एक बंदा गुरू साहिब जी के पास आया करता था जब भी वो बंदा गुरुद्वारे मे प्रवेश करता तो ये शुक्राने वाला भजन चलता था और वो बंदा अपनी नौकरी

एक बंदा गुरू साहिब जी के पास आया करता था जब भी वो बंदा गुरुद्वारे मे प्रवेश करता तो ये शुक्राने वाला भजन चलता था और वो बंदा अपनी नौकरी, अपनी पारिवारिक परेशानी, पैसे की तंगी और दूसरी परेशानियाँ का सामना कर रहा था और दरबार मे बैठते ही वो बंदा होठो ही होठो मे कहता था कि किस बात का शुक्राना करू है क्या मेरे पास,

आपके पास आता हूँ आपने दिया क्या है मुझे परेशानियों के अलावा और दुखी मन से माथा टेक कर वापिस चला जाता लेकिन जब भी गुरू जी के पास वो बंदा बैठा होता ये शुक्राने वाला भजन जरूर लगता और बंदे को जख्म पर नमक की तरह महसूस होता और उल्टा सीधा सोचकर आज्ञा लेकर घर वापिस चला जाता जब भी आज्ञा लेने जाता तो गुरू जी को मन्द मन्द मुस्कुराते देखकर और बुरा लगता, खैर कुछ टाईम बाद आना ही छोड दिया, लगभग दो महीने बाद जब परेशानियाँ हद से ज्यादा बढ गयी तो गुरू साहिबजी याद आये और आ गया गुरू चरणो मे और उस दिन भी यही भजन सुनने को मिला बडे ही निराश मन से बैठा रहा शायद गुरू जी आज बुला ले और कल्याण कर दे मेरा, आखिर तक बैठा रहा जब गुरू जी ने नही बुलाया तो आज्ञा लेने गया तो गुरू साहिबजी कहने लगे ” बे जा (बैठ जा) मेरे कौल ते ओ जो दीवार नाल तीन बन्दे बैठे ने पता है कौन ने ?? उस बंदे ने कहा गुरू जी मैनू नही पता, गुरू जी ने केहा “ओ जो पहले दीवार दे नाल टोह लगाके बैठा है ओ अन्हा ( अन्धा ) है ते शुक्राना कर रेहा है “गुरू जी त्वाडा शुक्राना कि मै कम से कम अपने कन्नां (कान) नाल त्वाडी रबाबी ते रूहानी गुरूबाणी ते सुन रेहा हाँ आपदा हर पल शुक्राना मेरे वाहेगुरू जी,”

ते जो दूसरे नम्बर ते बैठा है ओ बहरा है सुन नही सकदा ते ओ वी बार बार शुक्राना कर रेहा है कि “हे मेरे गुरू जी अगर कान नही ने कोई गल्ल नही कम से कम अक्खां नाल त्वाडे सचखण्ड ते अपने भगवान गुरू जी दे दर्शन कर रेहा हाँ आपदा हर पल शुक्राना मेरे सतगुरू जी, ते तीजे नम्बर ते जो बैठा है ओहदे दोनो पैर नही ने बडी मुश्किल नाल दरबार विच आन्दा है ते शुक्राना करदा है कि “है मेरे सतगुरू जी की होया जे पैर नही हन कम से कम मेरे कौल दो अक्खां ने जिदे नाल मे त्वाडा नूरानी रूप देख सकदा हाँ कान दित्ते ने आपदी बख्शी दात गुरूबाणी सुन रेहा हाँ, महसूस कर सकदा हाँ, आपदा हर पल शुक्राना मेरे गुरू जी, तेनू ते मै सब कुछ दित्ता फैर क्यो नही शुक्राना करेंगा, किस दिन भूखा सूत्ता है तू या तेरा परिवार, कैडी ऐसी जरूरी लोड है जो पूरी नही कीत्ती बस ज्यादा नही दीत्ता क्योकि कुछ कर्म ऐसे होन्दे ने जो भुगतने पैन्दे ने ते मै तां तेरे नाल रहके तेरे कर्म भुगतवा रेहा हाँ अब बात उस बंदे की थी सारे भ्रम दूर हो गये थे आंखो पर छाया काला अन्धेरा मिट गया था और गुरू जी के चरणो मे गिरकर शुक्राना किया हमे गुरू जी से कुछ मांगने की जगह हर पल शुक्राना करना चाहिये समय आने पर उन्होने सब कुछ देना है इतना देना है कि हम संभाल भी नही पायेंगे.
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙇🏼

यह संसार एक धर्मशाला के समान है। जैसे धर्मशाला में लोग आते हैं, 2/4 दिन रहते हैं, और फिर अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं।

“यह संसार एक धर्मशाला के समान है। जैसे धर्मशाला में लोग आते हैं, 2/4 दिन रहते हैं, और फिर अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं।”
“इसी प्रकार से लोग संसार में आते हैं, 50/60/80 वर्ष तक यहां पर रहते हैं और अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं अर्थात संसार रुपी धर्मशाला को छोड़कर कर चले जाते हैं।”

“जैसे लोग धर्मशाला में जाते हैं, 2/4 दिन रहते हैं‌। वहां अपने पड़ोसियों के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करते। बल्कि उनको कुछ न कुछ सहयोग देते ही हैं। कुछ कुछ सहयोग लेते भी हैं। परंतु वे जो भी व्यवहार करते हैं – प्रेमपूर्वक करते हैं।”

धर्मशाला में रहने वाले वे सभी लोग जानते हैं, कि “हम यहां 2/4 दिन के अतिथि हैं, स्थाई रूप से यहां नहीं रहेंगे। इस कारण से वे लोग प्रेमपूर्वक रहते हैं, और आपस में लड़ाई झगड़ा नहीं करते।”

यदि संसार में रहने वाले लोग भी, संसार को धर्मशाला के समान स्वीकार कर लें और ऐसा सोच लें, कि “कुछ समय तक ही तो यहां रहना है, फिर एक दिन तो यहां से वापस जाना ही है। हमारी वापसी का दिन भले ही निश्चित न हो फिर भी वापस जाने का टिकट तो कन्फर्म ही है। बस उसकी तारीख निश्चित नहीं है।” “न जाने किस दिन संसार से जाना पड़ जाए। तब सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होगा।” “जो हमें यहां धन संपत्ति आदि सुविधाएं मिली हुई हैं, ये सब भी पूर्व जन्म के कुछ कर्मों का फल है। वे कर्म भी हमने केवल अपनी शक्ति से नहीं किए थे, बल्कि ईश्वर के दिए हुए शरीर मन बुद्धि विद्या आदि साधनों से किए थे। इसलिए इन कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुई इन संपत्तियों पर भी हमारा पूरा स्वामित्व (अधिकार = मालिकी) नहीं है। इन संपत्तियों का “प्रयोग करने का थोड़ा सा अधिकार मात्र” हमें ईश्वर ने दिया है, पूरा स्वामित्व नहीं। न ही हम इन्हें अपने साथ अगले जन्म में ले जा पाएंगे। इसलिए न तो हमारा कुछ है, और न ही दूसरों का। सबको, सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ है। तो ईश्वर की दी हुई संपत्तियों पर हम आपस में क्यों झगड़ें? बल्कि ईश्वर से मिली इन सुविधाओं का चुपचाप लाभ ले लेना चाहिए, और शांति से जीवन जीना चाहिए।”

“बस, इतना यदि संसार के लोग समझ लें, तो आपस के लड़ाई झगड़े ईर्ष्या द्वेष छीन झपट लोभ क्रोध अभिमान आदि सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, और संसार में प्रेममय उत्तम वातावरण बनेगा – जैसा कि धर्मशाला में होता है।”

एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव हमेशा खुश रहने का नुस्खा अगर हो तो दीजिए।

एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव हमेशा खुश रहने का नुस्खा अगर हो तो दीजिए।

गुरु बोले, बिल्कुल है आज तुमको वह राज बताता हूँ।

गुरु उस शिष्य को अपने साथ सैर पर ले गये ओर उस से अच्छी अच्छी बातें करते रहे! शिष्य बड़ा आनंदित था।

एक स्थान पर ठहर कर गुरु ने उस शिष्य को एक बड़ा पत्थर देकर कहा इसे उठाए उठाये मेरे साथ चलो।

पत्थर को उठाकर वह शिष्य गुरु के साथ-साथ चलने लगा। कुछ समय तक तो आराम से चला लेकिन थोड़ी देर में हाथ में दर्द होने लगा, पर दर्द सहन करता चुपचाप चलता रहा।

गुरु पहले की तरह मधुर उपदेश देते चल रहे थे पर शिष्य का धैर्य जवाब दे गया!

शिष्य ने कहा गुरूजी आपके प्रवचन मुझे प्रिय नहीं लग रहे! अब मेरा हाथ दर्द से फटा जा रहा है।

गुरु से पत्थर नीचे रखने का संकेत मिला तो उस युवक ने पत्थर को फेंका और आनंद में भरकर गहरी साँसे लेने लगा!

गुरु ने कहा *यही है खुश रहने का राज़!

मेरे प्रवचन तुम्हें तभी तक आनंदित करते रहे जब तक तुम बोझ से मुक्त थे परंतु पत्थर के बोझ ने उस आनंद को छीन लिया!

जैसे पत्थर को ज़्यादा देर उठाये रखेंगे तो दर्द बढ़ता जायेगा! उसी तरह हम दुखों या किसी की कही कड़वी बात के बोझ को जितनी देर तक उठाये रखेंगे उतना ही हमें दुःख होगा।*

अगर खुश रहना चाहते हो तो दु:ख रुपी, द्वेष रूपी, चिंता रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो! और हो सके तो उसे उठाओ ही नही- तभी जीवन का वास्तविक आनंद पाओगे।

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏
श्रद्धा ज्ञान देती है, नम्रता मान देती है, योग्यता स्थान देती है, तीनों मिल जाए तो व्यक्ति को हर जगह सम्मान देती है।

👉 आज से हम सम्माननीय बनें…

🌸🌸🌸🌸

Devotion gives knowledge, Politeness gives respect, and Capability gives space, When these three combine together, it gives a person honor everywhere!

👉 TODAY ONWARDS LET”S become honorable…

सबसे ऊँची प्रार्थना

सबसे ऊँची प्रार्थना

एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था! मृत्यु से पहले वह अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है कि “जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ! उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे।

उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह भर गया। अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया। वह थैला इतना बड़ा था कि उसे खर्च करने में कई साल बीत गए! इस बीच वह प्रार्थना भूल गया।

जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि “अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी।”

उसने बहुत याद किया और उसे याद ही नहीं आया। अब वह लोगों से पूँछने लगा। पहले पड़ोसी से पूछता है कि “ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या? जिसमें चार शब्द हैं।

पड़ोसी ने कहा, “हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, “ईश्वर मेरी मदद करो।”
उसने सुना और उसे लगा कि ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे। कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है। फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ।

फिर वह एक फादर से मिला! उन्होंने बताया कि, “ईश्वर तुम महान हो”
ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा।

वह एक नेता से मिला! उसने कहा, “ईश्वर को वोट दो!” यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई।

वह बहुत उदास हुआ! उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली जो पिताजी ने बताई थी।

वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया।
उसने कहा, “सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो।”

उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया। उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना कि, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद।”

अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया कि “अरे! यही तो वह चार शब्द थे।”

उसने वे शब्द दोहराने शुरू किया कि, “हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद” और उसके सिक्के बढ़ते गए! बढ़ते गए! इस तरह उसका पूरा थैला भर गया। इससे समझें कि जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया। “हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।”

यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है। अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है! प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है।

ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं कि ऐसा ज्ञान का मौका हमें प्राप्त हुआ है। बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में बदलाव ला रहा है!

ज्ञान के बिना ऐसे अनेक लोग हैं – जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं। मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता। उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

ऊपर दी गई कहानी से समझें कि, “हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद!” ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं।

हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को! जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें – पहली “साँस का चलना” दूसरी “सत्य की प्यास।”

यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी। भक्ति और प्रार्थना से होगा – आनंद, परम आनंद!

🙏🏽🙏🏼🙏सुप्रभात🙏🏾🙏🏻🙏🏿

सतत अभ्यास करो!!

सतत अभ्यास करो!!

एक साहब ने तोता पाल रखा था और उस से बहुत प्रेम करते थे!

एक दिन एक बिल्ली उस तोते पर झपटी और तोता उठा कर ले गई!

वो साहब रोने लगे तो लोगो ने कहा: भाई आप क्यों रोते हो? हम आपको दूसरा तोता ला देते हैं!

वो साहब बोले: मैं तोते की जुदाई पर नही रो रहा हूं।

फिर उनसे पूछा गया: फिर क्यों रो रहे हो?

कहने लगे: दरअसल बात ये है कि मैंने उस तोते को मंत्र सिखा रखा था जिसे वो सारा दिन मंत्र रटता रहता था! आज जब बिल्ली उस पर झपटी तो वो मंत्र पढ़ना भूल गया और टाएं टाएं करने लगा।

अब मुझे ये फिक्र खाए जा रही है कि मंत्र तो मैं भी पढ़ता हूँ लेकिन जब काल के दूत मुझ पर झपटेगें! न मालूम मेरी जबान से मंत्र निकलेगा या तोते की तरह टाएं-टाएं निकलेगी!

इसीलिए महापुरुष कहते हैं कि महाराजी से प्राप्त ज्ञान का अभ्यास इतना पक्का कर लो कि यह आपकी आदत बन जाय! इसके बिना हर पल फीका लगने लगे!

अगर थोड़ी भी लापरवाही हुई, अभ्यास करना छोड़ दिया तो अन्तिम समय ऐसा न हो हम भी तोते की तरह भगवान के नाम की जगह हाय-हाय करने लगें।
इसलिए निरंतर भजन अभ्यास बहुत ज़रूरी है!

आपका दिन मंगलमय हो!

गुरु ही ईश्वर है!

गुरु ही ईश्वर है!

स्वामी विवेकानंद एक बार एक रेलवे स्टेशन पर बैठे थे उनका अयाचक (ऐसा व्रत जिसमें किसी से मांग कर भोजन नहीं किया जाता) व्रत था। वह व्रत में किसी से कुछ मांग भी नहीं सकते थे। एक व्यक्ति उन्हें चिढ़ाने के लहजे से उनके सामने खाना खा रहा था।

स्वामी जी दो दिन से भूखे थे और वह व्यक्ति कई तरह के पकवान खा रहा था और बोलता जा रहा था कि बहुत बढ़िया मिठाई है। विवेकानंद ध्यान की स्थिति में थें और अपने गुरुदेव को याद कर रहे थे।

वह मन ही मन में बोल रहे थे कि गुरुदेव आपने जो सीख दी है उससे अभी भी मेरे मन में कोई दुख नहीं है। ऐसा कहते विवेकानंद शांत बैठे थे। दोपहर का समय था। उसी नगर में एक सेठ को भगवान श्रीराम ने दर्शन दिए और कहा कि रेलवे स्टेशन पर मेरा भक्त एक संत आया है उसे भोजन करा कर आओ उसका अयाचक व्रत है जिसमें किसी से कुछ मांग कर खाना नहीं खाया जाता है तो आप जाओ और भोजन करा कर आओ ।

सेठ ने सोचा यह महज कल्पना है । दोपहर का समय था सेठ फिर से करवट बदल कर सो गया । भगवान ने दोबारा दर्शन दिए और सेठ से कहा कि तुम मेरा व्रत रखते हो और तुम मेरा इतना सा भी काम नहीं करोगे । जाओ और संत को भोजन करा कर आओ ।

तब सेठ सीधा विवेकानंद के पास पहुंच गया और वह उनसे बोला कि मैं आपके लिए भोजन लाया हूं। सेठ बोला में आपको प्रणाम करना चाहता हूं कि ईश्वर ने मुझे सपने में कभी दर्शन नहीं दिए आपके कारण मुझे-श्रीरामजी के दर्शन सपने में हो गए इसलिए में आपको प्रणाम कर रहा हूं ।

विवेकानंद की आंखों में आंसू आ गए । वो सोचने लगे कि मैनें याद तो मैरे गुरुदेव को किया था। गुरुदेव और ईश्वर की कैसी महिमा है। स्वामी विवेकानंद की आंखों के आंसू रुक नहीं रहे थे, तब उन्हें लगा कि गुरु ही ईश्वर हैं |
………….. शुभ रात्रि……….

हृदय में आनंद हो तो वसंत कभी भी आ सकता है।

हृदय में आनंद हो तो वसंत कभी भी आ सकता है।

*जीवन परिवर्तनशील है! इसलिए वह हमेशा चक्र की भांति घूमता रहता है। इस घूमते हुए चक्र से ही ऋतुएं बनती हैं।

जैसे इन्सान के अलग-अलग मनोभाव होते हैं – कभी दृढ़, कभी प्रफुल्लित तो कभी शांत, कभी गर्म तो कभी अशान्त!
वैसे ही प्रकृति के भी मूड्स होते हैं और उसे ही ऋतु चक्र कहते हैं।

मनुष्य का मन और प्रकृति एक दूसरे के बहुत निकट हैं। इसलिए बदलते हुए मौसम मन को प्रभावित करते हैं। एक प्रकृति मनुष्य के बाहर है और एक प्रकृति भीतर है। जब बाहर प्रकृति बदलती है तो कहीं न कहीं अंतर्मन की प्रकृति को भी प्रभावित करती है।

जैसे मौसम बदलने से मन की भावनाएं, विचार, इच्छाएं, सब कुछ बदलता है। जब आसमान में घने बादल छा जाते हैं, तब मन के आसमान में भी उदासी छा जाती है और जब बाहर चिड़िया चहकती है और फूल खिलते हैं, तब मन भी वसंत हो जाता है।

इससे विपरीत , जब आदमी का मन बदलता है तो उसका असर प्रकृति पर दिखाई देता है। पर्यावरण की खराब हालत आदमी के हिंसक मन का ही असर है। दुखी आदमी पर्यावरण का विनाश करता है।

जिनके मन शांत और सुंदर होते हैं, वे अपने आसपास सौंदर्य की बगिया लगाते हैं, प्रकृति को खुशहाल रखते हैं, उसका आदर करते हैं।

भीतर अगर वासंतिक मनोभाव न हो! हृदय में बसंती रंग न छाया हो तो पीले कपड़े पहनकर भी वसंत बुझा-बुझा सा रहेगा, सुलग न पाएगा।*

हम सबके भीतर हमारा अपना वसंत छिपा हुआ है।
आइये, अपने अन्तरमन में भी झांकें, वहाँ के सोंदर्य का आनन्द लें!

🙏🙏 जय सच्चिदानंद🙏🙏

अपने मालिक पर भरोसा

अपने मालिक पर भरोसा

एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।

वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।

वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।

उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।
दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।

थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई मालिक है?
बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।

गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?

उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है।

गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?

थोड़ी ही देर में सचमुच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।

जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उस बाघ के स्वभाव से उन दोनों की जान के लिए वह खतरा था।
यदपि यह काल्पनिक कथानक हो सकता है लेकिन समझने के लिय हम सभी को प्रेरणा मिलती है कि –
गाय हमारे समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।
बाघ हमारा अहंकारी मन है।
कीचड़ इस संसार माया में हमारी लिप्तता है।
संघर्ष हमारे अनागत अस्तित्व की लड़ाई है।
और मालिक के रूप में सदगुरु आते हैं और हमको इस मायारूपी कीचड़ से निकालकर अपने आनन्द के संसार में ले जाते हैं!

इसलिय
सभी गुरुभक्तों को अपने जीवन की डोर हमेशा समर्पित भाव से अपने मालिक को दे देना ही श्रेयष्कर है! तभी हमारा जीवन सफल हो पायेगा!

भ्रम और वास्तविकता

*भ्रम और वास्तविकता*

बार एक धनवान व्यक्ति ने अपने घर की सारी दीवारों पर कांच की टुकड़ियां लगवा रखीं थीं !

उससे घर में हजारों दर्पण नजर आ रहे थे!
एक ही आदमी के हजारों आदमी नजर आते थे!

एक बार इस सम्राट के महल में एक कुत्ता घुस गया।

कांच के टुकड़ों में अपनी परछाई देख कर वह कुत्ता तो बड़ी मुश्किल में फंस गया!

उसने यह देखा कि *हजारों कुत्ते उसे घूर रहे हैं! वह डरकर भौंकने लगा।*

ध्यान रहे कि *जो डरते हैं, वही भौंकते हैं वर्ना निडर हमेशा आश्वस्त और शान्त रहता है!*

भौंकने से भौंकने वाले को तसल्ली मिलती है कि *हम डरे नहीं हैं, हम तो डरा रहे हैं।*

सच तो यह है कि *डराने की चेष्टा करना ही डरना होता है। दूसरों को वही डराता है, जो खुद डरा हुआ होता है।*

वह कुत्ता जोर से भौंका तो *दर्पण के सब कुत्ते भी एक साथ उसको भौंकते दिखाई दिए। इससे वह तो और भी घबरा गया!*

उसको महसूस हुआ कि *यह क्या उसे तो एक साथ हजारों दुश्मनों ने उसे घेर लिया!*

उसको अपनी सुरक्षा का एक ही उपाय सूझा – *हमला!*

उसने भागकर दर्पणों पर हमला किया। *दर्पणों के हजारों कुत्तों ने भी तब अपनी जवाबी कार्रवाई कर डाली!*

आखिरकार *वह कुत्ता पागल हो गया व अगले दिन मरा हुआ पाया गया!*

संत महापुरुषों के अनुसार;
*इस अस्तित्व के साथ हम जो कुछ भी भाव बनाते हैं उसकी प्रतिध्वनियां भी गूंजने लगती हैं!*
*हम भी किसी ना किसी डर के कारण किसी ना किसी तरह डर के शिकार बन जाते हैं!*

अपनी अभिलाषा की पूर्ति ना होते देख हम शत्रुता की नजरों से देखना शुरु करते हैं तो हमको आभास होता है कि *हमारे चारों तरफ शत्रु खड़े हो रहे हैं!*

जब हम सभी को प्रेमपूर्वक देखने लग जायेंगे तो *हमको कोई शत्रु नजर नहीं आएगा! सभी मित्र नजर आएंगे!*

असल में, *हम अज्ञानता के कारण खुद ही फैल कर गूंजने लगते हैं। हमारी खुद की ही प्रतिध्वनि (आवाज) अपने को ही सुनाई पड़ने लग जाती है!*

हमें समय के महापुरुष यही संदेश देते हैं कि *अपने इस अस्तित्व के साथ मित्रता करो, अपने आप को जानो! तब परस्पर प्रेम, विश्वास, सहयोग और समर्पण के अर्थ समझ में आने लगेंगे!*

प्रश्न यही है कि *क्या हम अपने से प्रेम करते हैं? यदि हां, तो हम सबसे प्रेम करने लगेंगे!*

*जब हम सभी को दिल से प्रेम करने लगोगे तो हमको लगने लगेगा कि सभी हमसे प्रेम कर रहे हैं!*

प्रेम के मारग में कई लोग अपने कपोलकल्पित तर्कों के माध्यम से विजय पाना चाहते हैं!

लेकिन प्रेम का संबंध तो हृदय से है! जब हम अपने आप से प्रेम करने लगते हैं तो *हमारा प्रेम का नाता अजर अमर बन जाता है!*

इसलिए समय के सतगुरु भी हमें *परस्पर प्रेम और भक्ति का पाठ पढ़ाते हैं ; सत्संग, सेवा, सुमिरन व ध्यान सिखाते हैं! अगर हम जीवन का जीते जी असली आनन्द पाना चाहते हैं तो हमको “प्रेम की पाठशाला” में जाकर प्रेम का पाठ सीखना ही पड़ेगा!*

कहा भी है कि –
*प्रबल प्रेम के पाले पड़कर,*
*प्रभु को नियम बदलते देखा!*

*अपना मान भले टल जाए,*
*पर जन का मान ना टलते देखा!*
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*सुप्रभात*
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रात्री की कहानी, विरासत

*रात्री की कहानी*

*विरासत*

महेश के घर आते ही बेटे ने बताया कि वर्मा अंकल आर्टिगा गाड़ी ले आये हैं। *पत्नी ने चाय का कप पकड़ाया और बोली पूरे 13 लाख की गाड़ी खरीदी और वो भी कैश में*। महेश हाँ हूँ करता रहा। आखिर पत्नी का धैर्य जवाब दे गया, हम लोग भी अपनी एक गाड़ी ले लेते हैं, तुम मोटर साईकल से दफ्तर जाते हो क्या अच्छा लगता है कि सभी लोग गाड़ी से आएं और तुम बाइक चलाते हुए वहाँ पहुंचो, कितना खराब लगता है। तुम्हे न लगे पर मुझे तो लगता है।

देखो घर की किश्त और बाल बच्चों के पढ़ाई लिखाई के बाद इतना नही बचता कि गाड़ी लें। फिर आगे भी बहुत खर्चे हैं। महेश धीरे से बोला।

बाकी लोग भी तो कमाते हैं, सभी अपना शौक पूरा करते हैं, *तुमसे कम तनखा पाने वाले लोग भी स्कोर्पियो से चलते हैं, तुम जाने कहाँ पैसे फेंक कर आते हो। पत्नी तमतमाई।*

अरे भई सारा पैसा तो तुम्हारे हाथ मे ही दे देता हूँ, अब तुम जानो कहाँ खर्च होता है। महेश ने कहा।

*मैं कुछ नही जानती, तुम गाँव की जमीन बेंच दो ,यही तो समय है जब घूम घाम लें हम भी ज़िंदगी जी लें। मरने के बाद क्या जमीन लेकर जाओगे। क्या करेंगे उसका। मैं कह रही कल गाँव जाकर सौदा तय करके आओ बस्स। पत्नी ने निर्णय सुना दिया।*

अच्छा ठीक है पर तुम भी साथ चलोगी। महेश बोला । *पत्नी खुशी खुशी मान गयी* और शाम को सारे मुहल्ले में खबर फैल गयी कि सरला जल्द ही गाड़ी लेने वाली है।

सुबह महेश और सरला गाँव पहुँचे। गाँव में भाई का परिवार था। *चाचा को आते देख बच्चे दौड़ पड़े*। बच्चों ने उन्हें खेत पर ही रुकने को बोला, चाचा माँ आ रही है। तब तक महेश की भाभी लोटे में पानी लेकर वहाँ आईं और दोनों के जूड़ उतारने के बाद बोलीं लल्ला अब घर चलो।

*बहुत दिन बाद वे लोग गाँव आये थे, कच्चा घर एक तरफ गिर गया था। एक छप्पर में दो गायें बंधीं थीं। बच्चों ने आस पास फुलवारी बना रखी थी, थोड़ी सब्जी भी लगा रखी थी। सरला को उस जगह की सुगंध ने मोह लिया*। भाभी ने अंदर बुलाया पर वह बोली यहीं बैठेंगे। वहीं रखी खटिया पर बैठ गयी। महेश के भाई कथा कहते थे। एक बालक भाग कर उन्हें बुलाने गया। उस समय वह राम और भरत का संवाद सुना रहे थे। बालक ने कान में कुछ कहा, *उनकी आंख से झर झर आँसू गिरने लगे, कण्ठ अवरुद्ध हो गया। जजमानों से क्षमा मांगते बोले, आज भरत वन से आया है राम की नगरी*। श्रोता गण समझ नही सके कि महाराज आज यह उल्टी बात क्यों कह रहे। नरेश पंडित अपना झोला उठाये नारायण को विश्राम दिया और घर को चल दिये।

*महेश ने जैसे ही भैया को देखा दौड़ पड़ा, पंडित जी के हाथ से झोला छूट गया, भाई को अँकवार में भर लिए। दोनो भाइयों को इस तरह लिपट कर रोते देखना सरला के लिए अनोखा था। उसकी भी आंखे नम हो गयीं। भाव के बादल किसी भी सूखी धरती को हरा भरा कर देते हैं। वह उठी और जेठ के पैर छुए, पंडित जी के मांगल्य और वात्सल्य शब्दों को सुनकर वह अन्तस तक भरती गयी।*

दो पैक्ड कमरे में रहने की अभ्यस्त आंखें सामने की हरियाली और निर्दोष हवा से सिर हिलाती नीम, आम और पीपल को देखकर सम्मोहित सी हो रहीं थीं। *लेकिन आर्टिगा का चित्र बार बार उस सम्मोहन को तोड़ रहा था। वह खेतों को देखती तो उसकी कीमत का अनुमान लगाने बैठ जाती।*

दोपहर में खाने के बाद पण्डित जी नित्य मानस पढ़ कर बच्चों को सुनाते थे। आज घर के सदस्यों में दो सदस्य और बढ़ गए थे। *अयोध्याकांड चल रहा था। मन्थरा कैकेयी को समझा रही थी, भरत को राज कैसे मिल सकता है। पाठ के दौरान सरला असहज होती जाती जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो*। पाठ खत्म हुआ। पोथी रख कर पण्डित जी गाँव देहात की समसामयिक बातें सुनाने लगे। सरला को इसमें बड़ा रस आता था। *उसने पूछा कि क्या सभी खेतों में फसल उगाई जाती है?* पण्डित जी ने सिर हिलाते हुए कहा कि एक हिस्सा परती पड़ा है। सरला को लगा बात बन गयी, उसने कहा *क्यों न उसे बेंच कर हम कच्चे घर को पक्का कर लें। पण्डित जी अचकचा गए।* बोले बहू, यह दूसरी गाय देख रही, *दूध नही देती पर हम इसकी सेवा कर रहे हैं। इसे कसाई को नही दे सकते*।

*तुम्हे पता है, इस परती खेत में हमारे पुरखों का जांगर लगा है। यह विरासत है, विरासत को कभी खरीदा और बेंचा थोड़े जाता है। विरासत को संभालते हुए हम लोगों की कितनी पीढ़ियाँ खप गयीं। कितने बलिदानों के बाद आज भी हमने अपनी मही माता को बचा कर रखा है*। तमाम लोगों ने खेत बेंच दिए, उनकी पीढ़ियाँ अब मनरेगा में मजूरी कर रही हैं या शहर के महासमुन्दर में कहीं विलीन हो गए। *तुम अपनी जमीन पर बैठी हो, इन खेतों की रानी हो।* इन खेतों की सेवा ठीक से हो तो देखो कैसे माता मिट्टी से सोना देती है। शहर में जो हर लगा है बेटा वो सब कुछ हरने पर तुला है, सम्बन्ध, भाव, प्रेम, खेत, मिट्टी, पानी हवा सब कुछ। आज तुम लोग आए तो लगा मेरा गाँव शहर को पटखनी देकर आ गया। शहर को जीतने नही देना बेटा। शहर की जीत आदमी को मशीन बना देता है। *हम लोग रामायण पढ़ने वाले लोग हैं जहाँ भगवान राम सोने की लंका को जीतने के बाद भी उसे तज कर वापस अजोध्या ही आते है, अपनी माटी को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं।*

तब तक अंदर से भाभी आयीं और उसे अंदर ले गईं। कच्चे घर का तापमान ठंडा था। *उसकी मिट्टी की दीवारों से उठती खुशबू सरला को अच्छी लग रही थी*। भाभी ने एक पोटली सरला के सामने रख दी और बोलीं, *मुझे लल्ला ने बता दिया था, इसे ले लो और देखो इससे कार आ जाये तो ठीक नही तो हम इनसे कहेंगे कि खेत बेंच दें।*

सरला मुस्कुराई, *विरासत कभी बेंचा नही जाता भाभी। मैं बड़ों की संगति से दूर रही न इसलिए मैं विरासत को कभी समझ नही पाई। अब यहीं इसी खेत से सोना उपजाएँगे और फिर गाड़ी खरीदकर आप दोनों को तीरथ पर ले जायेंगे, कहते हुए सरला रो पड़ी, क्षमा करना भाभी। दोनो बहने रोने लगीं। बरसों बरस की कालिख धुल गयी।*

अगले दिन जब महेश और सरला जाने को हुए तो उसने अपने पति से कहा, *सुनो मैंने कुछ पैसे गाड़ी के डाउन पेमेंट के लिए जमा किये थे उससे परती पड़े खेत पर अच्छे से खेती करवाइए। अगली बार उसी फसल से हम एक छोटी सी कार लेंगे और भैया भाभी के साथ हरिद्वार चलेंगे।*

*शहर हार गया, जाने कितने बरस बाद गाँव अपनी विरासत को मिले इस मान पर गर्वित हो उठा था।*

*जय श्रीराम*

*शुभरात्री*