Just One Question (Akbar and Birbal)

Just One Question (Akbar and Birbal)

The tales of Birbal’s unparalleled wit and wisdom had reached faraway lands. Once a scholar visited Akbar’s court with the thought of challenging Birbal’s intelligence. The scholar told the king that he is the smartest and even Birbal would not be able to answer his questions. Akbar called Birbal to the court and told him what the scholar claimed. Birbal accepted the challenge that the scholar had posed for him. The scholar asked Birbal, “Do you want to answer a hundred easy questions or one difficult question?” Birbal said that he wanted to answer the difficult one. The scholar said, “Tell me Birbal, what came first, the chicken or the egg?” Birbal thought for a while and said, “Chicken came first”. The scholar mocked Birbal and said, “How can you be sure?” Birbal immediately replied, “I had only promised to answer one question, and therefore, I will not reply”. The scholar felt ashamed of his claim and left with a heavy heart.

Moral
Presence of mind helps solve even the trickiest of problems.

The Hens and The Rooster (Akbar and Birbal)

The Hens and The Rooster (Akbar and Birbal)

Once King Akbar thought of playing a trick on his favourite minister, Birbal. He confided in all other ministers and shared his plan with them. As per the plan, all the ministers had to carry an egg each the following day, hidden inside their robes. The next day, Akbar told his courtiers that he had a dream – according to it, if the ministers fetch an egg each from the royal pond, it will prove their loyalty towards him. After narrating his dream, Akbar asked all his ministers to do the same and show him their loyalty. As planned, all the ministers pretended to look for the eggs, and within no time all of them returned an egg each that was already hidden inside their robes. Birbal kept looking for the egg, but couldn’t find any. When Birbal reached empty-handed, everyone sneered at him, and they were smiling at each other. Birbal could gauge the entire scenario and went up to the king and made the loud rooster-sounds. The King was perplexed and asked Birbal why he did so, upon which Birbal replied, “My King, I am not a hen, and therefore, I could not fetch you any eggs; but I am a rooster, and this is what I can do best”. Listening to this, everyone burst into a hearty laugh.

Moral :
Self-confidence helps in dealing with difficult situations.

Who Is the King (Akbar and Birbal)

Who Is the King (Akbar and Birbal)

Once Birbal was sent as an ambassador to another kingdom. The King of that kingdom had also heard stories about Birbal’s sharp intellect and wanted to test the same. The King made all his ministers dress up like him, and they all sat in a line to test Birbal. When Birbal entered the courtroom, he was amazed to see everyone dressed in the same clothes and sitting on a similar kind of throne. Perplexed, Birbal took a moment to observe everyone and then went up to one of them and bowed in front of him. It was the King himself, who then was surprised beyond words. He stood up and hugged Birbal and also asked him how he could guess so. Birbal smiled and answered, “My lord, the kind of confidence you exuded, no one else did, and they also kept looking at you for approval”. The King felt amused and praised Birbal for his unmatched intellect and presence of mind.

Moral :
Intelligent people can comprehend a great deal through observation.

Gold Coin and Justice (Akbar and Birbal)

Gold Coin and Justice (Akbar and Birbal)

Just like any other day in King Akbar’s court, once Akbar asked Birbal, “My dear Birbal if I tell you to choose between justice and a gold coin, what will you choose?” Without taking long to answer, Birbal replied, “My lord, I will choose a gold coin, without a doubt”. Everyone including king Akbar was aghast at Birbal’s instant reply and thought that this time Birbal had fumbled for once. King Akbar said, “I am very disappointed in you. Why would you choose something of lesser value like a gold coin over something as valuable as justice?” Birbal replied with a grin on his face, “My kind King, there is no dearth of justice because there is justice everywhere in your kingdom. I felt no need to ask something that I have in abundance but my lord, I surely fall short of money, and a gold coin would be nice”. Listening to this reply, Akbar was speechless, but he had a big smile on his face. He felt overjoyed with the reply and rewarded Birbal with 100 gold coins.

Moral :
One should choose one’s words wisely.

Who’s Mango Tree is It? (Akbar and Birbal)

Who’s Mango Tree is It? (Akbar and Birbal)

Once, two brothers, Ram and Sham, were fighting over the ownership of a Mango Tree. Ram said the Mango tree was his; while Sham said he owned it. Unable to find a way out, they decided to ask Birbal for help. Birbal analysed the situation and told the brothers to remove all the mangoes, share them between the two brothers, then cut the tree in two equal halves. Upon hearing Birbal, Ram noded, while Sham pled not to cut the tree for he had nurtured it for three whole years. Birbal found who the real owner of the tree was. He said, “The tree belongs to Sham because the very thought of cutting it down troubled him. Someone who has cared for it for three years won’t cut it down immediately.”

Moral :
True ownership comes with responsibilities.

सबकी सोच एक जैसी – अकबर और बीरबल की कहानियाँ!

सबकी सोच एक जैसी – अकबर और बीरबल की कहानियाँ!

दरबार की कार्यवाही चल रही थी। सभी दरबारी एक ऐसे प्रश्न पर विचार कर रहे थे जो राज-काज चलाने की दृष्टि से बेहद अहम न था। सभी एक-एक कर अपनी राय दे रहे थे।

बादशाह दरबार में बैठे यह महसूस कर रहे थे कि सबकी राय अलग है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि सभी एक जैसे क्यों नहीं सोचते!

तब बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा, ‘क्या तुम बता सकते हो कि लोगों की राय आपस में मिलती क्यों नहीं? सब अलग-अलग क्यों सोचते हैं?’
‘हमेशा ऐसा नहीं होता, बादशाह सलामत!’ बीरबल बोला, ‘कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं जिन पर सभी के विचार समान होते हैं।’ इसके बाद कुछ और काम निपटा कर दरबार की कार्यवाही समाप्त हो गई। सभी अपने-अपने घरों को लौट चले।

उसी शाम जब बीरबल और बादशाह अकबर बाग में टहल रहे थे, तो बादशाह ने फिर वही राग छेड़ दिया और बीरबल से बहस करने लगे।

तब बीरबल बाग के ही एक कोने की ओर उंगली से संकेत करता हुआ बोला, ‘वहां उस पेड़ के निकट एक कुंआ है। वहां चलिए, मैं कोशिश करता हूं कि आपको समझा सकूं कि जब कोई समस्या जनता से जुड़ी हो तो सभी एक जैसा ही सोचते हैं।

मेरे कहने का मतलब यह है कि बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनको लेकर लोगों के विचार एक जैसे होते हैं।’

बादशाह अकबर ने कुछ देर कुंए की ओर घूरा, फिर बोले, ‘लेकिन मैं कुछ समझा नहीं, तुम्हारे समझाने का ढंग कुछ अजीब-सा है।’ बादशाह जबकि जानते थे कि बीरबल अपनी बात सिद्ध करने के लिए ऐसे ही प्रयोग करता रहता है।

‘सब समझ जाएंगे हुजूर!’

बीरबल बोला, ‘आप शाही फरमान जारी कराएं कि नगर के हर घर से एक लोटा दूध लाकर बाग में स्थित इस कुंए में डाला जाए। दिन पूर्णमासी का होगा। हमारा नगर बहुत बड़ा है, यदि हर घर से एक लोटा दूध इस कुएं में पड़ेगा तो यह दूध से भर जाएगा।’

बीरबल की यह बात सुन बादशाह अकबर ठहाका लगाकर हंस पड़े। फिर भी उन्होंने बीरबल के कहेनुसार फरमान जारी कर दिया।

शहर भर में मुनादी करवा दी गई कि आने वाली पूर्णमासी के दिन हर घर से एक लोटा दूध लाकर शाही बाग के कुंए में डाला जाए। जो ऐसा नहीं करेगा उसे सजा मिलेगी।

पूर्णमासी के दिन बाग के बाहर लोगों की कतार लग गई। इस बात का विशेष ध्यान रखा जा रहा था कि हर घर से कोई न कोई वहां जरूर आए। सभी के हाथों में भरे हुए पात्र (बरतन) दिखाई दे रहे थे।

बादशाह अकबर और बीरबल दूर बैठे यह सब देख रहे थे और एक-दूसरे को देख मुस्करा रहे थे। सांझ ढलने से पहले कुंए में दूध डालने का काम पूरा हो गया। हर घर से दूध लाकर कुंए में डाला गया था।

जब सभी वहां से चले गए तो बादशाह अकबर व बीरबल ने कुंए के निकट जाकर अंदर झांका। कुंआ मुंडेर तक भरा हुआ था। लेकिन यह देख बादशाह अकबर को बेहद हैरानी हुई कि कुंए में दूध नहीं पानी भरा हुआ था। दूध का तो कहीं नामोनिशान तक न था।

हैरानी भरी निगाहों से बादशाह अकबर ने बीरबल की ओर देखते हुए पूछा, ‘ऐसा क्यों हुआ? शाही फरमान तो कुंए में दूध डालने का जारी हुआ था, यह पानी कहां से आया? लोगों ने दूध क्यों नहीं डाला?’

बीरबल एक जोरदार ठहाका लगाता हुआ बोला, ‘यही तो मैं सिद्ध करना चाहता था हुजूर! मैंने कहा था आपसे कि बहुत-सी ऐसी बातें होती हैं जिस पर लोग एक जैसा सोचते हैं, और यह भी एक ऐसा ही मौका था। लोग कीमती दूध बरबाद करने को तैयार न थे। वे जानते थे कि कुंए में दूध डालना व्यर्थ है। इससे उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं था।

इसलिए यह सोचकर कि किसी को क्या पता चलेगा, सभी पानी से भरे बरतन ले आए और कुंए में उड़ेल दिए। नतीजा…दूध के बजाय पानी से भर गया कुंआ।’

बीरबल की यह चतुराई देख बादशाह अकबर ने उसकी पीठ थपथपाई।

बीरबल ने सिद्ध कर दिखाया था कि कभी-कभी लोग एक जैसा भी सोचते हैं।

निमित्त होने का घमंड कैसा ??

निमित्त होने का घमंड कैसा ??
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आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया…
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हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा पढ़िए

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
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एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
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कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला।
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- “प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।”

समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा—
“ऋषिवर…!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”
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अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया।
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लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं।
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
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लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
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कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा—“ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।”
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साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया।
इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”
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कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया !
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया ।
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??
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दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप।।
कथा अच्छी लगी हो तो शेयर अवश्य करना 🙏

अच्छी शिक्षा

अच्छी शिक्षा

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में फ्लेमिंग नाम का एक गरीब किसान था।
एक दिन वह अपने खेत पर काम कर रहा था। अचानक पास में से किसी के चीखने की आवाज सुनाई पड़ी। किसान ने अपना साजो सामान व औजार फेंका और तेजी से आवाज की तरफ लपका।
आवाज की दिशा में जाने पर उसने देखा कि एक बच्चा दलदल में डूब रहा था। वह बालक कमर तक कीचड़ में फंसा हुआ बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। वह डर के मारे बुरी तरह कांप पर रहा था और चिल्ला रहा था।
किसान ने आनन-फानन में लंबी टहनी ढूंढी, और अपनी जान पर खेलकर उस टहनी के सहारे बच्चे को बाहर निकाला।
अगले दिन उस किसान की छोटी सी झोपड़ी के सामने एक शानदार गाड़ी आकर खड़ी हुई।
उसमें से कीमती वस्त्र पहने हुए एक सज्जन उतरे। उन्होंने किसान को अपना परिचय देते हुए कहा- “मैं उस बालक का पिता हूं और मेरा नाम राँडॉल्फ चर्चिल है।”
फिर उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल ने कहा कि वह इस एहसान का बदला चुकाने आए हैं।
किसान फ्लेमिंग उन सज्जन के ऑफर को ठुकरा दिया। उसने कहा, मैंने जो कुछ किया उसके बदले में कोई पैसा नहीं लूंगा।
किसी को बचाना मेरा कर्तव्य है, मानवता है, इंसानियत है और उस मानवता इंसानियत का कोई पैसा नहीं होता।
इसी बीच फ्लेमिंग का बेटा झोपड़ी के दरवाजे पर आया।
उस अमीर सज्जन की नजर अचानक उस लड़के पर गई तो एक विचार सूझा। उसने पूछा – “क्या यह आपका बेटा है।”
किसान ने गर्व से कहा- “हां।” उस व्यक्ति ने अब नए सिरे से बात शुरू करते हुए किसान से कहा- “ठीक है अगर आपको मेरी कीमत मंजूर नहीं है तो ऐसा करते हैं कि आपके बेटे की शिक्षा का भार मैं अपने ऊपर लेता हूँ। मैं उसे उसी स्तर की शिक्षा दिलवाने की व्यवस्था करूंगा जो अपने बेटे को दिलवा रहा हूँ। फिर आपका बेटा आगे चलकर एक ऐसा इंसान बनेगा, जिस पर हम दोनों गर्व महसूस करेंगे।”
किसान ने सोचा मैं तो उच्च शिक्षा नहीं दिला पाऊंगा और ना ही सारी सुविधाएं जुटा पाऊंगा, जिससे कि यह बड़ा आदमी बन सके।

बच्चे के भविष्य की खातिर फ्लेमिंग तैयार हो गया।
अब फ्लेमिंग के बेटे को सर्वश्रेष्ठ स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।
आगे बढ़ते हुए उसने लंदन के प्रतिष्ठित सेंट मेरीज मेडिकल स्कूल से स्नातक डिग्री हासिल किया और कालांतर, किसान का यही बेटा पूरी दुनिया में पेनिसिलिन का आविष्कारक महान वैज्ञानिक सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग के नाम से विख्यात हुआ।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
कुछ वर्षों बाद, उस अमीर के बेटे को निमोनिया हो गया।
और उसकी जान पेनिसिलीन के इंजेक्शन से ही बची। उस अमीर राँडाल्फ चर्चिल के बेटे का नाम था- विंस्टन चर्चिल, जो दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे।
इसलिए, व्यक्ति को हमेशा अच्छे कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि आपका किया हुआ कर्म आखिरकार लौटकर आपके ही पास आता है। यानी अच्छाई पलट-पलट कर आती रहती है।
अतः यकीन मानिए कि मानवता की दिशा में उठाया गया प्रत्येक कदम आपकी स्वयं की चिंताओं को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा।

मगर लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं और महत्वाकांक्षाओं के भंवर में क्षणिक लाभ के लिए अपने पुण्य कर्मों को तिरोहित कर देते हैं। जीवन अनंत नहीं है बहुत ही अल्पकाल के हम मुसाफिर हैं। अपने संस्कारों को अपनी संस्कृति को अपने सद्कर्मों को और आप पर किए गए उपकारों को हमेशा याद रखें

सदैव प्रसन्न रहिये!!
जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!
🙏🙏🌳🌳🙏🙏

*एक पुरानी कथा इस समय के लिए आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है*

*एक पुरानी कथा इस समय के लिए आज भी बिल्कुल प्रसांगिक है*

एक राजा को राज भोगते काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।
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राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है और तबले वाले को सावधान करना ज़रूरी है,वरना राजा का क्या भरोसा दंड दे दे । तो उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक *दोहा* पढ़ा –
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*”बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई ।*
*एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए ।”*
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अब इस *दोहे* का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा ।
…✍
जब यह दोहा *गुरु जी* ने सुना और गुरु जी ने सारी मोहरें उस नर्तकी को अर्पण कर दीं ।
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दोहा सुनते ही *राजा की लड़की* ने भी अपना *नौलखा हार* नर्तकी को भेंट कर दिया ।
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*दोहा* सुनते ही राजा के *पुत्र युवराज* ने भी अपना *मुकट* उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।
…
*राजा बहुत ही अचिम्भित हो गया ।*
सोचने लगा रात भर से नृत्य चल रहा है पर यह क्या! अचानक *एक दोहे* से सब अपनी मूल्यवान वस्तु बहुत ही ख़ुश हो कर नर्तिकी को समर्पित कर रहें हैं ,
*राजा* सिंहासन से उठा और नर्तकी को बोला *एक दोहे* द्वारा एक सामान्य नर्तिका होकर तुमने सबको लूट लिया ।”*

…✍
जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे – “राजा ! इसको *नीच नर्तिकी मत कह, ये अब मेरी गुरु बन गयी है क्योंकि इसने दोहे से मेरी आँखें खोल दी हैं* । दोहे से यह कह रही है कि *मैं सारी उम्र जंगलों में भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ,* भाई ! मैं तो चला ।” यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।
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*राजा की लड़की* ने कहा – “पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस *नर्तकी के दोहे ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?”*
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*युवराज ने कहा -* “पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस *नर्तकी के दोहे ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।”*
…✍
जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैंसला लिया – “क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।” फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा – “पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।” राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।
…✍
*यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा -* “मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?” उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा नृत्य बन्द करती हूँ और कहा कि “हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।”

*Same implements on us at this lockdown*
*”बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताई ।*
*एक पल के कारने, ना कलंक लग जाए ।”*
आज हम इस दोहे को यदि हम कोरोना को लेकर अपनी समीक्षा करके देखे तो हमने पिछले 22 तारीख से जो संयम बरता, परेशानियां झेली ऐसा न हो हमारी कि अंतिम क्षण में एक छोटी सी भूल,हमारी लापरवाही,हमारे साथ पूरे समाज को न ले बैठे।
आओ हम सब मिलकर कोरोना से संघर्ष करे , *घर पर रह सुरक्षित रहे व सावधानियों का विशेष ध्यान रखें।
**🙏🙏🙏**

पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं –

पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं –
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन
4. नकुल। 5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं –
1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह
4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम
7. सह 8. विंद 9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान
19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र
22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल
43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर
49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी
52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी
64. दुष्पराजय 65. अपराजित
66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष
68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त
71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु
83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी। 89. विरवि
90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु
96. सुजात। 97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी 99. विरज
100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम””दुशाला””था,
जिसका विवाह”जयद्रथ”सेहुआ था )

“श्री मद्-भगवत गीता”के बारे में-

ॐ . किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।

ॐ . कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।

ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।

ॐ. कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी

ॐ. कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।

ॐ. कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में

ॐ. क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।

ॐ. कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय

ॐ. कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक

ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।

ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने

ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को

ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में

ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है….?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।

ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद

ॐ. गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना

ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.

अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद

अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है।

33 करोड नहीँ 33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार।
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं…

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-

12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु…!

8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार है :-
रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है
तो इस जानकारी को अधिक से अधिक
लोगो तक पहुचाएं। ।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

१ हिन्दु हाेने के नाते जानना ज़रूरी है

THIS IS VERY GOOD INFORMATION FOR ALL OF US … जय श्रीकृष्ण …

अब आपकी बारी है कि इस जानकारी
को आगे बढ़ाएँ ……

अपनी भारत की संस्कृति
को पहचाने.
ज्यादा से ज्यादा
लोगो तक पहुचाये.
खासकर अपने बच्चो को बताए
क्योकि ये बात उन्हें कोई नहीं बताएगा…

📜😇 दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष ,
शुक्ल पक्ष !

📜😇 तीन ऋण –

देव ऋण ,
पितृ ऋण ,
ऋषि ऋण !

📜😇 चार युग –

सतयुग ,
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग ,
कलियुग !

📜😇 चार धाम –

द्वारिका ,
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी ,
रामेश्वरम धाम !

📜😇 चारपीठ –

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम )
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) ,
शृंगेरीपीठ !

📜😇 चार वेद-

ऋग्वेद ,
अथर्वेद ,
यजुर्वेद ,
सामवेद !

📜😇 चार आश्रम –

ब्रह्मचर्य ,
गृहस्थ ,
वानप्रस्थ ,
संन्यास !

📜😇 चार अंतःकरण –

मन ,
बुद्धि ,
चित्त ,
अहंकार !

📜😇 पञ्च गव्य –

गाय का घी ,
दूध ,
दही ,
गोमूत्र ,
गोबर !

📜😇 पञ्च देव –

गणेश ,
विष्णु ,
शिव ,
देवी ,
सूर्य !

📜😇 पंच तत्त्व –

पृथ्वी ,
जल ,
अग्नि ,
वायु ,
आकाश !

📜😇 छह दर्शन –

वैशेषिक ,
न्याय ,
सांख्य ,
योग ,
पूर्व मिसांसा ,
दक्षिण मिसांसा !

📜😇 सप्त ऋषि –

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज ,
गौतम ,
अत्री ,
वशिष्ठ और कश्यप!

📜😇 सप्त पुरी –

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी ,
माया पुरी ( हरिद्वार ) ,
काशी ,
कांची
( शिन कांची – विष्णु कांची ) ,
अवंतिका और
द्वारिका पुरी !

📜😊 आठ योग –

यम ,
नियम ,
आसन ,
प्राणायाम ,
प्रत्याहार ,
धारणा ,
ध्यान एवं
समाधि !

📜😇 आठ लक्ष्मी –

आग्घ ,
विद्या ,
सौभाग्य ,
अमृत ,
काम ,
सत्य ,
भोग ,एवं
योग लक्ष्मी !

📜😇 नव दुर्गा —

शैल पुत्री ,
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा ,
स्कंदमाता ,
कात्यायिनी ,
कालरात्रि ,
महागौरी एवं
सिद्धिदात्री !

📜😇 दस दिशाएं –

पूर्व ,
पश्चिम ,
उत्तर ,
दक्षिण ,
ईशान ,
नैऋत्य ,
वायव्य ,
अग्नि
आकाश एवं
पाताल !

📜😇 मुख्य ११ अवतार –

मत्स्य ,
कच्छप ,
वराह ,
नरसिंह ,
वामन ,
परशुराम ,
श्री राम ,
कृष्ण ,
बलराम ,
बुद्ध ,
एवं कल्कि !

📜😇 बारह मास –

चैत्र ,
वैशाख ,
ज्येष्ठ ,
अषाढ ,
श्रावण ,
भाद्रपद ,
अश्विन ,
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष ,
पौष ,
माघ ,
फागुन !

📜😇 बारह राशी –

मेष ,
वृषभ ,
मिथुन ,
कर्क ,
सिंह ,
कन्या ,
तुला ,
वृश्चिक ,
धनु ,
मकर ,
कुंभ ,
मीन!

📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग –

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल ,
ओमकारेश्वर ,
बैजनाथ ,
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ ,
त्र्यंबकेश्वर ,
केदारनाथ ,
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

📜😇 पंद्रह तिथियाँ –

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी ,
पंचमी ,
षष्ठी ,
सप्तमी ,
अष्टमी ,
नवमी ,
दशमी ,
एकादशी ,
द्वादशी ,
त्रयोदशी ,
चतुर्दशी ,
पूर्णिमा ,
अमावास्या !

📜😇 स्मृतियां –

मनु ,
विष्णु ,
अत्री ,
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना ,
अंगीरा ,
यम ,
आपस्तम्ब ,
सर्वत ,
कात्यायन ,
ब्रहस्पति ,
पराशर ,
व्यास ,
शांख्य ,
लिखित ,
दक्ष ,
शातातप ,
वशिष्ठ !

॥ हरे कृष्णा हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥
॥ हरे राम हरे राम
॥ राम राम हरे हरे ॥