जीवन की मूल संपदा – परिष्कृत व्यक्तित्व
👉 “व्यक्तित्व” ही मनुष्य की मूल संपदा है । इसकी श्रेष्ठता और निकृष्टता के आधार पर ही किसी व्यक्ति का श्रेष्ठ या निकृष्ट होना निर्भर है।
प्रश्न उठता है कि यह “व्यक्तित्व” क्या है ?
मनुष्य जो दिखाई देता है, आचरण, रहन-सहन व बोल-चाल व्यवहार का जैसा जो कुछ प्रभाव छोड़ता है क्या वही व्यक्तित्व है?
इसका उत्तर निश्चित ही “नहीं” में है।
“व्यक्तित्व” में ये सब बातें समाहित तो है, पर वह इन सबके जोड़ से भी ऊपर बहुत कुछ भिन्न है।
आँख से देखने पर तो व्यक्तित्व शरीर की बनावट, आकर्षक साज-सज्जा, आकर्षक चाल-ढाल और शिष्टाचार पर अवलंबित दीखता है,
पर परख की दृष्टि जब गहराई में प्रवेश करती है, तो गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं चरित्र का समुच्चय ही “व्यक्तित्व” की कसौटी बन जाता है।
👉 सम्मानित और तिरस्कृत, समुन्नत और पतित, प्रखर और पिछड़े लोगों के बीच पाया जाने वाला अंतर तो परिस्थितिजन्य दीखता है-
पर वस्तुतः यह विभेद अंत:स्थिति का होता है।
यह अंत:स्थिति जो मान्यता-अभिरुचि और आदत के रूप में समूचे अंतराल पर कब्जा जमाए बैठी है। अंत:क्षेत्र से उठने वाली सुगंध अथवा दुर्गंध ही समीपवर्ती वातावरण को उल्लसित एवं कलुषित बनाती है।अंतराल ही बाह्य जगत में प्रतिबिंबित होता है और स्वर्गीय एवं नारकीय प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है ।
अपना ही स्वभाव समीपवर्ती लोगों के साथ सहयोग एवं विग्रह के अवसर रचता और इन्हें चित्र-विचित्र घटनाक्रर्मों के रुप में सामने ला खड़ा करता है!
👉 जीवन का सबसे बड़ा उपार्जन एवं वैभव परिष्कृत “व्यक्तित्व” ही है।
पग-पग पर मानवीय अनुदानों और दैवी वरदानों के उपहार बरसाने वाला सौभाग्य और कुछ नहीं मनुष्य का स्व उपार्जित व्यक्तित्व ही है।
कोई किसी को यदि वस्तुतः कोई ठोस अनुदान दे सकता है तो वह एक ही अनुग्रह है कि व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में सहायता की जाए।
अन्य संपदाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई किसी को कितने ही बडे़ परिमाण में देकर भी वास्तविक साधन नहीं कर सकता।
उपकार वही सार्थक है, जो “व्यक्तित्व” को विकसित करने की सहायता के रूप में लिया या दिया जा सके। अनुग्रह वही धन्य है जो प्रखरता और प्रतिभा निखारने में सहयोग प्रदान करें।
सौभाग्यशाली वे हैं – जिनको “सुसंस्कृत” लोगों का सान्निध्य मिल पाया और उन्होंने अपने व्यव्हार, व्यक्तित्व को गरिमामय बनाने का सतत अभ्यास जारी रख्खा है!

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