जब हनुमान ने सभा के बीच अपना हृदय चीर दिया
भक्ति का वह क्षण, जिसने अयोध्या को रुला दिया “
अयोध्या की एक सभा उस क्षण इतिहास बन गई, जब भक्ति ने शब्दों से नहीं, हृदय से उत्तर दिया। देवी सीता द्वारा अर्पित हार से उठा एक साधारण-सा प्रश्न, पवनपुत्र हनुमान की भक्ति के माध्यम से परम सत्य में बदल गया। वह दृश्य केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि जहाँ प्रेम निष्काम हो और सेवा निरहंकार, वहीं सच्ची भक्ति निवास करती है।
अयोध्या की वह रात सामान्य नहीं थी।
रात गहरी थी। अयोध्या में दीपक बुझ चुके थे, पर राजमहल के प्रांगण में एक दीप अभी भी टिमटिमा रहा था। वह दीपक न तेल से जल रहा था, न बाती से, वह किसी और ही अग्नि से प्रज्वलित था – भक्ति की अग्नि से। उस दीप के सामने वानर रूप में बैठा था – पवनपुत्र हनुमान।
श्रीराम के अयोध्या लौटे कई वर्ष हो चुके थे। राज्य में समृद्धि थी, शांति थी, पर हनुमान के हृदय में एक गहरा कंपन था। सेवा करने का अवसर मानो कम हो गया था; न लंका थी, न सेतु था, न कोई युद्ध, न कोई संकट। अब सब ठीक था – बस यही बात हनुमान जी को बेचैन कर रही थी।
उन्होंने अकेले में कहा –
“प्रभु… जब तक आप वन-वन भटक रहे थे, तब तक मेरा हर श्वास सेवा में था। अब जब सब कुछ सुन्दर है, तो मेरी साँसें खाली क्यों लग रही हैं?”
उस रात वे राजमहल के पिछवाड़े वाले बाग़ में जाकर एक कोने में बैठ गए। चाँदनी उनके कंधों पर गिर रही थी, पर उनके भीतर अंधेरा घना था।
कुछ ही दिन बाद अयोध्या में एक भव्य यज्ञ का आयोजन हुआ। राज्य के कोने-कोने से ऋषि, मुनि, देवदूत, साधु–संत आए। सबके लिए वस्त्र, आभूषण, रत्न और धन की व्यवस्था की गई। जो भी यज्ञ में सेवा करता, उसे राम स्वयं पुरस्कृत करते।
यज्ञ के अंतिम दिन श्रीराम ने घोषणा की –
“जो भी इस यज्ञ में सेवा और भक्ति से जुड़ा है, उसे आज सम्मान दिया जाएगा।”
सभा में उल्लास फैल गया। सबने मन ही मन सोचा, “आज कुछ न कुछ तो मिलेगा।” वहाँ हनुमान भी थे, पर उनकी आँखें बस राम के चरणों पर टिकी थीं, किसी उपहार पर नहीं।
पहले लक्ष्मण को सम्मान मिला, फिर भरत, शत्रुघ्न, फिर कई योद्धा, मंत्री, ऋषि। सबको रत्न, हार, वस्त्र, भूमि–दान मिलते गए। अंत में सीता माता उठीं। उनके हाथ में चमकता हुआ, बहुमूल्य हीरों का एक हार था।
माता सीता ने प्रेम से कहा –
“यह हार मैं उस पर अर्पित करती हूँ, जिसकी भक्ति और सेवा मेरे राम के लिए सर्वश्रेष्ठ हो।”
सभामंडप में खामोशी छा गई। सबकी नज़रें हनुमान की ओर घूमने लगी। कई मन में बोले – “निश्चय ही यह हार हनुमान को मिलेगा।”
सीता जी हँसकर हनुमान की ओर बढ़ीं और वह चमकता हार उनके हाथों में रख दिया।
हनुमान जी ने हार को हाथ में लिया, कुछ क्षण उसे निहारा, फिर एक–एक कर मोतियों और हीरों को तोड़ने लगे। वे हाथ से रत्न निकालकर दाँतों से चबा–चबाकर फेंकते जा रहे थे, और आँखों में तपता हुआ आँसू भर आया था।
सभा में हलचल मच गई।
एक योद्धा क्रोध से बोला –
“हनुमान जी! यह क्या कर रहे हैं? इतना कीमती हार… आप उसे नष्ट कर रहे हैं!”
दूसरा बोला –
“देवी सीता का प्रसाद है यह… और आप इसे चबा–चबा कर फेंक रहे हैं? क्या आपको इसका मूल्य नहीं पता?”
माता सीता ने भी आश्चर्य से पूछा –
“हनुमान, तुम यह क्या कर रहे हो? यह रत्न तुम्हें सम्मान के रूप में दिया गया था।”
हनुमान का हृदय काँप रहा था, पर स्वर में अटूट विनम्रता थी। उन्होंने टूटे हुए रत्नों को देखते हुए धीमे से कहा
“माते, मैं तो बस यह देखने की कोशिश कर रहा था कि इनमें मेरा प्रभु राम और आप विराजमान हैं या नहीं। जहाँ मेरे राम नहीं, वहाँ यह चमक मेरे लिए धूल से अधिक क्या है?”
सभा स्तब्ध रह गई।
एक मंत्री ने तंज से कहा –
“तो हनुमान जी, क्या आपके अंदर भी श्रीराम बसे हैं? या आपका शरीर भी बस मांस–हड्डियों से बना है?”
सवाल व्यंग्य था, पर हनुमान ने उसे प्रश्न समझकर उत्तर देने का निश्चय किया।
हनुमान जी कुछ क्षण मौन रहे। फिर धीरे से मुस्कुराए। उनकी आँखों में पानी था, पर चेहरा दीपक की लौ जैसा शांत था।
उन्होंने कहा –
“यदि मेरे भीतर राम नहीं, तो मेरा अस्तित्व ही व्यर्थ है। यदि मेरे रक्त–कण–कण में राम न हों, तो यह देह बोझ है।”
फिर उन्होंने अपने दोनों हाथ सीने पर रखे और बोले –
“आप सब स्वयं देख लें, यदि यह भी असत्य हो।”
इतना कहकर हनुमान ने अपने नखों से अपना वक्ष विदीर्ण कर दिया।
सभा से एक सिहरन उठी।
रक्त बहने लगा, पर वह रक्त नहीं, जैसे लाल प्रकाश की धारा थी। खुले हुए सीने के भीतर सभी ने एक दिव्य दृश्य देखा – वहाँ माँ सीता, राम, लखन त्रिभंग मुद्रा में बैठे हैं; हनुमान का हृदय उनका मंदिर था, उनकी धड़कनें रामनाम का जप थीं, उनके रक्त की हर बूँद से “राम… राम…” की अनाहत ध्वनि निकल रही थी।
सीता जी के होंठ काँप गए। राम की आँखों में अश्रु छलक पड़े। लक्ष्मण की मुट्ठियाँ भीग गईं। जो लोग हनुमान को लेकर संदेह कर रहे थे, वे ज़मीन पर गिर पड़े; चेहरे पर लज्जा थी, हृदय में दर्द।
श्रीराम स्वयं आसन से उठकर दौड़े। उन्होंने हनुमान को बाँहों में थाम लिया, जैसे माँ अपने बच्चे को आँचल में छिपा लेती है।
“बस हनुमान! और नहीं…”
राम के अश्रु हनुमान के रक्त पर गिर रहे थे। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि हवा भी भारी हो गई, दीपक की लौ भी स्थिर हो गयी।
राम ने काँपते स्वर में कहा –
“तूने मेरे लिए अपना हृदय चीर दिया… बताओ, अब मैं और क्या करूँ कि तेरे प्रेम का ऋण चुक सके?”
हनुमान ने हल्की मुस्कान के साथ कहा –
“प्रभु, ऋण और लेन–देन तो संसार के हैं। मेरा प्रेम तो आपका प्रतिबिंब है। आप हैं, इसलिए मैं हूँ। आप निवृत्त हो जाएँ, तो मेरा अस्तित्व भी मिट जाए।”
राम ने सीता की ओर देखा। सीता ने अपने आँचल से सिंदूर की एक लकीर ली और हनुमान के सीने पर लगा दी, जैसे घाव पर वरदान रख दिया हो।
सीता ने कहा –
“हनुमान, तुम्हारे इस हृदय-मंदिर से बड़ा कोई देवालय नहीं। आज से तुम्हारा शरीर भी उस सिंदूर की तरह है जो मेरे राम की आयु और कीर्ति को बढ़ाएगा।”
हनुमान जी ने आँखें मूँद लीं। उनके सीने का घाव जैसे सिंदूर और अश्रु के मिलन से भरता जा रहा था। धीरे–धीरे वह विदीर्ण वक्ष पुनः जुड़ गया, पर जो दृश्य सबने देखा, वह जीवन भर के लिए उनकी आत्मा पर लिख दिया गया।
उस रात राजमहल में कोई सो नहीं सका। जो भी आँखें बंद करता, उसे हनुमान का रक्तरंजित पर शांत चेहरा याद आ जाता – वह चेहरा जिसमें दर्द नहीं, केवल समर्पण था।
श्रीराम रात्रि में एकांत कक्ष में गए। वहाँ उन्होंने अकेले खड़े होकर कहा –
“हे प्रभु, यदि इस सृष्टि में भक्ति का कोई पूर्ण रूप है, तो वह हनुमान है। जब तक काल है, तब तक यह वानर मेरे नाम का प्रहरी रहेगा।”
कहते हैं, उसी क्षण आकाश में एक सूक्ष्म घोषणा हुई –
“हनुमान चिरंजीवी होंगे, जब तक रामनाम है, तब तक यह भी रहेगा।”
सालों बीत गए, युग बदले, राजधानियाँ बदलीं, राजसत्ताएँ गिरीं, पर यह कथा हवा में तैरती रही। जो भी सच्चे भाव से इसे सुनता, उसकी आँखें नम हो जातीं।
आज, जब कोई मंदिर के कोने में बैठकर “जय श्रीराम, जय हनुमान” कहता है, तो यह कथा उसके हृदय के द्वार पर दस्तक देती है –
“तू कितनी बार बाहर के रत्नों में भगवान को ढूँढता है? कभी भीतर के हृदय को भी तोड़कर देखा है कि उसमें किसका नाम बसता है?”
सत्य यही है कि हनुमान ने अपना हृदय सिर्फ एक बार नहीं चीर दिया, वे हर बार चीर देते हैं, जब भी कोई भक्त अपने अंदर झाँककर यह प्रश्न पूछता है –
“क्या मेरे भीतर भी राम बसते हैं, या मैं सिर्फ रत्नों को थामे फिर रहा हूँ?”
जब यह सवाल भीतर उठता है, तो रूह काँपती है, आँखें भर आती हैं, और कहीं दूर से एक मृदु स्वर सुनाई देता है –
“जहाँ प्रेम निःस्वार्थ हो, सेवा निरहंकार हो, और साँस–साँस में रामनाम की ध्वनि हो, वहीं सत्य हनुमान हैं।”







