Weekly Film
November 26, 2025 in Commentator
साप्ताहिक चलचित्र
भारत के दो पड़ोसी देशों नेपाल तथा तिब्बत की स्थिति पूर्ववत चिन्ताजनक’ बनी हुई है। यद्यपि राणा सरकार ने अपनी सैनिक शक्ति से फिलहाल पासा पलट दिया है और नेपाली कांग्रेस को बीरगंज से हटना पड़ा है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि नेपाली कांग्रेस नेपाली जनता का समर्थन खो चुकी है। वास्तविकता तो यह है कि राणाशाही के विरुद्ध नेपाल में ही नहीं, बल्कि उसके बाहर भी आवाज उठ रही है। प्रत्येक प्रगतिशील तत्व की यही आकांक्षा है कि नेपाल में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली कायम हो। यद्यपि भारत के समाजवादी दल की सलाह मानकर नेहरू सरकार अभी कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकती जिसका अर्थ नेपाल के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप लगाया जावे, किन्तु यह असंदिग्ध है कि भारत की सहानुभूति लोकतंत्र के पक्ष में है।
सरदार पटेल तथा मौलाना आजाद के भाषणों से ही भारत सरकार के रुख का कुछ आभास मिल गया था। अब ज्ञात हुआ है कि भारत सरकार तीन वर्षीय राजकुमार को नेपाल का राजा स्वीकार करने को तैयार नहीं। कहा जाता है कि भारत सरकार ने पुनः इस बात पर जोर दिया है कि नेपाल सरकार अपने देश में शासन को लोकतंत्रात्मक रूप देने के लिए कदम उठावे और राज-सिंहासन के उत्तराधिकार के प्रश्न का निर्णय जनता पर छोड़ दिया जाये। नेपाल के प्रश्न पर भारत सरकार की ब्रिटिश सरकार से बातचीत जारी है लेकिन भारत और ब्रिटेन की स्थितियों में अन्तर है। इस समय मलाया तथा सुदूरपूर्व के अन्य स्थानों की अशान्ति को देखते हुए ब्रिटेन सम्भवतः ऐसा कदम उठाना न चाहे जिससे कि नेपाली रंगरूटों की भरती पर बुरा असर पड़े; किन्तु भारत के लिए यह स्थिति निश्चय ही अवांछनीय है कि उसका पड़ोसी देश बाहर से शान्त दिखाई देने पर भी एक सुप्त ज्वालामुखी बना रहे।
बीरगंज पर राणा सरकार की सेनाओं का पुनः अधिकार हो जाने के बाद पत्र-प्रतिनिधियों ने जो समाचार भेजे हैं, वे चिन्ताजनक हैं। स्वयं पत्र-प्रतिनिधि एक भयंकर दुर्घटना के शिकार होते-होते बचे। ऐसा ज्ञात होता है कि प्रतिशोध लेने के लिए बहुत अत्याचार हो रहे हैं। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष श्री मातृका प्रसाद कोइराला ने भी कहा है कि नेपाल सरकार की सेनाओं ने बीरगंज में आतंक का राज्य कायम कर दिया है।
The situation in Nepal and Tibet, two of India’s neighboring countries, remains as ‘worrisome’ as before. Although the Rana government has temporarily turned the tables with its military might, and the Nepali Congress has been forced to withdraw from Birgunj, this does not mean that the Nepali Congress has lost the support of the Nepali people. The reality is that voices are being raised against the Rana regime not only within Nepal but also outside it. Every progressive element aspires to establish a democratic system of governance in Nepal. Although, following the advice of India’s socialist parties, the Nehru government cannot currently take any steps that could be construed as interference in Nepal’s internal affairs, it is undeniable that India’s sympathy is in favor of democracy.
The speeches of Sardar Patel and Maulana Azad already gave some idea of the Indian government’s stance. Now it has become known that the Indian government is not willing to accept the three-year-old prince as the King of Nepal. The Indian government is said to have reiterated its insistence that the Nepalese government take steps to democratize governance and leave the question of succession to the throne to the people. The Indian government is continuing discussions with the British government on the Nepalese issue, but there are differences between their positions. Given the current unrest in Malaya and other parts of the Far East, Britain may be reluctant to take steps that could adversely impact the recruitment of Nepalese recruits. However, it is certainly undesirable for India to see its neighboring country remain a dormant volcano despite its apparent calm.
The news sent by the correspondents after the Rana government’s forces regained control of Birgunj is alarming. The correspondents themselves narrowly escaped a terrible accident. It appears that numerous atrocities are being committed in retaliation. Mr. Matrika Prasad Koirala, President of the Nepali Congress, has also stated that the Nepalese government’s forces have unleashed a reign of terror in Birgunj.
Weekly Film
Weekly Film
November 26, 2025 in Commentator
साप्ताहिक चलचित्र
भारत के दो पड़ोसी देशों नेपाल तथा तिब्बत की स्थिति पूर्ववत चिन्ताजनक’ बनी हुई है। यद्यपि राणा सरकार ने अपनी सैनिक शक्ति से फिलहाल पासा पलट दिया है और नेपाली कांग्रेस को बीरगंज से हटना पड़ा है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि नेपाली कांग्रेस नेपाली जनता का समर्थन खो चुकी है। वास्तविकता तो यह है कि राणाशाही के विरुद्ध नेपाल में ही नहीं, बल्कि उसके बाहर भी आवाज उठ रही है। प्रत्येक प्रगतिशील तत्व की यही आकांक्षा है कि नेपाल में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली कायम हो। यद्यपि भारत के समाजवादी दल की सलाह मानकर नेहरू सरकार अभी कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकती जिसका अर्थ नेपाल के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप लगाया जावे, किन्तु यह असंदिग्ध है कि भारत की सहानुभूति लोकतंत्र के पक्ष में है।
सरदार पटेल तथा मौलाना आजाद के भाषणों से ही भारत सरकार के रुख का कुछ आभास मिल गया था। अब ज्ञात हुआ है कि भारत सरकार तीन वर्षीय राजकुमार को नेपाल का राजा स्वीकार करने को तैयार नहीं। कहा जाता है कि भारत सरकार ने पुनः इस बात पर जोर दिया है कि नेपाल सरकार अपने देश में शासन को लोकतंत्रात्मक रूप देने के लिए कदम उठावे और राज-सिंहासन के उत्तराधिकार के प्रश्न का निर्णय जनता पर छोड़ दिया जाये। नेपाल के प्रश्न पर भारत सरकार की ब्रिटिश सरकार से बातचीत जारी है लेकिन भारत और ब्रिटेन की स्थितियों में अन्तर है। इस समय मलाया तथा सुदूरपूर्व के अन्य स्थानों की अशान्ति को देखते हुए ब्रिटेन सम्भवतः ऐसा कदम उठाना न चाहे जिससे कि नेपाली रंगरूटों की भरती पर बुरा असर पड़े; किन्तु भारत के लिए यह स्थिति निश्चय ही अवांछनीय है कि उसका पड़ोसी देश बाहर से शान्त दिखाई देने पर भी एक सुप्त ज्वालामुखी बना रहे।
बीरगंज पर राणा सरकार की सेनाओं का पुनः अधिकार हो जाने के बाद पत्र-प्रतिनिधियों ने जो समाचार भेजे हैं, वे चिन्ताजनक हैं। स्वयं पत्र-प्रतिनिधि एक भयंकर दुर्घटना के शिकार होते-होते बचे। ऐसा ज्ञात होता है कि प्रतिशोध लेने के लिए बहुत अत्याचार हो रहे हैं। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष श्री मातृका प्रसाद कोइराला ने भी कहा है कि नेपाल सरकार की सेनाओं ने बीरगंज में आतंक का राज्य कायम कर दिया है।
The situation in Nepal and Tibet, two of India’s neighboring countries, remains as ‘worrisome’ as before. Although the Rana government has temporarily turned the tables with its military might, and the Nepali Congress has been forced to withdraw from Birgunj, this does not mean that the Nepali Congress has lost the support of the Nepali people. The reality is that voices are being raised against the Rana regime not only within Nepal but also outside it. Every progressive element aspires to establish a democratic system of governance in Nepal. Although, following the advice of India’s socialist parties, the Nehru government cannot currently take any steps that could be construed as interference in Nepal’s internal affairs, it is undeniable that India’s sympathy is in favor of democracy.
The speeches of Sardar Patel and Maulana Azad already gave some idea of the Indian government’s stance. Now it has become known that the Indian government is not willing to accept the three-year-old prince as the King of Nepal. The Indian government is said to have reiterated its insistence that the Nepalese government take steps to democratize governance and leave the question of succession to the throne to the people. The Indian government is continuing discussions with the British government on the Nepalese issue, but there are differences between their positions. Given the current unrest in Malaya and other parts of the Far East, Britain may be reluctant to take steps that could adversely impact the recruitment of Nepalese recruits. However, it is certainly undesirable for India to see its neighboring country remain a dormant volcano despite its apparent calm.
The news sent by the correspondents after the Rana government’s forces regained control of Birgunj is alarming. The correspondents themselves narrowly escaped a terrible accident. It appears that numerous atrocities are being committed in retaliation. Mr. Matrika Prasad Koirala, President of the Nepali Congress, has also stated that the Nepalese government’s forces have unleashed a reign of terror in Birgunj.
aditya singh
Previous Post
The Difference Between Victory and VictoryNext Post
India's average temperature increased by 0.89 degrees Celsius