क्या आप जानते हैं कि आपके अंतिम संस्कार के बाद आम तौर पर क्या होता है?

क्या आप जानते हैं कि आपके अंतिम संस्कार के बाद आम तौर पर क्या होता है?

कुछ ही घंटों में रोने की आवाज पूरी तरह से बंद हो जाएगी।

रिश्तेदारों के लिए होटलों से खाना मंगवाने में जुटेगा परिवार..

पोते दौड़ते और खेलते रहेंगे।

कुछ पुरुष सोने से पहले आपके बारे में कुछ संवेदनात्मक टिप्पणी करेंगे!

कोई रिश्तेदार आपके बच्चों से फोन पर बात करेगा कि आपात स्थिति के कारण वह व्यक्तिगत रूप से नहीं आ पा रहा है।

अगले दिन रात के खाने में, कुछ रिश्तेदार कम हो जाते हैं और कुछ लोग सब्जी में पर्याप्त नमक नहीं होने की शिकायत करते हैं।

भीड़ धीरे धीरे छंटने लगेगी..

आने वाले दिनों में फिर कुछ कॉल आपके फोन पर बिना यह जाने आ सकती हैं कि आप मर चुके हैं।

आपका कार्यालय या दुकान आपकी जगह लेने के लिए किसी को ढूंढने में जल्दबाजी करेगा।

दो सप्ताह में आपका बेटा और बेटी अपनी आपातकालीन छुट्टी खत्म होने के बाद काम पर लौट आएंगे।

महीने के अंत तक आपका जीवनसाथी भी कोई कॉमेडी शो देख कर हंसने लगेगा।

सबका जीवन सामान्य हो जाएगा
जिस तरह एक बड़े पेड़ के सूखे पत्ते में और जिसके लिए आप जीते और मरते हैं, उसमें कोई अंतर नहीं है, यह सब इतनी आसानी से, इतनी तेजी से, बिना किसी हलचल के होता है।

आपको इस दुनिया में आश्चर्यजनक गति से भुला दिया जाएगा।

इस बीच आपकी प्रथम वर्ष पुण्यतिथि भव्य तरीके से मनाई जाएगी।

पलक झपकते ही
साल बीत गए और तुम्हारे बारे में बात करने वाला कोई नहीं है।

एक दिन बस पुरानी तस्वीरों को देखकर आपका कोई करीबी आपको याद कर सकता है!

मुझे अभी बताओ…
जब लोग आपको आसानी से भूलने का इंतजार कर रहे हैं तो फिर आप किसके लिए दौड़ रहे हो? और आप किसके लिए चिंतित हैं?

अपने जीवन के अधिकांश भाग के लिए 80% आप इस बारे में सोचते हैं कि आपके रिश्तेदार और पड़ोसी आपके बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप उन्हें संतुष्ट करने के लिए जीवन जी रहे हैं? जो किसी काम का नहीं !
सच्चाई यही है कि –
जब लग जीवै माता रोए,
बहन रोए दश मासा!
तेरह दिन तक तिरिया रोए,
फिर ढूंढें घर वासा!
मन फूला फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे!!
इसलिए –
ध्यान दें, जिंदगी एक बार ही मिलती है, बस इसे जी भर के जीने की कोशिश करें! ज्ञान का अभ्यास करें!

जीवन का असली आनन्द हमारे ही अंदर है – इस बात को समझने की कोशिश करें!
इसी में जीवन की सार्थकता है और यही है जिन्दगी।

आपका जीवन मंगलमय हो!
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि –
*हे पार्थ !*
*तराजू पर पैर संभलकर रखना!*
*संतुलन बराबर रखना!*
*लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो उसका खास खयाल रखना!*

तो अर्जुन ने कहा,
*”हे प्रभु “, सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे?*

वासुदेव हंसते हुए बोले,
*हे पार्थ ! जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा !*

अर्जुन ने कहा,
*प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता?*

वासुदेव फिर हंसे और बोले, *जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे- उस अस्थिर “पानी” को स्थिर तो “मैं” ही रखूंगा !!*

कहने का तात्पर्य यह है कि*

*आप चाहे*
कितने ही निपुण क्यूँ ना हों!
कितने ही बुद्धिवान क्यूँ ना हों,
कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों!

*लेकिन आप*
स्वयं हरेक परिस्थिति के ऊपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते!आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हो!

क्योंकि
*साधारण पुरुषों की एक सीमा है!*

और
जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है
*उन्हीं को महापुरूष कहते हैं!*

‼️ आपके कर्म ही आपकी पहचान है ‼️

*‼️ आपके कर्म ही आपकी पहचान है ‼️*

एक फ़कीर श्मसान में दो चिताओं की राख बड़े ध्यान से देख रहा था। किसी ने पूछा, *बाबा ! ऐसा क्यों देख रहे हो इस राख को।*

फ़कीर ने कहा कि, *यह एक अमीर आदमी की लाश की राख है- जिसने हमेशा काजू-बादाम खाये हैं।*
और
*यह दूसरी एक गरीब आदमी की लाश है जिसे दो वक़्त की रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिलती थी।*
लेकिन
*इन दोनों की लाश की राख एक जैसी है फिर भी पता नहीं ज़िन्दगी भर आदमी को घमंड किस बात पर होता है !*

इस कटु सत्य को जब हम समझेंगे तो *तभी नश्वरता के परे उस शाश्वत से जुड़े रहेंगे – जो था, है और रहेगा!*

*आपका जीवन मंगलमय हो!*

राजाभोज और व्यापारी

*💐💐राजाभोज और व्यापारी💐💐*

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि *जैसा भाव हमारे मन मेे होता है, वैसा ही भाव सामने वाले के मन में आता है।*

इस सबंध में एक ऐतिहासिक घटना सुनी जाती है जो इस प्रकार है-

एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में आया कि* इस व्यापारी का सबकुछ छीन लिया जाना चाहिए।*

व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा – *मै प्रजा को हमेशा न्याय देता हूं। आज मेेरे मन में यह अन्याय पूर्ण भाव क्यों आ गया कि व्यापारी की संपत्ति छीन ली जाये?* उसने अपने मंत्री से सवाल किया!

मंत्री ने कहा, *“इसका सही जवाब कुछ दिन बाद दे पाउंगा!*
राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली। मंत्री विलक्षण बुद्धि का था वह इधर-उधर के सोच-विचार में सयम न खोकर सीधा व्यापारी से मिलने पहूंचा। व्यापारी से दोस्ती करके उसने व्यापारी से पूछा, *“तुम इतने चिंतित और दुखी क्यों हो? तुम तो भारी मुनाफे वाला चंदन का व्यापार करते हो।”*

व्यापारी बोला, *“धारा नगरी सहित मैं कई नगरों में चंदन की गाडीयां भरे फिर रहा हूं, पर चंदन इस बार चन्दन की बिक्री ही नहीं हुई! बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बच पाने का कोई उपाय नहीं है।*

व्यापारी की बातें सुन मंत्री ने पूछा, *“क्या अब कोई भी रास्ता नही बचा है?”*

व्यापारी हंस कर कहने लगा – *अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चंदन बिक सकता है।*

मंत्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मंत्री ने व्यापारी से कहा कि *तुम प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए एक मन ४० किलो चंदन दे दिया करो और नगद पैसे उसी समय ले लिया करो।*

व्यापारी मंत्री के आदेश को सुनकर बड़ा खुश हुूआ। वह अब मन ही मन राजा की लंबी उम्र होने की कामना करने लगा।

एक दिन राज-सभा चल रही थी। व्यापारी दोबारा राजा को वहां दिखाई दे गया। तो राजा सोचने लगा – *यह कितना आकर्षक व्यक्ति है इसे क्या पुरस्कार दिया जाये?*

राजा ने मंत्री को बुलाया और पूछा, *“मंत्रीवर, यह व्यापारी जब पहली बार आया था तब मैंने तुमसे कुछ पूछा था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया।*
खैर, आज जब मैंने इसे देखा तो *मेरे मन का भाव बदल गया! पता नहीं आज मैं इसपर खुश क्यों हो रहा हूँ और इसे इनाम देना चाहता हूँ!*

मंत्री को तो जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उसने समझाया- *महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। जब यह पहले आया था तब अपनी चन्दन की लकड़ियों का ढेर बेचने के लिए आपकी मृत्यु के बारे में सोच रहा था। लेकिन अब यह रोज आपके भोजन के लिए एक मन लकड़ियाँ देता है इसलिए अब ये आपके लम्बे जीवन की कामना करता है।*
यही कारण है कि *पहले आप इसे दण्डित करना चाहते थे और अब इनाम देना चाहते हैं।*

सचमुच, *अपनी जैसी भावना होती है वैसा ही प्रतिबिंब दूसरे के मन पर पड़ने लगता है। जैसे हम होते है वैसे ही परिस्थितियां हमारी ओर आकर्षित होती हैं। हमारी जैसी सोच होगी वैसे ही लोग हमें मिलेंगे।*

यही इस जगत का नियम है – *हम जैसा बोते हैं, वैसा काटते हैं! हम जैसा दूसरों के लिए मन में भाव रखते हैं, वैसा ही भाव दूसरों के मन में हमारे प्रति हो जाता है!*

इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि *हमेशा सबके प्रति सकारात्मक भाव रखें।*
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

दुःख का कारण- हमारी सोच

💐💐 *दुःख का कारण- हमारी सोच* 💐💐

एक शहर में एक आलीशान और शानदार घर था! वह शहर का सबसे ख़ूबसूरत घर माना जाता था! लोग उसे देखते, तो तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाते!

एक बार घर का मालिक किसी काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर चला गया।

कुछ दिनों बाद जब वह वापस लौटा तो देखा कि *उसके मकान से धुआं उठ रहा है! करीब जाने पर उसे घर से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ी! उसका ख़ूबसूरत घर जल रहा था! वहाँ तमाशबीनों की भीड़ जमा थी, जो उस घर के जलने का तमाशा देख रही थी!*

अपने ख़ूबसूरत घर को अपनी ही आँखों के सामने जलता हुए देख वह व्यक्ति चिंता में पड़ गया! उसे समझ नहीं आ रहा था कि *अब क्या करे? कैसे अपने घर को जलने से बचाये?*
वह लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा कि *वे किसी भी तरह उसके घर को जलने से बचा लें!*

उसी समय उसका बड़ा बेटा वहाँ आया और बोला, *“पिताजी, घबराइए मत! सब ठीक हो जायेगा!”*

उसकी इस बात पर कुछ नाराज़ होता हुआ पिता बोला, *“कैसे न घबराऊँ? मेरा इतना ख़ूबसूरत घर जल रहा है!”*

बेटे ने उत्तर दिया, *“पिताजी, माफ़ कीजियेगा! एक बात मैं आपको अब तक बता नहीं पाया था! कुछ दिनों पहले मुझे इस घर के लिए एक बहुत बढ़िया खरीददार मिला था! उसने मेरे सामने मकान की कीमत की ३ गुनी रकम का प्रस्ताव रखा!*
सौदा इतना अच्छा था कि *मैं इंकार नहीं कर पाया और मैंने आपको बिना बताये सौदा तय कर लिया!”*

ये सुनकर पिता की जान में जान आयी! उसने राहत की सांस ली और आराम से यूं खड़ा हो गया- *जैसे सब कुछ ठीक हो गया हो! अब वह भी अन्य लोगों की तरह तमाशबीन बनकर उस घर को जलते हुए देखने लगा!*

तभी उसका दूसरा बेटा आया और बोला, *“पिताजी हमारा घर जल रहा है और आप हैं कि बड़े आराम से यहाँ खड़े होकर इसे जलता हुआ देख रहे हैं! आप कुछ करते क्यों नहीं?”*

बेटा चिंता की बात नहीं है- *तुम्हारे बड़े भाई ने ये घर बहुत अच्छे दाम पर बेच दिया था! अब ये घर हमारा नहीं रहा! इसलिए अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता.”* पिता बोला.।

*“पिताजी भैया ने सौदा तो कर दिया था! लेकिन अब तक सौदा पक्का नहीं हुआ है! अभी हमें पैसे भी नहीं मिले हैं! अब बताइए, इस जलते हुए घर के लिए कौन पैसे देगा?”*

यह सुनकर पिता *फिर से चिंतित हो गया और सोचने लगा कि कैसे आग की लपटों पर काबू पाया जाए! वह फिर से पास खड़े लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा!*

तभी उसका तीसरा बेटा आया और बोला, *“पिता जी घबराने की सच में कोई बात नहीं है! मैं अभी उस आदमी से मिलकर आ रहा हूँ, जिससे बड़े भाई ने मकान का सौदा किया था!*

उसने कहा है कि *मैं अपनी जुबान का पक्का हूँ!*
मेरे आदर्श कहते हैं कि *चाहे जो भी हो जाये! अपनी जुबान पर कायम रहना चाहिए! इसलिए अब जो हो जाये – जबान दी है तो घर ज़रूर लूँगा और उसके पैसे भी दूंगा!”*

*पिता फिर से चिंतामुक्त हो गया और घर को जलते हुए देखने लगा!*

यह प्रसंग हम आसानी से समझ सकते हैं कि *एक ही परिस्थिति में व्यक्ति का व्यवहार भिन्न-भिन्न हो सकता है और यह व्यवहार उसकी सोच के कारण होता है!*
उदाहारण के लिए जलते हुए घर के मालिक को ही लीजिये – *घर तो वही था, जो जल रहा था। लेकिन उसके मालिक की सोच में कई बार परिवर्तन आया और उस सोच के साथ उसका व्यवहार भी बदलता गया!*

असल में, जब हम किसी चीज़ से जुड़ जाते हैं तो उसके छिन जाने पर या दूर जाने पर हमें दुःख होता है लेकिन यदि हम किसी चीज़ को ख़ुद से अलग कर देखते हैं तो एक अलग सी आज़ादी महसूस करते हैं और दु:ख हमें छूता तक नहीं है!

इसलिए *दु:खी होना और ना होना पूर्णतः हमारी सोच और मानसिकता (mindset) पर निर्भर करता है! सोच पर नियंत्रण रखकर या उसे सही दिशा देकर हम बहुत से दु:खों और परेशानियों से न सिर्फ बच सकते हैं बल्कि जीवन में नई ऊँचाइयाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।*
🙏🙏

*जो प्राप्त है-पर्याप्त है*
*जिसका मन मस्त है*
*उसके पास समस्त है!!*
🌸🌸🌸🌸🌸🌸

भलाई का जज्बा

!! भलाई का जज्बा !!

एक बार एक राजा ने एक कैदी को मौत की सजा सुनाई। सजा सुनकर कैदी आप खो बैठा। वह बादशाह को गालियां देने लगा। कैदी दरबार के आखिरी कोने में खड़ा था। इसलिए उसकी गालियां बादशाह को सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं।

इसलिए बादशाह ने अपने वजीर से पूछा कि वह क्या कह रहा है?
इस पर वजीर ने बताया, “महाराज, कैदी कह रहा है कि वे लोग कितने अच्छे होते हैं जो अपने क्रोध को पी जाते हैं और दूसरों को क्षमा कर देते हैं।”

यह सुनकर बादशाह को दया आ गई और उसने कैदी को माफ कर दिया।

लेकिन दरबारियों में एक व्यक्ति था जो वजीर से जलता था। उसने कहा, “महाराज, वजीर ने आपको गलत बताया है।”

“यह व्यक्ति आपको गंदी गंदी गालियां दे रहा है। आप इसको माफ मत करिए।” उसकी बात सुनकर बादशाह गुस्सा हो गया और दरबारी से बोला-
“मुझे वजीर की बात ही सही लगी। क्योंकि इसने झूठ भी बोला है तो किसी की भलाई के लिए। इसके अंदर भलाई का जज्बा तो है। जबकि तुम दरबार में रहने के योग्य नहीं हो। तुम्हें तुरंत बेदखल किया जाता है।”

हमेशा अपने व्यवहार और वाणी से दूसरों की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। वो झूठ भी सत्य के बराबर है जहाँ किसी की भलाई हो या जिंदगी बचने का सवाल हो!
🙏🏼🙏🙏🏿 सुप्रभात🙏🏾🙏🏻🙏🏽

लक्ष्य

!! लक्ष्य !!

एक लड़के ने एक बार एक बहुत ही धनवान व्यक्ति को देखकर धनवान बनने का निश्चय किया। वह धन कमाने के लिए कई दिनों तक मेहनत कर धन कमाने के पीछे पड़ा रहा और बहुत सारा पैसा कमा लिया।

इसी बीच उसकी मुलाकात एक विद्वान से हो गई। विद्वान के ऐश्वर्य को देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया और अब उसने विद्वान बनने का निश्चय कर लिया और अगले ही दिन से धन कमाने को छोड़कर पढने-लिखने में लग गया।

वह अभी अक्षर ज्ञान ही सीख पाया था कि इसी बीच उसकी मुलाकात एक संगीतज्ञ से हो गई। उसको संगीत में अधिक आकर्षण दिखाई दिया, इसीलिए उसी दिन से उसने पढाई बंद कर दी और संगीत सीखने में लग गया।

इसी तरह काफी उम्र बीत गई! ना वह धनी हो सका ना विद्वान और ना ही एक अच्छा संगीतज्ञ बन पाया। तब उसे बड़ा दुख हुआ।

एक दिन उसकी मुलाकात एक बहुत बड़े महात्मा से हुई। उसने महात्मन को अपने दुःख का कारण बताया।
महात्मा ने उसकी परेशानी सुनी और मुस्कुराकर बोले, “बेटा, दुनिया बड़ी ही चिकनी है! जहाँ भी जाओगे कोई ना कोई आकर्षण ज़रूर दिखाई देगा। एक निश्चय कर लो और फिर जीते जी उसी पर अमल करते रहो तो तुम्हें सफलता की प्राप्ति अवश्य हो जाएगी! नहीं तो दुनियां के झमेलों में यूँ ही चक्कर खाते रहोगे। बार-बार रूचि बदलते रहने से कोई भी उन्नत्ति नहीं कर पाओगे।”

युवक महात्मा की बात को समझ गया और एक लक्ष्य निश्चित कर उसी का अभ्यास करने लगा।

हमें भी शुरुआत से ही एक लक्ष्य बनाकर उसी के अनुरूप मेहनत करना चाहिए। इधर-उधर भटकने की बजाय एक ही जगह, एक ही लक्ष्य पर डटे रहने से ही सफलता व उन्नति प्राप्त की जा सकती हैं! चाहे वह भोतिक साधनों को प्राप्त करने की इच्छापूर्ति करना हो या अपने अंतरतम के परमानन्द को पाने की ललक! एक लक्ष्य के साथ सतत्त अभ्यास करना बहुत आवश्यक है!

आपका दिन मंगलमय हो!

रास्ते पर पडा अनगढ़ पत्थर

*🙏🏻रास्ते पर पडा अनगढ़ पत्थर🙏🏻*

एक मूर्तिकार एक रास्ते से गुजरा और उसने संगमरमर के पत्थर की दुकान के पास एक बड़ा अनगढ़ संगमरमर का पत्थर राह के किनारे पड़ा देखा।
उसने दुकानदार से पूछा – *और सब पत्थर सम्भाल के भीतर रखे गए हैं। ये पत्थर बाहर क्यों डाला है ?*
उसने कहा, *ये पत्थर बेकार है। इसे कोई मूर्तिकार खरीदने को राजी नहीं है। लेकिन आपकी इसमें उत्सुकता है क्या ?*

मूर्तिकार ने कहा, * हाँ, इसमें मेरी उत्सुकता है।*

दूकानदार ने कहा, *आप इसको मुफ्त ले जाएँ। ये निकले यहाँ से तो जगह खाली हो बस इतना ही काफी है। ये आज दस वर्ष से यहाँ पड़ा है। कोई खरीददार नहीं मिलता। आप ले जाओ कुछ पैसे देने की जरूरत नहीं है। अगर आप कहो तो आपके घर तक पहुँचवाने का काम भी मैं कर देता हूँ।*

दो वर्ष बाद मूर्तिकार ने उस पत्थर के दुकानदार को अपने घर आमंत्रित किया कि *मैंने एक मूर्ति बनाई है। तुम्हें दिखाना चाहूँगा। वो तो उस पत्थर की बात भूल ही गया था। मूर्ति देखके तो दंग रह गया ऐसी मूर्ति शायद कभी बनाई नहीं गई थी।*

उस मूर्तिकार ने भगवान श्री कृष्ण का बाल रूप तराशा। मईया यशोदा श्री कृष्ण को गोद में खिला रही हैं। इतनी जीवंत कि उसे भरोसा नहीं आया।*

दुकानदार ने कहा, *ये पत्थर तुम कहाँ से लाए? इतना अद्भुत पत्थर तुम्हें कहाँ मिला?*

मूर्तिकार हँसने लगा उसने कहा *ये वही पत्थर है। जो तुमने व्यर्थ समझकर दुकान के बाहर फेंक रखा था और मुझे मुफ्त में दिया था। इतना ही नहीं। मेरे घर तक पहुँचा दिया था।*

*“क्या यह ही पत्थर है?” उस दुकानदार को तो भरोसा ही नहीं आया। उसने कहा, *तुम मजाक करते हो। उसको तो कोई लेने को भी तैयार नहीं था। दो पैसा देने को भी कोई तैयार नहीं था। तुमने उस पत्थर को इतना महिमा रूप, इतना लावण्य दे दिया! तुम्हें पता कैसे चला कि ये पत्थर इतनी सुन्दर प्रतिमा बन सकता है?*

मूर्तिकार ने कहा, *आँखें चाहिए – पत्थरों के भीतर देखने वाली आँख चाहिए।*

अधिकतर लोगों के जीवन भी अनगढ़ रह जाते हैं। जीवन नीरस लगने लगता है! कारण इतना ही कि *तरशानेवाला न मिलने के कारण हमारा जीवन अनगढ़ पत्थर है!*

*प्रत्येक व्यक्‍ति परमात्मा को अपने भीतर लिए बैठा है। जब सदगुरु मिलते हैं तो वह सत्संग रुपी छेनी से अपने शिष्य को तरासते हैं! वे आत्मज्ञान देते हैं जिससे अन्दर स्थित परमात्मा का दीदार होता है और जीवन के मायने समझ में आने लगता है कि यह कितना कीमती है!*
अन्यथा कहा है कि –
*ज्ञान बिना नर सोवहिं ऐसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे!!*

हम सभी गुरुभक्तों के लिय खुश खबरी है कि *महाराजी ने हमें वह अंदर जाने की युक्ति प्रदान की है! बस हमें उस ज्ञान का सतत अभ्यास करना है!*
🙏🙏🙏🙏🙏

आज फिर एक सुन्दर प्रश्न आया…. एक युवक प्रश्न कर रहा था… उसने सहज भाव से पूछा…

आज फिर एक सुन्दर प्रश्न आया…. एक युवक प्रश्न कर रहा था… उसने सहज भाव से पूछा…

शास्त्रीजी… क्या सच में संसार के स्वामी चार महीने के लिए सो गये…

मैंने कहा… क्यों ? कोई शक…
युवक ने कहा-नहीं.. लेकिन यह भगवान विष्णु जगत के रचयिता हैं… और सोगये…. और वह भी चार महीने के लिए…. ब्रह्मांड के मामले कैसे चलेंगे…
शास्त्रीजी ने कहा-आपके
देश का प्रधानमंत्री एक हफ्ते के लिए विदेश चला जाता है…तो देश का कारोबार ठप हो जाता है?….अगर किसी एक कंपनी का अध्यक्ष एक महीने के लिए चला जाए तो क्या कंपनी नहीं चलती?

युवक ने कहा कि वो तो किसी को सत्ता सौंपके जाते है….

मैंने कहा कि इस दुनिया के मालिक भी सत्ता सौंप के जाते हैं…..

जगत के नाथ के सोते ही गुरु शक्ति जाग्रत हो जाती है….गुरु पूर्णिमा उत्सव आपको विश्वास दिलाता है कि… आपका ध्यान रखने के लिए गुरू परम्परा बैठी है …..जाग्रत है…

और फिर श्रावण मास में भगवान महादेव आपका ध्यान रखने को तैयार हैं….

श्रावण समाप्त होते ही विघ्नहर्ता गणेश की सवारी आ जाती है…. गणेशजी जब कैलाश जाते हैं तो आपके पितरों का उत्सव चालु होता है….तुम्हारे पिता तुम्हारा ध्यान रखते हैं….

पितृ उत्सव पूरा होते ही …. आद्य शक्ति माँ जगदम्बा शेर पर सवार होकर आती हैं…

और दिवाली पर… सरस्वती… लक्ष्मी…. और महाकाली तुम्हारा ख्याल रखती हैं….

और तुम तैयार हो जाते हो… देव- दिवाली का उत्सव धूमधाम से मनाने के लिए… क्योंकि जग का नाथ जाग गया है….

इस चातुर्मास में गुरु परंपरा आपको लगातार जाग्रत रखती है।

आप जाग्रत रहना… भगवान आपकी देखभाल करने के लिए आपके हृदय-कमल में ही बैठे हैं…

हरि ॐ 🙏😊

अभिमान अक्ल को खा जाता है!

*अभिमान अक्ल को खा जाता है!*
🌸🌸🌸🌸🌸🌸

एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि *उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता।*

उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी – उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था।

चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि *उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। इसलिय वह लोगों के सामने डींग हांका करता था।*

एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे, *“दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता*
यह अभिमान व्यर्थ है कि *मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा।सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।”*

सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, *“मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।”*

संत बोले, *“यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।”*

इस पर मुखिया ने कहा, *“आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।”*

संत ने कहा, *“ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक वर्ष के लिए गायब हो जाओ।*

उसने ऐसा ही किया। संत ने यह बात फैला दी कि *उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है। मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तक शोक संतप्त रहे।*

*गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए। एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी। गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी। एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया।*

एक वर्ष बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया तो घर वालों ने भूत समझ कर दरवाजा नहीं खोला। जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया – *हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं।*

*उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। संसार किसी के लिए भी नही रुकता!!*

सच्चाई यही है कि *यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है! संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा। जगत को चलाने की डींग भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है।*

*अतः अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है।*

*🙏सेवा भाव ही सर्वोपरी है!*🙏🙏

*जो प्राप्त है- वही पर्याप्त है!*
*जिसका मन मस्त है!*
*उसके पास समस्त है!!*