क्रोध एक सार्वभोमिक तकलीफ
क्रोध से कोई अछूता नहीं है! संतों ने इसका वर्णन अनेक तरीके से किया है और इससे दूर रहने की सलाह भी हम एक दुसरे को देते हैं पर जब अपनी बारी आती है तो हमारी उस क्रोध न करने की समझ का अक्सर अपहरण हो जाता है और अनायास ही हम इस क्रोध के शिकार हो जाते हैं!
अमूमन हम यही देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति क्रोध कर लेता है, तब सभी लोग उसे कहते हैं कि “भाई, आपको क्रोध नहीं करना चाहिए!”
उस समय ऐसे शब्द सुनकर वह क्रोधित व्यक्ति अपमान का अनुभव करता है और अपना अपमान किसी को अच्छा नहीं लगता।
इस कारण से, उस अपमान से बचने के लिए, अपने सम्मान की रक्षा के लिए और अपने आप को निर्दोष सिद्ध करने के लिए, वह व्यक्ति क्रोध आने के ‘कारण’ गिनाने लगता है, कि “उस व्यक्ति ने मुझे ऐसा ग़लत ग़लत कहा, जिस कारण से मुझे क्रोध आया।”
इस प्रकार से वह, क्रोध करने के बाद भी अपने दोष को स्वीकार नहीं करता, बल्कि सारा दोष दूसरे व्यक्ति के सिर पर डाल देता है। और कहता है कि “यदि वह ऐसा मुझे नहीं कहता, तो मैं क्रोध क्यों करता? इसलिए मेरी कोई गलती नहीं है, सारा काम उसने ही बिगाड़ा है।”
परंतु वास्तविकता यह है कि “कोई भी व्यक्ति जब क्रोध करता है – तब यह तो ठीक है कि क्रोध करने का कोई न कोई कारण तो होगा ही।”
यदि बैठे बिठाए बिना कारण के कोई व्यक्ति क्रोध करे, तब तो लोग उसे ‘पागल’ ही समझेंगे और उसे पागलखाने में पहुंचा देंगे। इसलिए बिना कारण तो कोई व्यक्ति क्रोध नहीं करता! “जब भी क्रोध आता है, तो उसका कोई न कोई कारण तो होता ही है।”
परंतु यह बात इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया।”
महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि “जब क्रोध आ गया, तब क्रोधित होकर आपने कोई ग़लत क्रिया कर दी या आपने भी कुछ उल्टा सीधा बोल दिया! तब उसका जो परिणाम निकला – क्या वह परिणाम अत्यंत हानिकारक नहीं होता है? क्या आप वह हानि उठाना चाहते हैं?”
उत्तर यही होगा कि कोई नहीं चाहेगा। लेकिन आवेग में तो वह नुकसान हो चूका!
इसलिए क्रोध आने के कारण नहीं गिनाने चाहिय कि “इस कारण से मुझे क्रोध आया। उस कारण से क्रोध आया।”
क्रोध के कारण गिनाने मात्र से आप क्रोध से होने वाली हानि से बच नहीं पाएंगे। इसलिए बुद्धिमत्ता इसी बात में है कि “यदि आप क्रोध की हानियों से बचना चाहते हों तो अपने मन और वाणी पर संयम रखें। स्वयं अपने आप पर संयम रखें।” यही समाधान है, क्रोध से बचने का।
अपने मन और वाणी पर संयम कैसे रखें? स्वयं अपने आप पर संयम कैसे रखें?
इसका उपाय है, “अपनी इच्छाओं/अपेक्ष्याओं पर नियंत्रण करें। आप लोगों से जितनी इच्छा और अपेक्षया कम रखेंगे, उतना ही आप क्रोध से बच जायेंगे और जितनी इच्छाएं और अपेक्ष्याओं को बढ़ाएंगे, उतना ही आप अधिक क्रोधित होंगे।”
क्योंकि क्रोध तभी आता है, जब आपकी इच्छा पूरी नहीं होती! और सारी इच्छाएं किसी व्यक्ति की कभी भी पूरी हो नहीं सकती। ऐसे तो सदा ही सबको क्रोध आता ही रहेगा। उसको कभी कोई व्यक्ति जीत ही नहीं पाएगा!”
बनने वाले ने हमारे अंदर दोनों प्रकार की चीजें डाली हैं –
पहली कि सुख की चाहत हमारी जन्मजात प्रक्रति बनायी और सात गुण – पवित्रता, शांति, शक्ति, प्यार, खुशी, ज्ञान और गंभीरता के रूप में दिए!
दूसरा, पांच तरह के विकार भी हम सभी में विद्यमान हैं – जिन्हें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार कहा गया है!
अब यह हमारे विवेक पर छोड़ दिया गया है कि अपना ध्यान किस ओर दें और किस चीज का ज्यादा इस्तेमाल करें! स्वाभाविक हैं कि जिसका हम अधिक अभ्यास, चिन्तन-मनन करेंगे उसी में पारंगत होंगे!
जिन लोगों को समय के सद्गुरु का सानिध्य मिलता है और जब वे उन्हें आत्मबोध कराते हैं तो इन पांच विकारों का मुकाबला ही नहीं इनका समन भी किया जाता सकता है! कयोंकि खाली क्रोध नहीं करना चाहिय यह एक सुन्दर बात है पर इसका निराकरण तो समय के महापुरुष का सानिध्य और मार्गदर्शन ही है! हम आरती में रोज गाते भी हैं कि –
काम क्रोध मद मत्सर चोर बड़े भारे!
ज्ञान खडग दे कर में गुरु सब संहारे!!
पांच चोर के मारण कारण नाम का बाण दिया!
प्रेम भक्ति से साधा, भव जल पार किया!!
सभी गुरुभक्तों के लिय खुशखबरी यही है कि महाराजी की कृपा से हमें इन पंच-विकारों से मुक्ति पाने की युक्ति मिली हुई है! अब हर एक भक्त पर निर्भेर करता है कि हम अपना झुकाव किस तरफ करें! जिस किसी ने इस युक्ति को समझ लिया और प्रेमभक्ति से अपने विकारों को दूर करने का अनवरत अभ्यास किया तो जीवन में आनन्द ही आनन्द है!
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