“यह संसार एक धर्मशाला के समान है। जैसे धर्मशाला में लोग आते हैं, 2/4 दिन रहते हैं, और फिर अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं।”
“इसी प्रकार से लोग संसार में आते हैं, 50/60/80 वर्ष तक यहां पर रहते हैं और अपनी अगली या वापसी यात्रा पर चल देते हैं अर्थात संसार रुपी धर्मशाला को छोड़कर कर चले जाते हैं।”
“जैसे लोग धर्मशाला में जाते हैं, 2/4 दिन रहते हैं। वहां अपने पड़ोसियों के साथ लड़ाई झगड़ा नहीं करते। बल्कि उनको कुछ न कुछ सहयोग देते ही हैं। कुछ कुछ सहयोग लेते भी हैं। परंतु वे जो भी व्यवहार करते हैं – प्रेमपूर्वक करते हैं।”
धर्मशाला में रहने वाले वे सभी लोग जानते हैं, कि “हम यहां 2/4 दिन के अतिथि हैं, स्थाई रूप से यहां नहीं रहेंगे। इस कारण से वे लोग प्रेमपूर्वक रहते हैं, और आपस में लड़ाई झगड़ा नहीं करते।”
यदि संसार में रहने वाले लोग भी, संसार को धर्मशाला के समान स्वीकार कर लें और ऐसा सोच लें, कि “कुछ समय तक ही तो यहां रहना है, फिर एक दिन तो यहां से वापस जाना ही है। हमारी वापसी का दिन भले ही निश्चित न हो फिर भी वापस जाने का टिकट तो कन्फर्म ही है। बस उसकी तारीख निश्चित नहीं है।” “न जाने किस दिन संसार से जाना पड़ जाए। तब सब कुछ यहीं छोड़कर जाना होगा।” “जो हमें यहां धन संपत्ति आदि सुविधाएं मिली हुई हैं, ये सब भी पूर्व जन्म के कुछ कर्मों का फल है। वे कर्म भी हमने केवल अपनी शक्ति से नहीं किए थे, बल्कि ईश्वर के दिए हुए शरीर मन बुद्धि विद्या आदि साधनों से किए थे। इसलिए इन कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुई इन संपत्तियों पर भी हमारा पूरा स्वामित्व (अधिकार = मालिकी) नहीं है। इन संपत्तियों का “प्रयोग करने का थोड़ा सा अधिकार मात्र” हमें ईश्वर ने दिया है, पूरा स्वामित्व नहीं। न ही हम इन्हें अपने साथ अगले जन्म में ले जा पाएंगे। इसलिए न तो हमारा कुछ है, और न ही दूसरों का। सबको, सब कुछ ईश्वर का दिया हुआ है। तो ईश्वर की दी हुई संपत्तियों पर हम आपस में क्यों झगड़ें? बल्कि ईश्वर से मिली इन सुविधाओं का चुपचाप लाभ ले लेना चाहिए, और शांति से जीवन जीना चाहिए।”
“बस, इतना यदि संसार के लोग समझ लें, तो आपस के लड़ाई झगड़े ईर्ष्या द्वेष छीन झपट लोभ क्रोध अभिमान आदि सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी, और संसार में प्रेममय उत्तम वातावरण बनेगा – जैसा कि धर्मशाला में होता है।”

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