रावण, विभीषण व कुंभकर्ण

रावण, विभीषण व कुंभकर्ण

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जब हम ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, हमें उस ज्ञान पर मान हो जाता है और हम अहंकार, दंभ से ग्रस्त हो जाते हैं।
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भौतिक शरीर तीन गुणों से संचालित होता है और उसके कर्म इन्हीं तीन के संतुलन – असंतुलन से निर्धारित होते हैं।
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ज्ञान के कारण अहंकार होने पर हम रावण बन जाते हैं।
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विभीषण और कुंभकरण यह दोनों हमारे अंतर्मन की अवस्थाएं हैं।
अहंकार से ग्रस्त होकर हम जब भी कोई कदम उठाते हैं तो हमारे भीतर का ..+विभीषण हमें बार-बार आगाह करता है। तमोगुण की अधिकता के कारण हमारा अहंकार इतना प्रभावी हो जाता है कि वह इस विभीषण को बलपूर्वक चुप कराता रहता है और विभीषण फिर भी न माने तो हमारा अहंकार उसे लात मार कर निकाल देता है।
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दूसरी और हमारे ही अंतर्मन में एक कुंभकरण भी है जो हमारे इस रवैये से क्षुब्ध एवं निराश होकर निद्रा अवस्था में चला जाता है अर्थात निष्क्रिय हो जाता है और हमें अच्छे बुरे का भेद समझाना बंद कर देता है।
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विभीषण, कुंभकरण और रावण यह हमारे भीतर व्याप्त “सत -रज – तम ” के संतुलन और असंतुलन से होने वाली अवस्थाएं हैं।

अविद्या

अविद्या

एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा की बीरबल यह अविद्या क्या है ?

बीरबल ने बोला कि आप मुझे 4 दिनकी छुट्टी दे दो फिर मैं आपको बताऊंगा !

अकबर राजी हो गया और उसने चार दिनों की छुट्टी दे दी !

बीरबल मोची के पास गया और बोला कि भाई जूती बना दो,मोची ने नाप पूछी तो बीरबल ने बोला भैया ये नाप वाप कुछ नहीं। डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी बना दो,और इसमें हीरे जवाहरात जड देना । सोने और चांदी के तारों से सिलाई कर देना और हाँ पैसे वैसे चिंता मत करना जितना मांगोगे उतना मिलेगा।

तो मोची ने भी कहा ठीक है भैया तीसरे दिन ले लेना !

तीसरे दिन जूती मिली तब पारितोषिक देने के पहले बीरबल ने उस मोची से एक ठोस आश्वासन ले लिया कि वह किसी भी हालात में इस जूती का कभी भी जिक्र नहीं करेगा यानि हर हालात में अनजान बना रहेगा ।

अब बीरबल ने एक जूती अपने पास रख ली और दूसरी मस्जिद में फेंक दी । जब सुबह मौलवी जी नमाज पढ़ने (बाँग देने ) के लिए मस्जिद गए तो मौलवी को वो जूती वहाँ पर मिली।

मौलवी जी ने सोचा यह जूती किसी इंसान की तो हो ही नहीं सकती जरूर अल्लाह मियांनमाज पढ़ने आया होंगे और उसकी छूट गई होगी।

तो उसने वह जूती अपने सर पर रखी, मत्थे में लगाई और खूब जूती को चाटा ।

क्यों ?

क्योंकि वह जूती अल्लाह की थी ना ।

वहां मौजूद सभी लोगों को दिखाया सब लोग बोलने लगे कि हां भाई यह जूती तो अल्लाह की रह गई उन्होंने भी उसको सर पर रखा और खूब चाटा।

यह बात अकबर तक गई।

अकबर ने बोला, मुझे भी दिखाओ ।

अकबर ने देखा और बोला यह तो अल्लाह की ही जूती है।

उसने भी उसे खूब चाटा, सर पर रखा और बोला इसे मस्जिद में ही अच्छी तरह अच्छे स्थान पर रख दो !

बीरबल की छुट्टी समाप्त हुई, वह आया बादशाह को सलाम ठोका और उतरा हुआ मुंह लेकर खड़ा हो गया।

अब अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या हो गया मुँह क्यों 10 कोने का बना रखा है।

तो बीरबल ने कहा राजासाहब हमारे यहां चोरी हो गई ।

अकबर बोला – क्या चोरी हो गया ?

बीरबल ने उत्तर दिया – हमारे परदादा की जूती थी चोर एक जूती उठा ले गया । एक बची हैः

अकबर ने पूछा कि क्या एक जूती तुम्हारे पास ही है ?

बीरबल ने कहा – जी मेरे पास ही है ।उसने वह जूती अकबर को दिखाई । अकबर का माथा ठनका और उसने मस्जिद से दूसरी जूती मंगाई और बोला *या अल्लाह मैंने तो सोचा कि यह जूती अल्लाह की है मैंने तो इसे चाट चाट के चिकनी बना डाली

बीरबल ने कहा राजा साहब यही है अविद्या ।
पता कुछ भी नहीं और भेड़ चाल में चले जा रहे है।

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छोटी सी बात

छोटी सी बात

रामू अपने काम में बहुत होशियार होने के बावजूद बड़ा ही आलसी था। जब देखो आलस के मारे सोता रहता था। उसकी इस आदत से उसकी पत्नी चंदा बड़ी दुखी थी। वह अकसर उसे समझाती, “तुम अपने हर काम में इतनी देर करते हो, तभी तो आज तक तुम्हारे पास एक दुकान तक नहीं है। मुझे तो डर है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे आलसीपन की वजह से भूखे मरने की नौबत आ जाए।”

एक दिन रामू और चंदा में झगड़ा हुआ तो रामू गुस्से से बोला, “मैं आज ही शहर जाकर कोई काम ढूंढूगा और एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा, देखना। फिर मेरे पास आलीशान मकान-दुकान सब कुछ होगा। लोग तब मेरे जैसा बनना चाहेंगे।”

सच में उस दिन रामू ने जो कहा वही किया। वह घर छोड़कर स्टेशन की तरफ चल दिया। वहां उसने टिकट लिया। तभी उसे सामने से एक पूरी-छोले बेचने वाला नजर आया। उसके मुंह में पानी आ गया। उसने पूरी-छोले खरीदे और जमकर खाया। पेट भरने के बाद उसे नींद सताने लगी। वहीं अपनी गठरी सिर के नीचे दबाकर वह खर्राटे भरने लगा।

ट्रेन कब आई और कब चली गई, रामू को कुछ पता नहीं चला। तभी मनकू काका उधर से गुजरे। उन्होंने रामू को सोते देखा। उन्होंने जाकर चंदा को बताया। चंदा स्टेशन पर पहुंची और रामू को जगाकर बोली, “काश, तुम बड़े बोल न बोलते।” नींद का मारा रामू अब भी कुछ समझ नहीं पाया। वह पूछने लगा, “क्या ट्रेन आ गई?”

उसकी बात सुनकर मनकू काका बोले, “चंदा, इसे कुछ कहने-सुनाने से तो अच्छा है, तुम ईश्वर से इसके लिए प्रार्थना करो कि यह आलस्य छोड़ दे। यह नहीं समझ पा रहा कि आलस्य घुन की तरह जीवन को खोखला कर देता है। जब पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।”

रामू ने कहा, “काका, मैं खुद बदलना चाहता हूं, लेकिन पता नहीं मुझे क्या हो जाता है। मुझे उस समय ध्यान नहीं रहता कि क्या ठीक है और क्या गलत, जब कुछ करने का मौका आता है तब!”

काका ने समझाया, “यह भी आदत है। इसे खत्म करने के लिए भी खुद से थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़ेगी। लोहे की सलाख टेढ़ी हो जाए, तो उसे आग में डालकर ठोकना-पीटना पड़ता है। तुम भी ऐसा ही करो। तुम्हारी जीत होगी। बहुत से लोगों ने ऐसा किया है । इसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई। सोचो, पक्का इरादा करो, अपनाओ और सब हो जाएगा। छोटी-सी बात है यह।”

रामू ने काका की बात मानी। छोटी-छोटी बातों पर काम किया और जो चाहा उसे पा लिया।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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गांव- में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है!

गांव- में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है!

वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है।

लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है।

बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है।

यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल- जमा करने में लगे रहते हैं और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।
यह सच ही कहा है कि –
पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता।
जो कर्म को समझता है, उसे धर्म को समझने की जरूरत नहीं पड़ती।

संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या अनेक हो सकते हैं, लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल और केवल हम स्वयं ही होते हैं!

इसलिए
उसकी खोज करें जो हमारे साथ जाना है, उसे हासिल करने में ही समझदारी है।

💐💐ऋण मुक्ति💐💐

💐💐ऋण मुक्ति💐💐

एक धर्मशाला में पति-पत्नी अपने छोटे-से नन्हें-मुन्ने बच्चे के साथ रुके। धर्मशाला कच्ची थी। दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे-से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये। वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा नाग कुण्डली मारकर फन फैलाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के-बक्के रह गये। बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग के फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है।

माँ चीख उठी ,
बाप चिल्लायाः-

“बचाओ… बचाओ… हमारे लाड़ले को बचाओ।”
लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँट गाड़ी पर बोझा ढोने का धंधा करता था।

वह बोलाः “मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाय और बच्चे को चोट लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ?”

पुत्र के आगे विषधर बैठा है ! ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ-बाप इनकार करेगे?
वह सहमत हो गये और माँ बोलीः “भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो,अगर गलती से बच्चे को चोट लग जायेगी तो हम कुछ नहीं कहेंगे।”

ऊँटवाले ने निशाना मारा। साँप जख्मी होकर गिर पड़ा, मूर्च्छित हो गया। लोगों ने सोचा कि साँप मर गया है। उन्होंने उसको उठाकर बाड़ में फेंक दिया।
रात हो गयी। वह ऊँटवाला उसी धर्मशाला में अपनी ऊँटगाड़ी पर सो गया।
रात में ठंडी हवा चली। मूर्च्छित साँप सचेतन हो गया और आकर ऊँटवाले के पैर में डसकर चला गया। सुबह लोग देखते हैं तो ऊँटवाला मरा हुआ था।
दैवयोग से सर्पविद्या जानने वाला एक आदमी वहाँ ठहरा हुआ था। वह बोलाः “साँप को यहाँ बुलवाकर जहर को वापस खिंचवाने की विद्या मैं जानता हूँ। यहाँ कोई आठ-दस साल का निर्दोष बच्चा हो तो उसके चित्त में साँप के सूक्ष्म शरीर को बुला दूँ और वार्तालाप करा दूँ।
गाँव में से आठ-दस साल का बच्चा लाया गया। उसने उस बच्चे में साँप के जीव को बुलाया।

उससे पूछा गया – “इस ऊँटवाले को तूने काटा है ?” बच्चे में मौजूद जीव ने कहा – “हाँ।”

फिर पूछा कि ,- “इस बेचारे ऊँट वाले को क्यों काटा?”

बच्चे के द्वारा वह साँप बोलने लगाः “मैं निर्दोष था। मैंने इसका कुछ बिगाड़ा नहीं था। इसने मुझे निशाना बनाया तो मैं क्यों इससे बदला न लूँ?”

वह बच्चा तुम पर मिट्टी डाल रहा था उसको तो तुमने कुछ नहीं किया !”
बालक रूपी साँप ने कहा- ” बच्चा तो मेरा तीन जन्म पहले का लेनदार है।
तीन जन्म पहले मैं भी मनुष्य था, वह भी मनुष्य था। मैंने उससे तीन सौ रुपये लिए थे लेकिन वापस नहीं दे पाया। अभी तो देने की क्षमता भी नहीं है। ऐसी भद्दी योनियों में भटकना पड़ रहा है,आज संयोगवश वह सामने आ गया तो मैं अपना फन झुका -झुकाकर उससे माफी मांग रहा था। उसकी आत्मा जागृत हुई तो धूल की मुट्ठियाँ फेंक-फेंककर वह मुझे फटकार दे रहा था कि “लानत है तुझे ! कर्जा नहीं चुका सका….” उसकी वह फटकार सहते-सहते मैं अपना ऋण अदा कर रहा था।

हमारे लेन-देन के बीच टपकने वाला वह ऊँट वाला कौन होता है? मैंने इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था फिर भी इसने मुझ पर निशाना मारा। मैंने इसका बदल लिया।”

सर्प-विद्या जाननेवाले ने साँप को समझाया, “देखो, तुम हमारा इतना कहना मानों, इसका जहर खींच लो।उस सर्प ने कहा – “मैं तुम्हारा कहना मानूँ तो तुम भी मेरा कहना मानो। मेरी तो वैर लेने की योनि है। और कुछ नहीं तो न सही,मुझे यह ऊँटवाला पाँच सौ रुपये देवे तो अभी इसका जहर खींच लूँ। उस बच्चे से तीन जन्म पूर्व मैंने तीन सौ रुपये लिये थे, दो जन्म और बीत गये, उसके सूद के दौ सौ मिलाकर कुल पाँच सौ लौटाने हैं।
“किसी सज्जन ने पाँच सौ रूपये उस बच्चे के माँ-बाप को दे दिये। साँप का जीव वापस अपनी देह में गया, वहाँ से सरकता हुआ मरे हुए ऊँटवाले के पास आया और जहर वापस खींच लिया। ऊँटवाला जिंदा हो गया।

इस कथा से स्पष्ट होता है कि इतना व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए कि सिर पर कर्जा चढ़ाकर मरना पड़े और उसे चुकाने के लिए फन झुकाना पड़े, मिट्टी से फटकार सहनी पड़े।

_जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबंध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को संतुष्ट करें। अपने आत्मा- परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करें।।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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हृदय में भगवान

हृदय में भगवान

यह घटना जयपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है, जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। उनके द्वारा बताई प्रभु कृपा की कहानी के अनुसार:-

एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके हृदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है।
मैंने अपने साथी डाक्टर से विचार करने के बाद उस दंपत्ति से कहा – 30% संभावना है बचने की ! दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी, नहीं तो बच्ची के पास सिर्फ तीन महीने का समय है !

माता पिता भावुक हो कर बोले, “डाक्टर साहब ! इकलौती बिटिया है। ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा नहीं है,
मैंने अन्य कोई विकल्प के लिए मना कर दिया
दंपति ने कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये।”

सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया। बच्ची मुझ से बहुत घुलमिल चुकी थी, बहुत प्यारी बातें करती थी। उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती, बेटी घबराना नहीं। भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं। वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।

सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा, “बेटी ! चिन्ता न करना, ऑपरेशन के बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे।” बच्ची ने कहा, “डाक्टर अंकल मैं बिलकुल नहीं डर रही क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं, पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे तो देखकर बताना भगवान कैसे दिखते हैं ?” मै उसकी बात पर मुस्कुरा उठा।

ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता, बच्ची को बचाना असंभव है, दिल में खून का एक कतरा भी नहीं आ रहा था। निराश होकर मैंने अपनी साथी डाक्टर से वापिस दिल को स्टिच करने का आदेश दिया।

तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड़ कर प्रार्थना करने लगा, “हे ईश्वर ! मेरा सारा अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए।”

मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी। इसी बीच मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे कोहनी मारी। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया यह देखकर कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया।

मेरे 60 साल के जीवन काल में ऐसा पहली बार हुआ था। आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया। होश में आने पर मैंने बच्ची से कहा, “बेटा ! हृदय में भगवान दिखे तो नहीं पर यह अनुभव हो गया कि वे हृदय में मौजूद हर पल रहते हैं।

इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू किया। मैं यह अनुरोध करता हूँ कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए।
हे परम् पिता तुम ही- सुधि ले रहे जन जन की।
कुछ कहने से पहले ही – सब जानते हो मन की।।

बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक अपने आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।

इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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💐💐भाईयों का प्रेम💐💐

💐💐भाईयों का प्रेम💐💐

दो भाई थे । आपस में बहुत प्यार था। खेत अलग-अलग थे..आजु बाजू में। बड़ा भाई शादीशुदा था…छोटा अकेला।

एक बार खेती बहुत अच्छी हुई..अच्छी फ़सल हुई। अपने खेत में काम करते करते बड़े भाई ने बगल के खेत में काम करते छोटे भाई को खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया..!!

उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा..खेती तो अच्छी हुई है…इस बार अनाज भी बहुत हुआ है… पर.. मैं तो अकेला हूँ, बड़े भाई की तो गृहस्थी है..पूरा परिवार है..मेरे लिए तो मेरे ये अनाज जरुरत से ज्यादा है..भैया के साथ तो भाभी बच्चे है..उन्हें जरुरत ज्यादा है..!!

ऐसा विचारकर वह अपने 10 बोरे अनाज..बड़े भाई के अनाज की ढेर में डाल देता है..!! तब तक बड़ा भाई भोजन करके आता है और उसके आते ही छोटा भाई भोजन के लिए चला जाता है..।

छोटे भाई के जाते ही वह बड़ा भाई विचारता है कि..मेरा गृहस्थ जीवन तो अच्छे से चल रहा है…छोटे भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है… उसे अभी जिम्मेदारिया सम्हालनी है…!! मै इतने अनाज का क्या करूँगा…ऐसा विचारकर उसने अपने ढ़ेर से 10 बोरे अनाज
छोटे भाई के ढ़ेर में डाल दिया…

दोनों भाईयों के मन में हर्ष था…!!अनाज उतना का उतना ही था..पर….अपनत्व स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था…।

सोच अच्छी रखेंगें तो प्रेम अपने आप बढेगा..!! अगर ऐसा प्रेम भाई भाई में हुआ तो दुनिया की कोई भी ताकत आपके परिवार को तोड़ नही सकती…और ऐसा परिवार ही धरती का स्वर्ग बन जाएगा..।

जब तक रिश्ते में दोनो ओर से देने की भावना बनी रहेगी रिश्ता बना रहेगा, जिस दिन भी किसी एक मे लेने की भावना आ गयी, रिश्तों में दूरी बढ़ने लगेगी। ज़रूरत, इच्छा, चाहत—हम इन भावों के साथ नहीं जन्मे होते है, जब हम बड़े होने लगते हैं तो ये तो हमें सामाजिक परिवेश की परिस्थितियां देती हैं। जब सांसारिक परिस्थितियाँ हमारे सपनों की चंचल-सी दुनिया के साथ लड़ बैठती हैं तो हम उस मंथन में रस्सी-से बन जाते हैं। हम उस दुपट्टे से हो जाते हैं जिसकी हर सलवट में कहीं अधूरे सच तो कहीं अप्राकृतिक भाव छिपे होते हैं। स्वार्थी बन जाते है।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

💐💐पांच मिनट💐💐

💐💐पांच मिनट💐💐

एक बार एक व्यक्ति को रास्ते में यमराज मिल गये वो व्यक्ति उन्हें पहचान नहीं सका। यमराज ने पीने के लिए व्यक्ति से पानी माँगा, बिना एक क्षण गंवाए उसने पानी पिला दिया। पानी पीने के बाद यमराज ने बताया कि वो उसके प्राण लेने आये हैं लेकिन चूँकि तुमने मेरी प्यास बुझाई है इसलिए मैं तुम्हें अपनी किस्मत बदलने का एक मौका देता हूँ।

यह कहकर यमराज ने एक डायरी देकर उस आदमी से कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है।

इसमें तुम जो भी लिखोगे वही हो जाएगा लेकिन ध्यान रहे केवल 5 मिनट।

उस व्यक्ति ने डायरी खोलकर देखा तो उसने देखा कि पहले पेज पर लिखा था कि उसके पड़ोसी की लॉटरी निकलने वाली है और वह करोड़पति बनने वाला है।

उसने वहां लिख दिया कि उसके पड़ोसी की लॉटरी न निकले।

अगले पेज पर लिखा था कि उसका एक दोस्त चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाला है, तो उसने लिख दिया कि उसका दोस्त चुनाव हार जाए।

इस तरह, वह पेज पलटता रहा और अंत में उसे अपना पेज दिखाई दिया।

जैसे ही उसने कुछ लिखने के लिए अपना पेन उठाया यमराज ने उस व्यक्ति के हाथ से डायरी ले ली और कहा वत्स तुम्हारा पांच मिनट का समय पूरा हुआ, अब कुछ नहीं हो सकता।

तुमने अपना पूरा समय दूसरों का बुरा करने में व्यतीत कर दिया और अपना जीवन खतरे में डाल दिया।

अंतत: तुम्हारा अंत निश्चित है। यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत पछताया लेकिन सुनहरा मौका उसके हाथ से निकल चुका था।

💐💐शिक्षा💐💐
यदि ईश्वर ने आपको कोई शक्ति प्रदान की है तो कभी किसी का बुरा न सोचे, और न ही बुरा करें। दूसरों का भला करने वाला सदा सुखी रहता है और ईश्वर की कृपा सदा उस पर बनी रहती है..!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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हमारे कभी न खत्म होने वाले काम

हमारे कभी न खत्म होने वाले काम
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एक दिन एक व्यक्ति पहाड़ पर घूमने गया जहाँ एक साध्वी ध्यान कर रही थी। उसने उन्हें दंडवत किया और उनसे पूछा “इतनी एकांत जगह पर आप यहां अकेले क्या कर रही हैं?”🌼

साध्वी ने जवाब दिया:- यहां मेरे पास बहुत काम है।”
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“यहां आपके पास काम कैसे हो सकता है?
मुझे यहां आस-पास कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है?”
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“मुझे दो बाज और दो चील को प्रशिक्षित करना है, दो खरगोशों को सिखाना है, एक साँप को अनुशासित करना है, एक गधे को प्रेरित करना है और एक शेर को वश में करना है।”
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“और, वे कहाँ गए हैं कि मैं,उन्हें देख नहीं पा रहा?”
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“ये सभी मेरे भीतर हैं।”
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बाज हर चीज पर पैनी नजर रखते हैं मेरी दोनों आँखें जो मेरे दोनों बाज हैं, उन्हें सिखाना है कि जो कुछ भी मेरे सामने है, अच्छा या बुरा, उनमें से केवल अच्छी चीजों को देखना है। मेरे दोनों हाथ मेरी दो चील हैं जो अपने पंजों से चोट पहुँचा सकते हैं और विनाश कर सकते हैं, मुझे उन्हें किसी को भी चोट न पहुँचाने के लिए प्रशिक्षित करना है।मेरे दोनों पैर मेरे दो खरगोश हैं। वे स्वेच्छा से भ्रमण करना चाहते हैं और कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं करना चाहते हैं। मुझे उन्हें दुख या ठोकर लगने पर भी शांत रहना सिखाना है।
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गधा हमेशा थका हुआ, जिद्दी होता है और हर बार चलने पर बोझ नहीं उठाना चाहता। वह मेरा शरीर है। मुझे इससे मेहनती बनना है।मेरी जुबान साँप के समान है। साँप को वश में करना सबसे कठिन है। यद्यपि यह 32 दाँत स्वरूप सलाखों के साथ एक मजबूत पिंजरे में बंद है, फिर भी यह हमेशा किसी को भी डंक मारने, काटने और जहर उगलने को तैयार रहती है। मुझे इसे अनुशासित करना है।मेरे पास एक शेर भी है। ओह, कितना गर्व, व्यर्थ, वह सोचता है कि “वह राजा है।” मुझे उसे वश में करना है। और वह मेरा अहंकार है।
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मेरे पास कितने काम हैं, जिन्हें खत्म करने
में शायद मेरा जीवन ही लग जाए।
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बहुत फर्क होता है-
किसी को “जानने और समझने में”
जानता वो है “जो साथ होता है”
और समझता वो है “जो पास होता है”।
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समर्पण का भाव

समर्पण का भाव

एक बार एक बेहद ख़ूबसूरत महिला समुद्र के किनारे रेत पर टहल रही थी।
समुद्र की लहरों के साथ कोई एक बहुत चमकदार पत्थर छोर पर आ गया।
महिला ने वह नायाब सा दिखने वाला पत्थर उठा लिया।
वह पत्थर नहीं असली हीरा था।
महिला ने चुपचाप उसे अपने पर्स में रख लिया।
लेकिन उसके हाव-भाव पर बहुत फ़र्क नहीं पड़ा।
पास में खड़ा एक बूढ़ा व्यक्ति बडे़ ही कौतूहल से यह सब देख रहा था।

अचानक वह अपनी जगह से उठा और उस महिला की ओर बढ़ने लगा।
महिला के पास जाकर उस बूढ़े व्यक्ति ने उसके सामने हाथ फैलाये और बोला :—-
मैंने पिछले चार दिनों से कुछ भी नहीं खाया है।
क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो???
उस महिला ने तुरंत अपना पर्स खोला और कुछ खाने की चीज ढूँढ़ने लगी।
उसने देखा बूढ़े की नज़र उस पत्थर पर है जिसे कुछ समय पहले उसने समुद्र तट पर रेत में पड़ा हुआ पाया था।

महिला को पूरी कहानी समझ में आ गयी।
उसने झट से वह पत्थर निकाला और उस बूढ़े को दे दिया।
बूढ़ा सोचने लगा कि कोई ऐसी क़ीमती चीज़ भला इतनी आसानी से कैसे दे सकता है???
बूढ़े ने गौर से उस पत्थर को देखा वह असली हीरा था
बूढ़ा सोच में पड़ गया।

इतने में औरत पलट कर वापस अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुकी थी।
बूढ़े ने उस औरत से पूछा :— क्या तुम जानती हो कि
यह एक बेशकीमती हीरा है???
महिला ने जवाब देते हुए कहा :—- जी हाँ और मुझे यक़ीन है कि यह हीरा ही है।
लेकिन मेरी खुशी इस हीरे में नहीं है बल्कि मेरे भीतर है।
समुद्र की लहरों की तरह ही दौलत और शोहरत आती जाती रहती है।

अगर अपनी खुशी इनसे जोड़ेंगे तो कभी खुश नहीं रह सकते।बूढ़े व्यक्ति ने हीरा उस महिला को वापस कर दिया और कहा कि यह हीरा तुम रखो और
मुझे इससे कई गुना ज्यादा क़ीमती वह समर्पण का भाव दे दो
जिसकी वजह से तुमने इतनी आसानी से यह हीरा मुझे दे दिया!!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

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