एक महान संत थे जो बहुत ही प्रचंड तपस्वी थे। उन्हें कई शास्त्रों का ज्ञान था। कई श्लोक मुँह जबानी याद थे।

एक महान संत थे जो बहुत ही प्रचंड तपस्वी थे। उन्हें कई शास्त्रों का ज्ञान था। कई श्लोक मुँह जबानी याद थे।

उनकी बुद्धिमानी के चर्चे मीलो तक थे। संत दिन रात प्रत्येक पल भगवान् की भक्ति में लगे रहते थे। कठिन से कठिन तपस्या करते थे लेकिन *उन्हें सेवा में रूचि नहीं थी।* उन्हें लगता था कि *सेवा से ज्ञान नहीं मिलता। केवल ईश्वर के ध्यान से ही जीव तरता है।*

इसलिए वे दिन रात ईश्वर भक्ति में तल्लीन रहते थे। ना उन्हें किसी अन्य से लेना था ना देना। ना किसी का भला करते थे और ना ही बुरा। ऐसे व्यक्ति से समाज को कोई खतरा नहीं होता। उन्हें लोग अच्छा ही मानते हैं। इसी कारण इनकी प्रसिद्धी सभी जगह थी।

एक दिन, संत अपनी साधना के लिए वट वृक्ष के नीचे बैठे। अचानक ही वही बैठे- बैठे उनके प्राण निकल गये। मृत्यु के बाद जब उनके सामने चित्रगुप्त आये तो उन्होंने संत को कहा- *हे तपस्वी! तुम्हारी तपस्या और ईश्वर भक्ति को देख कर, तुम्हे एक कुलीन, प्रतिष्ठित परिवार में अगला जन्म दिया जायेगा।*

यह सुनकर संत दुखी स्वर में बोले – *हे चित्रगुप्त! मैंने वर्षो तपस्या की, उसमे कोई कमी नहीं रखी। किसी प्राणी को दुःख नहीं दिया। फिर भी मुझे मोक्ष की प्राप्ति क्यूँ नहीं हो रही?* इस पर चित्रगुप्त ने संत को धर्मराज के सामने पैश किया।

संत ने अपनी सारी व्यथा धर्मराज से कही। अपने सारे धार्मिक कर्म कांड के बारे में विस्तार से कहा। यह सब सुनकर धर्मराज मुस्कराये और उन्होंने कहा – *हे वत्स! वास्तव में तुम असली धर्म को जान ही नहीं पाये। मुझे पता हैं तुमने कठिन से कठिन तप किया। किसी को कष्ट नहीं दिया लेकिन तुमने न तो अपने आप को जाना और ना ही परोपकार किया।*

अपने अर्जित ज्ञान से किसी अज्ञानी की मदद नहीं की। किसी भटके राही को सही मार्ग नहीं दिखाया। वास्तव में तुम जानते ही नहीं हो कि सेवा भाव ही मानव जीवन का आधार होना चाहिये।*

इस तरह संत को अपनी भूल का ज्ञान हुआ और उन्होंने सेवा भाव को भी जीवन का लक्ष्य बनाने का प्रण लिया फिर उन्हें वर्षो बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई।

वास्तव में इन्सान को यह पता ही नहीं होता कि *मनुष्य का असली धर्म क्या है!* वो तो दिन रात सुने-सुनाई बातों में लगा रहता है! इसलिय यह समझना आवश्यक है कि – *अपने आप को जानना! ही असली धर्म है!* जो समय के सदगुरु से प्राप्त हो सकता है!
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मन का पात्र शुद्ध कीजिए

❤️मन का पात्र शुद्ध कीजिए ❤️

एक साधु अपने एक शिष्य के साथ यात्रा को गया! मरुस्थल में मार्ग खो गया। बड़ी प्यास लगी थी। गला सूख रहा था।

किसी तरह खोज कर एक छोटा सा झरना मिल गया। बड़े प्रसन्न हुए। न केवल झरना मिला, बल्कि झरने के पास ही पड़ा एक पात्र भी मिल गया, क्योंकि उनके पास पात्र भी न था। उनके आनंद का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने उस पात्र में झरने का पानी भरा, लेकिन जब पीने गए तो वह इतना तिक्त और कड़वा था, जहरीला था, कि घबड़ा गए कि यह तो पीने लायक नहीं है और आगे निकल गए।

उस झरने को तो छोड़ा! जल की तलाश में निकल पड़े लेकिन पात्र को साथ ले लिया। दूसरे झरने पर जाकर पानी पीया, वह भी जहरीला था। अब तो बहुत घबरा गए कि मौत निश्चित है। जल सामने है, पी नहीं सकते। कण्ठ सूख रहा है। बेबस से फिर चलने लगे।

तीसरे झरना भी मिल गया! पात्र में जल भरा, लेकिन पानी पीया तो वह भी कड़वा था। वह बहुत हैरान और हताश हो गये पर तीसरे झरने पर एक और आदमी, एक साधु बैठा था। उससे उन्होंने कहा कि *हमें समझ नहीं आ रहा कि यह मामला क्या है।*

अपनी व्यथा उस साधु को बतायी। उस साधु उन्हें ने गौर से देखा और कहा कि *झरने का जल तो कड़वे नहीं है , जरूर तुम्हारे पात्र में कुछ खराबी होगी। क्योंकि मैं तो इन्हीं झरनों के जल पी कर जी रहा हूं। तुम झरने से सीधा पानी पीओ, इस पात्र में जल मत भरो।*

सीधा पानी पीया तो *ऐसा मीठा पानी कभी पीया ही न था।* इसका मतलब वह पात्र गंदा था। उस पात्र के संसर्ग में आते ही शुद्ध और मीठा जल भी ग्रहण करने योग्य नहीं रहता था।

यही हम सब की दुविधा है।अपना ही पात्र स्वच्छ नहीं और हम‌ दूसरों को दोषी कहते हैं।
*यदि प्रभु को पाने की चाह है, भक्ति करनी है तो अपने मन रूपी पात्र को साफ करना अति आवश्यक है। भक्ति रूपी गंगा जल तभी तो आप ग्रहण कर सकेंगे।*

*मन से तृष्णा मरी नहीं, लालच गयो, न काम!*
*विषय कोठरी भरी पड़ी, कहां विराजें श्रीराम!!*
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भक्तों की दरिद्रता

भक्तों की दरिद्रता

जगत-जननी पार्वतीजी ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो वे दौड़ी-दौड़ी ओघड़दानी शंकरजी के पास गयीं और कहने लगीं, “भगवन् ! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पिघलता। कम-से-कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर अपनी कई दिन की भूख शान्त कर रहा है।”

महादेव ने हँसते हुए कहा, “शुभे ! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ?”

माँ भवानी आश्चर्य से बोलीं, “तो क्या आपके भक्तों को उदर पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?”
श्रीशिवजी ने कहा, “परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।”

भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली, “बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?”

भर्तृहरि ने कहा, अवश्य! भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगाकर बैठे ही थे कि भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया, “बेटा ! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ! एक बुड्ढा पति भी है! उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।”

भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा।

उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी, “वत्स ! तुम कहाँ जा रहे हो?”

भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं।

माता बोलीं, “मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।”

प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा, “अभी तो आप अपनी और अपने पति की क्षुधा शान्त करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा? ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू?”

पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा, “मैं सर्वशक्तिमती हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।”

भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, “यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन-दुःखियों के लिए लगाता रहूँ और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।”

पार्वती जी “एवमस्तु” कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “भद्रे ! मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परन्तु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते हैं!
कहा भी है कि –
गो धन, गज धन, बाजी धन और रतन धन खान!
जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरी समान!!

मृत्यु के लिये प्रवेश!

मृत्यु के लिये प्रवेश!
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वाराणसी के एक गेस्ट हाउस का एकाउंट है, जहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं। इसे “काशी लाभ मुक्ति भवन” कहा जाता है।

एक हिंदु मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है, प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने वाराणसी जाने का फैसला किया, यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा, जिन्होंने
न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो।

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया। उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे। इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा, “शुक्ला जी, आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे।”

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये। लेकिन इस श्रृंखला में एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया, वह जीवन का पाठ है- “जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें।

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे, जिनका नाम राम सागर मिश्रा था। मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया। इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई, अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में, मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14वें दिन मिश्रा जी ने, 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा, “यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है। मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ।”

16वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया। जल्द ही, उनके सबसे छोटा भाई आ गए। मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा। उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया। उनका चेहरा शांत हो गया और वह उसी क्षण वह चल बसे।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे केवल अपनी यात्रा के समय इसे छोड़ना चाहते हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा की ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए। किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि
कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है। सोचें…क्या कुछ ऐसा है या कोई है जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए।

एक बार किसी ने कबीर जी से पूछा कि – आप “किसको भज रहे हो जी?”

एक बार किसी ने कबीर जी से पूछा कि – आप “किसको भज रहे हो जी?”

कबीर जी ने कहा – “राम जी को”
फिर उसने पूछा गया “कौन से राम जी को?” क्योंकि मैंने सुना है राम तो कई हैं।

एक राम दसरथ कर बेटा
एक राम घट घट में लेटा,
एक राम है जगत पसारा
और एक राम है सभी से न्यारा।”

तो कबीर साहिब को हंसी आ गई और कबीर साहिब थोड़ा टेढ़ा बोल देते थे, यानी दिल पर चुभ जाये ऐसी बात।

तो उन्होंने कहा:–“तुम्हारी दृष्टि में राम चार है तो मेरी दृष्टि में तुम्हारे बाप भी चार है।”

व्यक्ति को गुस्सा आया और बोला कि महाराज ऐसे कैसे बोल रहे हो।

तो कबीर जी बोले कि भाई क्रोद्ध मत करो। मैं तुम्हे चारों गिना देता हूँ !

एक बाप तेरे चाचा को भाई,
एक बाप तेरे दादा को जायो
एक बाप तेरे नाना को जवाई
एक बाप तेरे फूफा को सालो।
तो उस आदमी ने कहा:- “महाराज ये तो चारो एक ही है।*

तब कबीर साहिब बोले जैसे ये चारों एक है, वैसे ही मेरो राम भी एक ही है!

सोई राम अवधेश का राजा
सोई राम दसरथ कर बेटा
सोई राम घट घट में लेटा
सोई राम है जगत पसारा
सोई राम है सभी से न्यारा।

अतः राम तो एक ही है।
जरूरत है उसका दीदार जीते जी अपने अंतरतम में करने की!
🙏🏻🙏🏻🙏🏻

काल के दूत आने पर

काल के दूत आने पर

एक साहब ने तोता पाल रखा था और उस से बहोत प्रेम करते थे!
एक दिन एक बिल्ली उस तोते पर झपटी और तोता उठा कर ले गई वो साहब रोने लगे!
तो लोगो ने कहा: भाई आप क्यों रोते हो? हम आपको दूसरा तोता ला देते हैं!

वो साहब बोले: मैं तोते की जुदाई पर नही रो रहा हूं।

उनसे पूछा गया कि फिर क्यों रो रहे हो?

वो साहब कहने लगे दरअसल बात ये है कि मैंने उस तोते को मंत्र सिखा रखा था और वो सारा दिन मंत्र रटता रहता था! आज जब बिल्ली उस पर झपटी तो वो मंत्र पढ़ना भूल गया और टाएं टाएं करने लगा! अब मुझे ये फिक्र खाए जा रही है कि मंत्र तो मैं भी पढ़ता हूँ लेकिन जब काल के दूत मुझ पर झपटेगें, न मालूम मेरी जबान से मंत्र निकलेगा या तोते की तरह टाएं-टाएं निकलेगी।

इसीलिए महापुरुष कहते हैं कि ज्ञान का अभ्यास करके इतना अभ्यस्त हो जाओ कि हर हर स्थिति में ध्यान परमात्मा में ही लगा रहे! भगवान के सिवाय और कुछ दिखाई न दे!

ध्यान रहे, कहीं ऐसा न हो कि अभ्यास की कमी के कारण हम भी तोते की तरह भगवान के नाम की जगह हाय-हाय करने लगें!

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हमारे संतों ने श्रद्धा को विश्वास से भी ऊपर का दर्जा दिया है। 

हमारे संतों ने श्रद्धा को विश्वास से भी ऊपर का दर्जा दिया है। विश्वास और अविश्वास दोनों ही तर्क से जीते हैं। इन दोनों का भोजन तर्क है। नास्तिक तर्क देता है कि ईश्वर नहीं है। आस्तिक तर्क देता है कि ईश्वर है। लेकिन दोनों ही तर्क देते हैं और तर्क पर ही भरोसा करते हैं। मतलब, विश्वास और अविश्वास दोनों ही तर्क से चलते हैं।

लेकिन श्रद्धा बहुत बड़ी अनुभूति का नाम है। श्रद्धा के सामने तर्क नाकाफी हैं। श्रद्धा की शुरुआत ही इस बात से होती है कि तर्क पर्याप्त नहीं हैं!*

जिस व्यक्ति को यह दिखने लग जाता है कि तर्क की सीमा से आगे कुछ और भी है, उस व्यक्ति का जीवन श्रद्धा से भरपूर हो जाता है।
क्योंकि वह जान जाता है कि जीवन खुद तर्क से बाहर की कहानी है।

अगर आप ना होते तो आप किसी से भी नहीं कह सकते थे कि मैं क्यों नहीं हूं? आप हैं तो आप किसी से पूछ नहीं सकते कि मैं क्यों हूं?

महापुरुषों ने गहरी राज की बात बताई है कि जिंदगी के पास कोई तर्क नहीं है! प्रेम बिना तर्क के है! प्रार्थना भी बिना तर्क के है। इस जीवन में जो भी गहरा और महत्वपूर्ण है, वह सब तर्क से समझ नहीं आ सकता! गहरी बातें तर्क की पकड़ में आती ही नहीं और तर्क चूक जाता है! जिसको तर्क के अतर्क का पता चल जाता है – उसके कदम श्रद्धा की ओर चल पड़ते हैं। क्योंकि जब तर्क देने वाली बुद्धि थक जाती है – तो भी जीवन चलता रहता है!

मन बुद्धि और तर्कों से परे का *परम सत्य बहुत विराट है। उसकी सीमायेँ बड़ी अनंत है। उस तक पहुंचने के लिए व्यक्ति को कहीं आने-जाने की भी जरूरत नहीं है केवल उसके अन्दर श्रद्धा होनी चाहिय!* इसीलिय ही कहा गया है कि – श्रद्धावान लभते ज्ञानम!

श्रद्धा से जब ज्ञान मिलता है तो उसके बाद गुरु के वचनों के पालन में भी श्रद्धापूर्ण भाव का होना जरुरी है! तभी सेवा, सत्संग और सुमिरण का आनन्द मिल सकता है!

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एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था | एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |

एक संन्यासी सारी दुनिया की यात्रा करके भारत वापस लौटा था | एक छोटी सी रियासत में मेहमान हुआ |

उस रियासत के राजा ने जाकर संन्यासी को कहा :
*स्वामी, एक प्रश्न बीस वर्षो से निरंतर पूछ रहा हूं | कोई उत्तर नहीं मिलता |
क्या आप मुझे उत्तर देंगे?*

उस संन्यासी ने उस राजा से कहा : नहीं, आज तुम खाली नहीं लौटोगे| निश्चित दूंगा| पूछो|

उस राजा ने कहा : मैं ईश्वर से मिलना चाहता हूं | ईश्वर को समझाने की कोशिश मत करना| मैं सीधा मिलना चाहता हूं|
〰️⭕〰️
उस संन्यासी ने कहा : अभी मिलना चाहते हैं कि थोड़ी देर ठहर कर?
राजा ने कहा: माफ़ करिए , शायद आप समझे नहीं| मैं परम पिता परमात्मा की बात कर रहा हूं, आप यह तो नहीं समझे कि किसी ईश्वर नाम वाले आदमी की बात कर रहा हूं ; जो आप कहते हैं कि अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हो?

उस संन्यासी ने कहा : महानुभाव, भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है| मैं तो चौबीस घंटे परमात्मा से मिलाने का धंधा ही करता हूं| अभी मिलना है कि थोड़ी देर रुक सकते हैं, सीधा जवाब दें|

तुम तो बीस साल से भगवान से मिलने को उत्सुक हो और आज वक्त आ गया तो मिल लो|
राजा ने हिम्मत की और उसने कहा : अच्छा मैं अभी मिलना चाहता हूं मिला दीजिए|
〰️🔅🌞🔅〰️

संन्यासी ने कहा : इस छोटे से कागज पर अपना नाम पता लिख दो ताकि मैं भगवान के पास पहुंचा दूं कि आप कौन हैं|

राजा ने अपना नाम, अपना महल का नाम, अपना परिचय, अपनी उपाधियां लिखकर उन्हें दी!

तब वह संन्यासी बोला कि महाशय, ये सब बाते मुझे झूठ और असत्य मालूम होती हैं जो आपने कागज पर लिखीं|

राजा हतप्रभ था कि इस सन्यासी को मेरे परिचय पर संदेह क्यों हो रहा होगा?

उस संन्यासी ने कहा : मित्र, अगर तुम्हारा नाम बदल दें तो क्या तुम बदल जाओगे? तुम्हारी चेतना, तुम्हारी सत्ता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूसरा हो जाएगा?

उस राजा ने कहा : नहीं, नाम के बदलने से मैं क्यों बदलूंगा? नाम, नाम है, मैं, मैं हूं!

तो संन्यासी ने कहा : एक बात तय हो गई कि नाम तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि तुम उसके बदलने से बदलते नहीं| आज तुम राजा हो, कल गांव के भिखारी हो जाओगे तो के बदल जाओगे?

उस राजा ने कहा : नहीं, अगर मेरा राज्य चला जाएगा, मैं भिखारी भी हो जाऊंगा, लेकिन मैं क्यों बदल जाऊंगा? मैं तो जो हूं हूं| राजा होकर जो हूं, भिखारी होकर भी वही रहूँगा! अगर महल, राज्य और धन- संपति नहीं भी होगी तो भी मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं!

फिर संन्यासी ने कहा : तो तय हो गई दूसरी बात कि राज्य तुम्हारा परिचय नहीं है, क्योंकि राज्य छिन जाए तो भी तुम बदलते नहीं|
अब ये बताओ तुम्हारी उम्र कितनी है?

उसने कहा : चालीस वर्ष!

संन्यासी ने कहा: तो पचास वर्ष के होकर क्या तुम दूसरे हो जाओगे? जब तुम बीस वर्ष या जब बच्चे थे लो क्या तब दुसरे थे?

उस राजा ने कहा : नही! उम्र बदलती है, शरीर बदलता है लेकिन मैं कभी नहीं बदला! मैं तो जो बचपन में था, जो मेरे भीतर था, वह आज भी है!

उस संन्यासी ने कहा : अब तो उम्र भी तुम्हारा परिचय न रहा, शरीर भी तुम्हारा परिचय न रहा! अब अपना असली परिचय लिखकर दो कि असलियत में तुम कौन हो? अगर उसे लिख दोगे तो मैं उसे भगवान के पास पहुंचा दूंगा, अन्यथा गलत जानकारी देने की वजह से मैं भी झूठा बनूंगा तुम्हारे साथ! अभी तक तुम खुद बतला चुके कि अब तक का दिया परिचय तुम्हारा नहीं है|

राजा बोला : अब तो बड़ी कठिनाई हो गई| उसे तो मैं भी नहीं जानता! आखिर जो मैं हूं , उसे तो मैं नहीं जानता! अब तक मैं इन्हीं को अपना परिचय समझता था!

उस संन्यासी ने कहा : मेरे लिय भी यह धर्म संकट है कि जिसका मैं परिचय भी न दे सकूं, बता भी न सकूं कि कौन मिलना चाहता है, तो भगवान भी क्या कहेंगे कि किसको मिलाना चाहता है?
〰️🌞〰️

तो जाओ पहले इसको खोज लो कि तुम कौन हो |
और मैं तुमसे वादा करता हूं कि जिस दिन तुम यह जान लोगे कि तुम कौन हो, उस दिन तुम्हें भगवान को खोजने की जर्रूरत भी नहीं पड़ेगी क्योंकि खुद को जानने में ही वह भी जान लिया जाता है – जो परमात्मा है यानी जिसने खुद को जान लिया उसके परमात्मा को पा लिया!
खुद के बोध के लिय सदगुरु की शरणागत होना होगा तभी साक्षात् परम ब्रह्म का दीदार हो पायेगा!
जिसने भी वह दीदार अपने अन्दर ही जीते जी किया उसने यही अनुभव किया कि –

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः, गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अर्थात्, गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु ही शंकर हैं। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे सद्गुरु को मेरा प्रणाम!

लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं?

लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं?

एक संत भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवत चला रहे थे। वे रोज अलग-अलग गांवों में जाकर भिक्षा मांगते थे। एक दिन वे गांव के बड़े सेठ के यहां भिक्षा मांगने पहुंचे। सेठ ने संत को थोड़ा अनाज दिया और बोला कि गुरुजी मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं।

संत ने सेठ से अनाज लिया और कहा कि ठीक है पूछो।
सेठ ने कहा कि मैं ये जानना चाहता हूं कि लोग लड़ाई-झगड़ा क्यों करते हैं?
संत कुछ देर चुप रहे और फिर बोले कि मैं यहां भिक्षा लेने आया हूं, तुम्हारे मूर्खतापूर्ण सवालों के जवाब देने नहीं आया।

ये बात सुनते ही सेठ एकदम क्रोधित हो गया। उसने खुद से नियंत्रण खो दिया और बोला कि तू कैसा संत है, मैंने दान दिया और तू मुझे ऐसा बोल रहा है।

सेठ ने गुस्से में संत को खूब बातें सुनाई। संत चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने एक भी बार पलटकर जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद सेठ का गुस्सा शांत हो गया, तब संत ने उससे कहा कि भाई जैसे ही मैंने तुम्हें कुछ बुरी बातें बोलीं, तुम्हें गुस्सा आ गया। गुस्से में तुम मुझ पर चिल्लाने लगे। अगर इसी समय पर मैं भी क्रोधित हो जाता तो हमारे बीच बड़ा झगड़ा हो जाता!

इसलिय
क्रोध ही हर झगड़े का मूल कारण है
और शांति हर विवाद को खत्म कर सकती है।
अगर
हम क्रोध ही नहीं करेंगे तो कभी भी वाद-विवाद नहीं होगा।
जीवन में सुख-शांति चाहते हैं तो क्रोध को नियंत्रित करना चाहिए और क्रोध को काबू करने के लिए रोज ज्ञान का अभ्यास करें!

आपका जीवन आनन्दमय बना रहे!

अंत समय के बोल

🌷 अंत समय के बोल 🌷

एक सज्जन ने तोता पाल रखा था और उस से बहुत स्नेह करते थे,एक दिन एक बिल्ली उस तोते पर झपटी और तोता उठा कर ले गई । वो सज्जन रोने लगे तो लोगो ने कहा: महाश्य आप क्यों रोते हो?
हम आपको दूसरा तोता ला देते हैं तब वो सज्जन बोले: मैं तोते के दूर जाने पर नही रो रहा हूं।

पूछा गया: फिर क्यों रो रहे हो?

कहने लगे: दरअसल बात ये है कि मैंने उस तोते को रामायण की चौपाइयां सिखा रखी थी वो सारा दिन चौपाइयां बोलता रहता था
आज जब बिल्ली उस पर झपटी तो वो चौपाइयाँ भूल गया और टाएं टाएं करने लगा ।
अब मुझे ये फिक्र खाए जा रही है कि रामायण तो मैं भी पढ़ता हूँ । लेकिन जब यमराज मुझ पर झपटेगा, तब क्या मालूम मेरी जिव्हा से रामायण की चौपाइयाँ निकलेंगी या तोते की तरह टाएं-टाएं निकलेगी।
इसीलिए महापुरुष कहते हैं । कि विचार-विचार कर तत्त्वज्ञान और रुपध्यान इतना पक्का कर लो । कि हर समय, हर जगह भगवान के सिवाय और कुछ दिखाई न दे,
हर समय जिह्वा पर राधे-राधे या राम-राम चलता रहे। अन्तिम समय ऐसा न हो हम भी तोते की तरह भगवान के नाम की जगह हाय-हाय करने लगे..!!