परिवार और दोस्त

परिवार और दोस्त

जंगली भैंसों का एक झुण्ड जंगल में घूम रहा था।
तभी एक बछड़े ने पूछा, पिता जी, क्या इस जंगल में ऐसी कोई चीज है जिससे डरने की ज़रुरत है?

बस शेरों से सावधान रहना हा, भैंसा बोला।

हाँ , मैंने भी सुना है कि शेर बड़े खतरनाक होते हैं।

अगर कभी मुझे शेर दिखा तो मैं जितना हो सके उतनी तेजी से दौड़ता हुआ भाग जाऊँगा! बछड़ा बोला।

नहीं.. इससे बुरा तो तुम कुछ कर ही नहीं सकते! भैंसा बोला।

बछड़े को ये बात कुछ अजीब लगी! वह बोला, क्यों ? वे खतरनाक होते हैं? मुझे मार सकते हैं तो भला; मैं भाग कर अपनी जान क्यों ना बचाऊं?

भैंसा समझाने लगा, अगर तुम भागोगे तो शेर तुम्हारा पीछा करेंगे। भागते समय वे तुम्हारी पीठ पर आसानी से हमला कर सकते हैं और तुम्हे नीचे गिरा सकते हैं और एक बार तुम गिर गए तो मौत पक्की समझो।

तो… तो। .. ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए ? बछड़े ने घबराहट में पूछा!

अगर तुम कभी भी शेर को देखो… तो अपनी जगह डट कर खड़े हो जाओ और ये दिखाओ की तुम जरा भी डरे हुए नहीं हो। अगर वो ना जाएं तो देखना?

उसे अपनी तेज सींघें दिखाओ और खुरों को जमीन पर पटको।अगर तब भी शेर ना जाएं तो धीरे -धीरे उसकी तरफ बढ़ो और अंत में तेजी से अपनी पूरी ताकत के साथ उस पर हमला कर दो। भैंसे ने गंभीरता से समझाया।

पर ये तो पागलपन है!ऐसा करने में तो बहुत खतरा है।अगर शेर ने पलट कर मुझ पर हमला कर दिया तो ?? बछड़ा नाराज होते हुए बोला।

बेटे… अपने चारों तरफ देखो.. क्या दिखाई देता है? भैंसे ने कहा।*

बछड़ा घूम -घूम कर देखने लगा ! उसके चारों तरफ ताकत वर भैंसों का बड़ा सा झुण्ड था।अगर कभी भी तुम्हे डर लगे.. तो ये याद रखो कि हम सब तुम्हारे साथ हैं।

अगर तुम मुसीबत का सामना करने की बजाये , भाग खड़े होते हो तो हम तुम्हे नहीं बचा पाएंगे।

लेकिन अगर तुम साहस दिखाते हो और मुसीबत से लड़ते हो तो हम मदद के लिए ठीक तुम्हारे पीछे खड़े होंगे।

बछड़े ने गहरी सांस ली और अपने पिता को इस सीख के लिए धन्यवाद दिया।

हम सभी की ज़िन्दगी में भी शेर हैं! कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनसे हम डरते हैं! जो हमें भागने पर; हार मानने पर मजबूर करना चाहती हैं।

लेकिन अगर हम उन समस्याओं से भागते हैं तो वे हमारा पीछा करती हैं और हमारा जीना मुश्किल कर देती हैं।

इसलिए
उन मुसीबतों का सामना करिये!
उन्हें दिखाइए कि आप उनसे डरते नहीं हैं!

दिखाइए कि आप सचमुच कितने ताकतवर हैं और पूरे साहस और हिम्मत के साथ उल्टा उनकी तरफ टूट पड़िये!

और जब आप ऐसा करेंगे तो आप पाएंगे कि *आपके अपने दोस्त पूरी ताकत से आपके पीछे खड़े हैं!

बुजुर्गों का मन

💐💐बुजुर्गों का मन💐💐

 मांजी बहुत तेज बारिश हो रही है आप खिड़की बंद कर दीजिए बारिश की बूंदे आपको बीमार कर सकती हैं। प्रिशा अपनी सास मिथलेश जी से बोली।

नहीं बहू !! बूंदे यहां नहीं आ रही। तुम्हारे बाबूजी को बहुत पसंद थी बारिश। घंटो बैठे रहते थे खिड़की पर हम दोनों। साथ में चलता था पकोड़े और चाय का दौर। सच क्या दिन थे वो भी अब तो ना उनका साथ रहा ना पकोड़े झेलने वाला जिस्म! मिथलेश जी ठंडी आह भरकर बोली।

प्रिशा ने पकोडों की बात होने पर मिथलेश जी की आंखों में जो चमक देखी उससे प्रिशा की आंख भर आई। सच में बुढ़ापा ऐसा होता है जब जीभ तो बच्चों की तरह मचलती पर शरीर कुछ भी ऐसा वैसा खाने की इजाज़त नहीं देता है। मांजी को शूगर और ब्लड प्रेशर की बीमारी के कारण डाक्टर ने तला हुआ और मसालेदार खाना मना किया है।

मिथलेश जी अभी दो महीने पहले ही पति के मरने के बाद गांव का घर छोड़ बेटे बहु के पास आई है। यहां बहू प्रिशा बेटा तरुण पोता पोती सब हैं। बेटे बहू ने बाबूजी के ना रहने पर उन्हें अकेले नहीं रहने दिया तो मजबूरी में उन्हें शहर आना पड़ा था हालाकि उनके मन में शंका थी बहू कैसा व्यवहार करेगी पर बहू प्रिशा बहुत ध्यान रखती है सास का। पोते-पोती भी आगे पीछे घूमते रहते तो मिथलेश जी का मन लगा रहता है। पर इस उम्र में जीवनसाथी की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता क्योंकि इस उम्र में रिश्ता शरीर से नहीं दिल से बंधा होता है।

“तरुण !! मांजी बहुत उदास हो जाती हैं कभी-कभी मुझे समझ में नहीं आता उन्हें कैसे खुश रखूं!” प्रिशा अपने पति से बोली।

“प्रिशा !! अभी बाबूजी को गए ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है, उन्हें संभलने का मौका दो धीरे धीरे वो यहां के माहौल में रम जाएंगी! तरुण बोला।

प्रिशा हर संभव कोशिश करती मांजी को खुश रखने की।

मांजी चलिए पार्क चलते हैं! एक दिन प्रिशा बोली।

अरे नहीं बेटा !! मैं क्या करूंगी वहां जाओ तुम घूम आओ! मिथलेश जी बोली।

मांजी चलिए तो सही !! मिथलेश जी का हाथ पकड़ती हुई प्रिशा बोली।

पार्क में जा मिथलेश जी एक बेंच पर बैठ गई और बच्चों को खेलते देखने लगी।

दादी आप भी खेलो ना हमारे साथ! बैडमिंटन खेलती उनकी पोती पलक बोली।

अरे मैं कहां ये खेल सकती! मिथलेश जी बोली जबकि उनकी आंखों की चमक बता रही थी वो खेलना चाहती हैं पर माहौल को देख झिझक रही।

आओ ना मांजी !! हम दोनों खेलते हैं मुझे भी नहीं आता ये खेल इसलिए बच्चों के साथ तो खेल नहीं सकती! प्रिशा जानबूझ के झूठ बोल गई।

सास बहू ने खेलना शुरू किया। प्रिशा जान बूझ कर मांजी से हारने लगी जिससे मांजी खुश हो गई।

अरे बहू तुझमें तो जान ही नहीं है एक चिड़िया ( शटल कॉक) नहीं उछाल सकती! मांजी हंसते हुए बोली।

मांजी मुझे क्या पता था आपको इतना अच्छा खेलना आता है! प्रिशा मुंह बना बोली।

अच्छा अब घर चलो मैं थक गई और लगता है बारिश भी होने वाली है! मिथलेश जी बोली।सबके घर पहुंचते पहुंचते बारिश शुरू हो गई। तभी तरुण भी आ गए ।

प्रिशा !! आज तो गरम चाय और पकोड़े हो जाएं देखो कितनी अच्छी बारिश है! तरुण बोले। पकोड़े का नाम सुन मिथलेश जी की आंखों में एक चमक आई पर तभी बूझ भी गई। प्रिशा जानती थी मांजी को एक – दो पकोड़ो से तसल्ली नहीं होगी और ज्यादा उनके लिए जहर हैं।

लीजिए तरुण आपके पकोड़े और चाय और मांजी ये आपके! प्रिशा प्लेट बढ़ाते हुए बोली।

दिमाग खराब है प्रिशा !! जो मां को इतने सारे पकोड़े दे रही हो याद नहीं डॉक्टर ने कहा था तला इनके लिए जहर है! तरुण भड़क कर बोले।

मांजी !! आप खाइए पकोड़े वरना ठंडे हो जाएंगे और तरुण मैं मां की दुश्मन नहीं हूं ये पकोड़े मैने एयर फ्रायर में बनाए है बिन तेल के जो मैने कल ही ऑर्डर कर मंगवाया था क्योंकि मुझे पता है मांजी को पकोड़ो का कितना शौक है पर वो अपने शौक मारे हुए हैं! प्रिशा बोली।

तरुण प्रिशा को प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगा।मांजी पकोड़े खाते हुए नम आंखों से बहू को देख रही थी। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे और दिल में बहू के लिए ढेरों दुआएं ।

बात मामूली से पकोड़ो की थी पर बहू ने सास के मन को जाना ये मामूली बात नहीं थी। आज मांजी के चेहरे पर तृप्ति देख प्रिशा को बहुत अच्छा लग रहा था।

💐💐शिक्षा💐💐

दोस्तों,सादर प्रणाम, नमस्कार, चरण स्पर्श तथा उनकी नित्य सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल-ये चारों बढ़ते हैं। जीवन में वृद्धों की सेवा को ईश्वर की पूजा के समतुल्य माना गया हैं. जो व्यक्ति अपना भगवान वृद्ध माता पिता को मानकर उनका सम्मान करता है उन्हें कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है. बुजुर्गों के आशीष वचनों में कामयाबी की शुभेच्छा रसी बची होती हैं।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

अपने ‘मन’ को काबू में कैसे रखें?अपने ‘मन’ को

किसी राजा के पास एक बकरा था! एक बार उसने एलान किया कि ~जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा,nमैं उसे आधा राज्य दे दूँगा! लेकिन बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं – *इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा!

इस एलान को सुनकर एक आदमी राजा के पास आकर कहने लगा कि – बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है! वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारा दिन … उसे घास चराता रहा! शाम को उसने सोचा कि ~ सारा दिन इसने इतनी घास खाई है; *अब तो इसका पेट भर गया होगा! अब इसको राजा के पास ले चलूँ!

बकरे के साथ वह राजा के पास गया! राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखी, तो …बकरा उसे खाने लगा!
इस पर राजा ने उस आदमी से कहा ~ तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं; वर्ना वह घास क्यों खाने लगता?
❓???❓

इसी तरह बहुत लोगों ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया, किंतु ज्योंही दरबार में राजा के सामने घास डाली जाती, तत्काल वह फिर से घास खाने लगता!

एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा ~ इस एलान का कोई तो रहस्य है! मैं युक्ति से काम लूँगा! वह बकरे को चराने के लिए ले गया! वहाँ जब भी बकरा घास खाने के लिए मुँह बढ़ाता- वह उसे लकड़ी से मारता!

सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ! अंत में बकरे ने सोचा कि- यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी!

शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राज दरबार में लौटा बकरे को तो उसने घास खिलाई ही नहीं थी, फिर भी राजा से कहा ~ मैंने इसको भरपेट खिलाया है; अब यह बिलकुल घास नहीं खायेगा! लो कर लीजिये परीक्षा!

राजा ने घास डाली! लेकिन बकरे ने उसे खाना तो क्या ~ देखा और सूँघा तक नहीं! क्योंकि बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर घास खाऊँगा, तो मार पड़ेगी! अत: उसने घास नहीं खाई!.
🌸🌸🌸🌸🌸🌸

इसी तरह हमारा ‘मन’ भी यही बकरा है- उसे घास चराने के लिये ले जाने वाला ब्राह्मण हमारी ‘आत्मा’ है और राजा ‘परमात्मा’ है!

मन को मारो नहीं ~ मन पर अंकुश रखो! मन सुधरेगा, तो जीवन भी सुधरेगा!
अतः विवेक रूपी और अभ्यास रूपी लकड़ी से इस मन की ताड़ना करो और अपना सम्बन्ध उस अविनाशी आत्मा से जोड़ो!
कहा भी है कि –
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ॥
~ अमृतबिन्दु उपनिषद्
अर्थात् :
“मन ही मानव के बंधन और मोक्षका कारण है। इन्द्रियविषयासक्त मन बंधन का कारण है और विषयोँ से विरक्त मन मुक्ति का कारण है ।”

मजदूर के जूते

मजदूर के जूते

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले . उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं , जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तैयारी कर रहा था .

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा , “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”

शिक्षक गंभीरता से बोले , “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है . क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए .

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया . उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ , उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा . फिर उसने इधर -उधर देखने लगा , दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए . अब उसने दूसरा जूता उठाया , उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया , उसकी आँखों में आंसू आ गए , उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद , उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी .”

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं . शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हें कम ख़ुशी मिली ?”

शिष्य बोला , “ आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है , उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा . आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है! देने का आनंद असीम है ! देना देवत्त है !”

वास्तव में सुखी कौन

वास्तव में सुखी कौन

एक भिखारी किसी किसान के घर भीख माँगने गया। किसान की स्त्री घर में थी, उसने चने की रोटी बना रखी थी। किसान जब घर आया, उसने अपने बच्चों का मुख चूमा, स्त्री ने उनके हाथ पैर धुलाये, उसके बाद वह रोटी खाने बैठ गया। स्त्री ने एक मुट्ठी चना भिखारी को डाल दिया, भिखारी चना लेकर चल दिया।

रास्ते में भिखारी सोचने लगा, “हमारा भी कोई जीवन है? दिन भर कुत्ते की तरह माँगते फिरते हैं। फिर स्वयं बनाना पड़ता है। इस किसान को देखो कैसा सुन्दर घर है। घर में स्त्री है, बच्चे हैं, अपने आप अन्न पैदा करता है। बच्चों के साथ प्रेम से भोजन करता है। वास्तव में सुखी तो यह किसान है।

इधर वह किसान रोटी खाते-खाते अपनी स्त्री से कहने लगा, “नीला बैल बहुत बुड्ढा हो गया है, अब वह किसी तरह काम नहीं देता, यदि कहीं से कुछ रुपयों का इन्तजाम हो जाये तो इस साल का काम चले। साधोराम महाजन के पास जाऊँगा, वह ब्याज पर दे देगा।”

भोजन करके वह साधोराम महाजन के पास गया। बहुत देर चिरौरी विनती करने पर 1रु. सैकड़ा सूद पर साधों ने रुपये देना स्वीकार किया। एक लोहे की तिजोरी में से साधोराम ने एक थैली निकाली और गिनकर रुपये किसान को दे दिये।

रुपये लेकर किसान अपने घर को चला, वह रास्ते में सोचने लगा- “हम भी कोई आदमी हैं, घर में 5 रु. भी नकद नहीं। कितनी चिरौरी विनती करने पर उसने रुपये दिये हैं। साधो कितना धनी है, उसके पास सैकड़ों रुपये हैं।” वास्तव में सुखी तो यह साधो राम ही है। साधोराम छोटी सी दुकान करता था, वह एक बड़ी दुकान से कपड़े ले आता था और उसे बेचता था।

दूसरे दिन साधोराम कपड़े लेने गया, वहाँ सेठ पृथ्वीचन्द की दुकान से कपड़ा लिया। वह वहाँ बैठा ही था कि इतनी देर में कई तार आए कोई बम्बई का था तो कोई कलकत्ते का, किसी में लिखा था 5 लाख मुनाफा हुआ, किसी में एक लाख का। साधो महाजन यह सब देखता रहा, कपड़ा लेकर वह चला आया। रास्ते में सोचने लगा, “हम भी कोई आदमी हैं, सौ दो सौ जुड़ गये महाजन कहलाने लगे। पृथ्वीचन्द कैसे हैं, एक दिन में लाखों का फायदा। “वास्तव में सुखी तो यह है, उधर पृथ्वीचन्द बैठा ही था, कि इतने ही में तार आया कि 5 लाख का घाटा हुआ। वह बड़ी चिन्ता में था कि नौकर ने कहा, आज लाट साहब की रायबहादुर सेठ के यहाँ दावत है। आपको जाना है, मोटर तैयार है।”

पृथ्वीचन्द मोटर पर चढ़ कर रायबहादुर की कोठी पर चला गया। वहाँ सोने चाँदी की कुर्सियाँ पड़ी थी, रायबहादुर जी से कलक्टर-कमिश्नर हाथ मिला रहे थे। बड़े-बड़े सेठ खड़े थे। वहाँ पृथ्वीचन्द सेठ को कौन पूछता, वे भी एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। लाट साहब आये, राय बहादुर से हाथ मिलाया, उनके साथ चाय पी और चले गये।

पृथ्वीचन्द अपनी मोटर में लौट रहें थे, रास्ते में सोचते आते हैं, हम भी कोई सेठ हैं, 5 लाख के घाटे से ही घबड़ा गये। राय बहादुर का कैसा ठाठ है, लाट साहब उनसे हाथ मिलाते हैं। “वास्तव में सुखी तो ये ही है।”

अब इधर लाट साहब के चले जाने पर रायबहादुर के सिर में दर्द हो गया, बड़े-बड़े डॉक्टर आये एक कमरे वे पड़े थे। कई तार घाटे के एक साथ आ गये थे। उनकी भी चिन्ता थी, कारोबार की भी बात याद आ गई। वे चिन्ता में पड़े थे, तभी खिड़की से उन्होंने झाँक कर नीचे देखा, एक भिखारी हाथ में एक डंडा लिये अपनी मस्ती में जा रहा था। राय बहादुर ने उसे देखा और बोले, “वास्तव में तो सुखी यही है, इसे न तो घाटे की चिन्ता न मुनाफे की फिक्र, इसे लाट साहब को पार्टी भी नहीं देनी पड़ती, सुखी तो यही है।”

💐💐शिक्षा:-💐💐

इस प्रसंग से हमें यह पता चलता है कि हम एक-दूसरे को सुखी समझते हैं, पर वास्तव में सुखी कौन है, इसे तो वही जानता है जिसे आन्तरिक शान्ति है, जिसे आन्तरिक सुकून है। आप चाहे भिखारी हों चाहे करोड़पति हों। लेकिन आप के मन में जब तक शांति नहीं है तब तक आपको सुकून नहीं मिल सकता।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया। खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टोरेंट में बैठे दूसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था। खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया। उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया, और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा – क्या तुम्हें नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो?

उसने जवाब दिया – नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा। वृद्ध ने कहा – बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो। आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते, और कहते हैं – क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप छोटे थे, और आपके माता पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे। आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती थी।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं?

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं। उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे।

शिक्षा:-अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें..!!

जय श्रीराम

ऋषि और एक चूहा

ऋषि और एक चूहा

एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके डेरे पर बहुत दिनों से एक चूहा भी रहता आ रहा था। यह चूहा ऋषि से बहुत प्यार करता था। जब वे तपस्या में मग्न होते तो वह बड़े आनंद से उनके पास बैठा भजन सुनता रहता. यहाँ तक कि वह स्वयं भी ईश्वर की उपासना करने लगा था। लेकिन कुत्ते-बिल्ली और चील-कौवे आदि से वह सदा डरा-डरा और सहमा हुआ सा रहता।

एक बार ऋषि के मन में उस चूहे के प्रति बहुत दया आ गयी। वे सोचने लगे कि यह बेचारा चूहा हर समय डरा-सा रहता है, क्यों न इसे शेर बना दिया जाए। ताकि इस बेचारे का डर समाप्त हो जाए और यह बेधड़क होकर हर स्थान पर घूम सके।

ऋषि बहुत बड़ी दैवीय शक्ति के स्वामी थे। उन्होंने अपनी शक्ति के बल पर उस चूहे को शेर बना दिया और सोचने लगे कि अब यह चूहा किसी भी जानवर से नहीं डरेगा और निर्भय होकर पूरे जंगल में घूम सकेगा।

लेकिन चूहे से शेर बनते ही चूहे की सारी सोच बदल गई।वह सारे वन में बेधड़क घूमता। उससे अब सारे जानवर डरने लगे और प्रणाम करने लगे। उसकी जय-जयकार होने लगी. किन्तु ऋषि यह बात जानते थे कि यह मात्र एक चूहा है, वास्तव में शेर नहीं है।

अतः ऋषि उससे चूहा समझकर ही व्यवहार करते।यह बात चूहे को पसंद नहीं आई कि कोई भी उसे चूहा समझ कर ही व्यवहार करे।
वह सोचने लगा कि ऐसे में तो दूसरे जानवरों पर भी बुरा असर पड़ेगा. लोग उसका जितना मान करते हैं, उससे अधिक घृणा और अनादर करना आरम्भ कर देंगे।

अतः चूहे ने सोचा कि क्यों न मैं इस ऋषि को ही मार डालूं,फिर न रहेगा बाँस, न बजेगी बांसुरी।

यही सोचकर वह ऋषि को मारने के लिए चल पड़ा!
ऋषि ने जैसे ही क्रोध से भरे शेर को अपनी ओर आते देखा तो वे उसके मन की बात समझ गये! उनको शेर पर बड़ा क्रोध आ गया।

अतः उसका घमंड तोड़ने के लिए  ऋषि ने अपनी दैवीय शक्ति से उसे एक बार फिर चूहा बना दिया।

खुद को पूर्व स्थिति में चूहा बनता देख उसके सारे सपने धरे के धरे रहा गये! उसके हाथ अपने व्यवहार के लिए पछतावा के अलावा कुछ नहीं बचा!

यह प्रसंग हमें यही सीख देता है कि
हमें भी कभी भी अपने हितैषी का अहित नहीं करना चाहिए!
चाहे हम कितने ही बलशाली क्यों न हो जाए!
हमें उन लोगों को हमेशा याद रखना चाहिए;
जिन्होंने हमारे बुरे वक्त में हमारा साथ दिया होता है..
चूहा यदि अपनी असलियत याद रखता
तो उसे फिर से चूहा नहीं बनना पड़ता!

भक्त होने के नाते हमें यह तो कभी नहीं भूलना चाहिय कि –
सद्गुरु के बड़ा हमारा कोइ हितैषी हो नहीं सकता!
हम सभी ने

याचक बनकर उनके शरण में ज्ञान की भीख मांगी!
जब उन्होंने कृपा करके अपनाया, ज्ञानदान दिया
और इसको फलने फूलने के लिय
सेवा, सत्संग और अभ्यास का अवसर दिया

पर हमने अपने उस परम दयालु मालिक के साथ क्या किया?
हम उस चूहे की तरह अहसान फरामोशी करने लग गये!
हम याचक से मालिक बनने का प्रयास करने लग गये!

हम उनके भोले-भाले भक्तों के बीच
ग्रुपवाजी करके खुद को ही गुरु मनवाने का गरूर पाल बैठे!

तो जरा विचार करें –
गुरु महाराजी के साथ हमारा यह व्यवहार
हमारा क्या हस्र करेगा?

पिछले साल के टूर में महाराजी ने पब्लिकली समझाया कि –
छल-कपट और झूठ का व्यवहार गुरु दरवार में नहीं चलेगा!

इसलिय हम सभी शरणागत भक्तों के लिय यही हितकर होगा कि –
उनकी आज्ञा में रहकर, उनकी इच्छा अनुसार, सेवक की तरह, उनके द्वारा दिए अवसरों को आनन्द लिया जाय!
ताकि मनुष्य जीवन का सही मायने में आनन्द मिल सके!

अन्यथा पुनः मूषकः भव् का आप्सन भी सभी के लिय खुला हुआ है!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

मौन और मुस्कान की सफलता

मौन और मुस्कान की सफलता

मैं मौमु सेठ के बारे में बहुत तो नहीं जानता! पर इतना तो जानता ही हूँ कि वह पहले से ही सेठ नहीं था। वह तो एक गरीब आदमी था! झन्नु उसका नाम था।
झन्नु हमेशा झन्नाया रहता। बिना बात का झगड़ा करना तो उसके स्वभाव में ही था। किसी ने पूछ लिया कि झन्नु भाई टाईम क्या हुआ होगा? तो झन्नु झनझना जाता और कहता- यह घड़ी तेरे बाप ने ले कर दी है? यहाँ टाईम पहले ही खराब चल रहा है, तूं और आ गया मेरा टाईम खाने। भाग यहाँ से!

अब ऐसे आदमी के साथ कौन काम करे? न उसके पास कोई ग्राहक टिकता, न नौकर। यही कारण था कि वो जो भी काम करता था, उसमें उसे नुकसान ही होता था।

कहते हैं कि एक संत एक बार झन्नु के पास से गुजरे। वे कभी किसी से कुछ माँगते नहीं थे!
पर न मालूम उनके मन में क्या आया, सीधे झन्नु के सामने आ खड़े हुए। बोले- बेटा! संत को भोजन करा देगा?

अब झन्नु तो झन्नु ही ठहरा। झन्ना कर बोला- मैं खुद भूखे मर रहा हूँ, तूं और आ गया। चल चल अपना काम कर।

संत मुस्कुराए और बोले- मैं तो अपना काम ही कर रहा हूँ और वह भी बिल्कुल सही से कर रहा हूँ। असल में, तुम ही अपना काम सही से नहीं कर रहे हो!

झन्नु झटका खा गया। उसे ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी। पूछने लगा- क्या मतलब?

संत उसके पास बैठ गए। बोले- बेटा! मालूम है तुम्हारा नाम झन्नु क्यों है? क्योंकि झन्नाया रहना और नुकसान उठाना, यही तुम करते आए हो।
अगर तुम अपना स्वभाव बदल लो, तो तुम्हारा जीवन बदल सकता है। मेरी बात मानो तो चाहे कुछ भी हो जाए, खुश रहा करो।

झन्नु बोला- महाराज! खुश कैसे रहूँ? मेरा तो नसीब ही खराब है।

संत बोले- खुशनसीब वह नहीं है- जिसका नसीब अच्छा है!
बल्कि खुशनसीब वह है जो अपने नसीब से खुश है।
तुम खुश रहने लगो तो नसीब बदल भी सकता है।

तुम नहीं जानते कि कामयाब आदमी खुश रहे न रहे, पर खुश रहने वाला एक ना एक दिन कामयाब जरूर होता है।

झन्नु बोला- महाराज! दुनिया बड़ी खराब है! और मेरा ढंग ही ऐसा है कि मुझसे झूठ बोला नहीं जाता।

संत बोले- झन्नु! झूठ नहीं बोल सकते पर चुप तो रह सकते हो?

तुम दो सूत्र पकड़ लो और वह है – मौन और मुस्कान।
मुस्कान समस्या का समाधान कर देती है।
मौन समस्या का बंद कर देता है।

चाहे जो भी हो जाए – तुम चुप रहा करो और मुस्कुराया करो। फिर देखो क्या होगा?

झन्नु को संत की बात जंच गई और भगवान की कृपा से उसका स्वभाव और भाग्य दोनों बदल गए।
फल क्या मिला? समय बदल गया, झन्नु मौन और मुस्कान के सहारे चलते चलते मौमु सेठ बन गया।

यह बात सभी को सोचनी चाहिय कि आप टेलिविज़न नहीं हैं जो आपका रिमोट दूसरे के हाथ रहे।
वह चाहे तो आप हंसें! और वह चाहे तो रोएँ।
हमारा चेहरा हमारा है। यह हंसेगा या रोएगा, इसका निर्णय दूसरा क्यों करे?
अपने जीवन में अभी निर्णय करो, कि सचाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, हम सदा मुस्कुराएँगे।
तब दुनिया में कोई भी आपके चेहरे की मुस्कान न छीन पाएगा।

याद रहे-
“गुजरी हुई जिंदगी को कभी याद ना कर,
तकदीर में जो नहीं तो फ़रियाद ना कर।
जो होना होगा वो होकर ही रहेगा!
कल की फिक्र में, आज हंसी बर्बाद ना कर॥”

इसलिय
सदैव प्रसन्न रहिये और अधिकतर मौन धारण कीजिय!
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

आपका आज का दिन मंगलमय हो और आपको सपरिवार लोहड़ी, मकरसंक्रांति, पोंगल और बिहु आदि पर्वों की हार्दिक शुभकामनायें।
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तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास।

मन बेचें सतगुरु के पास तिस सेवक के सब कारज रास
अहंकार जिस भेंट के साथ जुड़ा है वह अपवित्र हो जाती है। चाहे दुनियाँ का साम्राज्य भी लेकर जाओ। निरंहकार भाव से तुम खाली हाथ लेकर भी गये तो वह भेंट स्वीकार हो जाती है।
महात्मा बुद्ध के जीवन में उल्लेख है। एक सम्राट बुद्ध से मिलने आया। स्वभावतः सम्राट है तो उसने एक बहुमुल्य कोहेनूर जैसा हीरा अपने हाथ में ले लिया। चलते वक्त उसकी पत्नी ने कहा कि पत्थर ले जा रहे हो। माना कि मुल्यवान है लेकिन बुद्ध के लिये इसका क्या मूल्य, जिसने सब साम्राज्य छोड़ दिया उसके लिये पत्थर ले जा रहे हो। यह भेंट कुछ जँचती नहीं। अच्छा तो हो कि अपने महल के सरोवर में पहला कमल खिला है मौसम का, वही ले जाओ। वह कम से कम जीवित तो है। इस पत्थर में क्या है? यह तो जड़ है बिल्कुल बन्द है।

बात उसे जँची सोचा कि एक हाथ खाली भी है पत्थर तो ले ही जाऊँगा। क्योंकि मुझे तो यही कीमती लगता है। वही चढ़ाऊँगा जिसका कुछ मुल्य है लेकिन तू कहती है हो सकता है तेरी बात भी ठीक हो। बुद्ध को मैं जानता नहीं कि किस प्रकार के आदमी है। एक हाथ में कमल एक हाथ में हीरा लेकर सम्राट, बुद्ध के चरणों में गया। जैसे ही बुद्ध के पास पहुँचा और हीरे का हाथ उसने आगे बढ़ाया बुद्ध ने कहा गिरा दो। मन में उसके अहंकार को बड़ी चोट लगी। चढ़ा दो नहीं, गिरा दो कहा। बहुमुल्य चीज़ है गिराने के लिये कहा। अगर अब गिराया नहीं तो भी फज़ीहत होगी हज़ारों भिक्षु देख रहे हैं। उसने बड़े बेमन से गिरा दिया। सोचा शायद पत्नी ने ठीक ही कहा था। दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और ज़रा ही आगे बढ़ा था कि बुद्ध ने फिर कहा गिरा दो। सम्राट सोचने लगा कि ये कुछ भी नहीं समझते। न बुद्धि की बात, न ह्मदय की बात समझते हैं। बुद्धि के लिये हीरा था, गणित था धन था। प्रेम, कमल है, ह्मदय का भाव है और इसको भी कहते हैं गिरा दो। मेरी पत्नी तो इनके चरणों में रोज़ आती है। वह इन्हें पहचानती है। उसने जब गिरा दिया तो वह खाली हाथ बुद्ध की तरफ झुकने लगा। बुद्ध ने कहा, गिरा दो। सोचने लगा अब कुछ है ही नहीं गिराने को दोनों हाथ खाली हैं। उसने कहा अब क्या गिरा दूँ? बुद्ध तो चुप रहे बुद्ध के एक भिक्षु सारिपुत्त ने कहा, अपने को गिरा दो। हीरे और कमलों को गिराने से क्या होगा? शुन्यवत हो जाओ तो ही उनके चरणों का स्पर्श हो पाएगा। तुम बचे गये तो चरण दूर। तुम मिट गये तो चरण पास। तब कहते हैं सम्राट को उसी क्षण बोध हुआ। वह गिर गया। जब उठा दूसरा ही आदमी था, महल की तरफ वापिस न गया भिक्षु हो गया। किसी ने समझाया इतनी जल्दी। उसने कहा जब मैं ही न रहा तो वापिस कौन जाये? जो आया था वह अब नहीं है, अब बुद्ध मुझमें समा गये हैं

हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

एक मालिक का प्यारा भक्त था – जिसका नाम करतार था!
वह छोले बेचने का काम करता था! उसकी पत्नी रोज सुबह-सवेरे उठ छोले बनाने में उसकी मदद करती थी!
एक बार की बात है कि एक फकीर – जिसके पास खोटे सिक्के थे उसको सारे बाजार में कोई वस्तु नहीं देता हैं तो वह करतार के पास छोले लेने आता है! करतार ने खोटा सिक्का देखकर भी *उस मालिक के प्यारे बंदे फ़क़ीर को छोले दे दिए।

ऐसे ही चार-पांच दिन उस फकीर ने करतार को खोटे सिक्के देकर छोले ले लिए और उसके खोटे सिक्के चल गए और जब सारे बाजार में अब यह बात फैल गयी की करतार तो खोटे सिक्के भी चला लेता हैं पर करतार लोगों की बात सुनकर कभी जबाव नहीं देते थे और अपने मालिक की मौज में खुश रहते थे।

एक बार जब करतार अरदास करके उठे तो अपनी पत्नी से बोले – “क्या छोले तैयार हो गए?”
पत्नी बोली – “आज तो घर में हल्दी-मिर्च नहीं थी और मैं बाजार से लेने गयी तो सब दुकानदारों ने कहा कि-यह तो खोटे सिक्के हैं और उन्होंने सामान नहीं दिया।”

पत्नी के शब्द सुनकर करतार मालिक की याद में बैठ गए और मालिक से बोले – “जैसी तेरी इच्छा! तेरे भाणे को कौन जान सका हैं!”

तभी आकाशवाणी हुई – ” क्यों करतार तू जानता नहीं था कि यह खोटे सिक्के हैं?”

करतार बोला – “सच्चे पातशाह ! मैं जानता था!”

मालिक ने कहा – “फिर भी तूने खोटे सिक्के ले लिए? ऐसा क्यूँ भले मानुष?

करतार बोला – “हे दीनानाथ ! मैं भी तो खोटा सिक्का हूँ इसलिए मैंने खोटा सिक्का ले लिया!

मैंने सोचा कि कहीं मैं तेरे दरबार में जाऊँ तो तू मुझे अपने दरबार से नकार ना दे! क्योंकि आप तो खरे सिक्के ही नवाजते हो! वैसे आप स्वयं ज़ानीज़ान हो! खोटे सिक्कों को भी आपके दरबार में जगह मिल सकें – इसलिए; मेरे परवर दिगार मैंने यह हिमाकत की!”

थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी हुई – “हे भले मानुष! तेरी दरबार में हाज़िरी क़बूल हो गयी है! तू मालिक का खोटा नहीं, खरा सिक्का हैं।
भक्त को हमेशा यही प्रार्थना करनी चाहिय कि –
मैं अपराधी जन्म का, नख शिख भरा विकार!
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो सम्हार!!