तेरा प्यार कैसे पाऊं, तुझे किस तरह रिझाऊं।
किस तौर सतगुरु जी, सतगुरु जी, अपना तुझे बनाऊं॥
जितना तू ना तू ऊंचा ठाकुर, जितनी है महिमा तेरी।
उतनी न अकल मुझमें, तेरा पार कैसे पाऊं ॥
चतुराई गुण न कोई, विद्या न बाहुबल है।
युक्ति न ऐसी जानूं, जिससे तुझे मनाऊं ॥
तू है पवित्र निर्मल, और मन मलीन है मेरा।
दिल के मंदिर में लाकर, कैसे तुझे बिठाऊं ॥
सब बल हार मैं बैठा, केवल तेरा भरोसा।
बस दर्द-मंद दिल से, रो-रो तुझे बुलाऊं ॥
थोड़ा-सा दास को भी, चरणों का प्रेम बख्शो।
हो मुझ पे नजरे-रहमत, जिससे कि तुझको भाऊं ॥







