जय और विजय का अंतर
एक साधक परम पुरुष के प्रति कब पूर्णतः समर्पित हो पाता है? चहुत ही गूढ़ प्रश्न है। इसका उत्तर न जाने कब से तलाशा जा रहा है। मेरी राय में यह अवस्था व्यक्ति के पूर्णतया निर्भीक होने पर ही आती है। जब व्यक्ति सत्य, श्रद्धा और अनुशासन से भर जाता है, तब भय उसके निकट नहीं आता, क्योंकि सत्य अपने आप में निडर है, उसके लिए कोई शत्रु नहीं, कोई विपत्ति नहीं।
समय-समय पर असत्य के प्रबल दिखने के उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उसकी गति अस्थायी होती है। वह आता है और चला जाता है; अस्तित्व उसका क्षणभंगुर है। सत्य इसके विपरीत है। सत्य अतीत में भी था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगा। इसलिए संघर्ष चाहे जितना तीखा हो, अंतिम विजय सत्य की ही होती है। हमारी परंपरा ने स्थायी जीत को विजय कहा है और क्षणिक सफलता को जय। असत्य को केवल जय मिलती है, विजय कभी नहीं।
आध्यात्मिक संसार का मार्ग इसी सत्य से प्रकाशित होता है। बाहरी दुनिया विविध ऊर्जाओं से स्पंदित होती है, परंतु मन और चेतना की अत्यंत सूक्ष्म तरंगों को ‘देव’ कहा गया है। जिन तरंगों से मनुष्य की अंतःचेतना आलोकित होती है, उसी की ओर ले जाने वाले मार्ग को देवयान कहते हैं। जिस पथ पर चलते हुए मनुष्य स्थूल से सुक्ष्म की ओर, और सूक्ष्म से दिव्यता की ओर अग्रसर होता है, वह देवयान का पथ है। जो व्यक्ति सत्य को जीवन का संकल्प बनाता है और उसकी रक्षा के लिए कर्म करता है, उसके लिए यह यात्रा सहज हो जाती है। इस मार्ग पर चले कई ऋषियों ने अंततः सत्य की परम स्थिति प्राप्त की है। इसे आप्तकाम कहा जाता है।
आप्तकाम वह है, जिसकी इच्छाएं सत्य के माध्यम से पूर्ण हो गई हों। संसार में हमें जो भी वस्तुएं प्राप्त होती हैं- धन, सम्मान, विद्या या सुविधाएं- वे सब प्राप्ति के उदाहरण हैं और प्रायः क्षणभंगुर होती हैं। धन है, तो कल नहीं भी हो सकता। बुद्धि बढ़ती है, तो समय के साथ स्मृति का क्षय भी होता है। पुस्तकों से प्राप्त ज्ञान धीरे-धीरे भूलने लगता है, क्योंकि प्राप्त ज्ञान टिकता नहीं, बह जाता है। अकबर-बीरबल की एक कथा से इसे समझिए। जब बादशाह ने पूछा कि ऐसी कौन-सी बात है, जो सुखी को दुखी और दुखी को सुखी कर दे, तो बीरबल ने कहा-यह दिन भी बीत जाएगा। संसार की हर वस्तु और हर अवस्था अस्थायी है, लेकिन आप्तवाक्य वह ज्ञान, जो सीधे मन और चेतना में उदित होता है, स्थायी होता है। वह न बढ़ता है, न घटता है, न विस्मृत होता है। जिस मनुष्य को ऐसा ज्ञान मिल जाता है, वह आप्तकाम कहलाता है। न उसे नाम-यश मोहित करता है, न ही किसी पद की ललक। वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।
संघर्ष चाहे जितना तीखा हो, अंतिम विजय सत्य की ही होती है। हमारी परंपरा ने स्थायी जीत को विजय कहा है और क्षणिक सफलता को जय। असत्य को जय मिलती है, विजय कमी नहीं।
श्री श्री आनंदमूर्ति
When does a seeker become completely surrendered to the Supreme Being? This is a profound question. The answer has been sought for ages. In my opinion, this state is achieved only when a person is completely fearless. When a person is filled with truth, faith, and discipline, fear does not come near him, because truth itself is fearless; it has no enemies, no calamities.
From time to time, there are instances of falsehood appearing dominant, but its strength is temporary. It comes and goes; its existence is fleeting. Truth is the opposite. Truth existed in the past, exists in the present, and will exist in the future. Therefore, no matter how intense the struggle, truth ultimately triumphs. Our tradition has called permanent victory a victory and temporary success a victory. Falsehood only achieves victory, never victory.
The path to the spiritual world is illuminated by this truth. The external world vibrates with various energies, but the extremely subtle waves of the mind and consciousness are called “Deva.” The path that leads to the waves that illuminate a person’s inner consciousness is called Devayana. The path that leads a person from the gross to the subtle, and from the subtle to the divine, is the path of Devayana. This journey becomes easy for those who make truth their life’s resolution and work to protect it. Many sages who have walked this path have ultimately attained the ultimate state of truth. This is called Apatkama.
Apatkama is one whose desires have been fulfilled through truth. Whatever we obtain in this world—wealth, honor, knowledge, or comforts—are all examples of attainment and are often fleeting. If there is wealth, there may not be tomorrow. While intelligence grows, memory also diminishes with time. Knowledge acquired from books is gradually forgotten because it doesn’t last; it flows away. Understand this from a story about Akbar and Birbal. When the king asked what makes the happy unhappy and the unhappy happy, Birbal replied, “This day too will pass.” Everything and every situation in the world is temporary, but the knowledge that arises directly in the mind and consciousness is permanent. It neither increases, nor decreases, nor is it forgotten. The person who attains such knowledge is called an Aptakaam. He is neither captivated by fame nor by the desire for position. He recognizes his true nature.
No matter how intense the struggle, the ultimate victory is always of truth. Our tradition has called lasting victory Vijay and temporary success Vijay. Falsehood wins victory, but victory is never lacking.
Sri Sri Anandmurti







