*जीवन में “ब्रेक” का महत्व*

*जीवन में “ब्रेक” का महत्व*

एक बार भौतिक विज्ञान की कक्षा में शिक्षक ने विद्यार्थियों से पूछा, *”कार में ब्रेक क्यों लगाते हैं?”*

एक छात्र ने उठकर उत्तर दिया, *”सर, कार को रोकने के लिए।”*
एक अन्य छात्र ने उत्तर दिया, *”कार की गति को कम करने और नियंत्रित करने के लिए।”*
एक अन्य ने कहा, *”टक्कर से बचने के लिए।”*

जल्द ही, जवाब दोहराए जाने लगे। इसलिए शिक्षक ने स्वयं प्रश्न का उत्तर देने का निर्णय लिया।

चेहरे पर एक मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, “मैं आप सभी की सराहना करता हूँ कि आप इस सवाल का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि मेरा मानना ​​​​है कि यह सब व्यक्तिगत धारणा का मामला है। पर मैं इसे इस तरह से देखता हूँ कि *कार के ब्रेक, हमें इसे और तेज चलाने में सक्षम बनाते हैं।*

कक्षा में गहरा सन्नाटा छा गया! इस जवाब की किसी ने कल्पना नहीं की थी।

शिक्षक ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, *”एक पल के लिए मान लेते हैं कि हमारी कार में कोई ब्रेक नहीं है। अब हम अपनी कार को कितनी तेज चलाने के लिए तैयार होंगे?”*

आगे उन्होंने कहा, *”यह ब्रेक ही हैं जिनके कारण हम कार को तेजी से चलाने की हिम्मत करते हैं और अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं।”*

कक्षा के सभी छात्र सोच में पड़ गए। उन्होंने पहले कभी इस तरह से “ब्रेक” के बारे में नहीं सोचा था।

*आइए विचार करें!*

जीवन रुपी गाड़ी चलाते समय हमारे सामने भी कई ऐसे ब्रेक आते हैं, जो हमें निराश करते हैं। हमारे माता-पिता, शिक्षक, शुभचिंतक और हमारे मित्र, हमारी प्रगति की दिशा या जीवन में निर्णय के बारे में हमसे पूछते हैं तो हम उनके प्रश्नों तथा जीवन की कठिन स्थितियों को “ब्रेक” के रूप में देखते हैं, जो हमारी गति को बाधित करते हैं।

लेकिन *कैसा हो अगर हम उन ब्रेकों को, समस्याओं को अपने लिय “समर्थक या उत्प्रेरक” के रूप में देखें?* ऐसे उपकरण के रूप में जो *हमें जोखिम लेने में सक्षम बनाते हैं, साथ ही यह सुनिश्चित करते हैं कि हम अपनी रक्षा भी कर सकें।*

क्योंकि, *कभी-कभी हमें रुकना पड़ता है। यहाँ तक की एक कदम पीछे भी हटना पड़ता है, ताकि हम एक लंबी छलांग लगा सकें।*

ऐसे सवालों और परिस्थितियों (समय-समय पर ब्रेक) के कारण ही हम आज जहॉं हैं, वहाँ पहुँचने में कामयाब रहे हैं।

जीवन में इन “ब्रेकों” के बिना हम फिसल सकते थे, दिशा खो सकते थे या एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का शिकार हो सकते थे।

*ये ब्रेक हमें वापस पीछे धकेलने या हमें बांधने के लिए नहीं होते हैं। इसके बजाय वे हमें पहले की तुलना में तेजी से आगे बढ़ने में सहायक होते हैं ताकि हम अपने गंतव्य तक शीघ्र और सुरक्षित पहुँच सकें!*

*क्या हम अपने जीवन में “ब्रेक” के लिए आभारी हैं या हम उन्हें केवल अपने काम में बाधा के रूप में देखते हैं?*
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*”जब हम जीवन में कठिन परिस्थितियों से गुजरते हैं, तो हम पहले से ज्यादा मजबूत और अनुभवी होकर उभरते हैं।”*

गधे और बाघ की तकरार का परिणाम

गधे और बाघ की तकरार का परिणाम

एक बार गधे और बाघ के बीच बड़ी लड़ाइ हो गयी!

गधे ने बाघ से कहा, घास नीली है!
बाघ ने कहा, घास हरी है!

“विवाद बढ़ता गया और *दोनों के बीच गर्मागर्मी तेज हो गई!” दोनों ही अपने-अपने कथन में दृढ़ थे!

इस विवाद को समाप्त करने के लिए दोनों जंगल के राजा शेर के पास गए!

पशु साम्राज्य के बीच में सिंहासन पर बैठा एक शेर था!

बाघ के कुछ कहने से पहले ही गधा चिल्लाने लगा, महाराज, घास नीला है ना?

शेर ने कहा – हाँ, घास नीली है!

तब गधा गुमान में आकर कहता है, महाराज, ये बाघ नहीं मान रहा, इसे ठीक से सजा दी जाए!!

शेर राजा ने घोषणा की कि, बाघ को एक साल की जेल होगी!
राजा का फैसला गधे ने सुना और वह पूरे जंगल में खुशी से झूम रहा था!

बाघ को एक साल की जेल की सजा सुनाई गई! बाघ शेर के पास गया और पूछा, क्यों महाराज ! घास हरी है, क्या यह सही नहीं है?

शेर ने कहा – हाँ! घास हरी है!
बाघ ने कहा तो मुझे जेल की सजा क्यों दी गई है?

शेर ने कहा, आपको घास नीले या हरे रंग के लिए सजा नहीं मिली, आपको उस मूर्ख गधे के साथ बहस करने के लिए दंडित किया गया है! आप जैसे बहादुर और बुद्धिमान जीव ने गधे से बहस की और निर्णय लेने के लिए मेरे पास आये!

जरा सोचे, क्या कभी कभार अपने को समझदार और ज्ञानी मानकर हमको भी अपने जीवन में ऐसे गधों का सामना करना नहीं करना पड़ता?
क्या हम अपने विचारों की सत्यता पर मुहर लगाने की कोशश नहीं किया करते?
और जब हमारे हिसाब से वाजिव उत्तर हमें नहीं मिलता तो हम भ्रमित नहीं होते?

इसलिय जरूरी यही है कि इस परिवर्तन से परिपूर्ण संसार में भ्रमित नहीं होना है और अपने रोल को, अपने लक्ष्य को, अपने समय को अपने लिय जीना है!
क्योंकि यह हमको जीवन दूसरों के लिय नहीं बल्कि अपने जीवन का आनन्द लेने के लिय मिला है!

मृत्यु अवश्यम्भावी है!

मृत्यु अवश्यम्भावी है!

हम सबने क्या कभी किसी पक्षी को मरते देखा?
ऐसे सरल, ऐसे सहज, चुपचाप विदा हो जाता है! पंख भी नहीं फड़फड़ाता। शोरगुल भी नहीं मचाता। पक्षी तो इतने चुपचाप विदा हो जाते हैं,  इतनी सरलता से विदा हो जाते हैं! ज़रा नोच-खचोंट नहीं। ज़रा शोरगुल नहीं। मौत में भी एक अपूर्व शांति होती है।

वही जब आदमी को मरते देखो तो कितना उपद्रव मचाता है, कितना रोकने की अपने को चेष्टा करता है!

इसका क्या कारण होता होगा?

कारण एक ही है – उस समय स्पष्ट महसूस होता है कि अनमोल जिंदगी व्यर्थ गई और बेरहम मौत आ गई – वही एक पल और जीने की छटपटाहट होती है!

लेकिन अब आगे कोई समय बचा ही नहीं। *खाली आए और खाली गए! जीवन में कुछ भराव नहीं और यह मौत आ गई।
ऐसे में इन्सान तड़फे नहीं तो क्या करे ?

जिन लोगों को समय के सदगुरु का सानिध्य मिलता है – वे इस अवागमन के दुःख से बच जाते हैं! क्योंकि गुरुमहाराजी बतलाते हैं कि -तुम खाली हाथ आये जरूर थे पर तुमको खाली हाथ जाने की जरूरत नहीं है!

यही कारण है कि प्राचीन ऋषि मनीषी अंत समय में समांधिष्ट हो जाते थे! जिसने भी यह समझ लिया हो कि वह निश्चित समय के लिय यहाँ मुसाफिर के रूप में आया है और उसने अपने जीवन में जीवन का जीते जी आनन्द भी लिया हो वह व्यक्ति शांति से, उल्लास से, उमंग से विदा होते हैं!

जैसे किसी प्यारी यात्रा पर जा रहे हों! ज़रा भी, क्षण-भर के लिय, कण-भर का भी उन्हें मोह नहीं होता उनको अपनी जीवन नैया के इस तट से बंधे रहने का कोई लालच नहीं होता, वे छोड़ देते अपनी नाव को उस पार जाने के लिय। खोल देते अपने पंख। यही सोच कर कि कूच करने की विराट पुकार आ गई, वह आवाज, संदेश आ गया।

फिर रुकना कैसा? जब इस तट को खूब जी लिया, मन भर कर जी लिया जी भरकर जी लिया! इस तट के गीत भी सुन लिए, इस तट का गीत भी गा लिया। इस तट के नृत्य भी देख लिए, इस तट का नाच भी नाच लिया। इस तट पर जो भी सुंदर था, जो भी मूल्यवान था, सबका स्वाद ले लिया। जाने की घड़ी आ ही गई। अब और तटों पर होंगे। अब और नृत्य और गीत उठेंगे। अब और दीए जलेंगे। एक उल्लास है। एक जाने की तत्परता है। अगर गीत न गाया गया हो तो मुश्किल खड़ी होती है।

मृत्यु उनके लिय पीड़ादायक अवश्य है – जिन्होंने जीते जी इस जीवन का गीत गाया नहीं है। गीत गाने की तो बात दूर, उनके साज भी टूट गया है। वीणा के तार भी उखड़ गए हैं। वाद्य भी विकृत हो गया है। आवाज भी मर गई है। वह आवाज जो गीत गाने को दी गई थी – वह दूसरों को गालियां देते-देते मर गई है। ये प्राण जो प्रार्थना के लिए दिए थे- उनका प्रार्थना से तो कोई संबंध ही न जुड़ा! सारी शक्ति पद-प्रतिष्ठा की आपा-धापी में ही लग गये! ये धड़कनें जो परमात्मा के साथ नाचने के लिए थीं – इन्हें भी झूठे प्यार में बिता दिया!

जब लोग आत्मा बेच कर मरते हैं – तो रोते हुए मरते हैं, पछताते हैं!
यह पछतावा न हो – महाराजी बतलाते हैं कि जीते जी उस शान्ति से सम्बन्ध बना लो क्योंकि शांति सम्भव है!

जीवन एक यात्रा है इसे जबरदस्ती तय ना करें,
बल्कि इस यात्रा को जबरदस्त तरीके से तय करें।
मृत्यु के डर से तड़पने की बजाए
जीवन को संयमित रहते हुए
सेवा, सत्संग और अभ्यास के द्वारा जीवन का उत्सव बनाएं
जिससे विदा की बेला में पछताना ना पड़े।

सच्चा सुख और आनंद

सच्चा सुख और आनंद

पुराने समय में संत गाँव के लोगों को प्रवचन देते थे! भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे। एक दिन गाँव की महिला ने एक संत के लिए खाना बनाया। जब संत उस महिला के घर खाना खाने गए तो उस महिला ने पूछा कि, महाराज हमें जीवन में सच्चा सुख और आनंद कैसे मिल सकता है?

इस पर संत ने कहा की इसका जवाब हम आपको कल देंगे।

अगले दिन उस महिला ने संत के लिए खीर बनाई क्योकि वह महिला उन संत से सुख और आनंद के बारे में प्रवचन सुनना चाहती थी।

संत आये और उन्होंने भिक्षा के लिए उस महिला को आवाज दी। महिला संत के लिए खीर लेकर बाहर आई। संत ने खीर लेने के लिए अपना कमंडल आगे किया। महिला खीर डालने ही वाली थी कि उसकी नजर कमंडल के अन्दर पड़ी! तो उसने संत से कहा कि, महाराज आपका कमंडल तो गंदा है, इसमें कचरा पड़ा है! इस पर संत ने कहा- हां कमंडल गंदा है, लेकिन आप खीर इसमें ही डाल दो। महिला ने कहा- नहीं महाराज, ऐसे तो खीर ख़राब हो जाएगी।

आप ऐसा कीजिये ये कमंडल मुझे दीजिये! मैं इसे धोकर साफ कर देती हूं। इस पर संत ने पूछा कि, मतलब, जब तक कमंडल साफ नहीं होगा तो आप इसमें खीर नहीं देगी। उसके बाद महिला ने कहा- जी महाराज, मैं इसे साफ़ करने के बाद इसमें खीर दे दूंगी। तब संत ने कहा, ठीक इसी तरह जब तक हमारे मन में लोभ, क्रोध, मोह, और काम जैसे बुरे विचारो की गंदगी है तो हम उसमें अच्छे उपदेश कैसे डाल सकते हैं? अगर ऐसे दूषित मन में उपदेश डालेंगे भी तो वह अपना असर नहीं दिखा पाएंगे।

इसलिए अच्छे उपदेश सुनने के लिए मन को शांत और पवित्र करना चाहिए। तभी हम ज्ञान की बातें सीख सकते हैं। शांत और पवित्र मन वाले ही सच्चे सुख और आनंद की प्राप्ति कर पाते हैं!

शिक्षा
जब हम अपने मन को सदगुरु से प्राप्त ज्ञान द्वारा शान्त और पवित्र बना लेंगे तभी हम जीवन का सच्चा सुख और आनंद की प्राप्त कर पाएंगे!

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
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एक पुरानी तिब्बती कथा है कि – *दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे।*

एक पुरानी तिब्बती कथा है कि – *दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे।*

*एक ने सांप अपने मुंह में पकड़ रखा था।* भोजन था उनका, सुबह के नाश्ते की तैयारी थी। *दूसरा एक चूहा पकड़ लाया था।* दोनों जैसे ही बैठे वृक्ष पर – पास पास आ कर *एक के मुंह में सांप और दुसरे के मुंह में चूहा!*

सांप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि – *वह चूहा तो उल्लू के मुंह में है और मौत के करीब है।*

चूहे को देख कर उस सांप के मुंह में रसधार बहने लगी। वह अपनी स्थिति को तो भूल ही गया कि *वह खुद भी तो मौत के मुंह में है।* उसको उसकी अपनी ही जीवेषणा ने पकड़ लिया था।

और दूसरी ओर चूहे ने जैसे ही देखा सांप को देखा – *वह भयभीत हो गया, वह कंपने लगा।* खुद ऐसे मौत के मुंह में बैठा है, मगर *सांप को देख कर कंपने लगा।*

वे दोनों उल्लू बड़े हैरान हुए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि *भाई, इसका कुछ राज समझे?* दूसरे ने कहा, *बिलकुल समझ में आया।* जीभ की, रस की, स्वाद की इच्छा इस सांप में इतनी प्रबल है कि *इसे अपनी मौत का भी डर नहीं है, सामने मृत्यु खड़ी हो तो भी दिखाई नहीं पड़ती।

और चूहे की स्थिति से यह भी समझ में आया कि *भय मौत से भी बड़ा है।* मौत सामने खड़ी है – उससे यह चूहा भयभीत नहीं है! लेकिन भय से भयभीत है कि *”कहीं सांप हमला न कर दे।’*

आज के मानव का भी यही हाल है – *मौत से वह भयभीत नहीं हैं, वह भय से ज्यादा भयभीत हैं और स्वाद लोभ का, इंद्रियों का, जीवेषणा का
इतना प्रगाढ़ प्रभाव है कि *मौत चौबीस घंटे खड़ी है, तो भी वह कभी दिखाई नहीं पड़ती। उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहते!*

इसी हकीकत से रूबरू करने के लिय *समय के सदगुरु आते है और अपने संदेश से मोह नीद में सोये मानव मन को जगाते हैं!*

जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि – *”सूर्यास्त तक नहीं मारा, तो अग्नि समाधि ले लूंगा!”*

जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि – *”सूर्यास्त तक नहीं मारा, तो अग्नि समाधि ले लूंगा!”*

तो, आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं, जिसका आकर 32 कोस का था। जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े-बड़े वीर तैनात थे।

भगवान कृष्ण बोले, *अर्जुन तुम रास्ता साफ करो। मैं रथ ले चलता हूँ। संध्या हो आई, अब भी 12 कोस रह गया।*

कृष्ण रथ से उतर गये! अर्जुन ने पूछा, *”केशव यह क्या?”*

कृष्ण ने कहा – *अश्व थक गये हैं।*
आगे बोलते हुए भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है-
*”अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया”, जो मैंने युद्ध के शुरू में दिया था! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो? तुम तो निमित्त मात्र हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते।*

*तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है, दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं।* ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि *असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा! यह डर ही तुम्हें हरा देगा।”*

भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता *आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात पर ध्यान दिया हो! वर्तमान में भी यह उतना ही सत्य है जितनी तब थी!*

*स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।*
*धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥*
अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढकर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है।

*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥*
सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और हार को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। ऐसा करते हुए, तुम्हें पाप नहीं मिलेगा।

*अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।*
*ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥*
लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, को अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप को प्राप्त करोगे।

हमारे जीवन के महाभारत में भी हमारी एकाग्रता इन्ही आवेग-संवेगों के कारण भंग होती रहती है और हम जीवन लक्ष्य को भूल जाते हैं! तभी सौभाग्य से गुरु महाराजी जी पूछते हैं कि *तुमको तुम्हारी जिन्दगी कैसी लगती है?* इतना ही नहीं वे यह दावा करते हैं कि *मैं तुमको तुमसे मिला सकता हूँ!*
इसलिय *कर्ता भाव* को छोड़कर *निमित्त मात्र बनकर कर्तव्य का पालन* करते रहें! तभी हमारा जीवन बोझिल ना होकर हल्का लगने लगेगा!

ज्ञान का अहंकार

ज्ञान का अहंकार
एक समय की बात है! एक घमंडी व्यक्ति शहर से पढ़ लिख कर अपने पुराने गांव आया! गांव और शहर के बीच में एक नदी पड़ती थी जिसको पार करने के बाद ही वह अपने गांव जा सकता था इसलिए उसने एक नाव वाले को बुलाया और उसके नाव में सवार होकर अपने गांव की ओर चल दिया!

कुछ देर चलने के बाद वह घमंड में भरकर नाविक से पूछना लगा– क्या तुमने कभी व्याकरण पढ़ा है?

नाविक कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया और फिर बोला ‘नहीं’ साहब मैंने नहीं पढ़ा है!

घमंड और अहंकार से भरे हुए व्यक्ति ने हंसते हुए कहा फिर तो तुमने अपनी आधी जिंदगी व्यर्थ में गंवा दी!

थोड़ी देर बाद अपनी पढ़ाई का और घमंड दिखाने के लिए उस व्यक्ति ने नाविक से फिर पूछा, तुमने इतिहास और भूगोल पढ़ा है?

नाविक ने ना में सिर हिलाते हुए कहा ‘नहीं’ साहब, मैंने वह भी नहीं पढ़ा है!

अहंकारी व्यक्ति ने फिर जोर से ठहाका लगाकर नाविक का मजाक उड़ाते हुए कहा फिर तो तुमने अपना पूरा जीवन व्यर्थ कर दिया!

नाविक को इस बात पर बहुत क्रोध आया लेकिन वह मन मार कर रह गया और उस व्यक्ति से कुछ नहीं बोला चुपचाप नाव चलाने लगा!

कुछ दूर नाव चलाने के बाद अचानक नदी में उफ़ान आ गया और नाव जोर-जोर से हिचकोले खाने लगी!
यह देख कर नाविक ने चेहरे पर छोटी सी मुस्कान के साथ ऊंचे स्वर में उस व्यक्ति से पूछा – ‘साहब’ आपको तैरना भी आता है या नहीं?

व्यक्ति ने कहा– ‘नहीं’ मुझे तैरना नहीं आता है!

तब नाविक ने कहा कि फिर तो आपको अपने इतिहास भूगोल और व्याकरण को सहायता के लिए बुलाना पड़ेगा वरना आपकी सारी उम्र बर्बाद हो जाएगी क्योंकि यह नाव डूबने वाली है!

यह कहकर नाविक नदी में कूद तैरता हुआ किनारे की ओर चला गया!

इसका अभिप्राय यही है कि कभी भी अपने ज्ञान पर व्यर्थ का अहंकार प्रदर्शित नहीं करना चाहिए और किसी को अपने ज्ञान के बल पर नीचा नहीं दिखाना चाहिए! सभी अपनी जगह पर श्रेष्ठ हैं!

वैसे भी कहा है कि विद्या ददाति विनयम विद्या से ही विनम्रता का उद्भव होता है! जो ज्ञान अहंकार दे वह कैसा ज्ञान?

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

दो चींटियों का दृष्टान्त है!

दो चींटियों का दृष्टान्त है!
एक नमक के ढेले पर रहने वाली चींटी की एक मिश्री के ढेले पर रहने वाली चींटी से मित्रता हो गयी ।
मित्रता के नाते वह उसे अपने नमक के ढेले पर ले गयी और कहा–‘खाओ !’

वह बोली–‘क्या खायें,यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या?’ नमक के ढेले पर रहने वाली ने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या ?’ तब मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने कहा– ‘यह तो मीठा है ही नहीं । मीठा तो इससे भिन्न ही जाति का होता है ।’ परीक्षा कराने के लिये मिश्री पर रहने वाली चींटी दूसरी चींटी को अपने साथ ले गयी ।
नमक पर रहने वाली चींटी ने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ इसलिय छोटी-सी नमक की डली उसने अपने मुँह में पकड़ ली।

मिश्री के पहाड़ पर पहुँचकर मिश्री मुँह में डालने पर भी उसे मीठी नहीं लगी।
मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने पूछा– ‘मीठा लग रहा है न ?’
वह बोली– ‘हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ ? बुरा तो नहीं मानोगी ?
मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, मुझे वैसा ही स्वाद आ रहा है।’

उस मिश्री पर रहने वाली चींटी ने विचार किया– ‘बात क्या है ? इसे वैसा ही–नमक का स्वाद कैसे आ रहा है !’
उसने मिश्री स्वयं चखा उसे मीठा ही लगा! वह सोचने लगी–‘आखिर बात क्या है !’

उसने पूछा–‘आते समय तुमने कुछ मुँह में रख तो नहीं लिया था ?’

इस पर वह बोली–मैं ‘भूखी न रह जाऊँ,इसलिये छोटा-सा नमक का टुकड़ा मुँह में डाल लिया था।’
उसने कहा– ‘निकालो उसे।’
जब उसने नमक की डली मुँह में से निकाल दी, तब दूसरी ने कहा–‘अब चखो इसे।’
अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी। पूछा–‘कैसा लगता है?’
तो वह इशारे से बोली– ‘बोलो मत,बस खाने दो।’
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इसी प्रकार प्रेमियों का भी हाल है! *सत्संग की बातें तो सुनते हैं पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि को पकड़े-पकड़े सुनते हैं। अभ्यास करना छोड़कर सब कुछ करते हैं!
अभ्यास करने वाला, ज्ञान का रस लेने वाला उनसे पूछता है– ‘क्यों ! कैसा आनन्द है ?’
तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें अभ्यास के बिना रस कैसे आये ? सांसारिक कामना और तृष्णारुपी नमक की डली जो मुँह में पड़ी है।*
मन में उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थों के संग्रह का, भोगों का और मान-पद आदि का ।*
अत: इनका उद्देश्य न रखकर केवल आंतरिक आनन्द की ओर जाने के लिय अभ्यास करना बहुत जरूरी है!

बिना ध्यान के जीवन में शांति असंभव

🌿बिना ध्यान के जीवन में शांति असंभव🌿

महत्वपूर्ण सवाल अभ्यास से ध्यान का है। मन को स्वांसों की धुन में लीन करके जोर ध्यान पर है। ध्यान का अर्थ है : स्वार्थ, परम स्वार्थ, आत्यंतिक स्वार्थ क्योंकि इस जगत में ध्यान से ज्यादा निजी कोई बात नहीं है। ध्यान का कोई सामाजिक संदर्भ भी नहीं है। ध्यान का अर्थ है : अपने एकांत में उतर जाना, अकेले हो जाना, मौन, शून्य, निर्विचार, निर्विकल्प। उस निर्विचार में, उस निर्विकल्प में आकाश बादलों से आच्छादित नहीं होता और भीतर का सूरज प्रकट होता है। सब जगमग हो जाता है। सब रोशन हो उठता है। फिर तुम्हारे भीतर प्रेम के फूल खिलते हैं, आनंद के झरने फूटते हैं, शांति के रस की धाराएं बहती हैं। फिर इसे बांटो और बांटना ही पड़ेगा। इसी बांटने को मानवता के प्रति समर्पित होकर परोपकार कहते हैं।

जिसके जीवन में ध्यान नहीं है, वह तो दूसरे को सताएगा और अवश्य सताएगा ही। अपरिहार्यरूपेण सताएगा। क्यों? क्योंकि जो खुद दुखी है, वह दुख ही बांट सकता है। गैर-ध्यानी दुखी होगा ही, नहीं तो कोई ध्यान तलाशे क्यों? अगर बिना ध्यान के जीवन में शांति हो सकती तो शांति कभी की हो गई होती। बिना ध्यान के जीवन में शांति होती ही नहीं है। ध्यान के बिना शांति का बीज टूटता ही नहीं, अंकुरण ही नहीं होता। फूल तो लगेंगे कैसे और फल आएंगे कैसे? ध्यान तो शांति के बीजों को बोना है। ध्यान में जैसे ही मन स्वांसों के साथ एकाकार होता है तो शांति के बीज का अंकुरण हो जाता है और शांति के फूल आ जाते हैं। तभी भीतर से शांति की खुशबू चारों ओर फैल जाती है।

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समजाते हुए कहते हैं कि

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते वक्त “श्री कृष्ण” ने अर्जुन को समजाते हुए कहते हैं कि : हे पार्थ, तराजू पर पैर संभलकर रखना, संतुलन बराबर रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही केंद्रित हो – उसका खास खयाल रखना।
तो अर्जुन ने कहा : “हे प्रभु” सबकुछ अगर मुजे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे ??

वासुदेव हंसते हुए बोले : हे पार्थ, जो आप से नहीं होगा वह में करुंगा।
पार्थ ने कहा : प्रभु ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता?

वासुदेव फिर हंसे और बोले : जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे, उस विचलित “पानी” को स्थिर “मैं” ही रखूँगा!

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हों, कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हों, कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हों, लेकिन आप स्वयं हरएक परिस्थिति के उपर पूर्ण नियंत्रण नहीँ रख सकते! आप सिर्फ अपना प्रयास कर सकते हैं, लेकिन उसकी भी एक सीमा है।

और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है – उसी का नाम “भगवान” है!