कैकयी को दण्ड

कैकयी को दण्ड

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों के संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा -एक बात पूछूँ, भइया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था – क्या वह राजद्रोह नहीं था?
उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा और दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई! ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए! बोले ~ जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले, तो उसका जीवन उसके असंख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है! जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो, उसे भला दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?

भरत संतुष्ट नहीं हुए और कहा ~ यह तो मोह है भइया और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है! एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया?

यही समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं बल्कि अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है!

राम गम्भीर हो गए! कुछ क्षण के मौन के बाद कहा ~ अपने सगे-सम्बन्धियों को किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत!

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है! वनवास के चौदह वर्षों में – हम चारों भाई अपने-अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं पर माता कैकई? हर क्षण मरती रही हैं! अपनी एक भूल के कारण! उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं! वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं! कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

उन्होंने आगे समझाया कि मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा!

राम के अश्रुपूरित नेत्रों को देख भरत आदि भाई मौन हो गए थे!

राम ने फिर कहा ~ भरत भाई, उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों? यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता? मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा! वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है?

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे! वे अनायास ही बड़े भाई राम के चरणों में नतमस्तक हो गये!
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क्रोध एक सार्वभोमिक तकलीफ

क्रोध एक सार्वभोमिक तकलीफ

क्रोध से कोई अछूता नहीं है! संतों ने इसका वर्णन अनेक तरीके से किया है और इससे दूर रहने की सलाह भी हम एक दुसरे को देते हैं पर जब अपनी बारी आती है तो हमारी उस क्रोध न करने की समझ का अक्सर अपहरण हो जाता है और अनायास ही हम इस क्रोध के शिकार हो जाते हैं!

अमूमन हम यही देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति क्रोध कर लेता है, तब सभी लोग उसे कहते हैं कि “भाई, आपको क्रोध नहीं करना चाहिए!”
उस समय ऐसे शब्द सुनकर वह क्रोधित व्यक्ति अपमान का अनुभव करता है और अपना अपमान किसी को अच्छा नहीं लगता।

इस कारण से, उस अपमान से बचने के लिए, अपने सम्मान की रक्षा के लिए और अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए, वह व्यक्ति क्रोध आने के ‘कारण’ गिनाने लगता है, कि “उस व्यक्ति ने मुझे ऐसा ग़लत ग़लत कहा, जिस कारण से मुझे क्रोध आया।”

इस प्रकार से वह, क्रोध करने के बाद भी अपने दोष को स्वीकार नहीं करता, बल्कि सारा दोष दूसरे व्यक्ति के सिर पर डाल देता है। और कहता है कि “यदि वह ऐसा मुझे नहीं कहता, तो मैं क्रोध क्यों करता? इसलिए मेरी कोई गलती नहीं है, सारा काम उसने ही बिगाड़ा है।”

परंतु वास्तविकता यह है कि “कोई भी व्यक्ति जब क्रोध करता है – तब यह तो ठीक है कि क्रोध करने का कोई न कोई कारण तो होगा ही।”
यदि बैठे बिठाए बिना कारण के कोई व्यक्ति क्रोध करे, तब तो लोग उसे ‘पागल’ ही समझेंगे और उसे पागलखाने में पहुंचा देंगे। इसलिए बिना कारण तो कोई व्यक्ति क्रोध नहीं करता! “जब भी क्रोध आता है, तो उसका कोई न कोई कारण तो होता ही है।”

परंतु यह बात इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया।”
महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि “जब क्रोध आ गया, तब क्रोधित होकर आपने कोई ग़लत क्रिया कर दी या आपने भी कुछ उल्टा सीधा बोल दिया! तब उसका जो परिणाम निकला – क्या वह परिणाम अत्यंत हानिकारक नहीं होता है? क्या आप वह हानि उठाना चाहते हैं?”

उत्तर यही होगा कि कोई नहीं चाहेगा। लेकिन आवेग में तो वह नुकसान हो चूका!

इसलिए क्रोध आने के कारण नहीं गिनाने चाहिय कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया। उस कारण से क्रोध आया।”
क्रोध के कारण गिनाने मात्र से आप क्रोध से होने वाली हानि से बच नहीं पाएंगे। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि “यदि आप क्रोध की हानियों से बचना चाहते हों तो अपने मन और वाणी पर संयम रखें। स्वयं अपने आप पर संयम रखें।” यही समाधान है, क्रोध से बचने का।

अपने मन और वाणी पर संयम कैसे रखें? स्वयं अपने आप पर संयम कैसे रखें?

इसका उपाय है, “अपनी इच्छाओं/अपेक्ष्याओं पर नियंत्रण करें। आप लोगों से जितनी इच्छा और अपेक्षया कम रखेंगे, उतना ही आप क्रोध से बच जायेंगे और जितनी इच्छाएं और अपेक्ष्याओं को बढ़ाएंगे, उतना ही आप अधिक क्रोधित होंगे।”

क्योंकि क्रोध तभी आता है, जब आपकी इच्छा पूरी नहीं होती! और सारी इच्छाएं किसी व्यक्ति की कभी भी पूरी हो नहीं सकती। ऐसे तो सदा ही सबको क्रोध आता ही रहेगा। उसको कभी कोई व्यक्ति जीत ही नहीं पाएगा!”

बनने वाले ने हमारे अंदर दोनों प्रकार की चीजें डाली हैं –
पहली कि सुख की चाहत हमारी जन्मजात प्रक्रति बनायी और सात गुण – पवित्रता, शांति, शक्ति, प्यार, खुशी, ज्ञान और गंभीरता के रूप में दिए!

दूसरा, पांच तरह के विकार भी हम सभी में विद्यमान हैं – जिन्हें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार कहा गया है!

अब यह हमारे विवेक पर छोड़ दिया गया है कि अपना ध्यान किस ओर दें और किस चीज का ज्यादा इस्तेमाल करें! स्वाभाविक हैं कि जिसका हम अधिक अभ्यास, चिन्तन-मनन करेंगे उसी में पारंगत होंगे!

जिन लोगों को समय के सद्गुरु का सानिध्य मिलता है और जब वे उन्हें आत्मबोध कराते हैं तो इन पांच विकारों का मुकाबला ही नहीं इनका समन भी किया जाता सकता है! कयोंकि खाली क्रोध नहीं करना चाहिय यह एक सुन्दर बात है पर इसका निराकरण तो समय के महापुरुष का सानिध्य और मार्गदर्शन ही है! हम आरती में रोज गाते भी हैं कि –
काम क्रोध मद मत्सर चोर बड़े भारे!
ज्ञान खडग दे कर में गुरु सब संहारे!!

पांच चोर के मारण कारण नाम का बाण दिया!
प्रेम भक्ति से साधा, भव जल पार किया!!
सभी गुरुभक्तों के लिय खुशखबरी यही है कि महाराजी की कृपा से हमें इन पंच-विकारों से मुक्ति पाने की युक्ति मिली हुई है! अब हर एक भक्त पर निर्भेर करता है कि हम अपना झुकाव किस तरफ करें! जिस किसी ने इस युक्ति को समझ लिया और प्रेमभक्ति से अपने विकारों को दूर करने का अनवरत अभ्यास किया तो जीवन में आनन्द ही आनन्द है!
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हम और हमारी अंतरात्मा?

हम और हमारी अंतरात्मा?

हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि “हम खुद को ही नहीं जानते”, शायद हम अपनी प्रकृति या मूल स्वभाव को ही नहीं जानते या फिर शायद जानते हुए भी अनजान है।

जिस तरह हमें पता है कि पानी का स्वभाव तरल होता है, उसी तरह क्या हमें पता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है? क्या है हमारा मूल स्वभाव….आत्म बोध….

हर व्यक्ति के अन्दर एक शांत शक्ति मौजूद है- जिसे हम अपनी अंतरआत्मा कहते हैं। यह अंतरात्मा हर परिस्थति में सही होती है। यह अंतरात्मा हमेशा हमें सही रास्ता दिखाती है।

जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते है, तब हमें अपने ही अन्दर से बड़ा अजीब सा लगता है जैसे कोई यह कह रहा कि वह कार्य मत करो। यह हमारे अन्दर मौजूद आतंरिक शक्ति ही होती है जो हमें बुरा कार्य करने से रोकती है।

यह भी कहा जाता है कि हर मनुष्य के अन्दर ईश्वर का अंश होता है, यह ईश्वर का अंश हमारी अंतरआत्मा ही होती है।

बनाने वाले ने हमारी प्रकृति या स्वभाव में – शांत, शक्ति, प्रेम, सुख, आनंद, पवित्रता, ज्ञान, सद्भाव, दूसरों की सहायता और अच्छा करने की भावना डाली है।

हर मनुष्य के अन्दर यह शांत और अद्भुत शक्ति मौजूद है, चाहे वह एक अपराधी हो या संत या और कोई व्यक्ति।
लेकिन फिर क्यों एक संत सही मार्ग पर चलता है और अपराधी गलत मार्ग पर?
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है लेकिन अपराधी को वह आवाज अब सुनाई नही देती।

दरअसल जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है।

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है।

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती।

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है। हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है।

समय के सदगुरु हमारा यही मार्गदर्शन करते हैं कि हम अपने अन्दर की आवाज को सुनें! इसके लिय बाहर के शोर को बंद करना होगा!
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बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

बुरे वक्त मे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट खाता है

   वैसे तो साथियों जीवन का नाम ही समस्या है अर्थात जिस जीवन में समस्या नहीं है वह जीवन किसी काम का नहीं होता समस्याएं जीवन का एक अभिन्न अंग है जीवन में आती रहती है जाती रहती लेकिन यदि आपके जीवन इस तरह की आकस्मिक घटना या समस्या आ जाये जो सोची भी ना जा सकती हो और ना जिसका कोई हल हो तो उसे क्या कहोगे . आपने एक कहावत सुनी  होगी जब आदमी का वक्त खराब होता है तो ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट लेता है .  शायद कहावत के शब्दो को आप जान गये परन्तु कहावत के असली मर्म को नही जाने कि आखिर कुत्ता इतने उँचे ऊँट पर बैठे आदमी को कैसे काट सकता है .
आईये मै बताता हू . कुत्ता कैसे काटता है . दोनो सच्ची घटना है . एक भारत की है और एक अमेरिका की .
1978 की बात हे दिल्ली की सड़को  एक भाई साहब जून की भरी दोपहरी मे स्कूटर पर कही जा रहे थे . गर्मी के कारण हेलमेट से  सिर पर पसीना था . सामने रेड लाईट थी . रुक गये . सडक के किनारे पेड था जिसकी छाव सडक पर आ रही थी . भाई साहब ने हेलमेट उतारा ताकी छाँव और हवा से पसीने मे कुछ राहत मिले . उसी समय आसमान मे एक चील अपनी चोच मे जहरीले सांप को लिये जा रही थी . अचानक सांप की हिलने डुलने की कोशिश से चील की चोच ढीली हो गई .सांप छूट कर नीचे गिरा . 

कहाँ गिरा ? आदमी की खोपडी पर जिसने अभी अभी गर्मी से बचने के लिये हेलमेट उतारा था . सांप खोपडी पर गिरा और गिरते ही आत्मरक्षा के भाव से भाई को डस लिया . पब्लिक जब तक कुछ समझती तब तक भाई साहब रेड लाईट पर ही रेड हो गये . चलते चलते हमेशा के लिये ग्रीन लाईट रेड हो गई .
नही नही विश्वास करो ये काल्पनिक नही सच्ची घटना है .
दूसरी घटना इससे भी दिलचस्प है . अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया के एक जंगल मे आग लगी . फौरन फायर बिग्रेड चेतन हुई . आग पर काबू पाने के लिये पानी से भरे अपने हैलीकाप्टर भेजे . पानी बरसाकर आग तो शान्त हो गई . पर पुलिस जंगल मे देखने गई कि कही नुक्सान ज्यादा तो नही हो गया . वहाँ जंगल मे उन्होने देखा एक व्यक्ति आग से भूना पडा है . उसने स्विमिंग सूट पहन रखा है . पुलिस बडे असमंजस मे कि ये आदमी स्विमिंग सूट मे यहाॅ क्या कर रहा था . जंगल मे कोई तालाब या स्विमिंग पूल भी नही था कि नहाने आया हो . फिर ये कैसे सम्भव है ? पुलिस हैरान कि ये व्यक्ति स्विमिंग सूट पहनकर जंगल मे करने क्या आया था ?
भारत होता तो कोई परवाह नही करता ना कोई सोचता . मर गया तो मर गया आग तो बुझ गई . परन्तु अमेरिकी पुलिस ने जांच बैठा दी और पता लगाने की कोशिश की ये व्यक्ति था कौन और स्विमिंग सूट मे सूनसान जंगल मे करने क्या आया था ? जो एक असम्भव बात थी .
जाच की रिसर्च से पता चला जब हैलीकाप्टर उपर उडकर पानी बरसा रहे थे तो कुछ हैलीकोप्टर जिनका पानी खत्म हो गया था पानी लेने के लिये जंगल से थोड़ी दूर एक स्विमिंग पूल मे पानी भरने गये . वहाँ उन्हे ये व्यक्ति दिखाई ही नही दिया . पानी भरने की जल्दबाजी मे पायलट ध्यान ही नही पाया या हो सकता है भाई साहब ने शैखी बघारने के लिये डुबकी लगाई हो कि देखो मै कितनी बडी डुबकी लगाता हू . तभी हैलीकोप्टर ने पानी खिचना शुरू किया . हैलीकोप्टर का पम्प बहुत मजबूत था . शक्तिशाली था . जब पानी खीचा तो भाई साहब ने डुबकी लगाई और पम्प ने भाई साहब को पानी के साथ खींच लिया . भाई साहब सोच रहे थे कि अरे ये क्या हुआ डुबकी पानी मे लगाई और मै आसमान मे उड रहा हू . ये कैसे हो गया ? जब तक समझ पाते हैलीकोप्टर ने सारा पानी जंगल मे बिखरा गया . भाई साहब भी पानी के साथ जंगल की आग मे फेंक दिये गये और आग मे भून गये .
कोई काल्पनिक कहानी नही सच्ची घटना है . ये कहानी डिस्कवरी पर मैंने खुद देखी है .
बिलकुल सच्ची घटना है दोनो .
अब आप बताईये दोनो भाई साहब अपने आप को सुरक्षित समझ रहे थे मगर हुआ क्या ? उन्होंने इसकी कल्पना भी नही की होगी .
इसे ही कहते है बुरा वक्त जब आता है ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता खाट खाता है .
वैसे ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ते ने कैसे काटा ये अलग कहानी है जो कहावत बन गई . वैसे बता दू कुत्ते ने सममुच ही ऊँट पर बैठे आदमी को काटा था . पर कैसे ? ये अलग तरह की अजब कहानी है . फिर कभी बताऊंगा .
तब तक आप इसी तरह की अन्प कहानी ध्यान मे लाते रहो . मुझे बताना भी .
🙂
🙏🏻 जय भारत 🇮🇳

पिता-पुत्र

पिता-पुत्र

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था।

खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।

फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा – क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया – नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा।

वृद्ध ने कहा – बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो।

आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,
और कहते हैं – क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

शिक्षा:-अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें..!!

जय श्रीराम

शुभरात्री

सच्ची लगन

सच्ची लगन

एक शख्स सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और सत्संग घर की तरफ चल दिया ताकि सतसंग का आनंद प्राप्त कर सके।

चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।

कपड़े बदलकर वापस सत्संग की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले, फिर सत्संग की तरफ रवाना हो गया।

जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक शख्स चिराग हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।

इस तरह वो शख्स उसे सत्संग घर के दरवाज़े तक ले आया।

पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर सतसंग सुन लें।

लेकिन वो शख्स चिराग हाथ में थामे खड़ा रहा और सत्संग घर में दाखिल नही हुआ।

दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है …

दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया “इसलिए क्योंकि

मैं काल हूँ,

ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।

काल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।

जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और दुबारा सत्संग घर की तरफ रवाना हुए तो आपके गुरु ने आपके सारे पाप क्षमा कर दिए।

जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो आपके गुरु ने आपके पूरे परिवार के गुनाह क्षमा कर दिए।

मैं डर गया की अगर अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप फिर कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के पाप क्षमा कर दे। इसलिए मैं यहाँ तक आपको खुद पहुंचाने आया हूँ।

अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं।

क्यों…

क्योंकि हम जीव अपने गुरु से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।

उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर सत्संग घर चला गया।

क्यों…

क्योंकि उसे अपने दिल में गुरु के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपनी बंदगीं का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।

इसीलिए काल ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में गिराया और मालिक की बंदगी में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था !

इसी तरह हम जीव भी जब हम भजन-सिमरन पर बैठे तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए

बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।
🙏💗🌹🙏🌹

“मैं न होता, तो क्या होता?” – सुंदरकांड का एक प्रेरक प्रसंग है जब

“मैं न होता, तो क्या होता?”

सुंदरकांड का एक प्रेरक प्रसंग है जब “अशोक वाटिका” में जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा
तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर, इसका सिर काट लेना चाहिये!

किन्तु, अगले ही क्षण, उन्होंने देखा कि, “मंदोदरी” ने रावण का हाथ पकड़ लिया !

यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता तो क्या होता ?

परन्तु ये क्या हुआ? सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं!

आगे चलकर जब “त्रिजटा” ने कहा कि “लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!”

तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है!
और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है -एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? जो प्रभु इच्छा!

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की

और जब “विभीषण” ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है!
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ में कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये!

तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी! वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया!

जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है!

हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं! इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि मैं न होता, तो क्या होता ?

आज विश्व शान्ति दिवस मानाने की गूंज सब जगह सुनायी पड रही है लेकिन शांति संभव है! का व्यावहारिक बीड़ा आज हमारे गुरु महाराजी ने उठाया है! उन्होंने इसी मिशन के लिय अपना पूरा जीवन समर्पित किया है!

उनके प्रयास विश्व पटल पर किसी से छुपे नहीं हैं! वे शांति के प्रति के दवा मात्र नहीं करते बल्कि हर मनुष्य के अन्दर उसका अनुभव करने की विधि भी प्रदान करते हैं! आज का मानव जिस सुख शान्ति की खोज बाहर की दुनिया में कर रहा है – उनका कहना है कि शान्ति विश्व को नहीं चाहिय बल्कि हर एक मनुष्य के हृदय में होनी चाहिय; जिसे बनाने वाले ने पहले से ही वह शांति हर एक के अन्दर रखी हुई है और उसको जीते जी महसूस भी किया जा सकता है!

इससे सरल और सहज बात क्या ही हो सकती है!

शान्तिदूत के रूप में सुविख्यात श्री प्रेम रावत जी (जिनको लोग प्रेम से महाराजी के नाम से भी जानते हैं) इस मुहिम की अलख बाल्यावस्था से ही पूरे संसार में जगा रहे हैं और उनके साथ पूरे संसार में असंख्य स्वयंसेवक हैं जिनको उन्होंने इसका व्यावहारिक बोध कराया है वे भी उनके इस मानवता और शांति के संदेश को जन जन तक पहुचाने में उनकी मदद कर रहे हैं!

आज के दिन पुनः हम सभी गुरु भक्तों के लिय गर्व का विषय हैं कि हमें शान्ति के अग्रदूत श्री प्रेम रावत जी से वह अनुपम उपहार ही नहीं मिला बल्कि उन्होंने हर गुरुभक्त के लिय इस शांति के संदेश में सहभागी बनने के दरवाजे भी खोल दिए हैं!

इसलिय, हम सभी गुरुभक्तो को भक्त हनुमान की तरह अपने सदगुरु का सिपाही बनकर सेवा का लाभ लेना है! ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि सेवा और विनम्रता की ताकत से हुनमान जी की आज भी पूजा की जाती है और उनको अजर अमर माना जाता है!

उपरोक्त प्रसंग हम सभी गुरु भक्तों के लिय अनुकरणीय और प्रेरणादायक बन जाता है जब हम भी शान्ति के सन्देशवाहक बनकर महाराजी के कार्य में सहभागी बनने की इच्छा रखते हैं! आत्मज्ञान की अनुभूति के साथ ही हम सभी गुरु भक्तों को आत्म मंथन करना होगा कि -ऐसे पुनीत कार्य का हिस्सा बनने के लिय क्या हम भक्त हुनमान की तरह पूर्ण समर्पित भाव रखते हैं या नहीं!

आप सभी को विश्व शान्ति दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं!
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जब मन सच्चा हो और इरादे नेक हो तो भगवन को भी आना पड़ता है, अपने भगत के लिये…!

एक बार सतगुरु जी सत्संग करके आ रहे थे रास्ते में गुरुजी का मन चाय पीने को हुआ उन्होंने अपने ड्राइवर को कहा हमे चाय पीनी है।

”ड्राइवर गाड़ी ५ स्टार होटल के आगे खड़ी कर दी।

गुरु जी ने कहा- “नहीं आगे चलो यहाँ नहीं।”

फिर ड्राइवर ने गाड़ी किसी होटल के आगे खड़ी कर दी।
गुरु जी ने वह भी मना कर दिया काफी आगे जाकर एक छोटी सी ढाबे जैसी एक दुकान आई।

गुरु जी ने कहा- “यहाँ रोक दो यहाँ पर पीते हैं चाय।”

ड्राइवर सोचने लगा कि अच्छे से अच्छे होटल को छोड़ कर गुरु जी ऐसी जगह चाय पीएंगे खैर वो कुछ नहीं बोला। ड्राइवर चाय वाले के पास गया और बोला-“अच्छी सी चाय बना दो।

”जब दुकानदार ने पैसों वाला गल्ला खोला तो उसमे गुरु जी का स्वरुप फोटो लगा हुआ था।

गुरु जी का स्वरुप देख कर ड्राइवर ने दुकानदार से पूछा-“तुम इन्हें जानते हो, कभी देखा है इन्हें?”

तो दुकानदार ने कहा- “मैंने इनको देखने जाने के लिए पैसे इकठे किये थे। जो कि चोरी हो गए, और मैं नहीं जा पाया। पर मुझे यकीन है कि गुरु जी मुझे यही आ कर मिलेंगे।”

ड्राइवर ने कहा-“जाओ और चाय उस कार मैं दे कर आओ।”

तो दुकानदार ने बोला- “अगर मैं चाय देने के लिए चला गया तो कहीं फिर से मेरे पैसे चोरी न हो जायें।”

तो ड्राइवर ने कहा- “चिंता मत करो अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हारे पैसे अपनी जेब से दूंगा।”

दुकानदार चाय कार मैं देने के लिए चला गया जब वहां उसने गुरु जी को देखा तो हैरान हो गया।

आँखों में आंसू देखे तो गुरू जी ने कहा- “तूने कहा था कि मैं तुम्हे यहीं मिलने आऊं और अब मैं तुमको मिलने आया हूँ तो तुम रो रहे हो।”

इतना प्यार था उस आदमी के अन्दर आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

जब मन सच्चा हो और इरादे नेक हो तो भगवन को भी आना पड़ता है, अपने भगत के लिये…!

दिमाग एक खजाना है जिसमे हम प्यार,

दिमाग़ कचरे का डब्बा नहीं, जिसमें हम क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान और जलन रखें…!
दिमाग एक खजाना है जिसमे हम प्यार, सम्मान, ज्ञान, विज्ञान, मानवता, दया जैसी बहुमूल्य चीजें रख सकते हैं…!!
ताक़त आवाज़ में नहीं अपने विचारो में रखिए क्योंकि फ़सल बारिश से होती है, बाढ़ से नहीं…….!!
आपका दिन शुभ एवम मंगलमय हो……!!

. सुप्रभात,………..

सच मानिये थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।

राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया।

राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।

विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई।

कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं?

संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे।

संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था! क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं; आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं; लेकिन आप तो कल की चिंता करते हैं।

सच्चा भक्त तो वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है।

अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रात भर आनंद से प्रार्थना करेंगे।

ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है।

उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं! राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी।

इससे यही साबित होता है कि सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान्) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।

कभी आप बहुत परेशान हो, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो। आप आँखे बंद कर के विश्वास के साथ पुकारें – सच मानिये थोड़ी देर में आप की समस्या का समाधान मिल जायेगा।