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जीव का आखिरी सत्य

जीव का आखिरी सत्य

जब किसी भी व्यक्ति की स्वांसों की माला टूट जाती है तो उसका अस्तिव ही समाप्त हो जाता है! आश्चर्य की बात है कि इस परम सत्य से हमारा कई बार सामना भी हुआ है! और हमने शव यात्रा में जाते समय राम नाम सत्य है का उद्धोष भी किया है! इतना ही नहीं उस स्वांस विहीन व्यक्ति ने जिनके लिय मैं-मेरी का भाव रखकर जीवन जिया और स्वांस जैसी कृपा को नजरअंदाज किया – वही लोग उसे अग्नि को समर्पित करते हुए – तत्काल ही रिश्ता खत्म कर देते हैं और परिजन समाज के लोगों को सूचित भी करते हैं कि उनके फलां प्रिय जन का नि+धन हो गया है! कहीं कहीं तो कुछ लोग बाद के क्रियाकर्म भी इस डर के मारे हैं कि कहीं वह भूत बनकर हमें या हमारे परिवार को सताना न शुरू करे!
कहावत भी है कि –
हाड जले ज्यों लाकड़ी, केश जले ज्यों घास!
सोना जैसी क्या जल गयी, कोई ना रहा पास!!

जब लग जीवै माता रोये , बहन रोये दश मासा!
तेरह दिन तक तिरीया रोये, फिर ढूंढे घर वासा!

मैंने भी कई बार ऐसी पूर्व निर्धारित परलोक गमन का, लोगों को पूरी तरह से नि+धन होते लोगों को देखा है! उस सर्वभोमिक अकाट्य सत्य से हम सबने गुजरना है! उस समय की वह हृदय विदारक स्थिति हर व्यक्ति को भरे मन से स्वीकार करनी पड़ती है!

अर्थी पर पड़े हुए शव पर लाल कपड़ा बाँधा जा रहा है! गिरती हुई गरदन को सँभाला जा रहा है! पैरों को अच्छी तरह रस्सी बाँधी जा रही है, कहीं रास्ते में मुर्दा गिर न जाए! गर्दन के इर्दगिर्द भी रस्सी के चक्कर लगाये जा रहे हैं। पूरा शरीर लपेटा जा रहा है! अर्थी बनाने वाला बोल रहा है: ‘तू उधर से खींच’ दूसरा बोलता है : ‘मैने खींचा है, तू गाँठ मार!’

लेकिन यह गाँठ भी कब तक रहेगी? वह बंधी जाने वाली रस्सियाँ भी कब तक रहेंगी? अभी जल जाएँगी और रस्सियों से बाँधा हुआ शव भी जलने को ही जा रहा है बाबा! धिक्कार है इस नश्वर जीवन को! धिक्कार है इस नश्वर देह की ममता को ! धिक्कार है इस शरीर के अभिमान को!

अर्थी को कसकर बाँधा जा रहा है! आज तक उसका नाम सेठ, साहब की लिस्ट (सूची) में था! अब वह मुर्दे की लिस्ट में आ गया!
लोग कहते हैं: ‘मुर्दे को बाँधो जल्दी से’ अब ऐसा नहीं कहेंगे कि ‘सेठ को, साहब को, मुनीम को, नौकर को, संत को, असंत को बाँधो…’ पर कहेंगे, ‘मुर्दे को बाँधो !’

हम सभी के लिय विचारणीय है कि –
हो गया हमारे पूरे जीवन की उपलब्धियों का अंत – आज तक हमने जो कमाया था वह हमारा न रहा! आज तक हमने जो जाना था वह मृत्यु के एक झटके में छूट गया। हमारे सारे इन्कम टेक्स (आयकर) के कागजातों को, हमारे प्रमोशन और रिटायरमेन्ट की बातों को, हमारी उपलब्धि और अनुपलब्धियों को, यहाँ तक कि हमें एक पल भी ही अपने सगे सम्बन्धियों से भी सदा-सदा के लिए अलविदा होना पड़ा!

हाय रे, मनुष्य! तेरा श्वास! हाय रे, तेरी कल्पनाएँ! हाय रे तेरी नश्वरता ! हाय रे, मनुष्य; तेरी वासनाएँ ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि इतना पाया है और इतना पाँऊगा! इतना जाना है और इतना जानूँगा! इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा! इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा!

अरे! हम अपने को मौत से तो न बचा पाए ! अपने को जन्म मरण से भी न बचा पाए! देखी तेरी ताकत! देखी तेरी कारीगरी बाबा !

समझने योग बात तो यह है कि कहाँ चले गया हमारा वह हम और अहम!

हमारा शव बाँधा जा रहा है! हम अर्थी के साथ एक हो गये हैं शमशान यात्रा की तैयारी हो रही है। लोग रो रहे हैं। चार लोगों ने अर्थी को उठाया और घर के बाहर हमें ले जा रहे हैं पीछे-पीछे अन्य सब लोग चल रहे हैं!!

हमारी शव यात्रा में कोई स्नेहपूर्वक आया है, कोई मात्र दिखावा करने आये है। कोई निभाने आये हैं कि समाज में बैठे हैं तो पाँच-दस आदमी सेवा के हेतु आये हैं। उन लोगों को पता नहीं कि उनकी भी यही हालत होगी।

जो अभी भी जीवित हैं, जिनकी स्वासें चल रही हैं – उनके लिय भी संदेश है कि अपने को कब तक अच्छा दिखाओगे? अपने को समाज में कब तक ‘सेट’ करते रहोगे? सेट करना ही है तो अपने को परमात्मा में ‘सेट’ क्यों नहीं करते भैया?

दूसरों की शवयात्राओं में जाने का नाटक करते हो? ईमानदारी से शवयात्राओं में जाया करो। अपने मन को समझाया करो कि तेरी भी यही हालत होनेवाली है। तू भी इसी प्रकार उठनेवाला है, इसी प्रकार जलनेवाला है। बेईमान मन! तू अर्थी में भी ईमानदारी नहीं रखता? जल्दी करवा रहा है? घड़ी देख रहा है? ‘आफिस जाना है… दुकान पर जाना है…’ अरे! आखिर में तो शमशान में जाना है ऐसा भी तू समझ ले। आफिस जा, दुकान पर जा, सिनेमा में जा, कहीं भी जा लेकिन आखिर तो शमशान में ही जाना है। तू बाहर कितना जाएगा?
हम यह ना भूलें कि हम पल -पल मृत्यु की और बढ़ रहे हैं और एक न एक दिन हमें यहाँ से जाना है!
जीते जी परमात्मा की कृपा का अहसास करना, हर स्वांस में कृतज्ञता का भाव बने रहना बहुत जरूरी है ताकि हर पल का आनन्द हमको मिलता रहे!
रामायण में बताया गया है कि –
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा॥
यानी, यह मनुष्य का शरीर भवसागर (से तारने) के लिए बेड़ा (जहाज) है। वायु रूप में इस स्वांस का आना जाना ही मेरी कृपा है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेने वाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनता से मिलने वाले) साधन सुलभ हो गए हैं!

इसलिय हमेशा अपने को समझाएं कि –
स्वान स्वान सुमिरन करें, बिरधा स्वांस ना खोय!
न जाने इस सवांस का, आवन होय ना होय!

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