मुमकिन नहीं कि वक़्त हमेशा मेहरबान रहे

एक लड़का एक गांव के एक छोटे से घर में रहता था, उसके माँ-बाप इस दुनिया मे नहीं थे इसलिए वह मज़बूरी में नजदीक के ही एक दुकान पर काम भी करता था. अक्सर उसे काम की वजह से उसे बाहर भी जाना पड़ता था .

एक दिन वो लड़का अपने घर में बेहतर रौशनी के मकसद से चार मोमबत्ती जलाकर किसी काम से बाहर चला गया.

रात का समय था। चारो तरफ गहरा अँधेरा छाया हुआ था। केवल एक ही कमरे में उजाला था जिसमें चार मोमबत्तियां जल रही थी। चारो मोमबत्तियां एकांत देखकर आपस में बातें करने लगी।

पहली मोमबत्ती बोली, “मैं शांति हूँ। जब मैं इस दुनिया को देखती हूँ तो बहुत दुखी हो जाती हूँ। चारो ओर मारामारी, लूटखसोट और हिंसा का बोलबाला है। ऐसे में मेरा यहाँ रहना मुश्किल है। अब मैं यहाँ और नहीं रह सकती।” इतना कहकर पहली मोमबत्ती बुझ गई।

दूसरी मोमबत्ती भी अपनी मन की बात कहने लगी, “मैं विश्वास हूँ। मुझे लगता है कि झूठ, धोखा, फरेब और बेईमानी मेरा वजूद खत्म करते जा रहे हैं। यह जगह मेरे लायक नहीं है। मैं भी जा रही हूँ।” इतना कहकर दूसरी मोमबत्ती भी बुझ जाती है।

तीसरी मोमबत्ती दुखी थी। वह कहने लगी, “मैं प्रेम हूँ। मैं हर किसी के लिए हर पल जल सकती हूँ पर अब किसी के लिए मेरे पास वक्त नहीं बचा। स्वार्थ और नफरत मेरी जगह लेते जा रही है। लोगों के मन में अपनों के प्रति प्रेम-भावना नहीं बची। मैं और सहन नहीं कर सकती। मेरे लिए जाना ही ठीक होगा।” यह कहकर तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गई।

तीसरी मोमबत्ती के बुझते ही कमरे में वो लड़का वापस आ गया ।

मोमबत्तियों को बुझा देखकर उसे बहुत दुख होता है। उसके आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
वह दुखी मन से बोला, “इस तरह बीच में ही मेरे जीवन में अँधेरा कर कैसे जा सकती हो तुम। तुम्हे तो अंत तक जलना था लेकिन तुमने मेरा साथ छोड़ दिया। अब मैं क्या करूँगा?”

लड़के की बात सुनकर चौथी मोमबत्ती बोली, “तुम घबराओ मत, मैं उम्मीद हूँ और मैं तुम्हारे साथ हूँ। जब तक मैं जल रही हूँ तुम मेरी लौ से दूसरी मोमबत्तियों को जला दो।”

चौथी मोमबत्ती की बात सुनकर उस लड़के को विश्वास हो गया। उसने उम्मीद के साथ शांति, विश्वास और प्रेम को फिर से जलाकर रौशन कर दिया।

इसलिए मनुष्य के जीवन में समय एक सा नहीं रहता, कभी उजाला तो कभी अँधेरा होता है। जीवन में अगर क़भी भी अँधकार आए, मन अशांत हो जाए, विश्वास डगमगाने लगे और दुनिया पराई लगने लगे तब उम्मीद का दीपक जला लेना। जब तक उम्मीद का दीपक जलता रहेगा जीवन में कभी अँधेरा नहीं हो सकता। इसलिए उम्मीद का साथ कभी न छोड़े।

मुमकिन नहीं कि वक़्त हमेशा मेहरबान रहे…
कुछ लम्हे जीने का तज़ुर्बा भी सिखाते हैं…!!

🌸🌻🌸

हीरों का हार

हीरों का हार

पुराने समय में किसी शहर में एक जौहरी रहता था, उसकी असमय मृत्यु हो गई। उसके परिवार में पत्नी और उसका एक बेटा था। जौहरी की मृत्यु के बाद उनके परिवार में पैसों की कमी आ गई। एक दिन मां ने अपने बेटे को हीरों का हार दिया और कहा कि “इसे अपने चाचा की दुकान पर बेच दो, इससे जो पैसा मिलेगा, वह हमारे काम आएगा।”

लड़का हार लेकर अपने चाचा की दुकान पर पहुंच गया। चाचा ने हार देखा और कहा *“बेटा अभी बाजार मंदा चल रहा है, इस हार को बाद में बेचनाके। तुम्हें पैसों की जरूरत है तो अभी मुझसे ले लो। तुम चाहो तो मेरी दुकान पर काम भी कर सकते हो।” 

लड़के ने चाचा की बात मान ली और अगले दिन से लड़का अपने चाचा की दुकान पर काम करने लगा। समय के साथ वह लड़का भी हीरों की अच्छी परख करने लगा था। वह असली और नकली हीरे को तुरंत ही पहचान लेता था।

एक दिन उसके चाचा ने कहा “अभी बाजार बहुत अच्छा चल रहा है, तुम अपना हीरों का हार बेच सकते हो।” 
लड़का अपनी मां से वह हार लेकर दुकान आ गया और चाचा को दे दिया। लड़के से उसके चाचा ने कहा “अब तो तुम खुद भी हीरों की परख कर लेते हो, इस हार को देखकर इसकी कीमत का अंदाजा लगा सकते हो। इसीलिए तुम खुद इस हार की परख करो।” लड़के ने हार को ध्यान से देखा तो उसे मालूम हुआ कि हार में नकली हीरे लगे हैं और इसकी कोई कीमत नहीं है।

लड़के ने पूरी बात बताई तो चाचा ने कहा “मैं तो शुरू से जानता हूं कि ये हीरे नकली हैं, लेकिन अगर मैं उस दिन तुम्हें ये बात कहता तो तुम मुझे ही गलत समझते। तुम्हें यही लगता कि मैं ये हार हड़पना चाहता हूं, इसीलिए इसे नकली बता रहा हूं। तुम्हें उस समय हीरों का कोई ज्ञान नहीं था। बुरे समय में अज्ञान की वजह से हम अक्सर दूसरों को ही गलत समझते हैं।”

शिक्षा:-विपरीत समय में हमारे ऊपर निगेटिविटी हावी हो जाती है और सोचने- समझने की शक्ति कमजोर होने लगती है। ऐसी स्थिति में की गई जल्दबाजी से नुकसान हो सकता है, रिश्ते खराब भी हो सकते हैं। इसीलिए बुरे समय में धैर्य से काम लेना चाहिए।

जय श्री राम

शुभरात्री

आशक्ति और अनाशक्ति भाव

🌸आशक्ति और अनाशक्ति भाव🌸

भारतीय परंपरा में मनुष्य जीवन जीने की व्यवस्था दी गई है। इसमें केवल अर्थोपार्जन, काम- सेवन या सिर्फ दुनियादारी की ही व्यवस्था नहीं है बल्कि पूरे जीवन की व्यवस्था की गई है।

जीवन का एक भाग शिक्षा के लिए, दूसरा भाग धनोपार्जन, परिवार के पालन-पोषण एवं बच्चों की परवरिश लिए, जीवन का तीसरे भाग घर में रहते हुए भी अनासक्त जीवन जीने के लिए और चौथा भाग मुक्ति एवं सन्यास के लिए।

इतिहास इस बात का गवाह है कि –
जिन सम्राटों ने अपने राज्य का संचालन राज्य के गुरुओं के मार्गदशन में किया और बुढापे की दहलीज पर आकर अपनी इच्छा से राजसिंघासन का त्याग करके वनवास ग्रहण किया, उन्होंने अपने जीवन को सुखी किया!
लेकिन –
जिन्होंने सत्ता की लिप्सा के चलते राजसिंघासन का त्याग नही किया – वे अपनी ही सन्तानों के द्वारा या तो मारे गए या फिर उन्होंने नाना प्रकार की यंत्रनाए भोगी।

यद्यपि जीवन का आंतरिक आनन्द पाने के लिय हमें अपने जीवन की किसी अवस्था का इंतजार नहीं करना चाहिय! हर स्वास में हरि का सुमिरन पाने की विधि का बोध प्राप्त करके प्रतिपल उस शाश्वत शक्ति के सानिध्य, सामीप्य का आनन्द लेना चाहिय!

लेकिन जो लोग वृध्दावस्था की दहलीज पर पहुंचकर भी गफलत की नीद में सोये हैं और नश्वर संसार को ही अपना समझ बैठे हैं, अपने जीवन में आंतरिक सुख को पाने का प्रयास नहीं करते, उन्हें तो यह अनमोल जीवन, जो 84 लाख योनियों के भ्रमण के बाद मिलता है, इसे खोने का पछतावा तो होगा ही!

कहावत है कि राजा दशरथ ने अपने सिर में एक सफेद बाल देखा और उनके मन में वैराग्य जग गया।

आज भी इस बात की जरूरत है कि व्यक्ति स्वयं में उतर कर जीए।यह सारा संसार,यह सारी दुनिया बन्धन की माया है। व्यक्ति ने स्वयं ही अपने आप को इस बन्धन में बांधे है और स्वयं ही आसक्त हो रहा है। कोई किसी को बांधता नहीं है, हम स्वयं ही जानबूझकर बंधे और नशवर मायावी संसार से जुड़े हैं।

माया के प्रति अनासक्ति भाव और अपने अंदर की परमशक्ति की तरफ आसक्ति भाव ही बन्धन खोलने एवं जीते जी मोक्ष प्राप्ति का साधन है। जो समय के सदगुरु के सानिध्य और मार्गदर्शन से मिलता है!

जैसे भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को बतलाया कि – तू युद्ध भी कर और सुमिरन भी कर!

हमको भी अपने जीवन के महाभारत को जितने के लिय श्री कृष्ण जैसा सारथी खोजना होगा! तभी हम जीवन में भरपूर आनन्द ले पाएंगे!

💐💐 सुप्रभात💐💐

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आपके जीवन डोर कहां बंधी है?

🌸आपके जीवन डोर कहां बंधी है?🌸

एक पूर्णिमा की रात में एक छोटे-से गांव में, कुछ जवान लड़कों ने शराबखाने में जाकर शराब पी ली और जब वे शराब के नशे में मदमस्त हो गये और शराब-घर से बाहर निकले तो चांद की बरसती चांदनी में उन्हें यह खयाल आया कि नदी पर जायें और नौका-विहार करें।

रात बड़ी सुन्दर और नशे से भरी हुई थी। वे गीत गाते हुए नदी के किनारे पहुंच गये। नाव वहां बंधी थी। मछुए नाव बांधकर घर जा चुके थे। रात आधी हो गयी थी।

वे एक नाव में सवार हो गये। उन्होंने पतवार उठा ली और नाव खेना शुरू किया। फिर वे रात देर तक नाव खेते रहे।

सुबह की ठण्‍ड़ी हवाओं ने उन्हें सचेत किया। जब उनका नशा कुछ कम हुआ तो उनमें से किसी ने पूछा, ‘‘कहां आ गये होंगे अब तक हम। आधी रात तक हमने यात्रा की है!

न-मालूम कितनी दूर तक निकल आये होंगे। नीचे उतर कर कोई देख ले कि किस दिशा में हम चल रहे हैं, कहां पहुंच रहे हैं?”

जो व्यक्ति नीचे उतरा था, वह नीचे उतर कर हंसने लगा।
उसने कहा, ‘‘दोस्तो! तुम भी उतर आओ। हम कहीं भी नहीं पहुंचे हैं। हम वहीं खड़े हैं, जहां रात नाव खडी थी।”

वे बहुत हैरान हुए। रात भर उन्होंने पतवार चलायी थी और पहुंचे कहीं भी नहीं थे!

नीचे उतर कर उन्होंने देखा तो पता चला कि नाव की जंजीरें किनारे से बंधी रह गयी थीं और उन्हें वे खोलना भूल गये थे!

अज्ञानता से, अहंकार के नशे से भरा मनुष्य का जीवन भी इन्हीं शराबियों की तरह पूरी रात नाव खेने जैसा है!

पूरे जीवन पतवार खेने पर कहीं भी पहुंचता हुआ मालूम नहीं पड़ता। मरते समय आदमी वहीं पाता है स्वयं को, जहां वह जन्मा था!

ठीक उसी किनारे पर, जहां आंख खोली थी- आंख बंद करते समय आदमी पाता है कि वहीं खड़ा है और तब बड़ी हैरानी होती है कि जीवन में इतनी जो दौड़- धूप की, उसका क्या हुआ?

वह जो प्रण किया था – कहीं पहुंचने का, वह जो यात्रा की थी कहीं पहुंचने के लिए, वह सब निष्फल गयी!

मृत्यु के क्षण में आदमी वहीं पाता है अपने को, जहां वह जन्म के क्षण में था! तब सारा जीवन एक सपना मालूम पड़ने लगता है और महसूस होने लगता है कि यह जीवन नैया (नाव) भी कहीं न कहीं माया मोह की खूंटी में बंधी रह गयी।

हां, कुछ लोग- कुछ सौभाग्यशाली लोग- गुरू कृपा से मरते के बाद नहीं बल्कि जीते जी वहां पहुंच जाते हैं – जहां जीवन का आकाश है!जहां जीवन का प्रवास है! जहां सत्य है! जहां परमात्मा का असली मंदिर है। जहां शान्ति है! जहां परमानन्द है!

लेकिन, वहां वे ही लोग पहुंचते हैं, जो किनारे से, खूंटे से जंजीर खोलने के लिए अपने जीवन नैय्या की डोर सद्गुरु को पकड़ा देते हैं और सद्गुरु समय समय पर याद दिलाते रहते हैं कि – आपके जीवन का असली आनन्द आपके अंदर ही है – जिसे आप अज्ञानता में बाहर खोज रहे हैं!

🙏🏻🙏 सुप्रभात🙏🏽🙏🏿

संस्कार की रसीद

संस्कार की रसीद
नरोत्तम सेठ ने आज कहीं व्यस्त होने के कारण ईंट भट्टे पर फिर अपने बेटे को ही भेजा था ।

बेटे का मन क़भी भी भट्टा पर नही लगता जिसके कारण वह अक्सर ग्राहकों से उलझ जाता था । जबकि नरोत्तम सेठ चाहते थे कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय भट्टा पर दे जिससे वो अपने पुस्तैनी व्यवसाय में दक्ष हो सके।

अभी उनका बेटा आकर अपने केबिन में बैठा ही था कि मुनीम आ गया-
“भईया जी एक बुजुर्ग फटी-पुरानी पुर्जी लेकर आया है और दस हजार ईंट मांग रहा है।”

“क्या मतलब..!” बेटे ने पूछा ।

“कह रहा है कि सन उन्नीस सौ अड़सठ में पन्द्रह रुपया हजार के भाव से उसने दस हजार ईंट का दाम एक सौ पचास रुपया जमा किए थे जो आज लेने आया है।”

“दिमाग खराब है उसका । आज दस हजार ईंट की कीमत अस्सी हजार है, एक सौ पचास रुपये में कैसे दे देंगे , भगा दो उसको यहां से ….।”

“पर बड़े बाबूजी के हाथ की दस्तख़त की हुई रसीद है उसके पास है।”

“तो क्या हुआ…? तब क्यों नही ले गये थे । अब, जब ईंट का मूल्य आठ हजार रुपये प्रति हजार है तब ये पन्द्रह रुपये के भाव से ले जाएंगे ?”

सेठ का लड़का अभी मुंशी और बुजुर्ग को डाट ही रहा था कि नरोत्तम सेठ स्वयं आ गये। देखा, बेटा फिर आज किसी से उलझा हुआ है।
कारण पूछने पर बेटे ने वह मुड़ी तुड़ी पुर्जी सेठ को पकड़ा दी।

सेठ पर्ची को देखते ही चौंक गये। अब बुजुर्ग की तरफ ध्यान से देखा और पहचानते ही मुस्करा पड़े।

“धनीराम कहां गायब हो गये थे भाई, पैसा जमा करके..मैने तब कितनी प्रतीक्षा की थी आपकी ? खैर ,अब ले जाओ ,दस हजार आपकी ईंट तो मेरे पास है ही।”

“पर पापा, अस्सी हजार की ईंट एक सौ पचास रुपये में कैसे संभव है ?” बेटे ने कहा ।

“बेटा जब इन्होंने पैसा जमा किया था तब वही भाव था। सन अड़सठ से इनका भी एक सौ पचास रुपया इस ईंट भट्ठा में लगा हुआ है और उससे पैसा कमाया है … जिसके कारण हम अपने इस व्यवसाय को इतना बढ़ा सके । उस एक सौ पचास रुपये की पूंजी का लाभ लगातार सन अडसठ से हम खा भी तो रहे है । ये मेरे हाथ की रसीद हैं । मुझे याद है तब मैंने अपने पिताजी के साथ इस भट्ठा पर आना शुरू किया था । यह मेरी ही उम्र के हैं शायद ।

जब मैने यह रसीद काट कर इन्हें दी थी तो इन्होंने हंसकर कहा था -‘अगर रसीद गायब हो गयी तो क्या होगा ?

तब मेरे पिताजी ने जो जवाब दिया था वह मुझे आज भी याद है। पिताजी ने कहा था कि अगर मेरे जीवन काल में आ गये तो रसीद न भी लाओगे तब भी आपका पैसा मुझ पर रहेगा …ईंट आपको मिलेगी क्योंकि मुझे आपका चेहरा याद है , लेकिन जहां तक रसीद की बात है तो अगर आप इसे रखे रह गये तो मेरे न रहने के बाद भी आपको ईंटें मिलेंगी ..क्योंकि बेईमानी न मुझमें है और न ही मेरे संस्कार व खून में ।”

इतना कहकर सेठ ने दस हजार ईंट बुजुर्ग के यहाँ पहुंचाने के लिए मुंशी को आदेशित कर दिया औऱ अपने बेटे के कंधे पर अपना हाथ रखकर बोला… *”बेटा , तुम्हारे साथ परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल हो लेकिन ईमानदारी का पथ क़भी न छोड़ना। व्यापार ईमानदारी और पक्की जुबान से फलता फूलता है। छल से कमाई लक्ष्मी ज्यादा दिन नही ठहरती ।


🙏राधे राधे 🙏

सच्ची प्रार्थना

सच्ची प्रार्थना
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शिष्य ने गुरु से पूछा – हम प्रार्थना करते हैं, तो होंठ हिलते हैं पर आपके होंठ नहीं हिलते?
आप पत्थर की मूर्ति की तरह खडे़ हो जाते हैं! आप अपने अंदर कहते हैं? क्योंकि, अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे! तो होंठो पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है! चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है, लेकिन वह भाव भी नहीं आता।

गुरु जी ने कहा – मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खडे़ देखा, और एक भिखारी को भी खडे़ देखा!

वह भिखारी बस खड़ा था! फटे–चीथडे़ थे उसके शरीर पर। जीर्ण – जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनो से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आंखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थी!
बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा – तब गिरा!
सम्राट उससे बोला – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा – अगर आपके द्वार पर खडे़ होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं।

महाराज, क्या मुझे कुछ कहने की भी ज़रूरत है। मैं आपके द्वार पर खड़ा हूं! मुझे और मेरे हालात को देख लो मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।

गुरु जी ने कहा – उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी।

मैं भी परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूं – वह देख लेगें। मैं क्या कहूं ? अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे? अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्दों को क्या ही समझेंगे?

अतः भाव व दृढ विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता! आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है!

यह विश्वास रखना कि वह अंतर्यामी सर्वज्ञ है!

🙏🙏🏻 सुप्रभात🙏🏾🙏🏽

सच्चा ज्ञानी

!! सच्चा ज्ञानी !!

एक बार गुरुकुल में तीन शिष्यों की विदाई का अवसर आया तो आचार्य बहुश्रुत ने कहा कि सुबह मेरी कुटिया में आना। तुम्हारी अंतिम परीक्षा होगी।

आचार्य बहुश्रुत ने रात्रि में कुटिया के मार्ग पर कांटे बिखेर दिए।

सुबह तीनों शिष्य अपने-अपने घर से गुरु के निवास की ओर चल पड़े। मार्ग पर कांटे थे। लेकिन शिष्य भी कमजोर नहीं थे।

पहला शिष्य कांटों की चुभन के बावजूद कुटिया तक पहुंच गया।
दूसरा शिष्य कांटो से बचकर आया। फिर भी एक कांटा तो चुभ ही गया।
तीसरे शिष्य ने कांटे देखे तो कांटों की डालियों को घसीट कर दूर फेंक दिया।

फिर हाथ मुंह धोकर कुटिया तक तीनों गए।

आचार्य बहुश्रुत तीनों की गतिविधियां गौर से देख रहे थे।

तीसरा शिष्य ज्यों ही आया, त्यों ही उन्होंने कुटिया के द्वार खोल दिए और बोले- वत्स, तुम मेरी अंतिम परीक्षा में उतीर्ण हो गए हो।

गुरु ने कहा कि ज्ञान वही है जो व्यवहार में काम आए। तुम्हारा ज्ञान व्यावहारिक हो गया है। तुम संसार में रहोगे तो तुम्हें कांटे नहीं चुभेंगे और तुम दूसरों को भी चुभने नहीं दोगे।

फिर पहले और दूसरे शिष्य की ओर देखकर बोले, तुम्हारी शिक्षा अभी अधूरी है।

ज्ञानी वही है – जो ज्ञान को अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोग में लाता हो!

🙏🙏🙏सुप्रभात 🙏🙏🙏

एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने एक संत से प्रश्न किया, “महाराज, रंग रूप, बनावट प्रकृति में एक जैसे होते हुए भी कुछ लोग अत्यधिक उन्नति करते हैं। जबकि कुछ लोग पतन के गर्त में डूब जाते हैं।

एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति ने एक संत से प्रश्न किया, “महाराज, रंग रूप, बनावट प्रकृति में एक जैसे होते हुए भी कुछ लोग अत्यधिक उन्नति करते हैं। जबकि कुछ लोग पतन के गर्त में डूब जाते हैं।

संत ने उत्तर दिया, “तुम कल सुबह मुझे तालाब के किनारे मिलना। तब मैं तुम्हे इस प्रश्न का उत्तर दूंगा।

अगले दिन वह व्यक्ति सुबह तालाब के किनारे पहुंचा। उसने देखा कि संत दोनों हाथ में एक एक कमंडल लिए खड़े हैं।

जब उसने ध्यान से देखा तो पाया कि एक कमंडल तो सही है। लेकिन दूसरे की पेंदी में एक छेद है।

उसके सामने ही संत ने दोनों कमंडल तालाब के जल में फेंक दिए।
सही वाला कमंडल तो तालाब में तैरता रहा।
लेकिन
छेद वाला कमंडल थोड़ी देर तैरा, लेकिन जैसे जैसे उसके छेद से पानी अंदर आता गया। वह डूबने लगा और अंत में पूरी तरह डूब गया।

संत ने जिज्ञासु व्यक्ति से कहा- “जिस प्रकार दोनों कमंडल रंग-रूप और प्रकृति में एक समान थे। किंतु दूसरे कमंडल में एक छेद था। जिसके कारण वह डूब गया।

उसी प्रकार मनुष्य के अच्छे कर्म (सदाचार) ही उसे इस संसार सागर में उसे तैराते हैं।

जिसके जीवन में ख़राब कर्मों में छेद (दोष) होते हैं। वह पतन के गर्त में चला जाता है। लेकिन एक सदाचारी व्यक्ति इस संसार में उन्नति करता है।

इस प्रसंग से उस जिज्ञासु को तो उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया साथ ही मेरे जैसे व्यक्ति के लिए भी यह अनुकरणीय शिक्षा है!
🙏💐🌷🌺🌸🌼🌻

🙏 सुप्रभात🙏🏻🙏🏼

कर्मो का हिसाब

कर्मो का हिसाब

एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदीगंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें।

एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा।

भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जालील करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें, अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी, जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी, उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सिर कहां फूट गया?

भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालियां दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया, भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं, याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया, याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी, बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ, कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे, कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जालील करते थे, कैसे हम उसे कभी_कभी मार या धकेल देते थे, अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुझे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था, जब भी वहाँ रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया।और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नही, आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी,

फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता, चाहे मेरे साथ कितनी भी जात्ती क्यू ना हो जाए, मेरे होठो पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता, की कोई और इतने बुरे दिन देखे, मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूंकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते, इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं,

सेठ चुपके चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी, बूढे बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें,

अगले दिन, वहाँ भिखारी भीख मांगने सेठ के यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी, भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया,

सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है, पर उसे पूर्ण वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता है।

शिक्षा:-हो सके तो बस हम अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास।

जय श्रीराम

शुभरात्री

गेंहू के दाने

💐💐गेंहू के दाने💐💐

एक समय की बात है जब राजस्थान के एक छोटे से गाँव नयासर में अमरसेन नामक व्यक्ति रहता था। अमरसेन बड़ा होशियार था, उसके चार पुत्र थे जिनके विवाह हो चुके थे और सब अपना जीवन जैसे-तैसे निर्वाह कर रहे थे परन्तु समय के साथ-साथ अब अमरसेन वृद्ध हो चला था! पत्नी के स्वर्गवास के बाद उसने सोचा कि अब तक के संग्रहित धन और बची हुई संपत्ती का उत्तराधिकारी किसे बनाया जाये?

ये निर्णय लेने के लिए उसने चारो बेटों को उनकी पत्नियों के साथ बुलाया और एक-एक करके गेहूं के पाँच दाने दिए और कहा कि मै तीरथ पर जा रहा हूँ और चार साल बाद लौटूंगा और जो भी इन दानों की सही हिफाजत करके मुझे लौटाएगा तिजोरी की चाबियाँ और मेरी सारी संपत्ती उसे ही मिलेगी
इतना कहकर अमरसेन वहां से चला गया।

पहले बहु-बेटे ने सोचा, बुड्ढा सठिया गया है! चार साल तक कौन याद रखता है! हम तो बड़े हैं तो धन पर पहला हक़ हमारा ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने गेहूं के दाने फेक दिये।

दूसरे ने सोचा कि संभालना तो मुश्किल है! यदि हम इन्हे खा लें तो शायद उनको अच्छा लगे और लौटने के बाद हमें आशीर्वाद दे दें और कहे की तुम्हारा मंगल इसी में छुपा था और सारी संपत्ती हमारी हो जाएगी यह सोचकर उन्होंने वो पाँच दानें खा लिये।

तीसरे ने सोचा कि हम रोज पूजा पाठ तो करते ही हैं और अपने मंदिर में जैसे ठाकुरजी को सँभालते हैं! वैसे ही ये गेहूं भी संभाल लेंगे और उनके आने के बाद लौटा देंगे।

चौथे बहु-बेटे ने समझदारी से सोचा और पाचों दानो को एक एक कर जमीन में बो दिया और देखते-देखते वे पौधे बड़े हो गये और कुछ गेहूं ऊग आये फिर उन्होंने उन्हें भी बो दिया इस तरह हर वर्ष गेहूं की बढ़ोतरी होती गई पाँच दानें पाँच बोरी, पच्चीस बोरी,और पचासों बोरियों में बदल गए।

चार साल बाद जब अमरसेन वापस आया तो सबकी कहानी सुनी और जब वो चौथे बहु-बेटों के पास गया तो बेटा बोला, ”पिताजी, आपने जो पांच दाने दिए थे अब वे गेंहूँ की पचास बोरियों में बदल चुके हैं! हमने उन्हें संभल कर गोदाम में रख दिया है, उनपर आप ही का हक़ है।”
यह देख अमरसेन ने फ़ौरन तिजोरी की चाबियाँ सबसे छोटे बहु-बेटे को सौंप दी और कहा, तुम ही लोग मेरी संपत्ति के असल हक़दार हो।

इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि मिली हुई जिम्मेदारी को अच्छी तरह से निभाना चाहिए और मौजूद संसाधनो, चाहे वो कितने कम ही क्यों न हों, उनका सही उपयोग करना चाहिए।

गेंहूँ के पांच दाने तो एक प्रतीक हैं, जो समझाते हैं कि कैसे छोटी से छोटी शुरुआत करके उसे एक बड़ा रूप दिया जा सकता है।

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