मानसिक तनाव से मुक्त होकर जीने का अचूक मंत्र :
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!

मानसिक तनाव से मुक्त होकर जीने का अचूक मंत्र :
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!
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एक महिला एक बस में चढ़ी और एक आदमी के बगल में बैठने के क्रम में उसे अपने बैग से और अपनी कोहनी से कई बार मार दिया।

पुरुष चुप रहा, तो महिला ने उससे पूछा कि जब उसने उसे अपने बैग से मारा तो उसने शिकायत क्यों नहीं की?

उस आदमी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:
“इतनी महत्वहीन बात से परेशान होने की जरूरत नहीं थी क्योंकि हमारी एक साथ की यात्रा बहुत छोटी है! मैं अगले पड़ाव पर उतर रहा हूँ।”

इस जवाब ने महिला को इतना परेशान किया कि उसने उस आदमी से उसे क्षमा करने के लिए प्रार्थना की और सोचा कि इन शब्दों को तो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए ।
हम में से प्रत्येक को यह समझना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा समय इतना कम है कि इसे बेकार तर्कों, ईर्ष्या, दूसरों को क्षमा न करने, असंतोष और बुरे व्यवहार के साथ व्यर्थ करना समय और ऊर्जा की एक हास्यास्पद बर्बादी है।

अब प्रश्न उठता है –
क्या किसी ने आपका दिल तोड़ा? तो शांत रहो।
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने आपको धोखा दिया, धमकाया या अपमानित किया?
तो आराम करें, तनावग्रस्त न हों!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने बिना वजह आपका अपमान किया?
तो भी शांत रहो, इसे नजरअंदाज करो!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने ऐसी टिप्पणी की जो आपको पसंद नहीं आई?
तो शांत रहें, नज़र अंदाज़ करें, क्षमा करें, उन्हें अपनी प्रार्थनाओं में रखें और बिना किसी कारण के उन्हें अभी भी प्यार करें!
क्योंकि यात्रा बहुत छोटी है।

कुछ लोग जो भी समस्याएँ हमारे सामने लाते हैं! वह समस्या तभी होती है जब हम उस पर विचार करते हैं!
याद रखें कि हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

हमारी यात्रा कितनी लंबी है यह कोई नहीं जानता। कल किसी ने नहीं देखा। कोई नहीं जानता कि हम अपने पड़ाव पर अचानक कब पहुंच जाएं।
हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

इसलिए हम हमेशा अपनों की, दोस्तों और परिवार की सराहना करें। उन्हें अच्छे, खुशनुमा वातावरण में रखें। उनका सम्मान करें। हम उनको आदरणीय भाव दें, हम स्वयं दयालु , प्रेममय और क्षमाशील बनें।

तब हम भी वास्तव में कृतज्ञता और आनंद से भर जाएंगे!
आखिरकार हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

हर किसी के साथ अपनी मुस्कान साझा करें! अपना रास्ता चुनें कि आप जितना सुंदर बनना चाहते हैं, उतना ही सुंदर बनें।
क्योंकि इस मंत्र को कभी ना भूलें कि –
हमारी यात्रा बहुत छोटी है!

अतः अपने जीवन में जो भी करें – खुशी से करें!

आपका जीवन आनंदमय बना रहे!
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बुद्धिमान साधू

!! बुद्धिमान साधू !!

किसी राजा के राजमहल के द्वार पर एक साधु आया और द्वारपाल से बोला कि भीतर जाकर राजा से कहे कि उनका भाई आया है।

द्वारपाल ने समझा कि शायद ये कोई दूर के रिश्ते में राजा का भाई हो जो संन्यास लेकर साधुओं की तरह रह रहा हो!

सूचना मिलने पर राजा मुस्कुराया और साधु को भीतर बुलाकर अपने पास बैठा लिया।

साधु ने पूछा – कहो अनुज, क्या हाल-चाल हैं तुम्हारे?

“मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं भैया?”, राजा बोला।

साधु ने कहा- जिस महल में मैं रहता था, वह पुराना और जर्जर हो गया है। कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे 32 नौकर थे वे भी एक-एक करके चले गए। पाँचों रानियाँ भी वृद्ध हो गयीं और अब उनसे कोई काम नहीं होता…

यह सुनकर राजा ने साधु को 10 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया। साधु ने 10 सोने के सिक्के कम बताए।

तब राजा ने कहा, इस बार राज्य में सूखा पड़ा है, आप इतने से ही संतोष कर लें।

साधु बोला- मेरे साथ सात समंदर पार चलो वहां सोने की खदाने हैं। मेरे पैर पड़ते ही समुद्र सूख जाएगा… मेरे पैरों की शक्ति तो आप देख ही चुके हैं।

अब राजा ने साधु को 100 सोने के सिक्के देने का आदेश दिया।

साधु के जाने के बाद मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा, “क्षमा करियेगा राजन, लकिन जहाँ तक हम जानते हैं आपका कोई बड़ा भाई नहीं है, फिर आपने इस ठग को इतना इनाम क्यों दिया?”

राजन ने समझाया, “देखो,  भाग्य के दो पहलु होते हैं। राजा और रंक। इस नाते उसने मुझे भाई कहा।

जर्जर महल से उसका आशय उसके बूढ़े शरीर से था!!
32 नौकर उसके दांत थे
और 5 वृद्ध रानियाँ, उसकी 5 इन्द्रियां हैं।

समुद्र के बहाने उसने मुझे उलाहना दिया कि राजमहल में उसके पैर रखते ही मेरा राजकोष सूख गया… क्योंकि मैं उसे मात्र दस सिक्के दे रहा था जबकि मेरी हैसियत उसे सोने से तौल देने की है। इसीलिए उसकी बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर मैंने उसे सौ सिक्के दिए और कल से मैं उसे अपना सलाहकार नियुक्त करूँगा।

इस प्रसंग से हमें ये सीख मिलती है कि किसी भी व्यक्ति के बाहरी रंग रूप से उसकी बुद्धिमत्ता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता इसलिए हमें सिर्फ किसी ने खराब कपडे पहने हैं या वो देखने में अच्छा नहीं है; उसके बारे में गलत विचार नहीं बनाने चाहियें बल्कि उसकी आंतरिक प्रज्ञा का आदर करना चाहिय!
कहा भी है कि –
भेष देख मत भूलिय, पूछ लीजिये ज्ञान!
मोल करो तलवार की, पड़े रहन दो म्यान!!

काँच और हीरा

💎काँच और हीरा💎

एक राजा का दरबार लगा हुआ था। क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था!

पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी।
महाराज के सिंहासन के सामने एक शाही मेज थी और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं!
राज्य के पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि सभी दरबार मे बैठे थे और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे!

💎उसी समय एक व्यक्ति आया और उसने भी सभा में प्रवेश की अनुमति मांगी और उसे इजाजत प्रवेश गई!

उसने व्यक्ति ने कहा, ” मेरे पास दो वस्तुएं हैं! मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और अपनी वस्तुओं को दिखाता हूँ पर इन्हें कोई परख ही नहीं पाता – सब हार जाते हैं और मैं विजेता बनकर घूमते-घामते अब आपके नगर मे आया हूँ!”

राजा ने उत्सुकता से पूछा, “ऐसी कौन सी वस्तु है तुम्हारे पास?”

💎तो उसने झट से दोनों वस्तुए राजा के मेज पर रख दीं! वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान आकार, समान रुप रंग, समान प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था!

राजा ने कहा “ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं!”
तो उस व्यक्ति ने कहा, “हाँ दिखाई तो एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न!
इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा! “

“💎लेकिन रूप रंग सब एक है!”
इसलिए कोई आज तक परख नहीं पाया क़ि कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा!”

💎 आप में से भी कोइ परख कर बताये कि ये हीरा है और ये काँच! अगर आपकी परख खरी निकली तो मैं हार जाऊंगा और यह कीमती हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा!”

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी!इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से जीतता आया हूँ!”

राजा ने कहा “मैं तो नही परख सकूंगा!
दीवान भी बोले कि हम भी हिम्मत नहीं कर सकते क्योंकि दोनों बिल्कुल समान है!

💎 कोई भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था! हारने पर पैसे देने होंगे – इसका कोई सवाल नहीं था क्योंकि राजा के पास बहुत धन था!

राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी, इसका सबको भय था।
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई!
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा!
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो!
मैंने सब शर्त सुनी है और यह भी सुना है कि कोई उस वस्तु परख नहीं पा रहा है!एक अवसर मुझे भी दो!

वह एक आदमी के सहारे राजा के पास पहुंचा।
उसने राजा को बतलाया कि मैं तो जनम से अंधा हूं फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये!
जिससे मैं भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं!

और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही है!

राजा को लगा कि इसे अवसर देने में हर्ज ही क्या है?

राजा ने कहा क़ि ठीक है!

तो तब उस अंधे आदमी को दोनों चीजें छुआ दी गयी और पूछा गया कि इनमें कौन सा हीरा है और कौन सा काँच? यही तुम्हें परख कर बतलाना है!
उस आदमी ने एक क्षण में कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच!

जो आदमी इतने राज्यों में जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला “सही है, आपने ठीक पहचान लिया!धन्य हो आप!

उसने अपने वचन के मुताबिक घोषणा की कि यह हीरा मैं आपके राज्य की तिजोरी में दे रहा हूँ !”

सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला!

सभी लोगों ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच!

उस अंधे ने कहा कि यह तो बहुत ही सरल बात है मालिक! हम सब धूप में बैठे हैं! मैंने दोनों चीज़ों को छुआ – 💎जो ठंडा रहा वह हीरा और जो गरम हो गया वह काँच!

यह प्रसंग हमको भी प्रेरणा देता है कि *जीवन में पारखी बनने के लिए हमें शान्त सीतल रहना होगा!

☝🏻 अक्सर हमारे जीवन में भी देखने को मिलता है कि जो बात बात में गरम होकर उलझ जाये – वह व्यक्ति काँच है!
और….
*🌷जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे *💎वह व्यक्ति हीरा है!💎*

हर व्यक्ति के जीवन में शीतलता हो सकती है, अगर इन्सान के अन्दर चाहत हो तो आज भी ऐसे पारखी हैं जो कहते हैं कि शान्ति सम्भव है!
बस हमने शान्ति दिशा में एक कदम बढ़ाना है!
कहा भी है कि –
बहता था बहे जात था,
लोक वेद के साथ!
पैंढे में सद्गुरु मिले,
दीपक दीना हाथ!
दीपक दीना हाथ कर
वस्तु दई लखाय!
कोटि जनम का पंथ था,
पल में पहुंचा जाए!!
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बुरी स्मृतियाँ भुला दी जाएँ

बुरी स्मृतियाँ भुला दी जाएँ

दो भाई थे। परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे। बड़ा भाई कोई वस्तु लाता तो छोटे भाई तथा उसके परिवार के लिए भी अवश्य ही लाता, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता।

पर एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात बढ़ गई और छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था! दोनों के बीच दरार पड़ ही तो गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और कोई किसी से नहीं बोला। कई वर्ष बीत गये। मार्ग में आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते, छोटे भाई की कन्या का विवाह आया तो उसने सोचा बडे़ अंत में बडे़ ही हैं, जाकर मना लाना चाहिए।

वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा। बोला अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए।

पर बड़ा भाई न पसीजा, चलने से साफ मना कर दिया। छोटे भाई को दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाकर लाया जाए!
इधर विवाह के भी बहुत ही थोडे दिन रह गये थे। संबंधी आने लगे थे।

किसी ने कहा- उसका बडा भाई एक संत के पास नित्य जाता है और उनका कहना भी मानता है।
छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बात बताते हुए अपनी त्रुटि के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और प्रार्थना की कि “”आप किसी भी प्रकार मेरे भाई को मेरे यहां आने के लिए तैयार कर दे।””

दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने पूछा – तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है। तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो?

बड़ा भाई बोला- “मैं विवाह में सम्मिलित नही हो रहा। कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं।””

संत जी ने कहा जब सत्संग समाप्त हो जाए तो जरा मुझसे मिलते जाना।””
सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा तो उन्होंने पूछा- मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें क्या बतलाया गया था?

बडा भाई मौन! कहा कुछ याद नहीं पडता कौन सा विषय था?

संत ने कहा- अच्छी तरह याद करके बताओ।

लेकिन प्रयत्न करने पर भी उसे वह विषय याद नहीं आया।

संत बोले “देखो, मेरी बताई हुई अच्छी बात तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रही और छोटे भाई के कडवे बोल जो एक वर्ष पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे हैं? जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते तो तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे? और जब जीवन नहीं सुधारा तब सत्संग में आने का क्या लाभ? अतः कल से यहाँ मत आया करो।””

अब बडे़ भाई की आँखें खुली। अब उसने आत्म-चिंतन किया और देखा कि मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ। छोटों की बुराई भूल ही जाना चाहिए। इसी में बडप्पन है।

उसने संत के चरणों में सिर नवाते हुए कहा, मैं समझ गया गुरुदेव! अभी छोटे भाई के पास जाता हूँ, आज मैंने अपना गंतव्य पा लिया।””

रहीमदास जी ने भी कहा है कि –
छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात।
कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात।।
यानी कि बड़ों को क्षमा शोभा देती है और छोटों को उत्पात (बदमाशी)। अगर छोटे बदमाशी करें कोई बड़ी बात नहीं और बड़ों को इस बात पर क्षमा कर देना चाहिए। छोटे अगर उत्पात मचाएं तो उनका उत्पात भी छोटा ही होता है। जैसे यदि कोई कीड़ा (भृगु) अगर लात मारे भी तो उससे कोई हानि नहीं होती।
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श्री कृष्ण की वंशी अद्भुत

*श्री कृष्ण की वंशी अद्भुत*

भारत के महान संत स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने गए तो वहां किसी ने उनसे प्रश्न किया कि *”स्वामी जी, कहते हैं कि श्री कृष्ण की वंशी सुनकर गाएं दौड़ी चली आती थी। क्या यह संभव है?*”
स्वामी जी बोले, *”इसका जवाब फिर किसी दिन दूंगा।”*

एक दिन स्वामी जी सभा हाल में भाषण दे रहे थे। *जनता मंत्रमुग्ध हो सुन रही थी। स्वामी जी अचानक चुप हो गए व चुपचाप वहां से चले पड़े।*

सभी बिना कुछ बोले *उनके पीछे-पीछे सारे श्रोतागण भी चल पड़े ताकि भाषण का बाकी अंश सुन सकें।*

स्वामी जी एक ऊंची जगह खड़े हो गए और बोले, *आप में से किसी ने एक दिन पूछा था कि क्या श्री कृष्ण की वंशी सुनकर गाएं दौड़ी चली आती थीं?*

इसका जवाब आज दे रहा हूं।

*जब मुझ जैसे साधारण से मानव का अधूरा भाषण सुनने के लिए आप सब यहां तक आ गये!*
तो फिर *श्री कृष्ण जी तो सोलह कला संपूर्ण थे। उनकी वंशी सुनकर गायों का दौड़े चले आना तो स्वाभाविक ही था!इस में हो सकता है क्या?”*

इस प्रकार *उन सब श्रोताओं का संदेह दूर हो गया और श्रद्धा से सब का सिर झुक गया।*

यह वास्तविकता है कि महापुरुषों के प्रेम और विश्वास में वो ताकत है कि वो असंभव को भी सम्भव कर सकते हैं!

कहा भी है –
*मूकं करोति वाचालं, पङ्गुं लङ्घयते गिरिं।*
*यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥*
यानी जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं! लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं! उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ!

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छुपी हुई शक्तियां

💐💐छुपी हुई शक्तियां💐💐

एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी!
चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये।
सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं।

दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा, नहीं- नहीं, हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे।

उनकी बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा , “न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।”

सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक अन्य देवता ने कहा, क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव-मन की गहराइयों में छिपा दें।

चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर-उधर दौड़ता रहता है! मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा!

अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए और ऐसा ही किया गया!
मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया!
इसलिए कहा जाता है कि मानव मन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

इस कथानक का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर ही इतनी शक्तियां विद्यमान हैं।
इसलिय अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये! उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए।
हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये।
मीरा ने भी यही कहा कि-
बाहर धुंध फिरि में इसको, वह वस्तु घट भीतर पायो!
भाग बड़े मैं सद्गुरु पायो!!
जिन बडभागियों को सदगुरु के द्वारा अपने अन्दर जाने की विधी मिली है वे इसका अनवरत अभ्यास करें और अपने अन्दर का आनन्द लें !
यह कभी न भूलें कि – शांति संभव है!
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प्रभु ही हमारे राजा

*💐💐प्रभु ही हमारे राजा💐💐*

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा।राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ!क्या कभी मैं राजा साहब से बात कर पाऊँगा?
माँ हंसी और चुप रह गई।पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था।उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे।तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी।
संत ने कहा-अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है,तुम वहाँ चले जाओ,और मजदूरी करो।पर ध्यान रखना,वेतन न लेना।अर्थात् बदले में कुछ मांगना मत,निष्काम रहना।वह लड़का गया।वह दोगुनी मेहनत करता पर वेतन न लेता।
एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी।प्रबंधक से पूछा-यह लड़का कौन है,जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है?इसे आज अधिक मजदूरी देना।
प्रबंधक ने विनय की- महराज!इसका अजीब हाल है,दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है।पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता।कहता है मेरे घर का काम है।घर के काम की क्या मजदूरी लेनी?राजा ने उसे बुला कर कहा-बेटा!तूं मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तूं क्या चाहता है?

लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला-महाराज!आपके दर्शन हो गए,आपकी कृपा दृष्टि मिल गई,मुझे मेरी मजदूरी मिल गई।अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया।

*💐💐शिक्षा💐💐*

*संत महापुरुष कहते है कि भगवान ही राजा हैं। हम सभी भगवान के मजदूर हैं।भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है।संत ही मंत्री है।भक्ति ही राजपुत्री है।मोक्ष ही वह राज्य है।*

*हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं।वह लड़का सकाम कर्म करता,तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा।यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।*

*तुलसी विलम्ब न कीजिए,निश्चित भजिए राम,जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान।*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

*🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏*

अहंकार

*🔥अहंकार🔥*

एक दिन रामकृष्ण परमहंस किसी सन्त के साथ बैठे हुए थे। ठण्ड के दिन थे। सांयकाल हो गया था। तब सन्त ने ठण्ड से बचने के लिए कुछ लकड़ियां एकट्ठा कीं और धूनी जला दी। दोनों सन्त धर्म और अध्यात्म पर चर्चा कर रहे थे।

इनसे कुछ दूर एक गरीब व्यक्ति भी बैठा हुआ। उसे भी ठण्ड लगी तो उसने भी कुछ लकड़ियां एकट्ठा कर लीं। अब लकड़ी जलाने के लिए उसे आग की आवश्यकता थी। वह तुरन्त ही दोनों संतों के पास पहुंचा और धूनी से जलती हुई लकड़ी का एक टुकड़ा उठा लिया।

एक व्यक्ति ने सन्त द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया तो सन्त गुस्सा हो गए। वे उसे मारने लगे।

संत ने कहा कि *तू पूजा-पाठ नहीं करता है, भगवान का ध्यान नहीं करता, तेरी हिम्मत कैसे हुई, तूने मेरे द्वारा जलाई गई धूनी को छू लिया?*

रामकृष्ण परमहंस ये सब देखकर मुस्कुराने लगे।

जब संत ने परमहंसजी को प्रसन्न देखा तो उन्हें और गुस्सा आ गया। उन्होंने परमहंसजी से कहा, *‘आप इतना प्रसन्न क्यों हैं? ये व्यक्ति अपवित्र है, इसने गन्दे हाथों से मेरे द्वारा जलाई गई अग्नि को छू लिया है तो क्या मुझे गुस्सा नहीं होना चाहिए?’*

परमहंसजी ने कहा, *‘मुझे नहीं मालूम था कि कोई वस्तु छूने से अपवित्र हो जाती है। अभी आप ही कह रहे थे कि सभी व्यक्तियों में परमात्मा का वास है। और थोड़ी ही देर पश्चात् आप ये बात स्वयं ही भूल गए।’*

उन्होंने आगे कहा, *‘वास्तव में इसमें आपकी गलती नहीं है। आपका शत्रु आपके अन्दर ही है! वह है – आपका अहंकार।*

ध्यान रहे, *घमण्ड के कारण ही हमारा सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, इसीलिए हमें इससे बचना चाहिए। तभी हम असली मानव कहलाने के अधिकारी बन सकेंगे!*
इसलिए –
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
🌸🌸🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌸🌸

रौशनी की किरण

💐💐रौशनी की किरण💐💐

रोहित आठवीं कक्षा का छात्र था। वह बहुत आज्ञाकारी था, और हमेशा औरों की मदद के लिए तैयार रहता था। वह शहर के एक साधारण मोहल्ले में रहता था , जहाँ बिजली के खम्भे तो लगे थे पर उनपे लगी लाइट सालों से खराब थी और बार-बार कंप्लेंट करने पर भी कोई उन्हें ठीक नहीं करता था।

रोहित अक्सर सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को अँधेरे के कारण परेशान होते देखता , उसके दिल में आता कि वो कैसे इस समस्या को दूर करे। इसके लिए वो जब अपने माता-पिता या पड़ोसियों से कहता तो सब इसे सरकार और प्रशाशन की लापरवाही कह कर टाल देते।

ऐसे ही कुछ महीने और बीत गए फिर एक दिन रोहित कहीं से एक लम्बा सा बांस और बिजली का तार लेकर और अपने कुछ दोस्तों की मदद से उसे अपने घर के सामने गाड़कर उसपे एक बल्ब लगाने लगा। आस-पड़ोस के लोगों ने देखा तो पुछा , ” अरे तुम ये क्या कर रहे हो ?”

“मैं अपने घर के सामने एक बल्ब जलाने का प्रयास कर रहा हूँ ?” , रोहित बोला।

“अरे इससे क्या होगा , अगर तुम एक बल्ब लगा भी लोगे तो पुरे मोहल्ले में प्रकाश थोड़े ही फ़ैल जाएगा, आने जाने वालों को तब भी तो परेशानी उठानी ही पड़ेगी !” , पड़ोसियों ने सवाल उठाया।

रोहित बोला , ” आपकी बात सही है , पर ऐसा कर के मैं कम से कम अपने घर के सामने से जाने वाले लोगों को परेशानी से तो बचा ही पाउँगा। ” और ऐसा कहते हुए उसने एक बल्ब वहां टांग दिया।

रात को जब बल्ब जला तो बात पूरे मोहल्ले में फ़ैल गयी। किसी ने रोहित के इस कदम की खिल्ली उड़ाई तो किसी ने उसकी प्रशंशा की। एक-दो दिन बीते तो लोगों ने देखा की कुछ और घरों के सामने लोगों ने बल्ब टांग दिए हैं। फिर क्या था महीना बीतते-बीतते पूरा मोहल्ला प्रकाश से जगमग हो उठा। एक छोटे से लड़के के एक कदम ने इतना बड़ा बदलाव ला दिया था कि धीरे-धीरे पूरे शहर में ये बात फ़ैल गयी , अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से छापा और अंततः प्रशाशन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और मोहल्ले में स्ट्रीट-लाइट्स को ठीक करा दिया गया।

💐💐शिक्षा💐💐

मित्रों, कई बार हम बस इसलिए किसी अच्छे काम को करने में संकोच कर जाते हैं क्योंकि हमें उससे होने वाला बदलाव बहुत छोटा प्रतीत होता है। पर हकीकत में हमारा एक छोटा सा कदम एक बड़ी क्रांति का रूप लेने की ताकत रखता है। हमें वो काम करने से नहीं चूकना चाहिए जो हम कर सकते हैं। इस कहानी में भी अगर रोहित के उस प्रयास की वजह से पूरे मोहल्ले में रौशनी नहीं भी हो पाती तो भी उसका वो कदम उतना ही महान होता जितना की रौशनी हो जाने पर है। रोहित की तरह हमें भी बदलाव होने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए बल्कि, जैसा की गांधी जी ने कहा है , हमें खुद वो बदलाव बनना चाहिए जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं, तभी हम अँधेरे में रौशनी की किरण फैला सकते हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

विद्या का घमंड

*💐💐विद्या का घमंड💐💐

आज गंगा पार होने के लिए कई लोग एक नौका में बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी!मनमोहन भी उसमें सवार थे। मनमोहन जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है ?”

भोला- भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है इसका मुझे कुछ पता नहीं।”

मनमोहनजी ने शिक्षा का प्रदर्शन करते कहा, “तुम्हारी पाव भर जिंदगी पानी में गई।”

फिर मनमोहन जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ हुई तथा उन्होंने कैसे लडाई की ?”

नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो मनमोहन जी ने विजयीमुद्रा में कहा, “ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।”

फिर विद्या के मद में मनमोहन जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो ?”

अनपढ़ नाविक क्या कहे! उसने इशारे में ना कहा! तब मनमोहन जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”

तभी अचानक गंगा में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी और मनमोहनजी से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है?”

मनमोहन जी घभराहट में बोले “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है?”

नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा, “तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी।”

कुछ ही देर में नौका पलट गई। और मनमोहन जी बह गये!

यह समझना आवश्यक है कि विद्या वाद-विवाद के लिए नहीं है और ना ही दूसरों को नीचा दिखाने के लिए है।

लेकिन कभी-कभी ज्ञान के अभिमान में कुछ लोग इस बात को भूल जाते हैं और दूसरों का अपमान कर बैठते हैं।

याद रखिये शास्त्रों का ज्ञान समस्याओं के समाधान में प्रयोग होना चाहिए शस्त्र बना कर हिंसा करने के लिए नहीं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

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