क्रोध और अहंकार की गांठें
भगवान महावीर अक्सर अपने गणधर गौतम के साथ अन्य शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातः काल बहुत से श्रावक श्राविकाओं के साथ शिष्यगण उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे। भगवान महावीर समय पर सभा में पहुंचे! लेकिन आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। भगवान महावीर ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठें लगाने लगे।
वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब महावीर आगे क्या करेंगे; तभी महावीर ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं , अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी ?’
एक शिष्य ने उत्तर में कहा, ”गुरूजी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है! ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है।
एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं!
पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि “बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरुप अपरिवर्तित है।”
“तुम्हारा कथन सत्य है !” भगवान महावीर ने कहा, ”अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।”
यह कहकर महावीर रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे।
उन्होंने पूछा, “तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ?”
एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया कि, “नहीं-नहीं, ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हें खोलना और भी मुश्किल हो जाएगा।“
महावीर ने कहा, ‘ठीक है! अब एक आखिरी प्रश्न यह बताओ कि इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा?’
शिष्य बोला ,’ ”इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा! ताकि हम जान सकें कि इन्हे कैसे लगाया गया था और फिर हम इन्हे खोलने का प्रयास कर सकते हैं।“
भगवान महाबीर नै प्रसन्नतापूर्वक कहा कि “मैं यही तो सुनना चाहता था।
मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो; वास्तव में उसका कारण क्या है यह जानना बहुत जरूरी है! बिना कारण जाने निवारण असम्भव है।
मैं देखता हूँ कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं!
कोई मुझसे ये नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है?
लोग यह भी पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे करूँ?
कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अंहकार का बीज कहाँ से आया!
लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे ख़त्म करूँ?
प्रिय शिष्यों,
जिस प्रकार रस्सी में में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरुप नहीं बदलता; उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज ख़त्म नहीं होते।
जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं।
इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी ही! और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य होगा!
आवश्यकता है कि यदि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानेंगे, समझेंगे तो निवारण का रास्ता स्वतः ही खुलने लगेगा!
यह भक्तों का सौभाग्य ही है कि *जब उनको समय के महापुरुषों का सानिध्य और मार्ग दर्शन मिलता है तो तत्काल सहज रूप उनकी शंकाओं का समाधान हो जाता है!
कबीर दास जी कहते हैं कि –
🌹🥀पीछे लागा जाई था, लोक वेद के साथि।
आगैं थैं सतगुरु मिल्या, दीपक दीया साथि।।🌷🌷
पहले वे जीवन में सांसारिक मोह माया में व्यस्त थे। लेकिन जब उनकी इससे विरक्ति हुई तो उन्हें सद्गुरु के दर्शन हुए। सद्गुरु के मार्गदर्शन में उन्हें ज्ञान रूपी दीपक मिला और उसी से उन्हें परमात्मा के महत्व का ज्ञान हुआ। यह सब कुछ गुरु की कृपा से ही संभव हुआ था।
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