लालची गड़रिया

💐💐*लालची गड़रिया* 💐💐

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किसी गांव में एक गड़रिया रहता था। वह लालची स्वभाव का था, हमेशा यही सोचा करता था कि किस प्रकार वह गांव में सबसे अमीर हो जाये। उसके पास कुछ बकरियां और उनके बच्चे थे। जो उसकी जीविका के साधन थे।

एक बार वह गांव से दूर जंगल के पास पहाड़ी पर अपनी बकरियों को चराने ले गया। अच्छी घास ढूँढने के चक्कर में आज वो एक नए रास्ते पर निकल पड़ा। अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि तभी अचानक तेज बारिश होने लगी और तूफानी हवाएं चलने लगीं। तूफान से बचने के लिए गड़रिया कोई सुरक्षित स्थान ढूँढने लगा। उसे कुछ ऊँचाई पर एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया बकरियों को वहीँ बाँध उस जगह का जायजा लेने पहुंचा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं। वहां बहुत सारी जंगली भेड़ें मौजूद थीं।

मोटी- तगड़ी भेड़ों को देखकर गड़रिये को लालच आ गया। उसने सोचा कि अगर ये भेड़ें मेरी हो जाएं तो मैं गांव में सबसे अमीर हो जाऊंगा। इतनी अच्छी और इतनी ज्यादा भेड़ें तो आस-पास के कई गाँवों में किसी के पास नहीं हैं।

उसने मन ही मन सोचा कि मौका अच्छा हैं मैं कुछ ही देर में इन्हें बहला-फुसलाकर अपना बना लूंगा। फिर इन्हें साथ लेकर गांव चला जाऊंगा।

यही सोचते हुए वह वापस नीचे उतरा। बारिश में भीगती अपनी दुबली-पतली कमजोर बकरियों को देखकर उसने सोचा कि अब जब मेरे पास इतनी सारी हट्टी-कट्टी भेडें हैं तो मुझे इन बकरियों की क्या ज़रुरत उसने फ़ौरन बकरियों को खोल दिया और बारिश में भीगने की परवाह किये बगैर कुछ रस्सियों की मदद से घास का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर लिया!

गट्ठर लेकर वह एक बार फिर गुफा में पहुंचा और काफी देर तक उन भेड़ों को अपने हाथ से हरी-हरी घास खिलाता रहा। जब तूफान थम गया, तो वह बाहर निकला। उसने देखा कि उसकी सारी बकरियां उस स्थान से कहीं और जा चुकी थीं।

गड़ेरिये को इन बकरियों के जाने का कोई अफ़सोस नहीं था, बल्कि वह खुश था कि आज उसे मुफ्त में एक साथ इतनी अच्छी भेडें मिल गयी हैं। यही सोचते-सोचते वह वापस गुफा की ओर मुड़ा लेकिन ये क्या… बारिश थमते ही भेडें वहां से निकल कर दूसरी तरफ जान लगीं। वह तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंचा और उन्हें अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगा। पर भेडें बहुत थीं, वह अकेला उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकता था… कुछ ही देर में सारी भेडें उसकी आँखों से ओझल हो गयीं।

मन ही मन बडबडा रहा था कि तुम्हारे लिए मैंने अपनी बकरियों को बारिश में बाहर छोड़ दिया। इतनी मेहनत से घास काट कर खिलाई… और तुम सब मुझे छोड़ कर चली गयी… सचमुच कितनी स्वार्थी हो तुम सब।

गड़रिया बदहवास होकर वहीं बैठ गया। गुस्सा शांत होने पर उसे समझ आ गया कि दरअसल स्वार्थी वो भेडें नहीं बल्कि वो खुद हैं, जिसने भेड़ों की लालच में आकर अपनी बकरियां भी खो दीं।

शिक्षा:-
आज हम इंसान भी यही कर रहे हैं । जिससे हमें कुछ लाभ मिल सकता हैं उसी से हम आत्मीय संबंध रखते हैं!
जो व्यक्ति स्वार्थ और लोभ में फंसकर अपनों का साथ छोड़ता हैं, उसका कोई अपना नहीं बनता और अंत में उसे पछताना ही पड़ता हैं!

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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।

मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ

*मुठ्ठी खोलो बंधन मुक्त हो जाओ*
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एक बार एक संत अपनी कुटिया में शांत बैठे थे! तभी उन्हें कुछ शोर सुनाई दिया जा कर देखा तो एक बंदर ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था!*

*उसका एक हाथ एक घड़े के अंदर था और वह बंदर अपना हाथ छुड़ाने के लिए चिल्ला रहा था!*

संत को देख वह बंदर संत से आग्रह करने लगा – *महाराज कृपया कर के मुझे इस बंधन से मुक्त करवाए!*

संत ने बंदर को कहा – *जब तुमने घड़े के अंदर हाथ डाला तो वह आसानी से उसमे चला गया! परन्तु अब इसलिए बाहर नहीं निकल रहा है कयोंकि तुमने अपने हाथ में लड्डू पकड़ा हुआ है जो कि उस घड़े के अंदर है, अगर तुम वह लड्डू हाथ से छोड़ दो तो तुम आसानी से मुक्त हो सकते हो!**

बंदर ने कहा – *महाराज, लड्डू तो मैं नहीं छोड़ने वाला! अब आप मुझे बिना लड्डू छोड़े ही मुक्त होने की कोई युक्ति सुझाए!*

संत मुस्कुराए और कहा – *लड्डू छोड़ दो अन्यथा तुम कभी भी मुक्त नही हो सकते!*

हज़ार कोशिशों के बाद बंदर को इस बात का एहसास हुआ कि *बिना लड्डू छोड़े मेरा हाथ इस घड़े से बाहर नही निकल सकता और मैं मुक्त नही हो सकता!*

*आख़िरकार बंदर ने वो लड्डू छोड़ा और सहजता से ही उस घड़े से मुक्त हो गया!*

यह कहानी सिर्फ़ उस बंदर की ही नहीं बल्कि *आज के हर उस इंसान की है जो की इस संसार रुपी घड़े में स्वयं को फंसा बैठा है! और सांसारिक वस्तुओं रुपी लड्डू को छोड़ना भी नहीं चाहता और उस घड़े (84 के फेरे से) से मुक्त भी होना चाहता है!*

संत (सदगुरु) ने सभी को समझने के लिय कह तो दिया कि *भूले मन समझ के लाद लदनिया!* अब किसे कब समझ आए और वह कब मुक्त होगा यह उसकी अपनी समझ है।*
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*मंगलमय प्रभात*
*स्नेह वंदन*
*प्रणाम*

सच्चा साधु

*सच्चा साधु*
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एक साधु को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था! वैसे भी पहले ज़माने में साधु के पास पैसा कहां होता था!*

नाविक सरल था, पढा-लिखा तो नहीं था पर समझ की कमी नहीं थी। साधु रास्ते में ज्ञान की बात कहते, कभी भगवान की सर्वव्यापकता बताते और कभी अर्थसहित श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक सुनाते!

नाविक मछुआरा बङे ध्यान से सुनता और बाबा की बात ह्रदय में बैठा लेता!

एक दिन उस पार उतरने पर साधु नाविक को कुटिया में ले गयेऔर बोले, *वत्स, मैं पहले व्यापारी था! धन तो कमाया था पर उस धन के द्वारा अपने परिवार को आपदा से नहीं बचा पाया था! अब ये धन मेरे किसी का काम का नहीं, तुम ले लो! तुम्हारा जीवन संवर जायेगा! तेरे परिवार का भी भला हो जाएगा।*

नाविक ने विनम्रता पूर्वक कहा कि, *नहीं, बाबाजी, मैं ये धन नहीं ले सकता! मुफ्त का धन घर में जाते ही मेरा आचरण बिगाड़ देगा! कोई मेहनत नहीं करेगा! आलसी जीवन लोभ लालच और पाप बढायेगा!*

*आप ही ने मुझे ईश्वर के बारे में बताया! मुझे तो आजकल लहरों में भी कई बार वो परमात्मा नजर आया!जब मै उसकी नजर में ही हूँ तो फिर उस पर अविश्वास क्यों करूं? मैं अपना काम करूं और शेष उसी पर छोङ दूं। जब उनको मैंने अपना सबकुछ मान ही लिया तो निशचित ही उनको भी मेरा ख्याल होगा ही!*

प्रसंग तो समाप्त हो गया पर एक सवाल छोड़ गया कि *इन दोनों पात्रों में साधु कौन था?*

एक वो था- *जिसको दुःख आया तो उसने भगवा पहना, संन्यास लिया, धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया, भगवान को याद किया और समझाने लायक स्थिति में भी आ गया फिर भी धन की ममता नहीं छोङ पाया! सुपात्र की तलाश करता रहा!*

और दूसरी तरफ, *वो निर्धन नाविक था जिसने सुबह खा लिया, तो शाम का पता नहीं, फिर भी जिसमें पराये धन के प्रति कोई लालसा नहीं, संसार में लिप्त रहकर भी निर्लिप्त रहना आ गया! उसने भगवा नहीं पहना, सन्यास नहीं लिया, पर उस का ईश्वरीय सत्ता में विश्वास जम गया।*

*उसने श्रीमदभगवद्गीता के श्लोक को ना केवल समझा बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में कैसे उतारना है ये सीख गया, और पल भर में धन के मोह को ठुकरा गया।*

*वास्तव में वैरागी कौन?*
*विचार कीजिए।*

*शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलकारी हो।*

अनोखा पात्र

अनोखा पात्र

एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा, “जो भी चाहते हो, मांग लो!

उस राजा के दरवार में दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था।

उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा, “बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।”

सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था!

वह तो जादुई पात्र था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!

सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला, “न भर सकें तो वैसा कह दे। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा !
ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके!”

सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन वह अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा!

तब उस सम्राट ने पूछा, “भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है। उसे भरना मेरी सामर्थ्य से बाहर है।
क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है?”

वह फकीर हंसने लगा और बोला, “कोई विशेष रहस्य नहीं। यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है।
क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय इन सांसारिक द्रव्यों से कभी भी भरा नहीं जा सकता!
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धन से, पद से, सांसारिक ज्ञान से – किसी से भी भरो, वह खाली ही रहेगा क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है। इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है, उतना ही दरिद्र होता जाता है। हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती है। क्यों?*

क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है!
यदि तुम शांति चाहते हो! संतृप्ति चाहते हो! तो अपने संकल्प को कहने दो कि परमात्मा के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।”
अपने हृदय की असली पुकार को सुनो और उसे परमात्मा के आनन्द से भरो!
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एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।

एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे।
रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि *प्रभु – एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ?*

श्री कृष्ण ने कहा – *अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक कुछ भी पूछ सकते हो।*

तब अर्जुन ने कहा कि *मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं?*

यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले कि *आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा।*

🌤श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का पहाड़ बना दिया।

इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि *हे अर्जुन, इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो।*

अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया।

उसने सभी गाँव वालों को बुलाया। उनसे कहा कि *वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया।*

गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए।लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे।उनमे अब तक अहंकार आ चुका था। गाँव के लोग वापस आ कर दोबारा से लाईन में लगने लगे थे। कुछ समय पश्चात अर्जुन काफी थक चुके थे।

लेकिन यह क्या? *जिन सोने की पहाड़ियों से अर्जुन सोना तोड़ रहे थे, उन दोनों पहाड़ियों के आकार में जरा भी कमी नहीं आई थी।*

उन्होंने श्री कृष्ण जी से कहा कि *अब मुझसे यह काम और न हो सकेगा। मुझे थोड़ा विश्राम चाहिए।*

प्रभु ने कहा कि *ठीक है तुम अब विश्राम करो और उन्होंने कर्ण बुला लिया।*

उन्होंने कर्ण से कहा कि *इन दोनों पहाड़ियों का सोना इन गांव वालों में बांट दो।*

कर्ण भी तुरंत सोना बांटने चल दिये। उन्होंने गाँव वालों को बुलाया और उनसे कहा – *यह सोना आप लोगों का है , जिसको जितना सोना चाहिए वह यहां से ले जाये।* ऐसा कह कर कर्ण वहां से चले गए।

यह देख कर अर्जुन ने कहा कि *ऐसा करने का विचार मेरे मन में क्यों नही आया?*

तब भगवान श्री कृष्ण ने जवाब दिया कि *तुम्हे सोने से मोह हो गया था। तुममें कर्ताभाव आ चूका था! तुम खुद यह निर्णय कर रहे थे कि *किस गाँव वाले की कितनी जरूरत है और उतना ही सोना तुम पहाड़ी में से खोद कर उन्हे दे रहे थे। तुम में दाता होने का भाव आ गया था! इसलिय तुमको इस सेवा में अत्यधिक थकान भी हुई और इतनी मेहनत करने के बाद आनंद भी नहीं आया!

दूसरी तरफ कर्ण ने ऐसा नहीं किया। वह सारा सोना गाँव वालों को देकर वहां से चले गए। वह नहीं चाहते थे कि *उनके सामने कोई उनकी जय जयकार करे या प्रशंसा करे। उनके पीठ पीछे भी लोग क्या कहते हैं उस से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिय ना वह थके और न ही उन्होंने मन की शांति को खोया!* यह उस आदमी की निशानी है जिसे आत्मज्ञान हांसिल हो चुका है।

*श्री कृष्ण ने खूबसूरत तरीके से अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया! अर्जुन को भी अब अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।*
हमको भी इस कलियुग में समय के महापुरुष का सानिध्य और सेवा के अवसर कर्ण-अर्जुन की तरह ही मिलते हैं! अब यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि *हम अर्जुन की तरह *कर्ताभाव* के बोझ तले संतापित रहते हैं या कर्ण की तरह अपने को निमित्त्त मात्र समझकर सेवाओं का आनन्द लेते हैं!*

*सेवा के बदले में धन्यवाद या बधाई की उम्मीद करना भी उपहार नहीं सौदा कहलाता है।*
यदि हम किसी भी रूप में सहयोग करना चाहते हैं तो *हमें निमित्त्त मात्र भाव के साथ इस आशा के करना चाहिए कि महापुरुष ने मुझे इस सेवा के लिय चुना ताकि इस सेवा की यादें मुझे ताजिन्दगी प्रफुल्लित कर सके, बजाय इसके पहले कि हममें कर्ताभाव का अहंकार आने लगे।*
*हम सभी के लिय नजदीक और दूर से अब आनन्दित होने के अवसर मिलने जा रहे हैं – जिनका हमें भरपूर लाभ लेना है!*
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आत्मा और प्रभु का चिंतन

*आत्मा और प्रभु का चिंतन*
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*एक बार संत कबीर से किसी ने पूछा, आप दिन भर कपड़ा बुनते रहते हैं तो भगवान का स्मरण कब करते हैं ?*

कबीर उस व्यक्ति को लेकर अपनी झोपड़ी से बाहर आ गए। बोले, यहां खड़े रहो। तुम्हारे सवाल का जवाब सीधे न देकर, मैं उसे दिखा सकता हूं।

*कबीर ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थी।*

उमंग से भरी हुई वह नाचती हुई-सी चली जा रही थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी।

*कबीर ने कहा, उस औरत को देखो। वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा।*

वह प्यासा होगा, उसके लिए वह पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हूं कि उसे गागर की याद होगी या नहीं।

*कबीर की बात सुनकर उस व्यक्ति ने जवाब दिया, उसे गागर की याद नहीं होती तो अब तक तो गागर नीचे ही गिर चुकी होती।*

कबीर बोले, यह साधारण सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करती है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है।

*और तुम मुझे इससे भी गया गुजरा समझते हो कि मैं कपड़ा बुनता हूं और परमात्मा का स्मरण करने के लिए मुझे अलग से वक्त की जरूरत है।*
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*मेरी आत्मा हमेशा उसी में लगी रहती है। कपड़ा बुनने के काम में शरीर लगा रहता है और आत्मा प्रभु के चरणों में लीन रहती है।*
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आत्मा हर समय प्रभु के चिंतन में डूबी रहती है। इसलिए ये हाथ भी आनंदमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं।
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आम का मोह

आम का मोह

एक बार..गुरू ने अपने शिष्य को समझाते हुए, आम के पेंड की कहानी सुनाई –

एक आम का वृक्ष था। जिसमे ढेर सारे आम पके हुए थे, एक दिन उस पेड का मालिक आया और पेड पर चढ़कर सारे आम तोड़ने लगा।

परन्तु आम का एक फल वृक्ष से दूर होने का मोह छोड़ नहीं पाया और वही कहीं पत्तों की आड़ में छिप गया। उस पेड के मालिक को जब लगा कि उसने सारे आम तोड़ लिया है तब वह नीचे उतर गया और वहां से चला गया, यह सब वह छिपा हुआ आम देख रहा था।

फिर दूसरे दिन जब उस आम ने देखा के उसके साथ के सारे आम तो जा चुके हैं केवल उसी का मोह उसे पेड से अलग होने नहीं दे रहा है। उसे अपने मित्र आमों की याद सताने लगी।

वह बार-बार सोचता कि नीचे कूद जाऊ और अपने दोस्तों से जा मिलूँ परन्तु उसे पेड का मोह अपनी ओर खींचने लगता, आम रोजाना इसी सोच में डूबा रहता।

चिंता का यह कीड़ा उसे लगातार काटे जा रहा था जल्द ही वह सूखने लगा और एक दिन वह गुठली और छिलका के रूप में ही बस रह गया, उसके अंदर का सारा रस समाप्त हो गया था।

अब अपना आकर्षण खो देने के कारण उसके तरफ कोई देखता भी नहीं था वह बहुत पछताने लगा कि संसार की कोई सेवा नहीं कर सका, वह लोगों का काम भी नहीं आ सका, आखिरकार एक दिन तेज हवा का झोंका आया और वह डाली टूटकर नीचे गिर गया!

“आम का मोह” कहानी का तात्पर्य या प्रेरणा, सन्देश यह है कि जरुरत से ज्यादा मोह आपको व्यर्थ बना सकता है!

वो कहते हैं ना कि कहीं पहुंचे के लिए कहीं से निकलना बहुत जरुरी होता है।

ठीक उसी तरह सफल होने के लिए मोह का त्याग करना आवश्यक होता है चाहे वह मोह आपके घर परिवार दोस्त आदि का हो, या चाहे आपके कम्फर्ट जोन का!
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सुखी जीवन का रहस्य

सुखी जीवन का रहस्य

एक महान संत हुआ करते थे जो अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे जिसके लिए वो कई लोगो से मुलाकात करते थे | एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था | इसी यात्रा के दौरान उनकी भेंट एक साधारण सी कन्या विदुषी से हुई | विदुषी ने उनका स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर आराम करने की याचना की | संत उसके मीठे व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया |

विदुषी ने संत को अपने हाथो का स्वादिष्ट भोज कराया | और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी | और खुद फर्श टाट बिछा कर सो गई | विदुषी को सोते ही नींद आ गई | उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही हैं | उधर संत को खाट पर नींद नहीं आ रही थी | उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी जो उन्हें दान में मिला था | वो रात भर विदुषी का सोच रहे थे कि वो कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो सकती हैं |

दुसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि – तुम कैसे इस कठोर धरा पर इतने चैन से सो रही थी | तब उसने बड़ी सरलता से उत्तर दिया – हे गुरु देव ! मेरे लिए मेरी ये छोटी सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य हैं | इसमें मेरे श्रम की महक हैं | अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता हैं तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ | जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूँ तो मुझे माँ की गोद का आत्मीय अहसास होता हैं | मैं दिन भर के अपने सत्कर्मो का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ | मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ |

यह सब सुनकर संत जाने लगे | तब विदुषी ने पूछा – हे गुरुवर ! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूँ?
तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया – बालिका ! तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया हैं उससे मुझे पता चला कि चित्त का सुख कहाँ हैं | अब मुझे किसी आश्रम बनाने के लिय इच्छा ही नहीं रह गई |

यह कहकर संत वापस अपने देश लौट गये और एकत्र किया धन उन्होंने गरीबो में बाँट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे |
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शिक्षा :
आत्म शांति एवम संतोष ही सुखी जीवन का रहस्य हैं | जब तक इंसान को संतोष नहीं मिलता वो जीवन की मोह माया में फसा ही रहता हैं और जो इस मोह माया में फसता हैं | उसे कभी चैन नहीं मिलता |

जीवन का सुख संतोष में हैं | अगर मनुष्य जो हैं उसे स्वीकार कर ले और उसी में खुशियाँ तलाशे तो वो उसी क्षण सारे सुख का अनुभव कर लेता हैं | जिस तरह विदुषी एक वक्त के भोजन को ही अपना सौभाग्य मानती हैं | और कठोर धरा पर भी चैन से सोती हैं | उसी कारण उसे जीव में सभी सुखों का अनुभव हुआ हैं | वही एक संत बैरागी होते हुए भी, खाट पर चैन से नहीं सो पा रहा था क्यूंकि उसे अपने पास जो है उससे संतोष नहीं था | जिस दिन उसने यह सत्य स्वीकार लिया, उसे एक कुटिया में भी अपार शांति का अनुभव होने लगा |
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यह कथा सुखी जीवन का रहस्य कहती हैं | आज घर में अपार धन दौलत ऐशो आराम होते हुए थी लोग सुख शांति से नही रहते क्यूंकि उन्हें जो हैं उसमे संतोष नहीं मिलता | कहते हैं ना जिन्हें दुसरो की थाली में घी ज्यादा दिखता हैं वो कभी खुद चैन से नहीं रहते | व्यक्ति को हमेशा वो चाहिये जो उसके पास नहीं हैं |और वो मिल जाए तो नयीं महत्वकांक्षा उसकी जगह ले लेती हैं | इस तरह पूरा जीवन असंतोष में ही बीत जाता हैं और अंत समय में भी चैन नहीं मिलता |

अतः संतुष्टि ही जीवन का मूल मंत्र हैं अगर इंसान में संतोष हैं तो कोई दुःख उसे तोड़ नहीं सकता | यही है – जीवन का रहस्य |

🙏जय सच्चिदानन्द 🙏

वाणी की मधुरता

वाणी की मधुरता

एक बार एक राजा ने स्वप्न में देखा कि उसके सारे दाँत टूट गये है, केवल सामने का एक बड़ा दाँत ही मुँह में बचा है।

सुबह राजा ने दरबार में अपना स्वप्न सुनाया, और उसका प्रतिफल जानना चाहा। मंत्रियों ने सलाह दी कि स्वप्न विशेषज्ञों को बुलाकर स्वप्न का फलादेश पूछा जायें।

राज्य में ढिंढोरा फिरवा कर घोषणा कि गयी कि जो भी विद्वान, ज्ञानी, राजा को उनके स्वप्न का फलादेश बतायेगा, उसे उचित ईनाम दिया जायेगा। कई व्यक्ति दरबार में आये, परन्तु कोई भी राजा को सही जवाब से संतुष्ट नहीं कर सका।

एक दिन एक विद्वान व्यक्ति जिसने काशी से विद्या प्राप्त की थी, दरबार में आया और बोला…..
“महाराज! मैं आपके स्वप्न का सही फलादेश बता सकता हूँ।”

राजा सहित सभी दरबारी जिज्ञासा से उस व्यक्ति की ओर देखने लगे। राजा ने अपना स्वप्न सुनाकर कर कहा, “बताइये मेरे इस स्वप्न का फलादेश क्या है?”

उस व्यक्ति ने कहा.. “राजन! आपका यह स्वप्न तो बहुत बेकार है। इसके फल स्वरूप आपके सामने ही आपके परिवार के सभी सदस्य मर जायेगें और आप सबके बाद मरेगें।”

यह सुनते ही राजा को क्रोध आगया और उस व्यक्ति को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया।

दूसरे दिन एक साधारण सा व्यक्ति दरबार में आया और बोला, “राजन! आप अपना स्वप्न मुझे बताइये, मैं उसका सही फलादेश बताने की कोशिश करुगाँ।”

राजा ने अपना स्वप्न सुनाया,स्वप्न सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर सोचने के बाद बोला, “राजन! यह बहुत ही अच्छा स्वप्न आया हैं आपको।
हम सभी प्रजा जन पर ईश्वर की विशेष कृपा है कि आप जैसे धर्मात्मा, पुण्यात्मा और प्रजापालक राजा को दीर्घायु (लंबी आयु) दी हैं। राजन आपके परिवार में आपकी आयु सबसे लंबी होगी। इस राज्य का यह सौभाग्य है कि आप कई वर्षो तक राज्य करेगें।”

स्वप्न का फलादेश सुनकर राजा बहुत खुश हुआ, और उस व्यक्ति का विशेष सम्मान कर उसे काफी धन दिया।

दोनों ही व्यक्तियों ने स्वप्न का एक ही फलादेश बताया, दोनो का एक ही मतलब था।
फिर भी एक व्यक्ति को बंदी बनाकर जेल भेजा गया और दूसरे को विशेष सम्मान कर उसे धन-दौलत का ईनाम मिला! क्यों?

क्योंकि एक व्यक्ति ने महान विद्वान होते हुए भी अपने उत्तर और बोलने में उचित शब्दो का प्रयोग नहीं किया! जबकि दुसरे व्यक्ति ने, साधारण होते हुए भी अपने उत्तर और बातचीत में उचित और सही शब्दो का प्रयोग किया।

तभी कहा गया है –
शब्द संभाले बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव,
एक शब्द करे औषधि, एक शब्द करे घाव!!

शब्द सम्भाले बोलियेे, शब्द खीँचते ध्यान!
एक शब्द मन घायल करेँ, एक शब्द बढाते मान!!

शब्द मुँह से छूट गया, शब्द न वापस आय!
शब्द जो हो प्यार भरा, शब्द ही मन मेँ समाएं!!

शब्द मेँ है भाव रंग का, शब्द है मान महान!
शब्द ही जीवन रुप है, शब्द ही दुनिया जहान!!

शब्द ही कटुता रोप देँ, शब्द ही बैर हटाएं!
शब्द जोङ देँ टूटे मन, शब्द ही प्यार बढाएं!!

मतलब, उचित, सम्मानित शब्दों के प्रयोग और मीठा और सभ्य बोलने के तरीके से दुश्मन के मन में भी प्यार भर जाता है,और ऐसे ही गलत शब्दों के प्रयोग असभ्य,अमर्यादित व रूखा बोलने के तरीकों से अपनों के दिलो में भी नफरत पैदा कर हो जाती है।
ध्यान रहे, हमें रोज की बोलचाल, बातचीत और व्यवहार में नपे-तुले शब्दों का प्रयोग करना चाहिये! अन्यथा हर दिन महाभारत का सामना करना पड़ सकता है!

हनुमानजी की चुटकी सेवा

हनुमानजी की चुटकी सेवा

अयोध्या में प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक होने के बाद हनुमानजी वहीं रहने लगे। उन्हें तो श्रीराम की सेवा का व्यसन (नशा) था। सच्चे सेवक का लक्षण ही है कि वह आराध्य के चित्त की बात जान लिया करता है। उन्हें पता रहता है कि मेरे स्वामी को कब क्या चाहिए और कब क्या प्रिय लगेगा? श्रीराम को कोई वस्तु चाहिए तो हनुमानजी पहले से लेकर उपस्थित। किसी कार्य, किसी पदार्थ के लिए के लिए संकेत तक करने की आवश्यकता नहीं होती थी।

हनुमानजी की सेवा का परिणाम यह हुआ कि भरत आदि भाइयों को श्रीराम की कोई भी सेवा प्राप्त करना कठिन हो गया। इससे घबराकर सबने मिलकर एक योजना बनाई और श्रीजानकीजी को अपनी ओर मिला लिया। प्रभु की समस्त सेवाओं की सूची बनाई गयी। कौन-सी सेवा कब कौन करेगा, यह उसमें लिखा गया। जब हनुमानजी प्रात:काल सरयू-स्नान करने गए तब अवसर का लाभ उठाकर तीनों भाइयों ने सूची श्रीराम के सामने रख दी। प्रभु ने देखा कि सूची में कहीं भी हनुमानजी का नाम नहीं है। उन्होंने मुसकराते हुए उस योजना पर अपनी स्वीकृति दे दी। हनुमानजी को कुछ पता नहीं था।

दूसरे दिन प्रात: सरयू में स्नान करके हनुमानजी जब श्रीराम के पास जाने लगे तो उन्हें द्वार पर भाई शत्रुघ्न ने रोक दिया और कहा–’ आज से श्रीराम की सेवा का प्रत्येक कार्य विभाजित कर दिया गया है। जिसके लिए जब जो सेवा निश्चित की गयी है, वही वह सेवा करेगा। श्रीराम ने इस व्यवस्था को अपनी स्वीकृति दे दी है।’

हनुमानजी बोले— ‘जब प्रभु ने स्वीकृति दे दी है तो उसमें कहना क्या है? सेवा की व्यवस्था बता दीजिये, अपने भाग की सेवा में करता रहूंगा।’

सेवा की सूची सुना दी गयी, उसमें हनुमानजी का कहीं नाम नहीं था। उनको कोई सेवा दी ही नहीं गयी थी क्योंकि कोई सेवा बची ही नहीं थी। सूची सुनकर हनुमानजी ने कहा—‘इस सूची में जो सेवा बच गयी, वह मेरी होनी चाहिए।’

सबने तुरन्त सिर हिलाया और कहा, ’हां, वह सेवा आपके हिस्से की!’
हनुमानजी ने कहा— ‘इस पर भी प्रभु की स्वीकृति भी मिलनी चाहिए।’ और श्रीराम जी ने भी इस बात पर अपनी स्वीकृति दे दी।

स्वामी श्रीराम का जिस प्रकार कार्य सम्पन्न हो, हनुमानजी वही उपाय करते हैं, उन्हें अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की जरा भी चिन्ता नहीं रहती थी।

हनुमानजी बोले—‘मेरे प्रभु को जब जम्हाई आएगी, तब उनके सामने चुटकी बजाने की सेवा मेरी।’

यह सुनकर सब चौंक गये। इस सेवा पर तो किसी का ध्यान गया ही नहीं था। लेकिन अब क्या करें? अब तो इस पर प्रभु की स्वीकृति भी मिल चुकी थी।

चुटकी सेवा के कारण हनुमानजी राज सभा में दिन भर श्रीराम के चरणों के पास उनके मुख की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे क्योंकि जम्हाई आने का कोई समय तो है नहीं। रात्रि हुई, स्नान और भोजन करके श्रीराम अंत:पुर में विश्राम करने पधारे तो हनुमानजी उनके पीछे-पीछे चल दिए। द्वार पर सेविका ने रोक दिया—‘आप भीतर नहीं जा सकते।’

हनुमानजी वहां से हट कर राजभवन के ऊपर एक कंगूरे पर जाकर बैठ गए और लगे चुटकी बजाने।

पर यह क्या हुआ?
श्रीराम का मुख तो खुला रह गया। न वे बोलते हैं, न संकेत करते हैं, केवल मुख खोले बैठे हैं। श्रीराम की यह दशा देखकर जानकीजी व्याकुल हो गईं। तुरन्त ही माताओं को, भाइयों को समाचार दिया गया। सब चकित और व्याकुल पर किसी को कुछ सूझता ही नहीं। प्रभु का मुख खुला है, वे किसी के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं।

अंत में गुरु वशिष्ठ बुलाए गये। प्रभु ने उनके चरणों में मस्तक रखा; किन्तु मुंह खुला रहा, कुछ बोले नहीं।

वशिष्ठजी ने इधर-उधर देखकर पूछा—‘हनुमान कहां हैं, उन्हें बुलाओ तो?’

जब हनुमानजी को ढूंढ़ा गया तो वे श्रीराम के कक्ष के कंगूरे पर बैठे चुटकी बजाए जा रहे हैं, नेत्रों से अश्रु झर रहे हैं, शरीर का रोम-रोम रोमांचित है, मुख से गद्गद् स्वर में कीर्तन निकल रहा है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम।’

भाई शत्रुघ्न ने हनुमानजी से कहा—‘आपको गुरुदेव बुला रहे हैं।’ हनुमानजी चुटकी बजाते हुए ही नीचे पहुंचे।

गुरुदेव ने हनुमानजी से पूछा—‘आप यह क्या कर रहे हैं?’

हनुमानजी ने उत्तर दिया—‘प्रभु को जम्हाई आए तो चुटकी बजाने की सेवा मेरी है। मुझे अन्तपुर में जाने से रोक दिया गया। अब जम्हाई का क्या ठिकाना, कब आ जाए, इसलिए मैं चुटकी बजा रहा हूँ, जिससे मेरी सेवा में कोई कमी न रह जाए।’

वशिष्ठजी ने कहा—‘तुम बराबर चुटकी बजा रहे हो, इसलिए श्रीराम को तुम्हारी सेवा स्वीकार करने के लिए जृम्भण मुद्रा (उबासी की मुद्रा) में रहना पड़ रहा है। अब कृपा करके चुटकी बजाना बंद कर दो।’

श्रीराम के रोग का निदान सुनकर सबकी सांस में सांस आई। हनुमानजी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया तो प्रभु ने अपना मुख बंद कर लिया।

अब हनुमानजी हंसते हुए बोले—‘तो मैं यहीं प्रभु के सामने बैठूँ? और सदैव सभी जगह जहां-जहां वे जाएं, उनके मुख को देखता हुआ साथ बना रहूँ, क्योंकि प्रभु को कब जम्हाई आएगी, इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है।’

प्रभु श्रीराम ने कनखियों से जानकीजी को देखकर कहा, मानो कह रहे हों—‘और करो सेवा का विभाजन ! हनुमान को मेरी सेवा से वंचित करने का फल देख लिया।’

स्थिति समझकर वशिष्ठजी ने कहा—‘यह सब रहने दो, तुम सब जैसे पहले सेवा करते थे, वैसे ही करते रहो।’

अब भला, गुरुदेव की व्यवस्था में कोई क्या कह सकता था। उनका आदेश तो सर्वोपरि है।

यही कारण है कि श्रीराम-पंचायतन में हनुमानजी छठे सदस्य के रूप में अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में निरन्तर उनके मुख की ओर टकटकी लगाए हाथ जोड़े बैठे रहते हैं।

हनुमानजी की सेवा के अधीन होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा—
कपि-सेवा बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ।
देबेको न कछू रिनियाँ हौं, धनिक तूँ पत्र लिखाउ।।
(विनय-पत्रिका पद 10017)
‘भैया हनुमान ! तुम्हें मेरे पास देने को तो कुछ है नहीं; मैं तेरा ऋणी हूँ तथा तू मेरा धनी (साहूकार) है। बस इसी बात की तू मुझसे सनद लिखा ले।’
इसलिय एक भजन में किसी भक्त ने अपने भाव रखे हैं कि – भक्तों से ज्यादा तुमको कोई और प्यारा ना हुआ..

यह कभी न भूलें कि – हमारे प्रभु सर्वज्ञ है, अन्तर्यामी हैं और उनको हर भक्त के भावों का पता है! किसको, कब, कहाँ और कैसी सेवा देनी है वे बेहतर जानते हैं!