💐💐सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे💐💐

💐💐सच्चा धन, पुत्र, वही जो परमार्थ करे💐💐

एक सेठ बड़ा साधु सेवी था। जो भी सन्त महात्मा नगर में आते वह उन्हें अपने घर बुला कर उनकी सेवा करता।

एक बार एक महात्मा जी सेठ के घर आये। सेठानी महात्मा जी को भोजन कराने लगी। सेठ जी उस समय किसी काम से बाज़ार चले गये।

भोजन करते करते महात्मा जी ने स्वाभाविक ही सेठानी से कुछ प्रश्न किये। पहला प्रश्न यह था कि तुम्हारा बच्चे कितने हैं ? सेठानी ने उत्तर दिया कि ईश्वर की कृपा से चार बच्चे हैं।

महात्मा जी ने दूसरा प्रश्न किया कि तुम्हारा धन कितना है? उत्तर मिला कि महाराज! ईश्वर की अति कृपा है लोग हमें लखपति कहते हैं।

महात्मा जी जब भोजन कर चुके तो सेठ जी भी बाज़ार से वापिस आ गये और सेठ जी महात्मा जी को विदा करने के लिये साथ चल दिये। मार्ग में महात्मा जी ने वही प्रश्न सेठ से भी किये जो उन्होंने सेठानी से किये थे।

पहला प्रश्न था कि तुम्हारे बच्चे कितने हैं? सेठ जी ने कहा महाराज! मेरा एक पुत्र है। महात्मा जी दिल में सोचने लगे कि ऐसा लगता है सेठ जी झूठ बोल रहे हैं। इसकी पत्नी तो कहती थी कि हमारे चार बच्चे हैं और हमने स्वयं भी तीन-चार बच्चे आते-जाते देखे हैं और यह कहता है कि मेरा एक ही पुत्र है।

महात्मा जी ने दुबारा वही प्रश्न किया, सेठ जी तुम्हारा धन कितना है? सेठ जी ने उत्तर दिया कि मेरा धन पच्चीस हज़ार रूपया है। महात्मा जी फिर चकित हुए इसकी सेठानी कहती थी कि लोग हमें लखपति कहते हैं। इतने इनके कारखाने और कारोबार चल रहे हैं और यह कहता है मेरा धन पच्चीस हज़ार रुपये है।

फिर महात्मा जी ने तीसरा प्रश्न किया कि सेठ जी! तुम्हारी आयु कितनी है? सेठ ने कहा-महाराज मेरी आयु चालीस वर्ष की है महात्मा जी यह उत्तर सुन कर हैरान हुए सफेद इसके बाल हैं, देखने में यह सत्तर-पचहत्तर वर्ष का वृद्ध प्रतीत होता है और यह अपनी आयु चालीस वर्ष बताता है। सोचने लगे कि सेठ अपने बच्चों और धन को छुपाये परन्तु आयु को कैसे छुपा सकता है?

महात्मा जी रह न सके और बोले-सेठ जी! ऐसा लगता है कि तुम झूठ बोल रहे हो?

सेठ जी ने हाथ जोड़कर विनय की महाराज! झूठ बोलना तो वैसे ही पाप है और विशेषकर सन्तोंं के साथ झूठ बोलना और भी बड़ा पाप है।

आपका पहला प्रश्न मेरे बच्चों के विषय में था। वस्तुतः मेरे चार पुत्र हैं किन्तु मेरा आज्ञाकारी पुत्र एक ही है। भक्ति भाव पूजा पाठ में लगा हुआ है मैं उसी एक को ही अपना पुत्र मानता हूँ। जो मेरी आज्ञा में नहीं रहते कुसंग के साथ रहते हैं वे मेरे पुत्र कैसे? दूसरा प्रश्न आपका मेरा धन के विषय में था। महाराज! मैं उसी को अपना धन समझता हूँ जो परमार्थ की राह में लगे। मैने जीवन भर में पच्चीस हज़ार रुपये ही परमार्थ की राह में लगाये हैं वही मेरी असली पूँजी है। जो धन मेरे मरने के बाद मेरे पुत्र बन्धु-सम्बन्धी ले जावेंगे वह मेरा क्यों कर हुआ? तीसरे प्रश्न में आपने मेरी आयु पूछी है। चालीस वर्ष पूर्व मेरा मिलाप एक संत जी से हुआ था। उनकी सेवा चरण-शरण ग्रहण करके गुरु धारण किए मैं तब से भजन-अभ्यास और साधु सेवा कर रहा हूँ। इसलिये मैं इसी चालीस वर्ष की अवधि को ही अपनी आयु समझता हूँ।

जब कभी सन्त सज्जन महापुरुषों का मिलाप होता है उनकी संगति में जाकर मालिक की याद आती है, वास्तव में वही घड़ी सफल है। शेष दिन जीवन के निरर्थक हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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ताश के पत्तों का मर्म

ताश के पत्तों का मर्म

हम ताश खेलते है, अपना मनोरंजन करते है। पर शायद कुछ ही लोग जानते होंगे कि ताश का आधार वैज्ञानिक है व साथ साथ ही प्राकृति से भी जुड़ा हुआ है:-

आयताकार मोंटे कागज़ से बने पत्ते चार प्रकार के …..ईंट, पान, चिड़ी, और हुक्म, प्रत्येक 13 पत्तों को मिलाकर कुल 52 पत्ते होते हैं।
पत्ते…. एक्का से दस्सा, गुलाम, रानी एवं राजा ।
1. 52 पत्ते …….52 सप्ताह
2. 4 प्रकार के पत्ते …….4 ऋतु
3. प्रत्येक रंग के 13 पत्ते….प्रत्येक ऋतु में 13 सप्ताह
4. सभी पत्तों का जोड़ ..1 से 13 = 91 × 4 = 364
5. एक जोकर….. 364+1= 365 दिन…1 वर्ष
6. दूसरा जोकर गिने..365 +1=366 दिन..लीप वर्ष
7. 52 पत्तों में 12 चित्र वाले पत्ते – 12 महिने
8. लाल और काला रंग … दिन और रात!

💥 पत्तों का अर्थ

1 दुक्की – पृथ्वी और आकाश
2. तिक्की- ब्रम्हा, विष्णू, महेश
3. चौकी – चार वेद (अथर्व वेद, सामवेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद)
4. पंजी – पंच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान)
5. छक्की – षड रिपू (काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर, लोभ)
6. सत्ती- सात सागर
7. अटठी- आठ सिद्धी
8. नव्वा- नौ ग्रह
9. दस्सी- दस इंद्रियां
10. गुलाम- मन की वासना
11. रानी- माया
12. राजा – सबका शासक
13. एक्का- मनुष्य का विवेक

अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

अच्छे और बुरे लोगों की पहचान

बहुत समय पहले की बात है। नदी के तट पर एक गांव बसा था और उसी के नजदीक एक संत का आश्रम था। एक बार संत अपने शिष्यों के साथ नदी में स्नान कर रहे थे, तभी एक राहगीर वहां आया और संत से पूछने लगा, ‘‘महाराज, मैं परदेस से आया हूं और इस जगह पर नया हूं। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में किस तरह
के लोग रहते हैं?’’

यह सुनकर संत ने उससे कहा, ‘‘भाई, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब बाद में दूंगा। पहले तुम मुझे यह बताओ कि तुम अभी जहां से आए हो, वहां किस प्रकार के लोग रहते हैं?’’

इस पर वह व्यक्ति बोला, ‘‘उनके बारे में क्या कहूं महाराज! वहां तो एक से एक कपटी, दुष्ट और बुरे लोग बसे हुए हैं।’’
तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें इस गांव में भी बिल्कुल उसी तरह के लोग मिलेंगे-कपटी, दुष्ट और बुरे।’’

इतना सुनकर वह राहगीर आगे बढ़ गया। कुछ समय बाद वहां से एक और राहगीर का गुजरना हुआ। वह भी किसी नई जगह पर बसने की इच्छा रखता था। उसने संत से पूछा, ‘‘महात्मन, मुझे यहां की आबोहवा ठीक लगती है। क्या आप बता सकते हैं कि इस गांव में कैसे लोग रहते हैं?’’
संत ने उससे भी वही सवाल पूछा, जो उन्होंने पहले राहगीर से पूछा था। इस पर राहगीर ने जवाब दिया, ‘‘महात्मन, मैं जहां से आया हूं, वहां तो बहुत ही सभ्य, सुलझे और नेक दिल इंसान रहते हैं।’’

तब संत ने उससे कहा, ‘‘तुम्हें यहां भी उसी तरह के लोग मिलेंगे। सभ्य, सुलझे हुए और नेकदिल। तुम्हें यहां रहने में कोई परेशानी नहीं होगी।’’ इतना सुनते ही वह राहगीर संत को प्रणाम कर आगे बढ़ गया।

शिष्य यह सब देख रहे थे। राहगीर के जाते ही उन्होंने संत से पूछा, ‘‘गुरुदेव, आपने दोनों राहगीरों को एक ही स्थान के बारे में अलग-अलग बातें क्यों बताईं?’’

इस पर संत ने उनसे कहा, ‘‘वत्स, आमतौर पर हम चीजों को वैसे नहीं देखते, जैसी वे हैं। बल्कि उन्हें हम उसी हिसाब से देखते हैं, जैसे कि हम खुद हैं। हर जगह हर प्रकार के लोग होते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस तरह के लोगों को देखना चाहते हैं। अगर हम अच्छाई देखना चाहें तो हमें अच्छे लोग मिलेंगे और बुराई देखना चाहें तो बुरे।’’

यह सुनकर शिष्यों को उनकी बात का मर्म समझ में आ गया और उन्होंने जीवन में सिर्फ अच्छाइयों पर ध्यान केंद्रित करने का निश्चय किया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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श्रद्धा और विश्वास

श्रद्धा और विश्वास

एक सेठ बड़ा धार्मिक था संपन्न भी था। एक बार उसने अपने घर पर पूजा पाठ रखी और पूरे शहर को न्यौता दिया। पूजा पाठ के लिए बनारस से एक विद्वान शास्त्री जी को बुलाया गया और खान पान की व्यवस्था के लिए शुद्ध घी के भोजन की व्यवस्था की गई। जिसके बनाने के लिए एक महिला जो पास के गांव में रहती थी को सुपुर्द कर दिया गया।

शास्त्री जी कथा आरंभ करते हैं, गायत्री मंत्र का जाप करते हैं और उसकी महिमा बताते हैं उसके हवन पाठ इत्यादि होता है लोग बाग आने लगे और अंत में सब भोजन का आनंद लेते घर वापस हो जाते हैं। ये सिलसिला रोज़ चलता है।

भोज्य प्रसाद बनाने वाली महिला बड़ी कुशल थी वो अपना काम करके बीच बीच में कथा आदि सुन लिया करती थी।

रोज की तरह एक दिन शास्त्री जी ने गायत्री मंत्र का जाप किया और उसकी महिमा का बखान करते हुए बोले कि इस महामंत्र को पूरे मन से एकाग्रचित होकर किया जाए तो इस भव सागर से पार जाया जाएगा सकता है। इंसान जन्म मरण के झंझटों से मुक्त हो सकता है।

खैर करते करते कथा का अंतिम दिन आ गया। वह महिला उस दिन समय से पहले आ गई और शास्त्री जी के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और बोली कि शास्त्री जी आपसे एक निवेदन है।”

शास्त्री उसे पहचानते थे उन्होंने उसे चौके में खाना बनाते हुए देखा था। वो बोले कहो क्या कहना चाहती हो ?”

वो थोड़ा सकुचाते हुए बोली शास्त्री जी मैं एक गरीब महिला हूँ और पड़ोस के गांव में रहती हूँ। मेरी इच्छा है कि आज का भोजन आप मेरी झोपड़ी में करें।”

सेठ जी भी वहीं थे, वो थोड़ा क्रोधित हुए लेकिन शास्त्री जी ने बीच में उन्हें रोकते हुए उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और बोले आप तो अन्नपूर्णा हैं। आप ने इतने दिनों तक स्वादिष्ट भोजन करवाया, मैं आपके साथ कथा के बाद चलूंगा।”
वो महिला प्रसन्न हो गई और काम में व्यस्त हो गई। कथा खत्म हुई और वो शास्त्री जी के समक्ष पहुंच गई, वायदे के अनुसार वो चल पड़े गांव की सीमा पर पहुंच गए देखा तो सामने नदी है।

शास्त्री जी ठिठक कर रुक गए बारिश का मौसम होने के कारण नदी उफान पर थी कहीं कोई नाव भी नहीं दिख रही थी। शास्त्री जी को रुकता देख महिला ने अपने वस्त्रों को ठीक से अपने शरीर पर लपेट लिया व इससे पहले की शास्त्रीजी कुछ समझते उसने शास्त्री जी का हाथ थाम कर नदी में छलांग लगा दी और जोर जोर से ऊँ भूर्भुवः स्वः ….. ऊँ भूर्भुवः स्वः बोलने लगी और एक हाथ से तैरते हुए कुछ ही क्षणों में उफनती नदी की तेज़ धारा को पार कर दूसरे किनारे पहुंच गई।

शास्त्री जी पूरे भीग गए और क्रोध में बोले मूर्ख औरत ये क्या पागलपन था अगर डूब जाते तो…?”

महिला बड़े आत्मविश्वास से बोली शास्त्री जी डूब कैसे जाते ? आप का बताया मंत्र जो साथ था। मैं तो पिछले दस दिनों से इसी तरह नदी पार करके आती और जाती हूँ।

शास्त्री जी बोले क्या मतलब ??”

महिला बोली की आप ही ने तो कहा था कि इस मंत्र से भव सागर पार किया जा सकता है। लेकिन इसके कठिन शब्द मुझसे याद नहीं हुए बस मुझे ऊँ भूर्भुवः स्वः याद रह गया तो मैंने सोचा “भव सागर” तो निश्चय ही बहुत विशाल होगा जिसे इस मंत्र से पार किया जा सकता है तो क्या आधा मंत्र से छोटी सी नदी पार नहीं होगी और मैंने पूरी एकाग्रता से इसका जाप करते हुए नदी सही सलामत पार कर ली। बस फिर क्या था मैंने रोज के 20 पैसे इसी तरह बचाए और आपके लिए अपने घर आज की रसोई तैयार की।”

शास्त्री जी का क्रोध व झुंझलाहट अब तक समाप्त हो चुकी थी।

किंकर्तव्यविमूढ़ उसकी बात सुन कर उनकी आँखों में आंसू आ गए और बोले माँ मैंने अनगिनत बार इस मंत्र का जाप किया, पाठ किया और इसकी महिमा बतलाई पर तेरे विश्वास के आगे सब बेसबब रहा।”

“इस मंत्र का जाप जितनी श्रद्धा से तूने किया उसके आगे मैं नतमस्तक हूं। तू धन्य है कह कर उन्होंने उस महिला के चरण स्पर्श किए। उस महिला को कुछ समझ नहीं आ रहा था वो खड़ी की खड़ी रह गई। शास्त्री भाव विभोर से आगे बढ़ गए वो पीछे मुड़ कर बोले मां चलो भोजन नहीं कराओगी बहुत भूख लगी है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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💐💐संगत💐💐

💐💐संगत💐💐

एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी ! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ!
भंवरा भोजन खाने पहुँचा! बाद में भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिये मुझे गोबर खाना पड़ा! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रन दिया कि तुम कल मेरे यहाँ आओ!

अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया! कीड़े ने परागरस पिया! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और बिहारी जी के चरणों में चढा दिया! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुये! चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला! संध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़ दिए! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था! इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र! क्या हाल है? कीड़े ने कहा-भाई! जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी! ये सब अच्छी संगत का फल है!

संगत से गुण ऊपजे, संगत से गुण जाए
लोहा लगा जहाज में , पानी में उतराय!
कोई भी नही जानता कि हम इस जीवन के सफ़र में एक दूसरे से क्यों मिलते है,

सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता हैं,हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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एक राजा के पास एक व्यक्ति एक हीरा लाया और बोला- महाराज! मैं यह हीरा बेचना चाहता हूँ।

एक राजा के पास एक व्यक्ति एक हीरा लाया और बोला- महाराज! मैं यह हीरा बेचना चाहता हूँ।

राजा ने मूल्य पूछा तो वह बोला- श्रीमान! आप जो दे देंगे। बस अन्याय न हो। हीरे का जितना मूल्य उचित हो उतना दे दें।

राजा ने मन्त्रियों और जौहरियों से परामर्श किया, पर हीरे के सही मूल्य का निर्णय न हो सका। किसी ने कहा पाँच हजार तो किसी ने कहा पचास हजार, किसी ने एक लाख कहा तो किसी ने पाँच लाख।

अंत में हार कर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि हमारे पास एक हीरा आया है, जो कोई भी इस हीरे का उचित मूल्य बताएगा उसे हम यथायोग्य पुरस्कार देंगे।

एक संत सेवी लड़के ने यह बात सुनी। वह एक जौहरी का ही पुत्र था और अपने गुरू जी के पास रहता हुआ उनके उपदेश सुनता था। वह राजमहल पहुंचा। उसने हीरे तीन महीने तक परखा और अन्ततः हीरे के गुणों का वर्णन करता हुआ बोला- महाराज! इसका मूल्य सवा करोड़ रुपये है।

राजा ने हीरा लाने वाले को सवा करोड़ रुपये दे दिए और हीरा ले लिया।

पर अब यह प्रश्न यह उत्पन्न हुआ कि इस लड़के को क्या पुरस्कार दिया जाए?
किसी ने कहा पाँच हजार तो किसी ने कहा दस हजार। तीसरे ने कहा कि इतना कुशल लड़का है, इसे बीस हजार रुपये तो देने ही चाहिए।

निर्णय नहीं हुआ तो राजा ने फिर घोषणा कराई कि निर्णय हो कि इस लड़के को क्या पुरस्कार दिया जाए?

इस घोषणा को उस लड़के के गुरू जी ने भी सुना। वे राजमहल आए, बोले- महाराज! मैं बताता हूँ कि इसे क्या पुरस्कार दिया जाए।

इसे कड़कती धूप में खड़ा कर दिया जाए, और जब यह पसीना-पसीना हो जाए तब इसे दस जूते लगाए जाएँ, यही इसका पुरस्कार है।

राजा ने आश्चर्य से कहा- यह कैसा पुरस्कार है?

गुरू जी बोले- यही उचित पुरस्कार है महाराज। भगवान ने इसे इतनी अच्छी बुद्धि दी है। इसने उस आत्मा को, अंदर के असली हीरे को, पहचानने में नहीं, पत्थर को पहचानने में अपना जीवन लगा दिया। ऐसे मनुष्य को यही फल मिलना चाहिए।

अब हम भी स्वयं अपने आप से पूछें कि हम अपना ध्यान, अपनी बुद्धि कहाँ लगा रहे हैं।।🙏🙏

भगवान से मिलना

भगवान से मिलना

एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर भगवान से मिलने की जिद किया करता था। उसे भगवान् के बारे में कुछ भी पता नहीं था, पर मिलने की तमन्ना, भरपूर थी। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो भगवान के साथ बैठकर खाये।

एक दिन उसने एक थैले में 5,6 रोटियां रखीं और परमात्मा को को ढूंढने के लिये निकल पड़ा।

चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया। उसने देखा एक नदी के तट पर एक बुजुर्ग माता बैठी हुई हैं, जिनकी आँखों में बहुत ही गजब की चमक थी, प्यार था, किसी की तलाश थी , और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठी उसका रास्ता देख रहीं हों।

वो मासूम बालक बुजुर्ग माता के पास जा कर बैठ गया, अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।
फिर उसे कुछ याद आया तो उसने अपना रोटी वाला हाथ बूढी माता की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा, बूढी माता ने रोटी ले ली, माता के झुर्रियों वाले चेहरे पे अजीब सी खुशी आ गई आँखों में खुशी के आंसू भी थे।

बच्चा माता को देखे जा रहा था , जब माता ने रोटी खाली बच्चे ने एक और रोटी माता को दे दी।
माता अब बहुत खुश थी। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।

जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाजत लेकर घर की ओर चलने लगा और वो बार- बार पीछे मुड़कर देखता ! तो पाता बुजुर्ग माता उसी की ओर देख रही होती हैं।

बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देखकर जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,
बच्चा बहूत खुश था। माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो खुशी का कारण पूछा,
तो बच्चे ने बताया!

माँ ! ….आज मैंने भगवान के साथ बैठकर रोटी खाई, आपको पता है माँ उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,, पर माँ भगवान् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,, मैं आज बहुत खुश हूँ माँ….

उधर बुजुर्ग माता भी जब अपने घर पहुँची तो गांव वालों ने देखा माता जी बहुत खुश हैं, तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा ..??

माता जी बोलीं,,,, मैं दो दिन से नदी के तट पर अकेली भूखी बैठी थी,, मुझे पता था भगवान आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।
आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे सांथ बैठकर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई, बहुत प्यार से मेरी ओर देखते थे। जाते समय मुझे गले भी लगाया,, भगवान बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है।
वास्तव में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में ईश्वर के लिए अगाध सच्चा प्रेम था।
और प्रभु ने दोनों को, दोनों के लिये, दोनों में ही ( ईश्वर) खुद को भेज दिया।

जब मन ईश्वर भक्ति में रम जाता है तो, हमें हर एक जीव में वही नजर आता है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

मां का दायित्व

मां का दायित्व

शहर के एक अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बग़ीचे में तेज़ धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न से पेड़ – पौधों की काट छाँट में लगा था कि तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, “गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।”

गंगादास को आख़िरी के पांँच शब्दों में काफ़ी तेज़ी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्त्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वज़ह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ़ किया और चल दिया, द्रुत गति से प्रधानाचार्या के कार्यालय की ओर।
उसे प्रधानाचार्या महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी हृदयगति बढ़ गई थी। सोच रहा था कि उससे क्या ग़लत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्या महोदया ने तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।
वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था। पता नहीं क्या ग़लती हो गयी। वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा……
“मैडम, क्या मैं अंदर आ जाऊँ? आपने मुझे बुलाया था।”
“हाँ। आओ और यह देखो” प्रधानाचार्या महोदया की आवाज़ में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी।
“पढ़ो इसे” प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
“मैं, मैं, मैडम! मैं तो इंग्लिश पढ़ना नहीं जानता मैडम!” गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
“मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ। क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इज़ाज़त दी। मुझे कृपया एक और मौक़ा दें मेरी कोई ग़लती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंँगा।” गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।

उसे प्रधानाचार्या ने टोका “तुम बिना वज़ह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो, मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका को बुलाती हूँ।”

वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुँची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई ग़लती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रहीं। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।
कक्षा-अध्यापिका के पहुँचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा, “हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर में जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हें सुनाएँगी, ग़ौर से सुनो।”
कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, “आज मातृ दिवस था और आज मैंने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा। तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।”

उसके बाद कक्षा- अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
“मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थीं। उन्होंने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसीं। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाक़ी की नज़र में तो मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा – दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लायें ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी
एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वज़ह से मेरे दादा – दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, ज़मीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी ज़रूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।”
“आज मुझे समझ आता है कि वे क्यों हर उस चीज़ को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना कर देते थे कि वह उन्हें पसंद नहीं है, क्योंकि वह आख़िरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्त्व पता चला।”
“मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख – सुविधाओं का ध्यान रखा और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था।”
“यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।”
“यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं।”
“यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।”
“यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते हैं और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ हैं।”
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामनाएँ दूँगी और कहूँगी कि आप संसार के सबसे अच्छे पालक हैं। बहुत गर्व से कहूँगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, मेरे पिता हैं।”
“मैं जानती हूँ कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊँगी। क्योंकि मुझे माँ पर लेख लिखना था और मैंने पिता पर लिखा,पर यह बहुत ही छोटी सी क़ीमत होगी उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद”।
आख़िरी शब्द पढ़ते – पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बग़ीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज़ को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज़ को पिता के आँसुओं से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था।
उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, “गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े ज़ोर – शोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है। यह सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नहीं है एक पालक बनने के लिए। साथ ही यह अनुशंसा करता है उस विश्वास का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमें गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का पिता है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमें गर्व है कि आप एक माली हैं और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बग़ीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा ख़ुशबूदार बनाकर रखा जिसकी ख़ुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेंगे?”
रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा , अपनी प्यारी बिटिया को।

संसार की समस्त प्यारी – प्यारी बेटियों के पालकों को समर्पित l

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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करने वाले तो परमात्मा है

करने वाले तो परमात्मा है

एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया ।

दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है। मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं । घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे ।

गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में ये चिट्ठी मेरे एक भक्त को देते जाना।

वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 2 साल के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना।

उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 2 साल तक अन्दर गुरु के बताएं अनुसार नियमपूर्वक साधना करता रहा परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ होगा, बच्चों का क्या हुआ होगा ?

उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे।तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया।

खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला।

उसने ईमानदारी से वह मटका खेत के मालिक को दे दिया।

उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदाद भी दे दी ।

अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी।

जब वह शिष्य 2 साल बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया ।

मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा

करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं।

वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया। गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है।

मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा ।

मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है।

वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है..

प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर
तुलसी चिंता क्या करे भज ले तू रघुबीर

शिष्य को अपनी गलती का अहसास हुआ और सद्गुरु के आश्रम में रहते हुए गुरु के बताए साधना मार्ग अनुसार अपने जीवन परम कल्याण परमार्थ प्राप्ति में लगा दिय़ा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

चिंता

चिंता

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

शिक्षा:
अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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