सतगुरु के मनभावन सुरतिया, सबके दीवाना बनवले बा॥
नाम रूप के ज्ञान कराइके, आवागमन मिटवले बा।
घट ही में अमृत पान कराइके, घट-घट में ज्योति जगवले बा ॥
सुमिरन सुरतिया लगाइके भइया, घट उजियारा लखवले बा।
ताला खोल जब शब्द निराला, अनहद के गूंज सुनवले बा ॥
चारों तरफ से भक्तन के नारा, प्रेम के धूम मचवले बा।
हाथ जोड़ के विनती करत प्रेमी, चरनन में शीश झुकवले बा ॥







