भाव” “अभाव” और “प्रभाव

“भाव” “अभाव” और “प्रभाव” 💗

महाभारत का युद्ध रोकने के अंतिम प्रयास हेतु स्वयं श्री कृष्ण शांति प्रस्ताव लेकर हस्तीनापुर पहुंचे! कुटिल शकुनी ने कृष्ण को भोजन पर आमंत्रित करने की योजना बनाई! स्वयं दुर्योधन ने उनको निमंत्रण दिया!
कृष्ण तो फिर कृष्ण हैं! उन्होंने निमंत्रण अस्वीकार कर दिया और जा पहुँचे विदुर के घर! विदुरानी कृष्ण पर अपार स्नेह रखती थी!अचानक कृष्ण को देख भावुक हो गई। कृष्ण ने जब कहा क़ि, भूख लगी है! तो तुरंत केले ले आई और भाव विह्वलता से बेसुध होकर केले फैंक देती और छिलका खिला देती।

माधव भी बिना कुछ कहे प्रेम से छिलकों को खाते रहे! बात फैली! दुर्योधन जो कृष्ण से बैर भाव रखता था ताना मारके बोला, “केशव मैंने तो छप्पन भोग बनवाये थे पर आपको तो छिलके ही पंसद आये!”

माधव मुस्करा के बोले, दुर्योधन, कोई किसी का आमंत्रण तीन वजहों से स्वीकार करता है – *पहला *भाव में, दूसरा अभाव में और तीसरा प्रभाव में!*

भाव तुझमें है नहीं, अभाव मुझे है नहीं और प्रभाव तेरा मै मानता नहीं।अब तू ही बता कि मैं कैसे तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करता?

मैं वहीं गया जहाँ मुझे जाना चाहिये था। मैं भोजन का नहीं भाव का भूखा हूं और हमेशा रहूंगा!

भाव का भूखा हूँ मैं और भाव ही एक सार है!….

आत्म-दर्शी” व “आत्म-अन्वेषक

*”आत्म-दर्शी” व “आत्म-अन्वेषक”*
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आज मनुष्य अपने शरीर निर्वाह के लिए, परिवार पालन के लिए ऊंची से ऊंची लौकिक शिक्षा प्राप्त करता है। परंतु अलौकिक शिक्षा से आत्मा को पुष्ट और पवित्र करने का विचार नहीं करता क्योंकि वह अपने आत्मिक अस्तित्व के बारे में जानता ही नहीं।

*जो शिक्षा मनुष्य को चरित्रवान बनाए! उसे उसके अन्दरस्थित शक्ति से जोड़कर संसार में सुख शांति की स्थापना में सहयोगी बनाए! उसे ही वास्तविक शिक्षा कहा जा सकता है।*

सर्वोत्तम शिक्षा वह है जिससे *आत्मा प्रकाशमान हो! शरीर शक्तिमान हो और कर्म सुखदाई हो!*

*ऐसी शिक्षा ही युग परिवर्तन का आधार है।*

सन 1921 में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए महानतम वैज्ञानिक आइंस्टाइन जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे! तब एक अमेरिकी पत्रकार ने उनसे पूछा, *”सर आप की अंतिम इच्छा क्या है? अगर पुनर्जन्म लिया तो आप क्या बनना पसंद करेंगे?*

कुछ देर सोच विचार कर आइंस्टाइन बोले, *मैंने बहुत बड़े-बड़े आविष्कार किए! दुनिया मेरा लोहा मानती है। ना जाने कितने सत्यों व तथ्यों की खोज करने में मैंने अपना सारा जीवन लगाया!* लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि *मैं तो खाली हाथ जा रहा हूं। *”मैं इस सब खेल को रचाने वाले सर्वश्रेष्ठ आविष्कारक के बारे में सोच भी नहीं सका। आत्म-परमात्म तत्व को नहीं जान पाया क्योंकि मेरा ध्यान उस तरफ कभी गया ही नहीं।”*

अब तो प्रभु से यही प्रार्थना है कि *अगले जन्म में मैं आत्म-दर्शी, आत्म-अन्वेषक संत बनूं ताकि जीवन का तथा उस परम शक्ति के तथ्यों का साक्षात्कार कर सकूं।*
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जीवन की सच्ची सार्थकता

💫 *जीवन की सच्ची सार्थकता*🌷

✍️ किसी ने अपने भगवान से पूछा कि, *”शांति चाहिए, इसके लिए मैं क्या करूं?*

जवाब मिला, *”कुछ मत करो, बल्कि जो कर रहे हो उसे बंद कर दो! शांति का अहसास होने लगेगा! क्वयोंकि ह तुम्हारे ही अन्दर है! उसको कही आना जाना नहीं है!*
बतौर उदाहरण आप झूले पर झूल रहे हो और पैर से टेका लगाना बंद कर दो! झूला अपने आप थम जाएगा। शांतिमय जीवन के लिए जरूरी है कि *व्यक्ति हर हाल में मस्त रहने की कला सीख ले।* जो नहीं मिला उसके लिए मुझ से शिकायत मत करो कि *तूने मुझे औरों से कम दिया है!*
बल्कि इस बात के लिए उसे धन्यवाद दो कि *तुमने मुझे तेरी काबलियत से भी अधिक दिया है।*

अगर तुम इस बात को मान लो तो *पचास फीसदी दुःख आज ही खत्म हो जाएँ!*

हमें इस बात का कभी अफसोस न हो कि *मेरे पास बहुत से दुनियावी सुखों की कमी है! बल्कि हमें इस बात की हमेशा ख़ुशी रहे कि *दुनिया का हर सुख देने वाला सुख सागर भगवान मेरा पिता है और सदा मेरे साथ है!*

महापुरुष हमें समझाते हैं कि, *संसार में तुम्हारा जीवन चार दिनों का खेल है!*
संसार का कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ दुख अथवा मौत का राज्य न हो! संसार का कोई भी इन्सान मौत के वार से बच नहीं सकता।
*जीना झूठ है और मरना सच है- अगर जीते जी अपने आप को नहीं जन पाये!*

समय के सदगुरु बार-बार सम्झाते हैं कि *मैं मौत की बातें बताकर तुम्हें डराता नहीं हूंँ!* केवल सच्ची हकीकत बताता हूंँ कि *इस रास्ते पर अकेले ही जाना है।* इसलिए हे इन्सान, *तू अपने अन्दर के भगवान् से जुड़ने में देर न कर! प्रभु की बन्दगी करके अपने आत्मिक स्वरूप को पहचान! फालतू बातों में अपना समय न गँवा! एक सच्चे कर्मयोगी तरह जीवनयापन कर! इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है और यही तेरे जीवन का लक्ष्य भी है!*

सदा याद रहे कि *आज है तो अब है! कल का नाम ही काल है!*
🍁🍁🍁💞 *सुप्रभात*💞🍁🍁🍁

सेठ जी की परीक्षा

*💐💐सेठ जी की परीक्षा💐💐*

बनारस में एक बड़े धनवान सेठ रहते थे। वह विष्णु भगवान् के परम भक्त थे और हमेशा सच बोला करते थे!

एक बार जब भगवान् सेठ जी की प्रशंशा कर रहे थे तभी माँ लक्ष्मी ने कहा , *”स्वामी, आप इस सेठ की इतनी प्रसंशा किया करते हैं, क्यों न आज उसकी परीक्षा ली जाए!* और जाना जाए कि *क्या वह सचमुच इसके लायक है या नहीं?”*

भगवान् बोले , *” ठीक है ! अभी सेठ गहरी निद्रा में है आप उसके स्वप्न में जाएं और उसकी परीक्षा ले लें।”*

अगले ही क्षण सेठ जी को एक स्वप्न आया।

स्वप्न मेँ धन की देवी लक्ष्मी उनके सामनेँ आई और बोली, *”हे मनुष्य! मैँ धन की दात्री लक्ष्मी हूँ।”*

सेठ जी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और वो बोले, *”हे माता आपने साक्षात अपने दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है! बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”*

लक्ष्मी बोली, *”कुछ नहीं ! मैं तो बस इतना बताने आयी हूँ कि मेरा स्वाभाव चंचल है, और वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते मैं ऊब चुकी हूँ और यहाँ से जा रही हूँ।”*

सेठ जी बोले, *”मेरा आपसे निवेदन है कि आप यहीं रहें, किन्तु अगर आपको यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है तो मैं भला आपको कैसे रोक सकता हूँ! आप अपनी इच्छा अनुसार जहाँ चाहें जा सकती हैं।”*

और माँ लक्ष्मी उसके घर से चली गई।

थोड़ी देर बाद वे रूप बदल कर पुनः सेठ के स्वप्न मेँ यश के रूप में आयीं और बोलीं, *”सेठ मुझे पहचान रहे हो?”*

सेठ – *“नहीं महोदय, आपको नहीँ पहचाना।*

यश – *”मैं यश हूँ , मैं ही तेरी कीर्ति और प्रसिध्दि का कारण हूँ । लेकिन अब मैँ तुम्हारे साथ नहीँ रहना चाहता क्योँकि माँ लक्ष्मी यहाँ से चली गयी हैं अतः मेरा भी यहाँ कोई काम नहीं।”*

सेठ – *”ठीक है, यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही।”*

सेठ जी अभी भी स्वप्न में ही थे और उन्होंने देखा कि *वह दरिद्र हो गए हैं और धीरे-धीरे उनके सारे रिश्तेदार व मित्र भी उनसे दूर हो गए हैं। यहाँ तक की जो लोग उनका गुणगान किया करते थे वो भी अब बुराई करने लगे हैं।*

कुछ और समय बीतने पर माँ लक्ष्मी *धर्म* का रूप धारण कर पुनः सेठ के स्वप्न में आयीं और बोलीं, *”मैँ धर्म हूँ। माँ लक्ष्मी और यश के जाने के बाद मैं भी इस दरिद्रता में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मैं जा रहा हूँ।”*

*”जैसी आपकी इच्छा।,* सेठ ने उत्तर दिया। और धर्म भी वहाँ से चला गया।

कुछ और समय बीत जाने पर माँ लक्ष्मी *सत्य* के रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं, *”मैँ सत्य हूँ। लक्ष्मी , यश, और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ!“*

ऐसा सुन सेठ जी ने तुरंत सत्य के पाँव पकड़ लिए और बोले, *हे महाराज, मैँ आपको नहीँ जानेँ दूँगा। भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें, मुझे त्याग दें पर कृपया आप ऐसा मत करिये, सत्य के बिना मैँ एक क्षण नहीँ रह सकता, यदि आप चले जायेंगे तो मैं तत्काल ही अपने प्राण त्याग दूंगा।“*

*”लेकिन तुमने बाकी तीनो को बड़ी आसानी से जाने दिया, उन्हें क्यों नहीं रोका?”* सत्य ने प्रश्न किया।

सेठ जी बोले, *”मेरे लिए वे तीनो भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उन तीनो के बिना भी मैं भगवान् के नाम का जाप करते-करते उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ, परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में झूठ प्रवेश कर जाएगा और मेरी वाणी अशुद्ध हो जायेगी, भला ऐसी वाणी से मैं अपने भगवान् की वंदना कैसे कर सकूंगा, मैं तो किसी भी कीमत पर आपके बिना नहीं रह सकता!*

सेठ जी का उत्तर सुन सत्य प्रसन्न हो गया और उसने कहा, *“तुम्हारी अटूट भक्ति नेँ मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया और अब मैँ यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा।”* और ऐसा कहते हुए सत्य अंतर्ध्यान हो गया।

सेठ जी अभी भी निद्रा में थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में *धर्म* वापस आया और बोला, *“मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है!”* सेठ जी ने प्रसन्नतापूर्वक धर्म का स्वागत किया।

उसके तुरंत बाद *यश* भी लौट आया और बोला, “जहाँ सत्य और धर्म हैं वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है, इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।* सेठ जी ने यश की भी आवाभगत की।

और अंत में *माँ लक्ष्मी* आयीं। उन्हें देखते ही सेठ जी नतमस्तक होकर बोले, *“हे देवी! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?”*

*“अवश्य, जहां सत्य, धर्म और यश हों वहाँ मेरा वास निश्चित है।,”* माँ लक्ष्मी ने उत्तर दिया।

यह सुनते ही सेठ जी की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा पर वास्तविकता में वह एक कड़ी परीक्षा से उत्तीर्ण हो कर निकले थे।

हमें भी हमेशा याद रखना चाहिए कि *जहाँ सत्य का निवास होता है वहाँ यश, धर्म और लक्ष्मी का निवास स्वतः ही हो जाता है। सत्य है तो सिध्दि, प्रसिध्दि और समृद्धि है।*

समय के सदगुरु भी यही बतलाते हैं कि – *अगर सत्य साथ है और सत्य का साथ है तो फिर निर्भय होकर इस जीवन को जियो!!*
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*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

जीवनदाता और मृत्यु

जीवनदाता और मृत्यु

जंगल में एक पेड़ पर दो बाज प्रेमपूर्वक रहते थे। दोनों शिकार की तलाश में निकलते और जो भी हाथ लगता शाम को उसे मिल बांटकर खाते। लंबे काल-खंड से यही क्रम चल रहा था।

एक दिन दोनों शिकार कर के लौटे तो *एक की चोंच में चूहा और दुसरे की चोंच में सांप था।*
दोनों ही शिकार तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की *सांप ने चूहे को देखा* और *चूहे ने सांप को।* सांप चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा सांप के प्रयत्नों को देख कर अपने शिकारी बाज के पंखों में अपने बचने का उपक्रम करने लगा।

उन दोनों के क्रियाकलाप को देखकर एक बाज गम्भीर हो गया और विचारों में खो गया। दूसरे बाज ने पहले वाले बाज से पूछा- *दोस्त, दार्शनिकों की तरह किस चिंतन में खो गए?* पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की और संकेत करते हुए कहा, *देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्राणी है? जीभ की लिप्सा के आगे इसे अपनी मौत भी एक प्रकार से विस्मरण हो रही है।*

दूसरे बाज ने अपनी चोंच में फंसे चूहे की आलोचना करते हुए कहा- *और इस नासमझ को भी देखो – भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी डरावना
लग रहा है।*

पेड़ की नीचे एक सन्त सुस्ता रहे थे। उन्होंने दोनों बाजों की बातें सुनी और एक लंबी सांस छोड़ते हुए बोले – *हम मानव भी तो सांप और चूहे की तरह स्वाद व भय को बड़ा समझते हैं! मृत्यु को तो हम लोगों ने भी विस्मृत कर रखा है, जबकि मृत्यु तो अटल सत्य है।*

अतः मानव को अपने स्वयं के भले के लिए दो चीजों को कभी विस्मृत नहीं करना है।
पहले भगवान, *जीवन दाता* – जिन्होंने कृपा करके मानव तन उपहार स्वरूप दिया और दूसरा *स्वयं की मौत।*

इस प्रकार जीवन-मृत्यु के बीच के अन्तराल में *अपने आप को जानना* है और *स्वयं का आनन्द लेना है!*
इसी में *जीवन की सार्थकता है!*

*आपका आज का दिन आनन्दमय हो!*

*ओम शांति*
💐💐सु प्र भा त💐💐

जीवन का आनंद

*💐💐जीवन का आनंद💐💐*

बहुत समय पहले की बात है जब सिकंदर अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था! वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि *अब वह अमर होना चाहता था!*
उसने पता लगाया कि *कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है!*

देश-दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार सिकंदर ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था! वह एक पुरानी गुफा थी जहां पर कोई आता जाता नहीं था।

देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी लेकिन सिकंदर ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया वहां पर उसने देखा कि *गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है!*

उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि *एक कौवे की आवाज आई! वह कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था! कौवा जोर से बोला, *ठहर, रुक जा यह भूल मत करन!*

सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। *वह कौवा बड़ी ही दयनीय अवस्था में था! पंख झड़ गए थे, पंजे गिर गए थे! वह अंधा भी हो गया था! बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था!*

सिकंदर ने कहा, *तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? मैं पूरी दुनिया को जीत सकता हूं तो यह अमृत पीने से मुझे तो कैसे रोकता है?*

तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि *मैं भी एक बार अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था!और मैंने जल्दबाजी में अमृत पी लिया और अब मैं कभी मर नहीं सकता! पर अब मैं मरना चाहता हूं लेकिन मर नहीं सकता।देख लो मेरी हालत।*

कौवे की बात सुनकर सिकंदर देर तक सोचता रहा! *सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीए ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया।*

सिकंदर समझ चुका था कि *जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं!*

*मित्रों, जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए! क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते है।*

इसलिय महापुरुषों का कहना है कि – *आज* में ही *अब* है और *अब* में ही *सब* है! इस *अब* में रहकर ही हम *अपने आप को जान* सकते हैं!
इसलिय, *आज* में, *अब* में जीने की कोशश कीजिय अन्यथा उस *अमरता का वरदान* पाया कौवा भी *मरने को लालायित है!*

*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।*

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सृष्टि का कठोरतम दण्ड!

सृष्टि का कठोरतम दण्ड!

एक दिन संध्या के समय सरयू के तट पर तीनों भाइयों संग टहलते श्रीराम से महात्मा भरत ने कहा, “एक बात पूछूं भईया? माता कैकई ने आपको वनवास दिलाने के लिए मंथरा के साथ मिल कर जो षड्यंत्र किया था, क्या वह राजद्रोह नहीं था?

उनके षड्यंत्र के कारण एक ओर राज्य के भावी महाराज और महारानी को चौदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा तो दूसरी ओर पिता महाराज की दुखद मृत्यु हुई।

ऐसे षड्यंत्र के लिए सामान्य नियमों के अनुसार तो मृत्युदंड दिया जाता है, फिर आपने माता कैकई को दण्ड क्यों नहीं दिया?

राम मुस्कुराए… और बोले –

“जानते हो भरत, किसी कुल में एक चरित्रवान और धर्मपरायण पुत्र जन्म ले ले तो उसका जीवन उसके असँख्य पीढ़ी के पितरों के अपराधों का प्रायश्चित कर देता है। जिस माँ ने तुम जैसे महात्मा को जन्म दिया हो उसे दण्ड कैसे दिया जा सकता है भरत?”

भरत संतुष्ट नहीं हुए। कहने लगे “यह तो मोह है भइया, और राजा का दण्डविधान मोह से मुक्त होता है।

एक राजा की तरह उत्तर दीजिये कि आपने माता को दंड क्यों नहीं दिया, समझिए कि आपसे यह प्रश्न आपका अनुज नहीं, अयोध्या का एक सामान्य नागरिक कर रहा है।

राम गम्भीर हो गए। कुछ क्षण के मौन के बाद कहा, अपने सगे-सम्बन्धियों के किसी अपराध पर कोई दण्ड न देना ही इस सृष्टि का कठोरतम दण्ड है भरत!

माता कैकई ने अपनी एक भूल का बड़ा कठोर दण्ड भोगा है। वनवास के चौदह वर्षों में हम चारों भाई अपने अपने स्थान से परिस्थितियों से लड़ते रहे हैं, पर माता कैकई हर क्षण मरती रही हैं।

अपनी एक भूल के कारण उन्होंने अपना पति खोया, अपने चार बेटे खोए, अपना समस्त सुख खोया, फिर भी वे उस अपराधबोध से कभी मुक्त न हो सकीं। वनवास समाप्त हो गया तो परिवार के शेष सदस्य प्रसन्न और सुखी हो गए, पर वे कभी प्रसन्न न हो सकीं। कोई राजा किसी स्त्री को इससे कठोर दंड क्या दे सकता है?

मैं तो सदैव यह सोच कर दुखी हो जाता हूँ कि मेरे कारण अनायास ही मेरी माँ को इतना कठोर दण्ड भोगना पड़ा।

राम के नेत्रों में अश्रु जल उतर आया था और भरत आदि भाई मौन हो गए थे।

राम ने फिर कहा, “और उनकी भूल को अपराध समझना ही क्यों भरत! यदि मेरा वनवास न हुआ होता तो संसार भरत और लक्ष्मण जैसे भाइयों के अतुल्य भ्रातृप्रेम को कैसे देख पाता। मैंने तो केवल अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन मात्र किया था, पर तुम दोनों ने तो मेरे स्नेह में चौदह वर्ष का वनवास भोगा। वनवास न होता तो यह संसार सीखता कैसे कि भाइयों का सम्बन्ध होता कैसा है।”

भरत के प्रश्न मौन हो गए थे। वे अनायास ही बड़े भाई से लिपट गए!

मर्यादा पुरुषोत्तम का यह सदेश आज भी मानव जीवन के लिय, पारिवारिक कलह से मुक्त होने के लिय रामबाण ही है! बशर्ते भारत की भावना के अनुसार इसके महत्व को महसूस जाय!
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काह भरोसा देह का, बिनस जात छान माही।

*काह भरोसा देह का, बिनस जात छान माही।*
*सांस सांस सुमरिन करो, और यतन कुछ नाही।।*

एक डॉक्टर बहुत ही होशियार थे ।

उनके बारे में यह कहा जाता था कि *वह मौत के मुंह में से भी बीमार को वापस ले आते थे।*

डॉक्टर के पास जो भी मरीज आता वह उससे एक फॉर्म भरवाते थे।

मरीज से यह पूछते कि आप इस फोरम में लिखें कि *यदि आप बच गए तो किस तरह से बाकी जिंदगी जियेगें और आपके जीवन में क्या करना शेष रह गया है – जो आप करना चाहेंगें।*

*सभी मरीज अपने मन की बात लिखने लगे।*

अगर मैं बच गया तो *अपने परिवार के साथ अपना समय बिताउंगा।*

*मैं अपने पुत्र और पुत्री की संतानों के साथ जी भर कर खेलूंगा।*

*किसी ने जी भर कर पर्यटन, घूमने का शौक पूरा करने का लिखा।*

किसी ने तो यह भी लिखा कि *मेरे द्वारा जिंदगी में यदि किसी से ठेस पहुंची है तो मैं उनसे माफी मागूंगा।*

किसी ने लिखा कि *मैं अपनी जिंदगी में मुस्कुराना बढ़ा दूंगा।जिंदगी में किसी से भी शिकायत नहीं करूंगा और ना किसी को शिकायत का मौका दूंगा। किसी को भी मन दुख ना ऐसा काम करूंगा।*

बहुत से लोगों ने तरह-तरह की बातें लिखी।

डॉक्टर आपरेशन करने के बाद जब मरीज को छुट्टी देते तब वह लिखा हुआ फार्म उन्हे वापस कर देते थे।

मरीज से कहते कि *आपने जो फॉर्म में लिखा है वह आप अपनी जिंदगी में कितना पूरा कर पा रहे हैं उस पर निशान लगाते जाए्।* वापस आए और मुझे बताएं कि *आपने इसमें से किस तरह की जिंदगी जी है।*

डॉक्टर ने कहा कि एक भी व्यक्ति ने ऐसा नहीं लिखा कि –
*अगर मैं बच गया तो मुझे किसी से बदला लेना है।*
*अपने दुश्मन को खत्म कर दूंगा!*
*मुझे बहुत धन कमाना है।*
*अपने आपको बहुत व्यस्त रखना है।*

*प्रत्येक का जीवन जीने का नजरिया अपना-अपना था।*

डॉक्टर ने प्रश्न किया कि *जब आप स्वस्थ थे तब आपने इस तरह का जीवन क्यों नहीं जिया? आप को कौन रोक रहा था? अभी कौन सी देरी हो गई है?*

हम भी कुछ क्षण अपने जीवन के बारे में चिंतन मनन करें। हमें अपनी जिंदगी में किस तरह का जीवन जीना शेष रह गया है जो हम जीवन जीना चाहते थे?

*बस उस तरह का जीवन जीना प्रारम्भ करें।*

जीवन का आनंद तभी ही है कि *जब लगे जीवन यात्रा पूर्ण हो तब कोई कामना नहीं रहे!
कोई अफ़सोस ना रहे। मन में यह ना रहे कि *मैं जैसा जीवन जीना चाहता था वैसा जीवन नहीं जी सका!*

और वह तभी सम्भव है जब हम *अपने आप को जानना शुरू कर देंगे! अन्तर्मुखी होना प्रारंभ करेंगे!*

सम्यक द्रष्टि- तेरे साथ कुछ नही जायेगा

सम्यक द्रष्टि- तेरे साथ कुछ नही जायेगा

एक बहुत प्रभावशाली, बुद्धि और वैभव से संपन्न राजा था! आस-पास के राजा भी समय-समय पर उससे परामर्श लिया करते थे! एक दिन राजा अपनी शैया पर लेेटे-लेटे सोचने लगा, मैं कितना भाग्यशाली हूं! कितना विशाल है मेरा परिवार! कितना समृद्ध है मेरा अंत:पुर! कितनी मजबूत है मेरी सेना! कितना बड़ा है मेरा राजकोष! ओह! मेरे खजाने के सामने कुबेर के खजाने की क्या बिसात! मेरे राजनिवास की शोभा को देखकर अप्सराएं भी ईर्ष्या करती होंगी! मेरा हर वचन आदेश होता है! राजा कवि हृदय था और संस्कृृत का विद्वान था!

उन्होंने अपने इन्हीं भावों को शब्दों में पिरोना शुरू किया! तीन चरण बन गए, लेकिन चौथी लाइन पूरी नहीं हो रही थी! जब तक पूरा श्लोक नहीं बन जाता, तब तक कोई भी रचनाकार उसे बार-बार दोहराता है! राजा भी अपनी वे तीन लाइनें बार-बार गुनगुना रहा था!

चेतोहरा: युवतय: स्वजनाऽनुकूला:,
सद्बान्धवा: प्रणयगर्भगिरश्च भृत्या:
गर्जन्ति दन्तिनिवहास्विरलास्तुरंगा:
यानी मेरी चित्ताकर्षक रानियां हैं, अनुकूल स्वजन वर्ग है, श्रेष्ठ कुटुंबी जन हैं! कर्मकार विनम्र और आज्ञापालक हैं! हाथी, घोड़ों के रूप में विशाल सेना है!

लेकिन बार-बार गुनगुनाने पर भी चौथा-चरण बन नहीं रहा था!
संयोग की बात है कि उसी रात एक चोर राजमहल में चोरी करने के लिए आया था! मौका पाकर वह राजा के शयनकक्ष में घुस गया और पलंग के नीचे दुबक कर कर बैठ गया!

चोर भी संस्कृत भाषा का विज्ञ और आशु कवि था! समस्यापूर्ति का उसे अभ्यास था! राजा द्वारा गुनगुनाए जाते श्लोक के तीन चरण चोर ने सुन लिए थे! राजा के दिमाग में चौथी लाइन नहीं बन रही है! यह भी वह जान गया लेकिन तीन लाइनें सुन कर उस चोर का कवि मन भी उसे पूरा करने के लिए मचलने लगा।

भावातिरेक में वह भूल गया कि वह चोर है और राजा के कक्ष में चोरी करने घुसा है!

अगली बार राजा ने जैसे ही वे तीन लाइनें पूरी कीं! चोर के मुंह से चौथी लाइन निकल पड़ी!
और वह इस प्रकार थी –
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सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति॥
यानी राज्य, वैभव आदि सब तभी तक है, जब तक आँखें खुली हैं। आंख बंद होने के बाद कुछ नहीं है। अत : किस पर गर्व कर रहे हो?

चोर की इस एक पंक्ति ने सचमुच में राजा की आंखें खोल दीं और उसे सम्यक् दृष्टि मिल गई!

वह चारों ओर विस्फारित नेत्रों से देखने लगा कि ऐसी ज्ञान की बात किसने कही? कैसे कही?

उसने आवाज दी कि पलंग के नीचे जो भी है, वह मेरे सामने उपस्थित हो!

चोर सामने आ कर खड़ा हुआ फिर हाथ जोड़ कर राजा से बोला – हे राजन ! मैं आया तो चोरी करने था! पर आप के द्वारा पढ़ा जा रहा श्लोक सुनकर यह भूल गया कि मैं चोर हूं। मेरा काव्य प्रेम उमड़ पड़ा और मैं चौथे चरण की पूर्ति करने का दुस्साहस कर बैठा! हे राजन ! मैं अपराधी हूं। मुझे क्षमा कर दें।
राजा ने कहा, तुम अपने जीवन में चाहे जो कुछ भी करते हो, उससे मुझे कोई सरोकार नहीं है! इस क्षण तो आप मेरे गुरु हो क्योंकि आपने मुझे जीवन के यथार्थ का परिचय कराया है!
आंख बंद होने के बाद कुछ भी नहीं रहता – यह कह कर तुमने मेरा सत्य से साक्षात्कार करवा दिया!*
इसलिय गुरु होने के कारण तुम मुझसे जो चाहो मांग सकते हो!

चोर की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन राजा ने आगे कहा -आज मेरे ज्ञान की आंखें खुल गईं। इसलिए शुभस्य शीघ्रम् – इस सूक्त को आत्मसात करते हुए मैं शीघ्र ही संन्यास लेना चाहता हूं! राज्य अब तृण के समान प्रतीत हो रहा है! तुम यदि मेरा राज्य चाहो तो मैं उसे भी सहर्ष देने के लिए तैयार हूं!

चोर बोला, राजन! आपको जैसे इस वाक्य से बोध पाठ मिला है, वैसे ही मेरा मन भी बदल गया है। मैं भी संन्यास स्वीकार करना चाहता हूं।

राजा और चोर दोनों संन्यासी बन गए।

एक ही पंक्ति ने दोनों को स्पंदित कर दिया। यह है सम्यक द्रष्टि का परिणाम।

जब तक राजा की दृष्टि सम्यक् नहीं थी, वह धन – वैभव, भोग-विलास को ही सब कुछ समझ रहा था!* ज्यों ही उनके आंखों से मायावी रंगीन चश्मा उतरा – दृष्टि सम्यक् बनी कि पदार्थ पदार्थ हो गया और आत्मा-आत्मा!! यानी नाशी और अविनाशी का साक्ष्यातकार हो गया!

इसलिय हमारा सम्बन्ध उस शाश्वत शक्ति से होना चाहिय जो था, है और हमेशा रहेगा! यही समय के महापुरुष हमें बार-बार समझाते हैं!

फकीर का भरोसा

फकीर का भरोसा
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एक फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, पूर्णिमा की रात। फकीर रोने लगा क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।

उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो?
फकीर से न रहा गया! उस फकीर ने कहा कि आप चोरी करने आए थे— कभी तो आए! जीवन में पहली दफा तो आए! यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं! तुम चोरी करने क्या आए, तुमने तो मुझे सम्राट बना दिया!

क्षण भर को मुझे भी लगा कि अपने घर भी क्या चोर आ सकते हैं? ऐसा सौभाग्य! इसलिय मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं! मैंने अपने को बहुत रोका कि कहीं तुम्हारे काम में बाधा न पड़े, लेकिन न रुक पाया, सिसकियां निकल गईं, क्योंकि घर में कुछ है नहीं है! तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दुबारा जब आओ तो सूचना तो दे देना। मैं गरीब फकीर हूं। दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—मूग कर इकट्ठा कर लेता।अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।

चोर तो घबड़ा गए! उनकी कुछ समझ में ही नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला न था। चोरी तो जिंदगी भर से की थी, मगर आदमी से पहली बार मिलना हुआ था। मन ही मन बुदबुदाने लगे कि *दुनिया में भीड़— भाड़ तो बहुत है, आदमी कहां! शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां हैं?

पहली बार चोरों की आंखों में शर्म आई, हया उठी और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, फ़क़ीर के आग्रह को मना नहीं कर सके! सोचने लगे कि मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। पर लेना भी मुश्किल हो रहा था! इस पर कुछ और तो है नहीं!

कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना।

लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है और तुम तो तीन मील चल कर गांव से आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम चुपचाप इस एक मात्र कम्बल को ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।

चोर तो ऐसे घबड़ा गए कि एकदम निकल कर बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे! तभी फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो!

चोर सोचने लगे कि यह फकीर भी अजीब है! उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे।

फिर फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा और उसने एक गीत लिखा—

जिस गीत का अर्थ है कि
मैं बहुत गरीब हूं मेरा वश चलता तो आज पूर्णिमा का चांद भी आकाश से उतार कर उनको भेंट कर देता!
कौन कब किसके द्वार आता है आधी रात!
यह नास्तिक है। इसे ईश्वर में भरोसा नहीं है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के ईश्वरत्व में भरोसा है।
कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है,
जो श्वासें ले रहा है, उस फैले हुए ईश्वरत्व के सागर में इसकी आस्था है।

कुछ समय बाद चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गयाऔर वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का जो कंबल था।

मजिस्ट्रेट भी तत्क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है!
उसने चोरों से कहा कि तो तुम उस गरीब फकीर के यहां से भी चोरी किए हो!
फकीर को भी बुलाया गया और मजिस्ट्रेट ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस फ़क़ीर का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा हैफिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। फिर बाकी तुम्हारी चोरियां सिद्ध हों या न हों, मुझे फिकर नहीं है। उस एक आदमी ने अगर कह दिया…।

चोर तो घबड़ा रहे थे, कंप रहे थे, पसीना—पसीना हुए जा रहे थे…

फकीर अदालत में आया और फकीर ने आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे। यह आस्तिकता है।
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मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं।
फकीर के पैरों पर गिर पड़े चोर और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा।

और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थीं। इस कंबल में मेरे सारे सिब्दों की कथा थी। यह साधारण कंबल नहीं था।

जैसे कबीर कहते हैं-
झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया!
ऐसे उस फकीर ने कहा *प्रार्थनाओं से बुना था इसे! इसी को ओढ़कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी।
तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले आएगा तुमको भी। और तुम आखिर आ गए।*

उस दिन रात में आए थे, आज दिन में आए। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए हो। मुझे भरोसा था कि तुम एक ना एक दिन सन्मार्ग का अनुसरण करोगे!
यह सही कहावत है कि कीट न जाने भृंग को, गुरु कर ले आप समान!
संतों की संगति मात्र से ही मानव विकार रहित होने लगते हैं!