बहन

बहन

बहन की शादी को 6 साल हो गए हैं।

मैं कभी उसके घर नही गया। होली दीपावली, भइया दूज पर कभी-2 मम्मी पापा जाते हैं।

मेरी बीवी एक दिन मुझे कहने लगी आपकी बहन जब भी आती है उसके बच्चे घर के हाल बिगाड़ कर रख देते हैं।
ख़र्च डबल हो जाता है और तुम्हारी मां हमसे छुप, छुपाकर कभी उसको साबुन की पेटी देती है,कभी कपड़े कभी सर्फ के डब्बे और कभी कभी तो चावल का थैला भर देती है ।
अपनी मां को बोलो ये हमारा घर है कोई ख़ैरात सेंटर नही।

मुझे बहुत गुस्सा आया मैं मुश्किल से ख़र्च पूरा कर रहा हूँ और मां सब कुछ बहन को दे देती है। बहन एक दिन घर आई हुई थी,उसके बेटे ने टीवी का रिमोट तोड़ दिया। मैं मां से गुस्से में कह रहा था मां बहन को बोलो कि यहा भैयादूज पर आया करे बस।

और ये जो आप साबुन सर्फ और चावल का थैला भर कर देती हैं ना उसको बन्द करें ।
मां चुप रही लेकिन बहन ने मेरी सारी बातें सुन ली थी, बहन कुछ ना बोली ।
4 बज रहे थे अपने बच्चों को तैयार किया और कहने लगी, भाई मुझे बस स्टॉप तक छोड़ आओ,
मैंने झूठे मुँह कहा, रह लेती कुछ दिन और लेकिन वह मुस्कुराई नही भाई बच्चों की छुट्टियां ख़त्म होने वाली है।

फिर जब हम दोनों भाईयों में ज़मीन का बंटवारा हो रहा था तो मैंने साफ़ इनकार किया,भाई मैं अपनी ज़मीन से बहन को हिस्सा नही दूँगा।

बहन सामने बैठी थी।

वह खामोश थी, कुछ ना बोली मां ने कहा बेटी का भी हक़ होता है लेकिन मैंने गाली दे कर कहा कुछ भी हो जाये मैं बहन को हिस्सा नही दूँगा।

मेरी बीवी भी बहन को बुरा भला कहने लगी। वह बेचारी खामोश रही।

बड़ा भाई अलग हो गया कुछ वक़्त बाद।
मेरे बड़े बेटे को टीबी हो गई,मेरे पास उसके इलाज करवाने के पैसे नहीं थे,मैं बहुत परेशान था, एक लाख रुपया कर्ज भी ले लिया था।

मैं बहुत परेशान था,कमरे में अकेला बैठा अपने हालात पर रो रहा था।

उस वक़्त वही बहन घर आ गई, मैंने गुस्से से बोला अब ये आ गई है मनहूस।

मैंने बीवी को कहा कुछ तैयार करो बहन के लिए ,तो बीवी मेरी पास आ गई ,कोई ज़रूरत नही कुछ भी पकाने की इसके लिए।

फिर एक घण्टे बाद बहन मेरे पास आई ,भाई परेशान हो.?
बहन ने मेरे सर पर हाथ फेरा बड़ी बहन हूँ तुम्हारी।
अब देखो मुझसे भी बड़े लगते हो,फिर मेरे क़रीब हुई अपने पर्स से सोने की कंगन निकाले ,मेरे हाथ में रखे और आहिस्ता से बोली पागल तू ऐसे ही परेशान होता है,

ये कंगन बेचकर अपना कर्जा उतार कर कर बेटे का इलाज करवा।
शक्ल तो देख ज़रा क्या हालत बना रखी तुमने,
मैं खामोश था बहन की तरफ देखे जा रहा था,वह आहिस्ता से बोली किसी को ना बताना कि कंगन के बारे में तुमको मेरी क़सम है।

मेरे माथे को चूमा और एक हज़ार रुपये मुझे दिया ,
जो सौ ,पचास के नोट थे शायद उसकी जमा पूंजी थी मेरी जेब मे डालकर बोली बच्चों को कुछ खाने के लिए ला देना परेशान ना हुआ कर।

जल्दी से अपना हाथ मेरे सर पे रखा,, देख तेरे बाल सफ़ेद हो गए ,वह जल्दी से जाने लगी उसके पैरों की तरफ़ मैं देखा टूटी हुई जूती पहनी थी,पुराना सा दुपट्टा ओढ़ रखी थी जब भी आती थी वही दुपट्टा ओढ़ कर आती।

हम भाई कितने मतलब परस्त होते हैं, बहनों को पल भर में बेगाना कर देते हैं, और बहनें भाईयों का ज़रा सा दुख बर्दाश्त नही कर सकती।

वह हाथ में कंगन पकड़े ज़ोर ,ज़ोर से रो रहा था उसके साथ मेरी आँखें भी नम थी।

अपने घर में #भगवान जाने कितने दुख सह रही होती हैं।
कुछ लम्हा बहनों के पास बैठकर हाल पूछ लिया करें। शायद उनके चेहरे पे कुछ लम्हों के लिए एक सुकून आ जाये।

बहनें मां का रूप होती हैं।

आजकल भाई अपनी बहनों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं ये बताने की जरूरत ही नहीं है और रही बात भाभियों की तो पूछिए ही मत,उनका व्यवहार अपनी नंद के प्रति कितना अच्छा होता है सभी जानते हैं।लगभग 2% से 3% ही कोई ऐसा भाई होंगे जो अपनी बहनों का अच्छे से ख्याल रखते होंगे या भाभियों का व्यवहार ननद के साथ अच्छा होगा।अपनी बहन आए तो कोई बात नहीं और जब पति की बहन आए तो मुसीबत आ जाती हैं।ऐसी सोच है हमारे समाज के अंदर लोगो की।आइए आज से हम सब मिलकर प्रण लें कि हम अपने बहनों का दिल कभी नहीं दुखायेंगे,उन्हें हमेशा घर बुलाएंगे,उनका मान सम्मान करेंगे,कभी कुछ ऐसा नहीं करेंगे जिससे उनके दिल को ठेस पहुंचे।बहन के घर आने से घर में रौनक आ जाती हैं।बहने मां का रूप होती हैं।ये पूज्यनीय हैं।आइए हम सब मिलकर इनका सम्मान करें और अपना सुख दुःख इनके साथ बांटे।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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एक कौआ माँस का बड़ा सा टुकड़ा लिये उड़ रहा था, तभी बाजों के झुँड ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया कौआ बहुत डर गया और उनसे बचने के लिये और ऊँचा उड़ने लगा लेकिन बेचारा कौआ उन ताकतवर बाजों से पीछा नहीं छुड़ा पाया

एक कौआ माँस का बड़ा सा टुकड़ा लिये उड़ रहा था, तभी बाजों के झुँड ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया कौआ बहुत डर गया और उनसे बचने के लिये और ऊँचा उड़ने लगा लेकिन बेचारा कौआ उन ताकतवर बाजों से पीछा नहीं छुड़ा पाया 🦅🦅🦅🦅

तभी एक गरुड़ ने कौए की ये दुर्दशा देखी तो करीब आकर उसने पूछा, “क्या हुआ, मित्र ? तुम बहुत परेशान लग रहे हो!

कौआ रोते हुए बोला, ये बाजों का पूरा झुँड मुझे मारने के लिए मेरे पीछे पड़ा है!

गरुड़ हँसते हुए बोला, वे तुम्हें मारने के लिए नहीं बल्कि माँस के उस टुकड़े के पीछे हैं जिसे तुम अपनी चोंच में कसकर पकड़े हुए हो, इसे छोड़ दो और देखो फिर क्या होता है?

कौए ने गरुड़ की सलाह मानकर माँस का टुकड़ा अपनी चोंच से गिरा दिया फौरन बाजों का पूरा झुँड, गिरते हुए माँस के टुकड़े के पीछे लग गया!

तब कौए ने राहत की साँस ली!
गरुड़ ने उसे समझाया “दुख दर्द केवल तब तक रहते हैं जब तक हम इसे पकड़े रहते हैं।
कारण जानकर उस चीज़ से उस रिश्ते से अपना मोह छोड़ देने से हमारे सारे दुख, हमारी सारी पीड़ा फौरन समाप्त हो जाती है!

कौआ नतमस्तक हो बोला, “आपकी बुद्धिमानी भरी सलाह के लिए धन्यवाद!

🌺हम भी रिश्तों या कीमती चीज़ों को अपना समझते हैं और हमेशा इनका बोझा ढोते रहते हैं जबकि हम ख़ाली हाथ दुनिया में आये थे और यहाँ से जाते समय भी बिल्कुल ख़ाली जाना है! जिस शरीर से आज हमें इतना ज्यादा प्यार है, हमारी मौत के बाद उस शरीर की कोई कीमत नहीं है!

परमात्मा द्वारा रचित खेल में हमें जो भी रोल दिया गया है -उसे बड़ी खुशी से निभाओ, सँसार की किसी भी चीज़ पर या किसी रिश्ते नाते पर अपना हक ना जताओ!

सब कुछ परमात्मा का है! हमारे कर्म ही सिर्फ हमारे अपने है!
असल में आत्मा का सच्चा व स्थाई रिश्ता सिर्फ परमात्मा से है – बाकी सब रिश्ते अस्थाई है!
हम इस संसार में मालिक नहीं मेहमान हैं!

🌺🌺आपका आज का दिन ध्यान सुमिरन में बीते – यही कामना है!🌺🌺

लोकसेवा से प्रसिद्धि

लोकसेवा से प्रसिद्धि

बहुत पहले संजय नाम का एक नवयुवक था। वह हमेशा साधु-महात्माओं का दर्शन किया करता था। उसके लिए वह मठों में तथा तीर्थों में भ्रमण करता था। एक बार वह किसी योगी के साथ रहा। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर योगी ने कहा- ’’हे वत्स! यदि तुम्हारी कोई इच्छा हो तो मैं उसे पूरी कर सकता हूँ।’’ संजय ने हाथ जोङकर कहा, ’’मैं योग का रहस्य जानना चाहता हूँ, इस चमत्कार से ख्याति प्राप्त करना चाहता हूँ।’’

योगी ने उसे योगाभ्यास कराया। उससे संजय ने अपने में विचित्र शक्ति का अनुभव किया। कुछ समय बाद संजय अकेला घूमने निकला। मार्ग में उसने देखा कि कुछ शिकारी लोहे के पिंजरे में सिंह को डाल कर ले जा रहे थे। संजय न अपना योगबल दिखाने के लिए मन्त्रपाठ किया। मन्त्र पढ़ने के साथ ही भयंकर सिंह पिंजरे से निकला। सिंह ने निकल कर शिकारी को मार दिया। अन्य शिकारियों ने पुनःसिंह को पकङ लिया। इस प्रकार उसे देखकर संजय ने हँसते हुए कहा, ’’क्या फिर सिंह को भगा दूँ?’’

शिकारी संजय को जादूगर जान कर मारने दौङा। संजय बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पङा। वह किसी तरह आगे चला। एक पर्वतीय गाँव में, उसने देखा कि लोग पहाङों की अधिकता से खेती करने में असमर्थ हैं। यदि मैं पर्वतों को हटा दूँ तो लोग मेरा सत्कार करेंगे। उसने मन्त्र पाठ किया। धीरे-धीरे पर्वत निकल-निकल कर टूटने आरम्भ हुए। गाँव के घर नष्ट होने लगे। लोग संजय की शरण में गये। संजय पर्वतों को चलाना तो जानता था किन्तु उन्हें रोक नहीं सकता था। इसलिए वह उनका उद्धार न सकता था। लोग संजय को मारने लगे। संजय किसी तरह भाग छूटा और मछुओं के गाँव में पहुँचा जहाँ मछलियों का अभाव था। संजय ने मछुओं को बुलाकर कहा, ’’आज मैं योग का चमत्कार दिखाता हूँ, आप लोग ठहरिये।’’ उसने मन्त्र बल से तालाबों में मछलियाँ भर दीं। मछुओं ने जाल बाँध दिये। घर-घर लोग मछलियाँ पकाने लगे। संजय की महिमाा सर्वत्र फैल गई।

यह एक विचित्र संयोग रहा कि वे मछलियाँ जहरीली थीं। जिन लोगों ने मछलियाँ खाई थीं वे पहले ही मरणासन्न हो गये, कुछ मर गये। बचे हुए लोगों ने लाठियों से संजय को मारना शुरू किया। उनकी चोट से वह पृथ्वी पर गिर पङा। ग्रामीणों ने उसको मरा हुआ मान कर जंगल में गिरा दिया।

आधी रात में जब संजय को होश आया तो वह चिल्लाया। वह स्वयं उठकर नहीं चल सकता। उस जंगल में एक साधु रहता था। जब उसकी चीत्कार सुनी तो साधु ने संजय को उठाया और अपने आश्रम में ले गया। औषधियांे से उसकी पीङा को शान्त किया। प्रातःकाल संजय ने सारी कहानी महात्मा को सुनाई। संजय ने कहा, ’’मैं अलौकिक शक्ति वाला हूँ किन्तु न मेरी प्रतिष्ठा है न मुझे शान्ति है, मैं नहीं जानता कि इसका क्या कारण है?’’

महात्मा ने कहा- ’’हे संजय! इसमें तुम्हारा ही दोष है, तू अपनी शक्ति का सदुपयोग करना नहीं जानता। अहंकार युक्त होकर व्यर्थ ही मिथ्या विज्ञापन और कौतुक प्रदर्शित करते हो। शक्ति का उपयोग तो अहंकार त्याग कर दीनों की सेवा करना है। इसी से यश और सुख प्राप्त होता है। कौतुक तो जादूगर करते हैं।’’ संजय का अज्ञान नष्ट हुआ। महात्मा से लोकशिक्षण की शिक्षा पाकर संजय समाज सेवा में लग गया। उसने अपनी शक्ति का सदुपयोग किया। उसके प्रभाव से कुछ समय बाद उसने संसार में कीर्ति प्राप्त की।

मित्रों” हमें अहंकार को त्याग देना चाहिए तथा परोपकारी कार्य करने चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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*विकारो के पांच गधे*

*विकारो के पांच गधे*

एक महात्मा कहीं जा रहे थे। रास्ते में वो आराम करने के लिये रुके। एक पेड के नीचे लेट कर सो गये नींद में उन्होंने एक स्वप्न देखा कि. “वे रास्ते में जा रहे हैं ,और उन्हें एक व्यापारी मिला, जो पांच गधों पर बड़ी- बड़ी गठरियां लादे हुए जा रहा था। गठरियां बहुत भारी थीं, जिसे गधे बड़ी मुश्किल से ढो पा रहे थे।

साधु ने व्यापारी से प्रश्न किया- *“इन गठरियों में तुमने ऐसी कौन-सी चीजें रखी हैं, जिन्हें ये बेचारे गधे ढो नहीं पा रहे हैं?”*
व्यापारी ने जवाब दिया- *“इनमें इंसान के इस्तेमाल की चीजें भरी हैं। उन्हें बेचने मैं बाजार जा रहा हूं।*

साधु ने पूछा- *“अच्छा! कौन-कौन सी चीजें हैं, जरा मैं भी तो जानूं!”*

व्यापारी ने कहा- *“यह जो पहला गधा आप देख रहे हैं इस पर अत्याचार की गठरी लदी है।*
साधु ने पूछा- *“भला अत्याचार कौन खरीदेगा?”*

व्यापारी ने कहा- *“इसके खरीदार हैं राजा- महाराजा और सत्ताधारी लोग। काफी ऊंची दर पर बिक्री होती है इसकी।*

साधु ने पूछा-*“इस दूसरी गठरी में क्या है?*
व्यापारी बोला- *“यह गठरी अहंकार से लबालब भरी है और इसके खरीदार हैं पंडित और विद्वान।*

*तीसरे गधे पर ईर्ष्या की गठरी लदी है और इसके ग्राहक हैं वे धनवान लोग, जो एक दूसरे की प्रगति को बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसे खरीदने के लिए तो लोगों का तांता लगा रहता है।*

साधु ने पूछा- *“अच्छा! चौथी गठरी में क्या है भाई?”*
व्यापारी ने कहा- *“इसमें बेईमानी भरी है और इसके ग्राहक हैं वे कारोबारी, जो बाजार में धोखे से की गई बिक्री से काफी फायदा उठाते हैं। इसलिए बाजार में इसके भी खरीदार तैयार खड़े हैं।*

साधु ने पूछा- *“अंतिम गधे पर क्या लदा है?”*
व्यापारी ने जवाब दिया- *“इस गधे पर छल-कपट से भरी गठरी रखी है और इसकी मांग उन औरतों में बहुत ज्यादा है जिनके पास घर में कोई काम-धंधा नहीं हैं और जो छल-कपट का सहारा लेकर दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश करती रहती हैं। वे ही इसकी खरीदार हैं।*

*तभी महात्मा की नींद खुल गई।* इस सपने में उनके कई प्रश्नों का उत्तर उन्हें मिल गया।
सही अर्थों में कहें तो *वह व्यापारी स्वयं शैतान था, जो संसार में बुराइयाँ फैला रहा था।*
और *उसके शिकार कमजोर मानसिकता के स्वार्थी लोग बनते हैं।*

शैतान का शिकार बनने से बचने का एक ही उपाय है कि *ईश्वर पर सच्ची आस्था रखते हुवे अपने मन को ईश्वर का मंदिर बनाने का प्रयत्न किया जाय।*
ईश्वर को इससे मतलब नहीं कि *कौन मंदिर गया, या किसने कितने वक्त तक पूजा की!*

पर उन्हें इससे अवश्य मतलब होगा कि *किसने अपने किन अवगुणों का त्याग कर किन गुणों का अपने जीवन में समावेश किया और उसके रचे संसार को कितना सजाया-संवारा!!*

कर भला तो हो भला

कर भला तो हो भला

एक प्रसिद्ध राजा हुआ करते थे जिनका नाम रामधन था। अपने नाम की ही तरह प्रजा सेवा ही उनका धर्म था।

उनकी प्रजा भी उन्हें राजा राम की तरह सम्मान देती थी। राजा रामधन सभी की निष्काम भाव से सहायता करते थे फिर चाहे वो उनके राज्य की प्रजा हो या अन्य किसी और राज्य की।

उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई थी, उनके दानी स्वभाव और व्यवहार के गुणगान उनके शत्रु राजा तक करते थे।

उन राजाओं में एक राजा था भीम सिंह, जिसे राजा रामधन की इस ख्याति से ईर्ष्या हुआ करती थी।

उस ईर्ष्या के कारण भीम सिंह ने राजा रामधन को हराने की एक रणनीति बनाई और कुछ समय बाद रामधन के राज्य पर आक्रमण कर दिया।

भीम सिंह ने छल से युद्ध जीत लिया और रामधन को अपनी जान बचाने के लिए जंगल में जाकर छुपना पड़ा। इतना होने पर भी रामधन की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई।

हर जगह प्रजा उन्हीं की चर्चा करती रहती थी। जिससे भीम सिंह परेशान हो गया और उसने राजा रामधन को मृत्युदंड देने का फैसला किया।

उसने ऐलान किया कि जो राजा रामधन को पकड़कर लायेगा, वे उसे दस हज़ार सोने के दिनार देगा।

दूसरी ओर राजा रामधन जंगलों में ही भटकते रहे। तब उन्हें एक राहगीर मिला और उसने कहा; भाई! तुम इस प्रान्त के लग रहे हो, क्या मुझे राजा रामधन के राज्य का रास्ता बता सकते हो ?

राजा रामधन ने पूछा: तुम्हें क्या काम है राजा से ?

तब राहगीर ने कहा, मेरा बेटा बहुत बीमार है, उसके इलाज़ में मेरा सारा धन चला गया। सुना है राजा रामधन सभी की मदद करते हैं, सोचा उन्हीं के पास जाकर याचना करूँ।

यह सुनकर राजा रामधन राहगीर को अपने साथ लेकर भीम सिंह के पास पहुँचा। उन्हें देख दरबार में सभी अचंभित थे।

राजा रामधन ने कहा– हे राजन ! आपने मुझे खोजने वाले को दस हजार दिनार देने का वादा किया था। मेरे इस मित्र ने मुझे आपके सामने पेश किया है, अतः इसे वो दिनार दे दें।

यह सुनकर राजा भीम सिंह को अहसास हुआ कि राजा रामधन सच में कितने महान और दानी हैं। उसने अपनी गलती को स्वीकार किया।

साथ ही राजा रामधन को उनका राज्य लौटा दिया और सदा उनके दिखाये रास्ते पर चलने का फैसला किया।

दोस्तों इसी को कहते हैं “कर भला तो हो भला।”

कहाँ एक तरफ भीम सिंह राजा रामधन को मारना चाहता था और कहाँ राजा रामधन की करनी देख वो लज्जित हुआ और उन्हें उनका राज्य लौटा दिया और स्वयं को उनके जैसा बनाने में जुट गया।

महान लोग सही कहते हैं “कर भला तो हो भला।” रामधन की करनी का ही फल था जो वो हारने के बाद भी जीत गया।

उसने जिस तरह सभी की मदद की उसकी मदद अंत में उसी के काम आई।

*शिक्षा:-*
मनुष्य को अपने कर्मों का ख्याल करना चाहिये। अगर आप अच्छा करोगे तो अच्छा ही मिलेगा। माना कि शुरू शुरू में कष्ट होता है लेकिन अंत सदैव अच्छा होता है..!!

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

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भगवान की प्लानिंग

भगवान की प्लानिंग

एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है,भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे ?

एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओl

भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।

मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता हैl

सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब सफल करना।

वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है l वह बिना पर्स लिये ही चला जाता हैl

सेवक बेचैन हो जाता है, वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाताl

इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।

तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है, वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता हैl

अब तीसरा व्यक्ति आता है, वह नाविक होता
है l वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं,यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान..।

तभी पीछे से बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता है और कहता है कि मेरे बाद ये नाविक आया हैl

इसी ने मेरा पर्स चुरा लिया है, पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता है।

अब पुलिस सेवक के कहने पर उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।

रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता हैl

भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा हैl

वह व्यापारी गलत धंधे करता है,अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था।

इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था। पर्स मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते !

रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था, अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती, उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती, तुमने सब गड़बड़ कर दीl

कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी परेशानी आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआl

लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग होती हैl

💐शिक्षा: जब भी कोई परेशानी आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,अच्छे के लिए होता है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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पुण्यों का मोल

पुण्यों का मोल

एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था।

एक यज्ञ में उसने अपना सब कुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे।

व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं।

आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।

पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं।

व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी।

नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई।

कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी।
व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया।
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी।

व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा।

व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ।

दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं।

सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है।

उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।

व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं।
व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!

सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए।

व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।

चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे, पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला।

कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।

व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए।

जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और थैली में रख लिये।

घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया।

इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली।
उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी।

व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ??
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही, लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था।

व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया।
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया।

दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।

ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो।
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं।

अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं।

इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके लिए भी कंकड़-पत्थर अनमोल रत्न हो सकते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था।

एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था।

एक यज्ञ में उसने अपना सब कुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे।

व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं।

आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।

पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं।

व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी।

नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई।

कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी।
व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया।
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी।

व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा।

व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ।

दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं।

सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है।

उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।

व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं।
व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!

सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए।

व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।

चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे, पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला।

कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।

व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए।

जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और थैली में रख लिये।

घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया।

इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली।
उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी।

व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ??
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही, लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था।

व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया।
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया।

दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।

ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो।
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं।

अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं।

इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके लिए भी कंकड़-पत्थर अनमोल रत्न हो सकते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम

दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम

एक समय की बात है कि श्री गुरू नानक देव जी महाराज और उनके 2 शिष्य बाला और मरदाना किसी गाँव में जा रहे थे। चलते चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया। बाला स्वभाव से बहुत कम बोलता था। मगर जो मरदाना था वो बात की नीँव उधेडता था।

मकई का खेत देख कर मरदाने ने गुरू महाराज से सवाल किया “कि बाबा जी इस मकई के खेत में जितने दाने हैं क्या वे सब पहले से ही निर्धारित कर दिये गए हैं कि कौन इसका हकदार है और ये किस किस के मुँह में जाऐंगे। इस पर गुरू नानक जी महाराज ने कहा बिल्कुल मरदाना जी इस संसार मे कहीं भी कोई भी खाने योग्य वनस्पति है उस पर मोहर पहले से ही लग गई है और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा। गुरू जी की इस बात ने मरदाने के मन के अन्दर कई सवाल खड़े कर दिए। मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर हथेली पर रख लिया और गुरू महाराज से यह पूछने लगा बाबा जी कृपा करके मुझे बताएं कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है। इस पर गुरू महाराज ने जवाब दिया कि इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है। मरदाने ने गुरू जी के सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वो दाना अपने मुँह मे फेंक लिया और गुरू जी से कहने लगा कि कुदरत का यह नियम तो बड़ी आसानी से टूट गया।

मरदाने ने जैसे ही वो दाना निगला वो दाना मरदाने की श्वास नली मे फंस गया। अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से कहा कि बाबा जी कुछ कीजिए नहीं तो मैं मर जांऊगा। गुरू नानक देव जी महाराज ने कहा मरदाना जी मैं क्या करूँ कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता है। पास के गाँव मे चलते हैं। वहाँ किसी हकीम को दिखाते हैं । मरदाने को लेकर वे पास के एक गाँव में चले गए। वहाँ एक हकीम मिला। उस हकीम ने मरदाने की नाक में नसवार डाल दी। नसवार बहुत तेज थी। नसवार सूंघते ही मरदाने को छींके आनीं शुरू हो गईं। मरदाने के छीँकने से मकई का वो दाना गले से निकल कर बाहर गिर गया। जैसे ही दाना बाहर गिरा पास ही खड़ी मुर्गी ने झट से वो दाना खा लिया। मरदाने ने गुरू नानक देव जी से क्षमा माँगी और कहा बाबा जी मुझे माफ कर दीजिए। मैने आपकी बात पर शक किया ।

इसी लिये कहते है जिसके भाग्य में ईश्वर ने जितना लिख दिया उसको उतना ही मिलता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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श्रीमद्भगवद्गीता दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में है, जो न केवल सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है, बल्कि कही और सुनी भी जाती है! कहते हैं कि जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा सकती है!

श्रीमद्भगवद्गीता दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में है, जो न केवल सबसे ज्यादा पढ़ी जाती है, बल्कि कही और सुनी भी जाती है! कहते हैं कि जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा सकती है!
भारत की सनातन संस्कृति में श्रीमद्भगवद्गीता न केवल पूज्य बल्कि अनुकरणीय भी है! इस ग्रंथ में उल्लिखित उपदेश इसके 18 अध्यायों में लगभग 720 श्लोकों में हैं!
प्रस्तुत है – इस महान दार्शनिक ग्रंथ के कुछ चुनींदा श्लोक जो जीवन का सार बताते हैं।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥
अर्थात्-आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥
अर्थात्-यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे… इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने वर्तमान कर्म के परिणाम की चर्चा की है, तात्पर्य यह कि वर्तमान कर्म से श्रेयस्कर और कुछ नहीं है।)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थात्-हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म-ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥
अर्थात्-सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कर्मियों के विनाश के लिए… और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात्-कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं… इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, जो कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थात्-विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थात्-क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
अर्थात्-श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।

नाना शास्त्र पठेन लोके नाना देवत पूजनम्।
आत्म ज्ञान बिना पार्थ-सर्व कर्म निर्रथकम्॥
अर्थात्-भगवान कहते हैं कि संसार के चाहे जितने शास्त्रों को पढा जावे, चाहे जितने देवताओं का पूजन किया जावे परन्तु आत्मज्ञान की बिना यह सभी कर्म व्यर्थ है।

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थात्-श्रद्धा रखने वाले मनुष्य, अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने वाले मनुष्य, साधनपारायण हो अपनी तत्परता से ज्ञान प्राप्त करते हैं, फिर ज्ञान मिल जाने पर जल्द ही परम-शान्ति (भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति) को प्राप्त होते हैं।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
अर्थात्-उस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात प्रश्न तथा सेवा करके जानो! ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
अर्थात्-(हे अर्जुन) सभी धर्मों को त्याग कर अर्थात हर आश्रय को त्याग कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं (श्रीकृष्ण) तुम्हें सभी पापों से मुक्ति दिला दूंगा, इसलिए शोक मत करो।