जिसमे भारत का इतिहास है अन्यथा भारत का इतिहास क्या मित्रो हम भगवान् कृष्ण और राम को ही खो चुके थे। हमारे ग्रन्थ ही भारत में खोने के कगार पर आ गए थे।
● उस समय उज्जैन के राजा भृतहरि ने राज छोड़कर श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से योग की दीक्षा ले ली और तपस्या करने जंगलों में चले गए, राज अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को दे दिया. वीर विक्रमादित्य भी श्री गुरू गोरक्ष नाथ जी से गुरू दीक्षा लेकर राजपाट सम्भालने लगे और आज उन्ही के कारण सनातन धर्म बचा हुआ है, हमारी संस्कृति बची हुई है।
● महाराज विक्रमादित्य ने केवल धर्म ही नही बचाया उन्होंने देश को आर्थिक तौर पर सोने की चिड़िया बनाई, उनके राज को ही भारत का स्वर्णिम राज कहा जाता है।
● विक्रमादित्य के काल में भारत का कपडा, विदेशी व्यपारी सोने के वजन से खरीदते थे।
भारत में इतना सोना आ गया था की, विक्रमादित्य काल में सोने की सिक्के चलते थे। आप गूगल इमेज कर विक्रमादित्य के सोने के सिक्के देख सकते हैं।
● कैलंडर जो विक्रम संवत लिखा जाता है वह भी विक्रमादित्य का स्थापित किया हुआ है।
आज जो भी ज्योतिष गणना है जैसे , हिन्दी सम्वंत , वार , तिथीयाँ , राशि , नक्षत्र , गोचर आदि उन्ही की रचना है , वे बहुत ही पराक्रमी , बलशाली और बुद्धिमान राजा थे।
कई बार तो देवता भी उनसे न्याय करवाने आते थे।
विक्रमादित्य के काल में हर नियम धर्मशास्त्र के हिसाब से बने होते थे। न्याय , राज सब धर्मशास्त्र के नियमो पर चलता था। विक्रमादित्य का काल प्रभु श्रीराम के राज के बाद सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जहाँ प्रजा धनी थी और धर्म पर चलने वाली थी।
◆ बड़े दुःख की बात है की भारत के सबसे महानतम राजा विक्रमादित्य के बारे में हमारे स्कूलों कालेजों मे कोई स्थान नही है। देश को अकबर, बाबर, औरंगजेब जैसै दरिन्दो का इतिहास पढाया जा रहा है।