सच्ची सेवा भावना

सच्ची सेवा भावना

एक संत ने एक विश्व-विद्यालय आरंभ किया। इस विद्यालय का प्रमुख उद्देश्य था ऐसे संस्कारी युवक-युवतियों का निर्माण जो समाज के विकास में सहभागी बन सकें।

एक दिन उन्होंने अपने विद्यालय में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। जिसका विषय था – “जीवों पर दया एवं प्राणिमात्र की सेवा।”
निर्धारित तिथि को तयशुदा वक्त पर विद्यालय के कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रतियोगिता आरंभ हुई। किसी छात्र ने सेवा के लिए संसाधनों की महत्ता पर बल देते हुए कहा कि हम दूसरों की तभी सेवा कर सकते हैं जब हमारे पास उसके लिए पर्याप्त संसाधन हों। वहीं कुछ छात्रों की यह भी राय थी कि सेवा के लिए संसाधन नहीं, भावना का होना जरूरी है।

इस तरह तमाम प्रतिभागियों ने सेवा के विषय में शानदार भाषण दिए। आखिर में जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे विद्यार्थी को चुना, जो मंच पर बोलने के लिए ही नहीं आया था।
यह देखकर अन्य विद्यार्थियों और कुछ शैक्षिक सदस्यों में रोष के स्वर उठने लगे। संत ने सबको शांत कराते हुए बोले, “प्यारे मित्रो व विद्यार्थियो, आप सबको शिकायत है कि मैंने ऐसे विद्यार्थी को क्यों चुना, जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। दरअसल, मैं जानना चाहता था कि हमारे विद्यार्थियों में कौन सेवाभाव को सबसे बेहतर ढंग से समझता है।

इसीलिए मैंने प्रतियोगिता स्थल के द्वार पर एक घायल बिल्ली को रख दिया था। आप सब उसी द्वार से अंदर आए, पर किसी ने भी उस बिल्ली की ओर आंख उठाकर नहीं देखा। यह अकेला प्रतिभागी था, जिसने वहां रुक कर उसका उपचार किया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ आया। सेवा-सहायता डिबेट का विषय नहीं, जीवन जीने की कला है।

*💐💐शिक्षा-💐💐*

*जो अपने आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसके वक्तव्य कितने भी प्रभावी क्यों न हों, वह पुरस्कार पाने के योग्य नहीं है।”*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

*🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏*

*एक साधु महाराज का इंटरव्यू*

एक साधु महाराज का न्यूयार्क में बडे पत्रकार इंटरव्यू ले रहे थे।

पत्रकार-
*सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क (contact) और संजोग (connection) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इसे समझा सकते हैं?*

साधु मुस्कराये और उन्होंने कुछ अलग तरीके से उल्टा पत्रकारों से ही पूछना शुरू कर दिया कि *क्या “आप न्यूयॉर्क से हैं?”*

पत्रकार – *जी हां!*

सन्यासी: *”आपके घर मे कौन कौन हैं?”*

पत्रकार को लगा कि साधु महाराज उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहे है क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था।

फिर भी पत्रकार बोला : *मेरी “माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं ! सब शादीशुदा हैं!”*

साधू ने चेहरे पर एक मुस्कान के साथ पूछा: *”आप अपने पिता से बात करते हैं?”*

*पत्रकार चेहरे से गुस्से में लगने लगा!*

साधू ने फिर पूछा, *”आपने अपने फादर से last बात कब की?”*

पत्रकार ने अपना गुस्सा दबाते हुए जवाब दिया : *”शायद एक महीने पहले!”*
.
साधू ने पूछा: *”क्या आप सभी भाई-बहिन अक़्सर मिलते हैं, आप सब आखिर में कब मिले एक परिवार की तरह?*

इस सवाल पर पत्रकार के माथे पर पसीना आ गया और अंदर ही अंदर सोचने लगा कि, *इंटरव्यू मैं इस साधू का ले रहा हूँ या ये साधु मेरा?*
क्योंकि उनकी वार्तालाप से यही लग रहा था कि *साधु महाराज ही पत्रकार का इंटरव्यू ले रहे हैं!*

एक आह के साथ पत्रकार बोला : *”क्रिसमस पर 2 साल पहले हम सभी भाई बहन मिले थे!*”

साधू ने पूछा: *”कितने दिन आप सब साथ में रहे ?”*

पत्रकार अपनी आँखों से निकले
आँसुओं को पोंछते हुये बोला : *”केवल 3 दिन!”*

साधु: *”कितना वक्त आप सभी भाई बहनों ने अपने पिता के बिल्कुल करीब बैठ कर गुजारा?*

पत्रकार हैरान और शर्मिंदा दिखा और एक कागज़ पर कुछ लिखने लगा…

साधु ने पूछा: *”क्या कभी आपने पिता के साथ नाश्ता, लंच या डिनर लिया?*
*क्या आपने अपने पिता से पूछा के वो कैसे हैं और माता की मृत्यु के बाद उनका वक्त कैसा गुज़र रहा है?*

साधु ने पत्रकार का हाथ पकड़ा और कहा:
*”शर्मिंदा या दुखी मत होना। मुझे खेद है अगर मैंने आपको अनजाने में चोट पहुंचाई हो लेकिन ये ही आपके सवाल का असली जवाब है कि -*
“संपर्क और संजोग” (contact and connection) आप अपने पिता के सिर्फ संपर्क (contact) में हैं पर आपका उनसे कोई “connection” (जुड़ाव ) नहीं है।

इसलिए वास्तविकता यही है कि *you are not connected to him. आप अपने father से संपर्क में तो हैं लेकिन जुड़े नहीं हैं!*

*Connection हमेशा आत्मा से आत्मा का होता है। heart से heart होता है। एक साथ बैठना, भोजन साझा करना और एक दूसरे की देखभाल करना, स्पर्श करना, हाथ मिलाना, आँखों का संपर्क होना, कुछ समय एक साथ बिताना आप अपने पिता, भाई और बहनों के संपर्क (contact) में हैं लेकिन सच्चाई यही है कि *आपका आपस मे कोई जुड़ाव (connection) नहीं है!”*

पत्रकार ने आंखें पोंछी और साधू महाराज से बोला: *”मुझे एक अच्छा और अविस्मरणीय सबक सिखाने के लिए आपका धन्यवाद!”*
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि – *वो साधु महाराज और कोई नहीं “स्वामी विवेकानंद” थे।”*

आज हमारे समाज की भी सच्चाई यही है हम सोसियल मीडिया के माध्यम से सबके हज़ारो संपर्क (contacts) हैं पर हमारा आपस में कोई दिली connection नहीं है, कोई विचार-विमर्श नहीं, हर आदमी अपनी नकली दुनिया में झूठी वाहवाही पाने में खोया हुआ है।

यह इस भारत भूमि का सौभाग्य ही है कि *समय समय पर स्वामी विवेकानंद की तरह प्रेरित करने के लिए महापुरुषों का पदार्पण होता रहा है!*

आज के तनावपूर्ण माहौल में अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुविख्यात प्रेम आदरणीय *श्री प्रेम रावत जी* पिछले 56 सालों से पूरे संसार में लोगों को ख़ुद से जुड़ने की युक्ति बता रहे हैं!
उनका कहना है कि *आज की विकट परिस्थितियों में भी “शान्ति सम्भव है!”*

इसके लिय वे समझाते हैं कि – *आप सबसे पहले खुद से जुड़े, अपने अंदर की असली ताकत को पहचानें! अपने अंदर का आनन्द कैसे लिया जाय इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से युक्ति बतलाते हैं!*
वे दावे के साथ कहते हैं कि *जब व्यक्ति का खुद से connection होगा, अंदर जाने की विधि का अभ्यास करेगा तो वह आन्तरिक आनंद पाकर अभिभूत होगा, शान्त होगा – तभी पूरे संसार में शान्ति सम्भव हो पायेगी!*
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*आपका जीवन मंगलमय हो!*
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हृदय रूपी मन्दिर में , प्रभु दर्शन

एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कि कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता है, तब मेरे पास भागा-भागा आता है और मुझे सिर्फ अपनी परेशानियां बताने लगता है,मेरे पास आकर कभी भी अपने सुख या अपनी संतुष्टि की बात नहीं करता मेरे से कुछ न कुछ मांगने लगता है!

अंतत: भगवान ने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- कि हे देवो, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही शास्वत स्वरूप में रह कर साधना कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभु के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट करने शुरू किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि आप किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं”।

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभु! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, क्योंकि मनुष्य बाहर की प्रकृति की तरफ को देखता है दूसरों की तरफ को देखता है खुद के हृदय के अंदर कभी झांक कर नहीं देखता इसलिए वह यहाँ आपको कदापि तलाश नहीं करेगा।

करोड़ों में कोई एक जो आपको अपने ह्रदय में तलाश करेगा वह आपसे शिकायत करने लायक नहीं रहेगा क्योंकि उसकी बाहरी इच्छा शक्ति खत्म हो चुकी होगी ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और भगवान हमेशा के लिए मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, पर्वत पहाड़ कंदरा गुफा ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।
परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर ईश्वर को ढूंढने की कोशिश नहीं करता है
इसलिए मनुष्य “हृदय रूपी मन्दिर” में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता और ईश्वर को पाने के चक्कर में दर-दर घूमता है पर अपने ह्रदय के दरवाजे को खोल कर नहीं देख पाता..!!

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सुकरात और आईना

दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।
तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ! सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा। वह कुछ बोला नहीं सिर्फ मुस्कराने लगा।

विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, *”मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ शायद तुम सोच रहे हो कि *मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है?”*

शिष्य कुछ नहीं बोला, *उसका सिर शर्म से झुक गया।*

सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया, *“शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ!”*

*“नहीं ”*, शिष्य बोला।

गुरु जी ने कहा, *“मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं।” आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं।*
इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि *अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।*

शिष्य को ये बात बहुत अच्छी लगी परंतु उसने साथ ही साथ एक शंका प्रकट की कि – *”तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए?”*

*“ऐसी बात नही!”* सुकरात समझाते हुए बोले, *”उन्हें भी आईना अवश्य देखना चाहिए!*
इसलिए ताकि उन्हे ध्यॉन रहे कि *वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें!*
ऐसा ना हो कि *कहीं उनके बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना ले और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दे।*

शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया। वह गुरु के आगे नतमस्तक हो निशब्द हो गया।

इस प्रसंग का आशय यही है कि *सुन्दरता मन व भावों मेन होनी चाहिय! शरीर की सुन्दरता तात्कालिक है जबकि मन और विचारों की सुन्दरता की सुगंध दूर-दूर तक फैलती है।*

अपने मन को पवित्र करने का सबसे अच्छा माध्यम ईश्वर की भक्ति में लीन होना बताया गया है। जब भी हम ईश्वर के सानिध्य में जाते हैं तो हमारा मन और तन अपने आप पवित्र होता है और हमारा जीवन आनन्दमय बन जाता है! यहाँ तक कि *हम जीते जी मोक्ष्य और बन्धन की परिकल्पनाओं से मुक्त हो जाते हैं!*

उपनिषद में कहा भी है कि –
*मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।*
*बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः॥*
~ अमृतबिन्दु उपनिषद्
यानी *”मन ही मानव के बंधन और मोक्षका कारण है। इन्द्रिय विषयासक्त मन बंधन का कारण है और विषयोँ से विरक्त मन मुक्ति का कारण है।”*

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उपयुक्त समय

अमावस्या का दिन था। एक व्यक्ति उसी दिन समुद्र-स्नान करने के लिए गया, किन्तु स्नान करने के बजाय वह किनारे बैठा रहा।

किसी ने पूछा, *“स्नान करने आये हो तो किनारे पर ही क्यों बैठे हो ? स्नान कब करोगे ?*

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि *“इसी समय समुद्र अशान्त है। उसमे ऊँची-ऊँची लहरे उठ रही है; जब लहरे बंद होगी और जब उपयुक्त समय आएगा तब मैं स्नान कर लूंगा। ”*

पूछने वाले को हँसी आ गयी । वह बोला, *“भले आदमी ! समुद्र की लहरे क्या कभी रुकने वाली हैं ? ये तो आती रहेंगी । समुद्र-स्नान तो लहरो के थपेड़े सहकर ही करना पड़ता है। नहीं तो स्नान कभी नहीं हो सकता।”*

यह हम सभी की बात है। *हम सोचते है कि ‘सभी प्रकार की अनुकूलताये होगी, तभी अपनी संकल्पना के अनुरूप कोई सत्कर्म करेंगे , किन्तु सभी प्रकार की अनुकुलताये जीवन में किसी को कभी मिलती नहीं। संसार तो समुद्र के समान है*।

जिसमे बाधा रूपी तरंगे तो हमेशा उठती ही रहेगी। एक परेशानी दूर होने पर दूसरी आएगी। जैसे वह व्यक्ति स्नान किए बिना ही रह गया, उसी प्रकार सभी प्रकार की अनुकूलता की राह देखने वाले व्यक्ति से कभी सत्कर्म नहीं हो सकता।

सत्कर्म या किसी और शुभ कार्य के लिए उपयुक्त समय की राह मत देखो। प्रत्येक दिन और प्रत्येक क्षण सत्कर्म के लिए अनुकूल है। ‘कोई परेशानी नहीं रहेगी तब सत्कर्म करूँगा’ – ऐसा सोचना निरी मूर्खता है।

*प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचै:*
*प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमन्ति मध्या:।*
*विघ्नै: पुन:पुनरपि प्रतिहन्यमाना:*
*प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति ।।*

विघ्न के भय से जो कार्य की शुरुआत ही नहीं करते *वे निम्नकोटि के पुरुष है।*
कार्य का आरम्भ करने के बाद विघ्न आने पर जो रूक जाते है, *वे मध्यम पुरुष है।*
परंतु
कार्य के आरम्भ से ही, बार बार विघ्न आने पर भी जो अपना निश्चित किया कार्य नहीं छोड़ते, *वही उत्तम पुरुष होते है!*

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डिग्रियों की कीमत

रूस के प्रसिद्ध लेखक लियो टॉलस्टॉय को एक बार अपना काम-काज देखने के लिए एक आदमी की ज़रुरत पड़ी।इस बारे में उन्होंने अपने कुछ मित्रों से भी कह दिया कि यदि उनकी जानकारी में कोई ऐसा व्यक्ति हो तो उसे भेजें।

कुछ दिनों बाद एक मित्र ने किसी को उनके पास भेजा। वह काफी पढ़ा लिखा था और उसके पास कई प्रकार के सर्टिफिकेट और डिग्रियां थीं। वह व्यक्ति टॉलस्टॉय से मिला, लेकिन तमाम डिग्रियां होने के बावजूद टॉलस्टॉय ने उसे नौकरी पर नहीं रखा , बल्कि एक अन्य व्यक्ति जिसके पास ऐसी कोई डिग्री नहीं थी उसका चयन कर लिया…. क्या मैं इसकी वजह जान सकता हूँ ?”

टॉलस्टॉय ने बताया , “मित्र, जिस व्यक्ति का मैंने चयन किया है उसके पास तो अमूल्य प्रमाणपत्र हैं, उसने मेरे कमरे में आने के पूर्व मेरी अनुमति मांगी। दरवाजे पर रखे गए डोरमैट पर जूते साफ करके रूम में प्रवेश किया। उसके कपड़े साधारण, लेकिन साफसुथरे थे। मैंने उससे जो प्रश्न किये उसके उसने बिना घुमाए-फिराए संक्षिप्त उत्तर दिए , और अंत में मुलाकात पूरी होने पर वह मेरी इज़ाज़त लेकर नम्रतापूर्वक वापस चला गया। उसने कोई खुशामद नहीं की, ना किसी की सिफारिस लाया, अधिक पढ़ा-लिखा ना होने के बावजूद उसे अपनी काबिलियत पर विश्वास था, इतने सारे प्रमाणपत्र बहुत कम लोगों के पास होते है।

और तुमने जिसे व्यक्ति को भेजा था उसके पास इनमे से कोई भी प्रमाणपत्र नहीं था , वह सीधा ही कमरे में चला आया, बिना आज्ञा कुर्सी पर बैठ गया , और अपनी काबिलियत की जगह तुमसे जान-पहचान के बारे में बताने लगा….. तुम्ही बताओं, उसकी इन डिग्रियों की क्या कीमत है ?”

मित्र टॉलस्टॉय की बात समझ गया, वह भी असल प्रमाणपत्रों की महत्ता जान चुका था।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*मित्रों,अपने जीवन मे डिग्रियों के साथ साथ अपना आचरण भी उच्च कोटि का रखना चाहिए ताकि डिग्रियों की जगह अपने व्यवहार के कारण अपनी पहचान बना सके।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

समय रहते अपना घर बना ले

एक निर्धन विद्वान व्यक्ति चलते चलते पड़ोसी राज्य में पहुँचा।
संयोग से उस दिन वहाँ हस्तिपटबंधन समारोह था! *जिसमें एक हाथी की सूंड में माला देकर नगर में घुमाया जाता था। वह जिसके गले में माला डाल देता था उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा बना दिया जाता था।*

वह निर्धन व्यक्ति भी समारोह देखने लगा। हाथी ने उसके ही गले में माला डाल दी।
*सभी ने जयजयकार करते हुए उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा घोषित कर दिया।*

राजपुरोहित ने उसका राजतिलक किया और वहाँ के नियम बताते हुए कहा कि *आपको केवल 5 वर्ष के लिए राजा बनाया जा रहा है। 5 वर्ष पूर्ण होते ही आपको मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नदी में छोड़ दिया जाएगा।*

यदि आप में ताकत होगी तो आप उनका मुकाबला करके नदी के पार वाले गाँव में पहुँच सकते हो। लेकिन *आप को वापिस इस नगर में आने नहीं दिया जाएगा।*

वह निर्धन विद्वान व्यक्ति तो सिहर गया पर उसने सोचा कि *अभी तो 5 वर्ष का समय है। कोई उपाय तो निकल ही जाएगा।*

*उसने 5 वर्ष तक विद्वत्तापूर्वक राज्य किया। राज्य की संचालन प्रक्रिया को पूरे मनोयोग से निभाया और इस प्रकार केवल राज्य पर ही नहीं लोगों के दिलों पर भी राज्य करने लगा। जनता ने ऐसा प्रजावत्सल राजा कभी नहीं देखा था।*

5 वर्ष पूर्ण हुए। नियमानुसार राजा को फिर से हाथी पर बैठाकर जुलूस निकाला गया। लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। नदी के तट पर पहुँच कर राजा हाथी से उतरा। राजपुरोहित ने कहा कि *अब आप नदी पार करके दूसरी ओर जा सकते हैं।*

अश्रुपूरित विदाई समारोह के बीच उसने कहा कि *मैं इस राज्य के नियमों का सम्मान करता हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दें।*

जैसे ही राजा ने नदी की ओर कदम बढाए! लोगों ने अपनी सजल आँखों को ऊपर उठाया तो *वहाँ नज़ारा देखकर वे लोग खुशी से नाचने लगे!*
कारण कि *राजा ने अपने इस पांच साल की अवधि में उनके द्वारा नदी पर इस पार से उस पार तक एक पुल बनवाया था और उस पर राजा शांत भाव से नदी के उस पार वाले सुंदर से गाँव की ओर चले जा रहे थे!*

इस प्रसंग से हमें यही प्रेरणा मिलती है कि *क्या ऐसा ही कुछ हमारे जीवन साथ भी तो घटित नहीं हो रहा? क्योंकि हमें भी तो बनाने वाले ने एक निश्चित समय के लिए श्वांसो की अनमोल पूंजी देकर इस अमूल्य जीवन की बागडोर सौंपी गई है।*

*नियत समय पूरा होते ही हमें यह राज्य छोड़ कर भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना है जहां से हमें फिर से इस राज्य में आने की आज्ञा नहीं है।*

यदि हमने आत्म ज्ञान का पुल नहीं बनाया तो *हमें भी मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नरकों में डाल दिए जाएगा और हम उनका ग्रास बन जाएंगे।*
अगर हम शांत भाव से भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना चाहते हैं तो *अभी से वह आनंद रुपी पुल बनाने की शुरूआत कर देनी चाहिए क्योंकि आयु काल पूरा होने के बाद तो निश्चित ही जाना है।*

ये सुन्दर पंक्तियाँ हमारे समझने के लिय काफी है कि *हम यहाँ मुसाफिर की तरह ही हैं और जीवन का हर पल हमारे हाथ से निकल रहा है!*

तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

सब कुछ पाया इस जीवन में,
फिर भी इच्छाएं बाकी हैं
दुनिया से हमने क्या पाया,
यह लेखा – जोखा बहुत हुआ,
*इस जग ने हमसे क्या पाया,
बस ये गणनाएं बाकी हैं।*

इस भाग-दौड़ की दुनिया में
हमको इक पल का होश नहीं,
वैसे तो जीवन सुखमय है,
पर फिर भी क्यों संतोष नहीं !

क्या यूं ही जीवन बीतेगा,
क्या यूं ही सांसें बंद होंगी ?
औरों की पीड़ा देख समझ
कब अपनी आंखें नम होंगी ?
मन के अंतर में कहीं छिपे
इस प्रश्न का उत्तर बाकी है।

मेरी खुशियां, मेरे सपने
मेरे बच्चे, मेरे अपने
यह करते – करते शाम हुई
इससे पहले तम छा जाए
इससे पहले कि शाम ढले

कुछ दूर परायी बस्ती में
इक दीप जलाना बाकी है।
तीन पहर तो बीत गये,
बस एक पहर ही बाकी है।
जीवन हाथों से फिसल गया,
बस खाली मुट्ठी बाकी है।

*जीवन की सारी दौड़ केवल अतिरिक्त के लिए है! अतिरिक्त पैसा, अतिरिक्त पहचान, अतिरिक्त शोहरत, अतिरिक्त प्रतिष्ठा, यदि यह अतिरिक्त पाने की लालसा ना हो तो जीवन एकदम सरल है!*

*आइए, इस गंभीर प्रसंग पर गहराई से विचार करें!*

*🙏🏿🙏🏼🙏*सुप्रभात *🙏🏽🙏🏻🙏🏾*

*!! समय की कीमत !!*

कल्पना कीजिए कि *आपके पास एक बैंक अकाउंट है और हर रोज सुबह उस बैंक अकाउंट में 86,400 रूपये जमा हो जाते है, जिसे आप उपयोग में ले सकते है! आप रूपयों को बैंक अकाउंट से निकाल कर अपनी तिजोरी में जमा करके नहीं रख सकते!*

इस बैंक अकाउंट में कैरी फोरवर्ड का सिस्टम नहीं है यानि कि *जिन रूपयों को आप उपयोग में नहीं ले पाते, वह रूपये शाम को वापस ले लिए जाते हैं और आपका अब उन पर कोई अधिकार नहीं रहता! यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*

हो सकता है कि *कल ही यह बैंक अकाउंट बंद हो जाए या फिर 2 वर्ष बाद या फिर 50 वर्ष बाद!*

लेकिन इतना तो निश्चित है कि *यह बैंक अकाउंट एक दिन जरूर बंद होगा!*

*ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे?*
जाहिर है *आप पूरे के पूरे 86,400 रूपयों का उपयोग कर लेंगे और इन 86,400 रूपयों का उपयोग अच्छे कार्यों के लिए करेंगे!*

क्योंकि *यह बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*

क्या आप जानते है कि *ऐसा ही एक बैंक अकाउंट हमारे पास होता है जिसका नाम है “जिंदगी (Life)”* और *इस “जीवन” रुपी बैंक अकाउंट में प्रतिदिन 86,400 सेकंड्स जमा होते हैं – जिनका उपयोग कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है हम चाहें तो इन 86,400 सेकंड्स का उपयोग बेहतरीन कार्यों के लिए कर सकते हैं और अगर ऐसा नहीं करते तो यह व्यर्थ हो जाएंगे! यह जीवन रुपी बैंक अकाउंट कभी भी बंद हो सकता है!*
इसलिए देर मत कीजिए *आपके जीवन का हर पल अमूल्य है इस समय का सदुपयोग कीजिए!*

कोई भी समझदार आदमी *जिस किसी को भी ऐसा बैंक अकाउंट दे दिया जाए जिसमें रोज 86,400 रूपये जमा हो तो वह व्यक्ति बहुत खुश हो जाएगा और एक रूपया भी व्यर्थ नहीं गवाएंगा!*

*क्या हमारे जीवन के एक सेकंड की कीमत एक रूपये से भी कम है? हम कैसे अपने जीवन की सबसे अनमोल सम्पति को ऐसे ही व्यर्थ गँवा सकते हैं?*
*खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है, लेकिन खोया हुआ समय वापस नहीं आता| उसके लिए केवल पश्चाताप ही शेष रह जाता है। हर एक दिन को व्यर्थ गंवाना आत्महत्या करने के समान है! बिना समय प्रबंधन के आज तक कोई भी सफल नहीं हुआ!*

इसलिय समझदारी इसी में है कि *बीते हुए कल को भूल जाइए, बीते कल का आज कोई वजूद नहीं! आज आपका है! आज से एक नयी शुरुआत कीजिए! अपने स्वांसों को व्यर्थ मत गंवाइए!*

जिस किसी ने संतों की चेतावनी को नज़रअंदाज किया; उनके लिए सच ही कहा है कि *“जो व्यक्ति अपने समय को नष्ट कर देते है, समय उन्हें नष्ट कर देता है!!’’*
कबीर दास जी ने कहते हैं कि –
*कहता हूँ कही जात हूँ, कहूँ बजा के ढोल।*
*स्वांस जो खाली जात है, ये तीन लोक का मोल।।*
इसका लाभ कैसे लिया जा सकता है? यह मार्ग दर्शन भी संतों ने दिया है –
*स्वांस स्वांस सुमिरन करो, वृथा स्वांस मत खोय।*
*ना जाने इस स्वांस का, आवन होय न होय।।*

*🙏🏼🙏🙏🏽सुप्रभात*🙏🏻🙏🏾🙏🏿

उपकार का बदला

उपकार का बदला ,,,,,,,,,,

🌹एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गई और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी।

🌹जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे। भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे। कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था।

🌹लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्रीकृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर है !

🌹प्रभु ने कुम्हार से कहा कि ‘कुम्हार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।

🌹तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया ।

🌹कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गई और कुम्हार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्हार !

🌹तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है क्या ?

🌹कुम्हार ने कह दिया -नहीं मैया, मैंने कन्हैया को नहीं देखा।

🌹श्री कृष्ण ये सब बातें बडे़े से घड़े के नीचे छुप कर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गई।

🌹अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं – ‘कुम्हार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।

🌹कुम्हार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।

🌹भगवान मुस्कुराये और कहा – ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।’ कुम्हार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।

🌹प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।

🌹अब कुम्हार कहता है – ‘बस, प्रभु जी ! एक विनती और है उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।

🌹भगवान बोले -वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?

🌹कुम्हार कहने लगा – ‘प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है।

🌹मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।

🌹भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।

🌹प्रभु बोले -अब तो तुम्हारी सब इच्छाएं पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।

🌹तब कुम्हार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन !

🌹बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे।

🌹बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।

🌹कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया ।

🌹फिर कुम्हार ने बालक श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।

🌹 प्रिय पाठको !!!!..जरा सोच करके देखिये, जो बालक श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं,क्या वे ,,,,,,,,,

🌹 विशेष ==🌹 १. क्या वे एक घड़ा नहीं उठा सकते थे। २. अपनी इच्छा से घड़े से बाहर क्यों नहीं आये और उन्होंने कुम्हार को ही क्यों पुकारा ?
उत्तर == १. गोवर्धन पर्वत को उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा ( परोपकार के भाव के कारन ) करने के लिए उठाया था जबकि यहां ऐसा कोइ भाव व्याप्त नहीं था बल्कि घड़ा कुम्हार का था और दूसरे की चीज़ के प्रयोग या हस्तक्षेप में उसके स्वामी की स्वीकृति आवश्यक होती है !
२. श्री कृष्ण भगवान् विष्णु के अवतार है और उनके अन्तःकरण में व्याप्त देवत्व के कारण यह देवताओं में यह स्वाभाविक होता है की ” उचित एवं अनुचित ” का विचार करे साथ ही उन्होंने ” शिष्टाचारवश” अपने ऊपर उपकार करने वाले से बाहर आने की स्वीकृति लेना ठीक समझा !
( ii ) कहानी में अन्य विशेष सन्दर्भ अपने ध्यान में रखने लायक == कुम्हार ने चरणामृत का पान किया ! सनातन धर्म में यह विश्वास एवं मान्यता है की भगवान् विष्णु के चरणों को छू कर आया जल मोक्ष प्रदान करता है और यह तर्क संगत भी है क्योंकि उसमे तुलसी होती है जिसे मोक्षदायनी कहा गया है !
🌹जय श्री राधे कृष्ण 🌹
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संकल्प पर ध्यान देना जरूरी

संकल्प पर ध्यान देना जरूरी

जैसे एक ही बिजली दो प्रकार से मारती है- एक चिपका कर मारती है तो दूसरी झटका देकर फेंक मारती है।
ऐसे ही एक ही मोह दो प्रकार से मारता है- मोह राग बन कर चिपका कर मारता है तो विमोह द्वेष बन कर फेंक मारता है।

हम कहते हैं कि मोह से कैसे बचें?
रेलगाड़ी की खिड़की से जो दृश्य जगत चलता हुआ दिखाई देता है, हम उस पर विशेष ध्यान न दें तो हमारी वृत्ति कहीं टिकती है? नहीं टिकती। क्यों?
क्योंकि दृश्य आया और गया, हममें किसी दृश्य का कोई संकल्प ही न उठा।*

पर हमने जैसे ही किसी दृश्य पर ध्यान दिया कि संकल्प उठा, वृत्ति उठी, मन दौड़ा और मोहजनित राग या द्वेष हुआ।
ऐसे ही संसार के किसी भी दृश्य पर अगर हम विशेष ध्यान न दें तो संकल्प उठेगा ही नहीं, मोह कैसे होगा?

यदि कोई कहे कि ध्यान बिना दिए काम कैसे चलेगा? ध्यान तो देना ही पड़ता है।

अगर कहीं ध्यान देना अवश्यम्भावी लगे तो उस वस्तु पर ध्यान दो पर उसे अपना मत समझो। जिसे तुम अपना न समझोगे, उससे भी मोह नहीं होगा।

जैसे किसी बैंक कर्मचारी को देखो। वह नोट गिनता है, बड़े ध्यान से एक-एक नोट गिनता है, रोज लाखों रुपए का लेन-देन करता है, पर न लेते हुए सुख मानता है, न देते हुए दुख पाता है। बस लेता है और देता है।

क्योंकि वह उस धन को अपना नहीं मानता। हम भी ऐसा ही अपने जीवन में करें तो सुख दुख कैसे हो? मोह कैसे हो? राग द्वेष कैसे हों?

नाशवान से आगे देखो। अविनाशी की ओर बढ़ो। तब नाशवान से मोह नहीं होगा। इसलिय मन को जोडते वक्त ध्यान जरूर दें।

एक गुरुभक्त अपने सद्गुरु से जब ज्ञान की याचना करता है तो वह भी संकल्प लेता है कि वह अनवरत अपने सदगुरु से जुडा रहेगा! ज्ञान का अभ्यास करेगा! पर ज्यों ही उस संकल्प को भूलता है तो माया के DC करन्ट के झटके झेलने को मजबूर हो जाता है!*

इसलिय संकल्प से सिद्धि पाने का एक ही रास्ता है कि हम अपने त्रिकोण को – जो हम उस ज्ञान और गुरु महाराज जी से जुड़े रहने पर बनाते हैं, उसे बरकरार रखें! उसमें किसी चौथे व्यक्ति, वस्तु का प्रवेश न होने दें! तभी हर पल आनंदित रहा जा सकता है!