सुखी जीवन का रहस्य

सुखी जीवन का रहस्य

एक महान संत हुआ करते थे जो अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे जिसके लिए वो कई लोगो से मुलाकात करते थे | एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था | इसी यात्रा के दौरान उनकी भेंट एक साधारण सी कन्या विदुषी से हुई | विदुषी ने उनका स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर आराम करने की याचना की | संत उसके मीठे व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया |

विदुषी ने संत को अपने हाथो का स्वादिष्ट भोज कराया | और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी | और खुद फर्श टाट बिछा कर सो गई | विदुषी को सोते ही नींद आ गई | उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही हैं | उधर संत को खाट पर नींद नहीं आ रही थी | उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी जो उन्हें दान में मिला था | वो रात भर विदुषी का सोच रहे थे कि वो कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो सकती हैं |

दुसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि – तुम कैसे इस कठोर धरा पर इतने चैन से सो रही थी | तब उसने बड़ी सरलता से उत्तर दिया – हे गुरु देव ! मेरे लिए मेरी ये छोटी सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य हैं | इसमें मेरे श्रम की महक हैं | अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता हैं तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ | जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूँ तो मुझे माँ की गोद का आत्मीय अहसास होता हैं | मैं दिन भर के अपने सत्कर्मो का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ | मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ |

यह सब सुनकर संत जाने लगे | तब विदुषी ने पूछा – हे गुरुवर ! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूँ?
तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया – बालिका ! तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया हैं उससे मुझे पता चला कि चित्त का सुख कहाँ हैं | अब मुझे किसी आश्रम बनाने के लिय इच्छा ही नहीं रह गई |

यह कहकर संत वापस अपने देश लौट गये और एकत्र किया धन उन्होंने गरीबो में बाँट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे |
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शिक्षा :
आत्म शांति एवम संतोष ही सुखी जीवन का रहस्य हैं | जब तक इंसान को संतोष नहीं मिलता वो जीवन की मोह माया में फसा ही रहता हैं और जो इस मोह माया में फसता हैं | उसे कभी चैन नहीं मिलता |

जीवन का सुख संतोष में हैं | अगर मनुष्य जो हैं उसे स्वीकार कर ले और उसी में खुशियाँ तलाशे तो वो उसी क्षण सारे सुख का अनुभव कर लेता हैं | जिस तरह विदुषी एक वक्त के भोजन को ही अपना सौभाग्य मानती हैं | और कठोर धरा पर भी चैन से सोती हैं | उसी कारण उसे जीव में सभी सुखों का अनुभव हुआ हैं | वही एक संत बैरागी होते हुए भी, खाट पर चैन से नहीं सो पा रहा था क्यूंकि उसे अपने पास जो है उससे संतोष नहीं था | जिस दिन उसने यह सत्य स्वीकार लिया, उसे एक कुटिया में भी अपार शांति का अनुभव होने लगा |
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यह कथा सुखी जीवन का रहस्य कहती हैं | आज घर में अपार धन दौलत ऐशो आराम होते हुए थी लोग सुख शांति से नही रहते क्यूंकि उन्हें जो हैं उसमे संतोष नहीं मिलता | कहते हैं ना जिन्हें दुसरो की थाली में घी ज्यादा दिखता हैं वो कभी खुद चैन से नहीं रहते | व्यक्ति को हमेशा वो चाहिये जो उसके पास नहीं हैं |और वो मिल जाए तो नयीं महत्वकांक्षा उसकी जगह ले लेती हैं | इस तरह पूरा जीवन असंतोष में ही बीत जाता हैं और अंत समय में भी चैन नहीं मिलता |

अतः संतुष्टि ही जीवन का मूल मंत्र हैं अगर इंसान में संतोष हैं तो कोई दुःख उसे तोड़ नहीं सकता | यही है – जीवन का रहस्य |

🙏जय सच्चिदानन्द 🙏

वाणी की मधुरता

वाणी की मधुरता

एक बार एक राजा ने स्वप्न में देखा कि उसके सारे दाँत टूट गये है, केवल सामने का एक बड़ा दाँत ही मुँह में बचा है।

सुबह राजा ने दरबार में अपना स्वप्न सुनाया, और उसका प्रतिफल जानना चाहा। मंत्रियों ने सलाह दी कि स्वप्न विशेषज्ञों को बुलाकर स्वप्न का फलादेश पूछा जायें।

राज्य में ढिंढोरा फिरवा कर घोषणा कि गयी कि जो भी विद्वान, ज्ञानी, राजा को उनके स्वप्न का फलादेश बतायेगा, उसे उचित ईनाम दिया जायेगा। कई व्यक्ति दरबार में आये, परन्तु कोई भी राजा को सही जवाब से संतुष्ट नहीं कर सका।

एक दिन एक विद्वान व्यक्ति जिसने काशी से विद्या प्राप्त की थी, दरबार में आया और बोला…..
“महाराज! मैं आपके स्वप्न का सही फलादेश बता सकता हूँ।”

राजा सहित सभी दरबारी जिज्ञासा से उस व्यक्ति की ओर देखने लगे। राजा ने अपना स्वप्न सुनाकर कर कहा, “बताइये मेरे इस स्वप्न का फलादेश क्या है?”

उस व्यक्ति ने कहा.. “राजन! आपका यह स्वप्न तो बहुत बेकार है। इसके फल स्वरूप आपके सामने ही आपके परिवार के सभी सदस्य मर जायेगें और आप सबके बाद मरेगें।”

यह सुनते ही राजा को क्रोध आगया और उस व्यक्ति को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया।

दूसरे दिन एक साधारण सा व्यक्ति दरबार में आया और बोला, “राजन! आप अपना स्वप्न मुझे बताइये, मैं उसका सही फलादेश बताने की कोशिश करुगाँ।”

राजा ने अपना स्वप्न सुनाया,स्वप्न सुनकर वह व्यक्ति कुछ देर सोचने के बाद बोला, “राजन! यह बहुत ही अच्छा स्वप्न आया हैं आपको।
हम सभी प्रजा जन पर ईश्वर की विशेष कृपा है कि आप जैसे धर्मात्मा, पुण्यात्मा और प्रजापालक राजा को दीर्घायु (लंबी आयु) दी हैं। राजन आपके परिवार में आपकी आयु सबसे लंबी होगी। इस राज्य का यह सौभाग्य है कि आप कई वर्षो तक राज्य करेगें।”

स्वप्न का फलादेश सुनकर राजा बहुत खुश हुआ, और उस व्यक्ति का विशेष सम्मान कर उसे काफी धन दिया।

दोनों ही व्यक्तियों ने स्वप्न का एक ही फलादेश बताया, दोनो का एक ही मतलब था।
फिर भी एक व्यक्ति को बंदी बनाकर जेल भेजा गया और दूसरे को विशेष सम्मान कर उसे धन-दौलत का ईनाम मिला! क्यों?

क्योंकि एक व्यक्ति ने महान विद्वान होते हुए भी अपने उत्तर और बोलने में उचित शब्दो का प्रयोग नहीं किया! जबकि दुसरे व्यक्ति ने, साधारण होते हुए भी अपने उत्तर और बातचीत में उचित और सही शब्दो का प्रयोग किया।

तभी कहा गया है –
शब्द संभाले बोलिए, शब्द के हाथ न पाँव,
एक शब्द करे औषधि, एक शब्द करे घाव!!

शब्द सम्भाले बोलियेे, शब्द खीँचते ध्यान!
एक शब्द मन घायल करेँ, एक शब्द बढाते मान!!

शब्द मुँह से छूट गया, शब्द न वापस आय!
शब्द जो हो प्यार भरा, शब्द ही मन मेँ समाएं!!

शब्द मेँ है भाव रंग का, शब्द है मान महान!
शब्द ही जीवन रुप है, शब्द ही दुनिया जहान!!

शब्द ही कटुता रोप देँ, शब्द ही बैर हटाएं!
शब्द जोङ देँ टूटे मन, शब्द ही प्यार बढाएं!!

मतलब, उचित, सम्मानित शब्दों के प्रयोग और मीठा और सभ्य बोलने के तरीके से दुश्मन के मन में भी प्यार भर जाता है,और ऐसे ही गलत शब्दों के प्रयोग असभ्य,अमर्यादित व रूखा बोलने के तरीकों से अपनों के दिलो में भी नफरत पैदा कर हो जाती है।
ध्यान रहे, हमें रोज की बोलचाल, बातचीत और व्यवहार में नपे-तुले शब्दों का प्रयोग करना चाहिये! अन्यथा हर दिन महाभारत का सामना करना पड़ सकता है!

हनुमानजी की चुटकी सेवा

हनुमानजी की चुटकी सेवा

अयोध्या में प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक होने के बाद हनुमानजी वहीं रहने लगे। उन्हें तो श्रीराम की सेवा का व्यसन (नशा) था। सच्चे सेवक का लक्षण ही है कि वह आराध्य के चित्त की बात जान लिया करता है। उन्हें पता रहता है कि मेरे स्वामी को कब क्या चाहिए और कब क्या प्रिय लगेगा? श्रीराम को कोई वस्तु चाहिए तो हनुमानजी पहले से लेकर उपस्थित। किसी कार्य, किसी पदार्थ के लिए के लिए संकेत तक करने की आवश्यकता नहीं होती थी।

हनुमानजी की सेवा का परिणाम यह हुआ कि भरत आदि भाइयों को श्रीराम की कोई भी सेवा प्राप्त करना कठिन हो गया। इससे घबराकर सबने मिलकर एक योजना बनाई और श्रीजानकीजी को अपनी ओर मिला लिया। प्रभु की समस्त सेवाओं की सूची बनाई गयी। कौन-सी सेवा कब कौन करेगा, यह उसमें लिखा गया। जब हनुमानजी प्रात:काल सरयू-स्नान करने गए तब अवसर का लाभ उठाकर तीनों भाइयों ने सूची श्रीराम के सामने रख दी। प्रभु ने देखा कि सूची में कहीं भी हनुमानजी का नाम नहीं है। उन्होंने मुसकराते हुए उस योजना पर अपनी स्वीकृति दे दी। हनुमानजी को कुछ पता नहीं था।

दूसरे दिन प्रात: सरयू में स्नान करके हनुमानजी जब श्रीराम के पास जाने लगे तो उन्हें द्वार पर भाई शत्रुघ्न ने रोक दिया और कहा–’ आज से श्रीराम की सेवा का प्रत्येक कार्य विभाजित कर दिया गया है। जिसके लिए जब जो सेवा निश्चित की गयी है, वही वह सेवा करेगा। श्रीराम ने इस व्यवस्था को अपनी स्वीकृति दे दी है।’

हनुमानजी बोले— ‘जब प्रभु ने स्वीकृति दे दी है तो उसमें कहना क्या है? सेवा की व्यवस्था बता दीजिये, अपने भाग की सेवा में करता रहूंगा।’

सेवा की सूची सुना दी गयी, उसमें हनुमानजी का कहीं नाम नहीं था। उनको कोई सेवा दी ही नहीं गयी थी क्योंकि कोई सेवा बची ही नहीं थी। सूची सुनकर हनुमानजी ने कहा—‘इस सूची में जो सेवा बच गयी, वह मेरी होनी चाहिए।’

सबने तुरन्त सिर हिलाया और कहा, ’हां, वह सेवा आपके हिस्से की!’
हनुमानजी ने कहा— ‘इस पर भी प्रभु की स्वीकृति भी मिलनी चाहिए।’ और श्रीराम जी ने भी इस बात पर अपनी स्वीकृति दे दी।

स्वामी श्रीराम का जिस प्रकार कार्य सम्पन्न हो, हनुमानजी वही उपाय करते हैं, उन्हें अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की जरा भी चिन्ता नहीं रहती थी।

हनुमानजी बोले—‘मेरे प्रभु को जब जम्हाई आएगी, तब उनके सामने चुटकी बजाने की सेवा मेरी।’

यह सुनकर सब चौंक गये। इस सेवा पर तो किसी का ध्यान गया ही नहीं था। लेकिन अब क्या करें? अब तो इस पर प्रभु की स्वीकृति भी मिल चुकी थी।

चुटकी सेवा के कारण हनुमानजी राज सभा में दिन भर श्रीराम के चरणों के पास उनके मुख की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे क्योंकि जम्हाई आने का कोई समय तो है नहीं। रात्रि हुई, स्नान और भोजन करके श्रीराम अंत:पुर में विश्राम करने पधारे तो हनुमानजी उनके पीछे-पीछे चल दिए। द्वार पर सेविका ने रोक दिया—‘आप भीतर नहीं जा सकते।’

हनुमानजी वहां से हट कर राजभवन के ऊपर एक कंगूरे पर जाकर बैठ गए और लगे चुटकी बजाने।

पर यह क्या हुआ?
श्रीराम का मुख तो खुला रह गया। न वे बोलते हैं, न संकेत करते हैं, केवल मुख खोले बैठे हैं। श्रीराम की यह दशा देखकर जानकीजी व्याकुल हो गईं। तुरन्त ही माताओं को, भाइयों को समाचार दिया गया। सब चकित और व्याकुल पर किसी को कुछ सूझता ही नहीं। प्रभु का मुख खुला है, वे किसी के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं।

अंत में गुरु वशिष्ठ बुलाए गये। प्रभु ने उनके चरणों में मस्तक रखा; किन्तु मुंह खुला रहा, कुछ बोले नहीं।

वशिष्ठजी ने इधर-उधर देखकर पूछा—‘हनुमान कहां हैं, उन्हें बुलाओ तो?’

जब हनुमानजी को ढूंढ़ा गया तो वे श्रीराम के कक्ष के कंगूरे पर बैठे चुटकी बजाए जा रहे हैं, नेत्रों से अश्रु झर रहे हैं, शरीर का रोम-रोम रोमांचित है, मुख से गद्गद् स्वर में कीर्तन निकल रहा है—‘श्रीराम जय राम जय जय राम।’

भाई शत्रुघ्न ने हनुमानजी से कहा—‘आपको गुरुदेव बुला रहे हैं।’ हनुमानजी चुटकी बजाते हुए ही नीचे पहुंचे।

गुरुदेव ने हनुमानजी से पूछा—‘आप यह क्या कर रहे हैं?’

हनुमानजी ने उत्तर दिया—‘प्रभु को जम्हाई आए तो चुटकी बजाने की सेवा मेरी है। मुझे अन्तपुर में जाने से रोक दिया गया। अब जम्हाई का क्या ठिकाना, कब आ जाए, इसलिए मैं चुटकी बजा रहा हूँ, जिससे मेरी सेवा में कोई कमी न रह जाए।’

वशिष्ठजी ने कहा—‘तुम बराबर चुटकी बजा रहे हो, इसलिए श्रीराम को तुम्हारी सेवा स्वीकार करने के लिए जृम्भण मुद्रा (उबासी की मुद्रा) में रहना पड़ रहा है। अब कृपा करके चुटकी बजाना बंद कर दो।’

श्रीराम के रोग का निदान सुनकर सबकी सांस में सांस आई। हनुमानजी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया तो प्रभु ने अपना मुख बंद कर लिया।

अब हनुमानजी हंसते हुए बोले—‘तो मैं यहीं प्रभु के सामने बैठूँ? और सदैव सभी जगह जहां-जहां वे जाएं, उनके मुख को देखता हुआ साथ बना रहूँ, क्योंकि प्रभु को कब जम्हाई आएगी, इसका तो कोई निश्चित समय नहीं है।’

प्रभु श्रीराम ने कनखियों से जानकीजी को देखकर कहा, मानो कह रहे हों—‘और करो सेवा का विभाजन ! हनुमान को मेरी सेवा से वंचित करने का फल देख लिया।’

स्थिति समझकर वशिष्ठजी ने कहा—‘यह सब रहने दो, तुम सब जैसे पहले सेवा करते थे, वैसे ही करते रहो।’

अब भला, गुरुदेव की व्यवस्था में कोई क्या कह सकता था। उनका आदेश तो सर्वोपरि है।

यही कारण है कि श्रीराम-पंचायतन में हनुमानजी छठे सदस्य के रूप में अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में निरन्तर उनके मुख की ओर टकटकी लगाए हाथ जोड़े बैठे रहते हैं।

हनुमानजी की सेवा के अधीन होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा—
कपि-सेवा बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ।
देबेको न कछू रिनियाँ हौं, धनिक तूँ पत्र लिखाउ।।
(विनय-पत्रिका पद 10017)
‘भैया हनुमान ! तुम्हें मेरे पास देने को तो कुछ है नहीं; मैं तेरा ऋणी हूँ तथा तू मेरा धनी (साहूकार) है। बस इसी बात की तू मुझसे सनद लिखा ले।’
इसलिय एक भजन में किसी भक्त ने अपने भाव रखे हैं कि – भक्तों से ज्यादा तुमको कोई और प्यारा ना हुआ..

यह कभी न भूलें कि – हमारे प्रभु सर्वज्ञ है, अन्तर्यामी हैं और उनको हर भक्त के भावों का पता है! किसको, कब, कहाँ और कैसी सेवा देनी है वे बेहतर जानते हैं!

एक महान संत थे जो बहुत ही प्रचंड तपस्वी थे। उन्हें कई शास्त्रों का ज्ञान था। कई श्लोक मुँह जबानी याद थे।

एक महान संत थे जो बहुत ही प्रचंड तपस्वी थे। उन्हें कई शास्त्रों का ज्ञान था। कई श्लोक मुँह जबानी याद थे।

उनकी बुद्धिमानी के चर्चे मीलो तक थे। संत दिन रात प्रत्येक पल भगवान् की भक्ति में लगे रहते थे। कठिन से कठिन तपस्या करते थे लेकिन *उन्हें सेवा में रूचि नहीं थी।* उन्हें लगता था कि *सेवा से ज्ञान नहीं मिलता। केवल ईश्वर के ध्यान से ही जीव तरता है।*

इसलिए वे दिन रात ईश्वर भक्ति में तल्लीन रहते थे। ना उन्हें किसी अन्य से लेना था ना देना। ना किसी का भला करते थे और ना ही बुरा। ऐसे व्यक्ति से समाज को कोई खतरा नहीं होता। उन्हें लोग अच्छा ही मानते हैं। इसी कारण इनकी प्रसिद्धी सभी जगह थी।

एक दिन, संत अपनी साधना के लिए वट वृक्ष के नीचे बैठे। अचानक ही वही बैठे- बैठे उनके प्राण निकल गये। मृत्यु के बाद जब उनके सामने चित्रगुप्त आये तो उन्होंने संत को कहा- *हे तपस्वी! तुम्हारी तपस्या और ईश्वर भक्ति को देख कर, तुम्हे एक कुलीन, प्रतिष्ठित परिवार में अगला जन्म दिया जायेगा।*

यह सुनकर संत दुखी स्वर में बोले – *हे चित्रगुप्त! मैंने वर्षो तपस्या की, उसमे कोई कमी नहीं रखी। किसी प्राणी को दुःख नहीं दिया। फिर भी मुझे मोक्ष की प्राप्ति क्यूँ नहीं हो रही?* इस पर चित्रगुप्त ने संत को धर्मराज के सामने पैश किया।

संत ने अपनी सारी व्यथा धर्मराज से कही। अपने सारे धार्मिक कर्म कांड के बारे में विस्तार से कहा। यह सब सुनकर धर्मराज मुस्कराये और उन्होंने कहा – *हे वत्स! वास्तव में तुम असली धर्म को जान ही नहीं पाये। मुझे पता हैं तुमने कठिन से कठिन तप किया। किसी को कष्ट नहीं दिया लेकिन तुमने न तो अपने आप को जाना और ना ही परोपकार किया।*

अपने अर्जित ज्ञान से किसी अज्ञानी की मदद नहीं की। किसी भटके राही को सही मार्ग नहीं दिखाया। वास्तव में तुम जानते ही नहीं हो कि सेवा भाव ही मानव जीवन का आधार होना चाहिये।*

इस तरह संत को अपनी भूल का ज्ञान हुआ और उन्होंने सेवा भाव को भी जीवन का लक्ष्य बनाने का प्रण लिया फिर उन्हें वर्षो बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई।

वास्तव में इन्सान को यह पता ही नहीं होता कि *मनुष्य का असली धर्म क्या है!* वो तो दिन रात सुने-सुनाई बातों में लगा रहता है! इसलिय यह समझना आवश्यक है कि – *अपने आप को जानना! ही असली धर्म है!* जो समय के सदगुरु से प्राप्त हो सकता है!
🙏🙏 🙏🙏

मन का पात्र शुद्ध कीजिए

❤️मन का पात्र शुद्ध कीजिए ❤️

एक साधु अपने एक शिष्य के साथ यात्रा को गया! मरुस्थल में मार्ग खो गया। बड़ी प्यास लगी थी। गला सूख रहा था।

किसी तरह खोज कर एक छोटा सा झरना मिल गया। बड़े प्रसन्न हुए। न केवल झरना मिला, बल्कि झरने के पास ही पड़ा एक पात्र भी मिल गया, क्योंकि उनके पास पात्र भी न था। उनके आनंद का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने उस पात्र में झरने का पानी भरा, लेकिन जब पीने गए तो वह इतना तिक्त और कड़वा था, जहरीला था, कि घबड़ा गए कि यह तो पीने लायक नहीं है और आगे निकल गए।

उस झरने को तो छोड़ा! जल की तलाश में निकल पड़े लेकिन पात्र को साथ ले लिया। दूसरे झरने पर जाकर पानी पीया, वह भी जहरीला था। अब तो बहुत घबरा गए कि मौत निश्चित है। जल सामने है, पी नहीं सकते। कण्ठ सूख रहा है। बेबस से फिर चलने लगे।

तीसरे झरना भी मिल गया! पात्र में जल भरा, लेकिन पानी पीया तो वह भी कड़वा था। वह बहुत हैरान और हताश हो गये पर तीसरे झरने पर एक और आदमी, एक साधु बैठा था। उससे उन्होंने कहा कि *हमें समझ नहीं आ रहा कि यह मामला क्या है।*

अपनी व्यथा उस साधु को बतायी। उस साधु उन्हें ने गौर से देखा और कहा कि *झरने का जल तो कड़वे नहीं है , जरूर तुम्हारे पात्र में कुछ खराबी होगी। क्योंकि मैं तो इन्हीं झरनों के जल पी कर जी रहा हूं। तुम झरने से सीधा पानी पीओ, इस पात्र में जल मत भरो।*

सीधा पानी पीया तो *ऐसा मीठा पानी कभी पीया ही न था।* इसका मतलब वह पात्र गंदा था। उस पात्र के संसर्ग में आते ही शुद्ध और मीठा जल भी ग्रहण करने योग्य नहीं रहता था।

यही हम सब की दुविधा है।अपना ही पात्र स्वच्छ नहीं और हम‌ दूसरों को दोषी कहते हैं।
*यदि प्रभु को पाने की चाह है, भक्ति करनी है तो अपने मन रूपी पात्र को साफ करना अति आवश्यक है। भक्ति रूपी गंगा जल तभी तो आप ग्रहण कर सकेंगे।*

*मन से तृष्णा मरी नहीं, लालच गयो, न काम!*
*विषय कोठरी भरी पड़ी, कहां विराजें श्रीराम!!*
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❤️🙏❤️ ❤️🙏❤️

भक्तों की दरिद्रता

भक्तों की दरिद्रता

जगत-जननी पार्वतीजी ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो वे दौड़ी-दौड़ी ओघड़दानी शंकरजी के पास गयीं और कहने लगीं, “भगवन् ! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पिघलता। कम-से-कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर अपनी कई दिन की भूख शान्त कर रहा है।”

महादेव ने हँसते हुए कहा, “शुभे ! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ?”

माँ भवानी आश्चर्य से बोलीं, “तो क्या आपके भक्तों को उदर पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?”
श्रीशिवजी ने कहा, “परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।”

भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली, “बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?”

भर्तृहरि ने कहा, अवश्य! भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगाकर बैठे ही थे कि भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया, “बेटा ! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ! एक बुड्ढा पति भी है! उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।”

भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा।

उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी, “वत्स ! तुम कहाँ जा रहे हो?”

भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं।

माता बोलीं, “मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।”

प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा, “अभी तो आप अपनी और अपने पति की क्षुधा शान्त करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा? ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू?”

पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा, “मैं सर्वशक्तिमती हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।”

भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, “यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन-दुःखियों के लिए लगाता रहूँ और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।”

पार्वती जी “एवमस्तु” कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “भद्रे ! मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परन्तु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते हैं!
कहा भी है कि –
गो धन, गज धन, बाजी धन और रतन धन खान!
जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरी समान!!

मृत्यु के लिये प्रवेश!

मृत्यु के लिये प्रवेश!
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वाराणसी के एक गेस्ट हाउस का एकाउंट है, जहाँ लोग मृत्यु के लिए प्रवेश लेते हैं। इसे “काशी लाभ मुक्ति भवन” कहा जाता है।

एक हिंदु मान्यता के अनुसार यदि कोई काशी में अपनी अंतिम सांस लेता है, तो उसे काशी लाभ (काशी का फल) जो वास्तव में मोक्ष या मुक्ति है, प्राप्त होता है।

इस गेस्ट हाउस के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें रहने और मरने के लिए केवल दो सप्ताह की अनुमति है। इसलिए इसमें प्रवेश से पहले किसी को अपनी मृत्यु के बारे में वास्तव में निश्चित होना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति दो सप्ताह के बाद भी जीवित रहता है, तो उसे ये गेस्ट हाउस छोड़ना होता है।

उत्सुकतावश, मैंने वाराणसी जाने का फैसला किया, यह समझने के लिए कि उन लोगों ने क्या सीखा, जिन्होंने
न केवल मृत्यु को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार किया बल्कि एक निश्चित समय के साथ अपनी मृत्यु का अनुमान भी लगा लिया हो।

मैंने गेस्टहाउस में दो सप्ताह बिताए और प्रवेश करने वाले लोगों का साक्षात्कार लिया। उनके जीवन के सबक वास्तव में विचारोत्तेजक थे।

उसी माहौल में मेरी मुलाकात श्री भैरव नाथ शुक्ला से हुई, जो पिछले 44 वर्षो से मुक्ति भवन के प्रबंधक थे। इतने सालों में उन्होंने वहाँ काम करते हुए 12,000 से ज्यादा मौते देखी थीं।

मैंने उनसे पूछा, “शुक्ला जी, आपने जीवन और मृत्यु, दोनों को इतने करीब से देखा है। मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ कि आपके अनुभव क्या रहे।”

शुक्ला जी ने इस संबंध में मेरे साथ जीवन के 12 सबक साझा किये। लेकिन इस श्रृंखला में एक सबक, जिससे शुक्ला जी बहुत प्रभावित थे और जो मुझे भी अंदर तक छू गया, वह जीवन का पाठ है- “जाने से पहले सभी विवादों को मिटा दें।

उन्होंने मुझे इसके पीछे की एक कहानी सुनाई…

उस समय के एक संस्कृत विद्वान थे, जिनका नाम राम सागर मिश्रा था। मिश्रा जी छह भाइयों में सबसे बड़े थे और एक समय था जब उनके सबसे छोटे भाई के साथ उनके सबसे करीब के संबंध थे।

बरसों पहले एक तर्क ने मिश्रा और उनके सबसे छोटे भाई के बीच एक कटुता को जन्म दिया। इसके चलते उनके बीच एक दीवार बन गई, अंततः उनके घर का विभाजन हो गया।

अपने अंतिम वर्षों में, मिश्रा जी ने इस गेस्टहाउस में प्रवेश किया। उन्होंने मिश्रा जी को कमरा नं. 3 आरक्षित करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें यकीन था कि उनके आने के 16वें दिन ही उनकी मृत्यु हो जाएगी।

14वें दिन मिश्रा जी ने, 40 साल के अपने बिछड़े भाई को देखने की इच्छा जताई। उन्होंने कहा, “यह कड़वाहट मेरे दिल को भारी कर रही है। मैं जाने से पहले हर मनमुटाव को सुलझाना चाहता हूँ।”

16वें दिन एक पत्र उनके भाई को भेजा गया। जल्द ही, उनके सबसे छोटा भाई आ गए। मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ कर घर को बांटने वाली दीवार गिराने को कहा। उन्होंने अपने भाई से माफी मांगी।

दोनों भाई रो पड़े और बीच में ही अचानक मिश्रा जी ने बोलना बंद कर दिया। उनका चेहरा शांत हो गया और वह उसी क्षण वह चल बसे।

शुक्ला जी ने मुझे बताया कि उन्होंने वहाँ आने वाले कई लोगों के साथ इसी एक कहानी को बार-बार दोहराते हुए देखा है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि सारे लोग जीवन भर इस तरह का अनावश्यक मानसिक बोझा ढोते हैं, वे केवल अपनी यात्रा के समय इसे छोड़ना चाहते हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा की ऐसा नहीं हो सकता है कि आपका कभी किसी से मनमुटाव ना हो बल्कि अच्छा यह है कि मनमुटाव होते ही उसे हल कर लिया जाए। किसी से मनमुटाव, किसी पर गुस्सा या शक-शुबा होने पर उसे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रखना चाहिए और उन्हें हमेशा जल्द से जल्द हल करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि अच्छी खबर यह है कि हम जिंदा हैं, लेकिन बुरी खबर यह है कि हम कब तक जिंदा है, यह कोई नहीं जानता।

तो, चाहे कुछ भी हो, अपने मनमुटावों को आज ही सुलझा लें, क्योंकि
कल का वादा इस दुनिया में किसी से नहीं किया जा सकता है। सोचें…क्या कुछ ऐसा है या कोई है जिसके साथ हम समय रहते शांति स्थापित करना चाहते हैं?

“जब हमें किसी के साथ कड़वे अनुभव होते हैं, तब हमें क्षमा भाव अपनाकर भावनात्मक बोझ दूर कर लेना चाहिए।

एक बार किसी ने कबीर जी से पूछा कि – आप “किसको भज रहे हो जी?”

एक बार किसी ने कबीर जी से पूछा कि – आप “किसको भज रहे हो जी?”

कबीर जी ने कहा – “राम जी को”
फिर उसने पूछा गया “कौन से राम जी को?” क्योंकि मैंने सुना है राम तो कई हैं।

एक राम दसरथ कर बेटा
एक राम घट घट में लेटा,
एक राम है जगत पसारा
और एक राम है सभी से न्यारा।”

तो कबीर साहिब को हंसी आ गई और कबीर साहिब थोड़ा टेढ़ा बोल देते थे, यानी दिल पर चुभ जाये ऐसी बात।

तो उन्होंने कहा:–“तुम्हारी दृष्टि में राम चार है तो मेरी दृष्टि में तुम्हारे बाप भी चार है।”

व्यक्ति को गुस्सा आया और बोला कि महाराज ऐसे कैसे बोल रहे हो।

तो कबीर जी बोले कि भाई क्रोद्ध मत करो। मैं तुम्हे चारों गिना देता हूँ !

एक बाप तेरे चाचा को भाई,
एक बाप तेरे दादा को जायो
एक बाप तेरे नाना को जवाई
एक बाप तेरे फूफा को सालो।
तो उस आदमी ने कहा:- “महाराज ये तो चारो एक ही है।*

तब कबीर साहिब बोले जैसे ये चारों एक है, वैसे ही मेरो राम भी एक ही है!

सोई राम अवधेश का राजा
सोई राम दसरथ कर बेटा
सोई राम घट घट में लेटा
सोई राम है जगत पसारा
सोई राम है सभी से न्यारा।

अतः राम तो एक ही है।
जरूरत है उसका दीदार जीते जी अपने अंतरतम में करने की!
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काल के दूत आने पर

काल के दूत आने पर

एक साहब ने तोता पाल रखा था और उस से बहोत प्रेम करते थे!
एक दिन एक बिल्ली उस तोते पर झपटी और तोता उठा कर ले गई वो साहब रोने लगे!
तो लोगो ने कहा: भाई आप क्यों रोते हो? हम आपको दूसरा तोता ला देते हैं!

वो साहब बोले: मैं तोते की जुदाई पर नही रो रहा हूं।

उनसे पूछा गया कि फिर क्यों रो रहे हो?

वो साहब कहने लगे दरअसल बात ये है कि मैंने उस तोते को मंत्र सिखा रखा था और वो सारा दिन मंत्र रटता रहता था! आज जब बिल्ली उस पर झपटी तो वो मंत्र पढ़ना भूल गया और टाएं टाएं करने लगा! अब मुझे ये फिक्र खाए जा रही है कि मंत्र तो मैं भी पढ़ता हूँ लेकिन जब काल के दूत मुझ पर झपटेगें, न मालूम मेरी जबान से मंत्र निकलेगा या तोते की तरह टाएं-टाएं निकलेगी।

इसीलिए महापुरुष कहते हैं कि ज्ञान का अभ्यास करके इतना अभ्यस्त हो जाओ कि हर हर स्थिति में ध्यान परमात्मा में ही लगा रहे! भगवान के सिवाय और कुछ दिखाई न दे!

ध्यान रहे, कहीं ऐसा न हो कि अभ्यास की कमी के कारण हम भी तोते की तरह भगवान के नाम की जगह हाय-हाय करने लगें!

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हमारे संतों ने श्रद्धा को विश्वास से भी ऊपर का दर्जा दिया है। 

हमारे संतों ने श्रद्धा को विश्वास से भी ऊपर का दर्जा दिया है। विश्वास और अविश्वास दोनों ही तर्क से जीते हैं। इन दोनों का भोजन तर्क है। नास्तिक तर्क देता है कि ईश्वर नहीं है। आस्तिक तर्क देता है कि ईश्वर है। लेकिन दोनों ही तर्क देते हैं और तर्क पर ही भरोसा करते हैं। मतलब, विश्वास और अविश्वास दोनों ही तर्क से चलते हैं।

लेकिन श्रद्धा बहुत बड़ी अनुभूति का नाम है। श्रद्धा के सामने तर्क नाकाफी हैं। श्रद्धा की शुरुआत ही इस बात से होती है कि तर्क पर्याप्त नहीं हैं!*

जिस व्यक्ति को यह दिखने लग जाता है कि तर्क की सीमा से आगे कुछ और भी है, उस व्यक्ति का जीवन श्रद्धा से भरपूर हो जाता है।
क्योंकि वह जान जाता है कि जीवन खुद तर्क से बाहर की कहानी है।

अगर आप ना होते तो आप किसी से भी नहीं कह सकते थे कि मैं क्यों नहीं हूं? आप हैं तो आप किसी से पूछ नहीं सकते कि मैं क्यों हूं?

महापुरुषों ने गहरी राज की बात बताई है कि जिंदगी के पास कोई तर्क नहीं है! प्रेम बिना तर्क के है! प्रार्थना भी बिना तर्क के है। इस जीवन में जो भी गहरा और महत्वपूर्ण है, वह सब तर्क से समझ नहीं आ सकता! गहरी बातें तर्क की पकड़ में आती ही नहीं और तर्क चूक जाता है! जिसको तर्क के अतर्क का पता चल जाता है – उसके कदम श्रद्धा की ओर चल पड़ते हैं। क्योंकि जब तर्क देने वाली बुद्धि थक जाती है – तो भी जीवन चलता रहता है!

मन बुद्धि और तर्कों से परे का *परम सत्य बहुत विराट है। उसकी सीमायेँ बड़ी अनंत है। उस तक पहुंचने के लिए व्यक्ति को कहीं आने-जाने की भी जरूरत नहीं है केवल उसके अन्दर श्रद्धा होनी चाहिय!* इसीलिय ही कहा गया है कि – श्रद्धावान लभते ज्ञानम!

श्रद्धा से जब ज्ञान मिलता है तो उसके बाद गुरु के वचनों के पालन में भी श्रद्धापूर्ण भाव का होना जरुरी है! तभी सेवा, सत्संग और सुमिरण का आनन्द मिल सकता है!

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